कितना समय तो तंबाकू ही ले लेता है!

मैं अकसर इस बात पर ध्यान करता हूं कि प्रतिदिन अस्पताल में काम करते हुए हमारा कितना समय तो यह तंबाकू ही खा लेता है।

सरकारी अस्पताल में काम करता हूं और प्रतिदिन कुछ मरीज़ –कुछ तो बहुत ही छोटी उम्र के– ऐसे आ ही जाते हैं जिन के मुंह में तंबाकू, गुटखा, पानमसाला, बीड़ी, सिगरेट आदि से होने वाले कैंसर की पूर्वावस्था दिख जाती है। ऐसे में कैसे मैं अपने आप को इन लोगों के साथ १०-१५ मिनट बिताने से रोक पाऊं। और बिना इतना समय बिताए बात बनती दिखती नहीं।

पहले तो मैं इन लोगों के मुंह के उस हिस्से का फोटो लेता हूं ..फिर उसे उन्हें दिखा कर यह समझाने की कोशिश करता हूं कि तंबाकू ने किस तरह से मुंह के अंदर की चमड़ी को खराब कर दिया है और किस तरह से आगे इसे बदतर होने से बचाया जा सकता है।

उस समय वे लोग बड़े रिसैप्टिव जान पड़ते हैं –हर बात ध्यान से सुनते हैं और लगता है कि आज के बाद ये लोग इन सब पदार्थों का सेवन बंद कर देंगे। हमें बातचीत करते अहसास तो हो ही जाता है कि कौन हमारी बात पर अमल करेगा और कौन यूं ही बस सुन रहा है क्योंकि कोई कह रहा है!

मुझे बहुत बार लगता है कि किसी बंदे की लाइफ़ से तंबाकू को दूर करना अपने आप में एक बड़ा काम है। और सरकारी अस्पतालों के डाक्टर तो इस में विशेष भूमिका निभा सकते हैं।

सरकारी और प्राईव्हेट डाक्टरों में मैंने यहां इसलिए डिफरैंशिएट किया क्योंकि भारत में कम से कम प्रिवेंटिव सलाह का कोई खरीददार तो है नहीं….अर्थात् किसी को इस तरह की बातें बेचना कि आप लोग तंबाकू को छोड़ कर किस तरह से अनेकों बीमारियों से बच सकते हैं, यह सब किसी की कहना… सुनने वाला सोचता होगा कि इस में नया क्या है, घर में सभी तो मेरे को यही बातें कह रहे हैं तंबाकू छोड़ने के लिए और मैं भी कोशिश तो कर ही रहा हूं इतने वर्षों से छोड़ने के लिए!

प्राईव्हेट प्रैक्टिस करने वाले डाक्टर से यह उम्मीद करना कि वह किसी मरीज़ को समझाने-बुझाने में १५-२० मिनट लगाए और उसे इस के लिए कम से कम ४००-५०० रूपये की फीस मिले …मुझे तो यह नहीं लगता। कौन देगा इस तरह की सलाह की फीस, बेशक इस तरह का परामर्श बेशकीमती तो है ही, लेकिन फिर भी कोई फोकट में यह सब बांट रहा हो तो मज़बूरी है लेकिन अगर इस सलाह के लिए पैसे-वैसे देने पड़ें तो ना..बाबा ना…हमें नहीं चाहिए यह नसीहत की घुट्टी। अपने आप छोड़ लेंगे, यह लत छोड़ने की कोशिश तो कर ही रहे हैं, कोई बात नहीं…कम ही पीते हैं।

इसलिए यह आशा नहीं करनी चाहिए कि प्राईव्हेट में कोई डाक्टर मुफ़्त में इतना इतना समय हर तंबाकू इस्तेमाल करने वाले के साथ बिताएगा… और वह इस के लिए अपने अन्य मरीज़ों का समय इस्तेमाल करेगा, ऐसा कैसे हो सकता है। अब एक डैंटिस्ट की ही बात कीजिए, अगर वह इस काम में लगा रहेगा, तो उस के अन्य मरीज़ –फिलिंग, आरसीटी, औक क्रॉउन लगवाने वाले मरीज़ों का क्या होगा, भाई उस ने भी अपने परिवार का भरन-पोषण करना है।

सारा दिन तंबाकू एवं अन्य ऐसे उत्पादों के बुरे प्रभावों के प्रति सचेत करते इतना समय निकल जाता है कि कईं बार तो झल्लाहट होने लगती है…..यार सारा कुछ तो इन वस्तुओं की पैकिंग पर लिखा रहता है कि इस के खाने से जान जा सकती है, कैंसर हो सकता है और अब तो इतनी भयानक तस्वीरें भी इन के ऊपर छपने लगी हैं, और सब से ज़्यादा दुःख तब होता है कि जब किसी मरीज़ से पूछो कि तुम्हें पता है कि इसे खाने से क्या होता है…तो वह तुरंत कह देता है ..हां, हां, वह सब तो पैकेट के ऊपर लिखा तो रहता ही है।

पता नहीं कितने लोग हमारी बात सुन कर उसे मानते भी होंगे …. अपने घर में तो हम लोग बदलाव ला नहीं पाए, मैं पिछले २५-३० वर्षों से अपने बड़े भाई को धूम्रपान के लिए मना कर रहा हूं लेकिन उन्होंने भी नहीं छोड़ो…हां, हां, मैंने बहुत कम कर दिए हैं, अब सिर्फ़ चार-पांच सिगरेट ही लेता हूं…..लेकिन ज़हर तो ज़हर है ही!

एक श्रेणी और भी दिखती है जिन्हें तंबाकू आिद के सेवन से कोई भयंकर रोग हो जाता है…बहुत भयंकर, आप समझ सकते हैं मैं क्या कहना चाह रहा हूं …और बड़े गर्व से कहते हैं कि पंद्रह दिन से तंबाकू भी बिल्कुल छोड़ दिया है। लेकिन जब चिड़िया खेत पहले ही चुग कर जा चुकी है तो बाद में पछताने से तो लकीर को पीटने वाली बात ही लगती है। इसलिए शाबाशी तो दूर, उन की इस बात पर कोई मूक प्रतिक्रिया तक देने की इच्छा नहीं होती।

सब से बढ़िया है कि हर प्रकार के तंबाकू प्रोडक्ट से कोसों दूर रहा जाए, यह आग का खतरनाक खेल है, छोटी छोटी उम्र में लोगों को इस से तिल तिल मरते देखा है।

कितनी जगहों पर तो प्रतिबंध लगा है इन सब वस्तुओं की बिक्री पर लेकिन हर जगह धड़ल्ले से बिक रहा है, खुले आम लोग खरीद खरीद कर बीमार–बहुत बीमार हुए जा रहे हैं।

दो वर्षों में भी अपना काम कर लेता है गुटखा

कल मेरे पास एक १८ वर्षीय युवक आया..देखने में वह लगभग २५ के करीब लग रहा था, मैंने पूछा कि क्या जिम-विम जाते हो, उसने जब हां कहा तो मैंने पूछ लिया कि कहीं बॉडी-बिल्डिंग वाले पावडर तो नहीं लेते। उसने बताया कि नहीं वह सब तो नहीं लेता, लेकिन घर में गाय-भैंसें हैं, इसलिए अच्छा खाते पीते हैं।

बहरहाल उस का वज़न भी काफ़ी ज़्यादा था, इसलिए मैंने उसे संयम से संतुलित आहार लेने की ही सलाह दी। लेकिन अभी उस समस्या के बारे में तो बात हुई नहीं जिस की वजह से वह मेरे पास आया था।

वह मुंह में छालों से परेशान था और उस का मुंह पूरा नहीं खुलता, इस लिए वह परेशान था। मेरे पूछने पर उस ने बताया कि वह गुटखा-पान मसाला पिछले दो वर्षों से खा रहा है, और लगभग १० पाउच तो रोज़ ले ही लेता है लेकिन पिछले ७ दिनों से उसने ये सब खाना बंद कर दिया है क्योंकि मुंह में जो घाव हैं उन की वजह से उन्हें खाने में दिक्कत होने लगी है।

इतने में उस की अम्मी ने कमरे के अंदर झांका तो मैंने उन्हें भी अंदर बुला लिया।

मैंने उस का पूर्ण मुख परीक्षण किया और पाया कि इस १८ वर्ष के युवक को ओरल-सबम्यूक्सफाईब्रोसिस की बीमारी है…यह गुटखे-पानमसाले के सेवन से होती है ..धीरे धीरे मुंह खुलना बंद हो जाता है और मुंह की चमड़ी बिल्कुल चमड़े जैसी सख्त हो जाती है ..और मुंह में घाव होने की वजह से खाने पीने में बेहद परेशानी होती है।

१८ वर्ष की उम्र में इस तरह के मरीज़ हमारे पास कम ही आते हैं……आते तो हैं लेकिन इतनी कम उम्र में यह कम ही आते हैं……ऐसा नहीं है कि यह बीमारी इस उम्र में हो नहीं सकती, ज़रूर हो सकती है और होती है। मैंने इसे १२ वर्षीय एक लड़की में भी देखा था जो राजस्थान से थी और बहुत ही ज़्यादा लाल-मिर्च खाया करती थीं। जी हां, यह बीमारी  उन लोगों में भी होती है जो लोग बहुत ज़्यादा लाल-मिर्च का सेवन करते हैं।

२०-२१ वर्ष के युवकों में तो यह बीमारी मैं पहले कईं बार देख चुका हूं और वे अकसर कहते हैं कि वे पिछले पांच सात वर्षों से गुटखे का सेवन कर रहे हैं। लेकिन शायद यह मेरे लिए यह पहला ही केस था कि उस युवक ने दो वर्ष ही गुटखे का सेवन किया और इस बीमारी के लफड़े में पड़ गया।

मैंने उस से दो तीन बार पूछा कि क्या वह दो वर्षों से गुटखा-पानमसाला खा रहा है, उस ने बताया कि हां, बिल्कुल, दो वर्षों से ही वह इन सब का सेवन कर रहा है। वह इंटर में पढ़ता है। बताने लगा कि दसवीं तक तो स्कूल में बड़ी सख्ती थी, हमारे स्कूल-बैग कि अचानक तलाशी ली जाती थी, इसलिए कक्षा दस तक तो इन के सेवन से बिल्कुल दूर ही रहा। लेकिन ग्याहरवीं कक्षा में जाते जाते इस की लत लग गई।

मैंने उसे बहुत समझाया कि अब इसे नहीं छूना….लगता है समझ तो गया है, वापिस पंद्रह दिन बाद बुलाया है।

दुःख होता है जब हम लोग इतनी छोटी उम्र में युवाओं को इस मर्ज़ का शिकार हुआ पाते हैं…..जैसा कि मैं पहले कईं बार अपने लेखों में लिख चुका हूं कि यह बीमारी कैंसर की पूर्वावस्था है (oral precancerous lesion)……कहने का अभिप्रायः है कि यह कभी भी कैंसर में परिवर्तित हो सकती है।

और धीरे धीरे कितने वर्षों में यह कैंसर पूर्वावस्था पूर्ण रूप से कैंसर में तबदील हो जाएगी और किन लोगों में होगी, यह कुछ नहीं कहा सकता …जैसे कि कल मैंने १८ वर्ष के युवक में इस अवस्था को देखा और कईं बार ३०-३५ वर्ष के युवाओं में यह तकलीफ़ कईं कईं वर्ष के गुटखे सेवन के बाद यह तकलीफ़ होती है, इन के लिए िकसी भी व्यक्ति की इम्यूनिटि (रोग प्रतिरोधक क्षमता), उस ने कितने गुटखे खाए, उस के खान-पान का सामान्य स्तर कैसा है…. बहुत सी बातें हैं जो यह निश्चित करती हैं कि कब कौन कितने समय में इस अजगर की चपेट में आ जाएगा।

इतना पढ़ने के बाद भी अगर किसी का मन गुटखा-पानमसाला मुंह में रखने के लिए ललचाए तो फिर कोई उस को क्या कहे…………..दीवाना और क्या!! जान के भी जो अनजान बने, कोई उस को क्या कहे, दीवाना, है कि नहीं?

 

मुंह न खोल पाना एक गंभीर समस्या….ऐसे भी और वैसे भी !

तीन चार दिन पहले मैं रेल में यात्रा कर रहा था.. एसी डिब्बे में ..लखनऊ से दिल्ली तक तो सब ठीक लगा ..लेकिन दिल्ली से आगे डेढ़ एक घंटे के सफ़र के दौरान अजीब सी बैचेनी होने लगी.. यह मेरे साथ पहली बार नहीं हुआ.. कभी कभी हो ही जाता है…अगर एसी का तापमान ठीक ढंग से सेट न किया जाए, तो अजीब सा लगता है ..आधे सिर में थोड़े थोड़े सिरदर्द से शुरू होता है … और एसिडिटी फिर इतनी बढ़ जाती है कि जब तक उल्टीयां न हो जाएं, चैन नहीं पड़ता।

बस के सफ़र के दौरान तो मोशन-सिकनैस का मैं बचपन से ही शिकार रहा हूं. लेकिन उस के लिए मैंने कुछ सालों से एक जुगाड़ सा कर लिया है.. एवोमीन (Avomine)  की एक गोली बस में चढ़ने से 30-40 मिनट पहले ले लेता हूं। और बस फिर कोई समस्या ही नहीं होती। लेिकन ट्रेन सफ़र के दौरान यह जो दिक्कत हो जाती है ..उस के लिए एक तो यह कईं बार एसी-वेसी का टैम्परेचर कंट्रोल और कईं बार मेरी बाहर कहीं भी न चाय पीने की आदत है।

घर के अलावा मैं चाय केवल वहीं पीता हूं जहां मेरा मन मानता है, वरना कहीं भी नहीं। इसलिए कईं बार चाय की विदड्रायल से भी ऐसा हो ही जाता है।

लेकिन एक बार जब इस तरह से तबीयत नासाज़ होती है तो फिर कईं कईं घंटे लग जाते हैं.. दुरूस्त होने में……..चलिए अपना दुःखड़ा रोना बंद करूं……बोर हो जाएंगे…

असली बात यह है कि उस दिन जब मैं इन उल्टीयों से परेशान था, बार बार मुंह खोल खोल कर अपनी परेशानी से निजात पाने की कोशिश कर रहा था तो मेरा ध्यान मेरी ही उम्र यानि ५०-५१वर्ष के उस बंदे की तरफ़ गया जिस का मुंह खुलना बिल्कुल बंद हो गया था।

वह मुझे मेरे एक परिचित के पास मिला था.. साथ में उस की २०-२१ वर्ष की बेटी.. हाथ में एक्स-रे एवं अन्य रिपोर्टों का थैला उठाया हुआ, साथ में ही उस की पत्नी भी थी… ग्रामीण पृष्टभूमि से …लेकिन अपने पति की तबीयत के बारे में बेहद चिंतित…हर बात ध्यान से सुनती हुई लेकिन बहुत कम बोलने वाले महिला….उस बेटी को भी अपने बापू की सेहत की बेहद चिंता थी।

इस ५० वर्षीय आदमी को हुआ यह कि यह रोज़ाना बहुत से पान-मसाले गुटखे खाया करता था …लगभग २०-२५ वर्ष से यह सब कुछ खा रहे हैं.. लेकिन अब पिछले कुछ वर्षों से इन का मुंह पूरा नहीं खुल पाता था…इसलिए खाने पीने में दिक्कत होती तो थी लेकिन जैसे तैसे काम चल ही रहा था लेकिन पिछले एक सप्ताह से तो इन का मुंह लगभग खुलना बिल्कुल बंद हो गया है, बस मामूली सा खुलता है ..लेकिन इतना कि उस खुले मुंह में एक ग्लूकोज़ का पतला बिस्कुट भी नहीं जा पाए….और अगर जैसे तैसे दूध-चाय में नरम कर के अंदर धकेल भी दिया जाए तो वह उसे चबा ही न पाए।

बहुत से डाक्टरों को वे इन दिनों दिखा चुके थे .. ईएऩटी स्पैशलिस्ट, जर्नल सर्जन सभी केी पर्चियां उन के पास थीं, दवाईंयां जैसे तैसे वह मुंह में धकेल लिया करता  था…..

उस दिन जब मेरी तबीयत खराब थी तो उस बंदे की हालत का ध्यान आते ही मेरा मन दहल जाता था… जैसा कि मैंने बताया कि वह बस नाम-मात्र ही मुंह खोल पा रहा था लेकिन वह थोड़ा बहुत बोल तो पा ही रहा था ..मैं उस की बात समझ रहा था..

खाने के नाम पर पिछले सात दिनों से थोड़ा बहुत दूध, ज्यूस आदि ……चेहरा बिल्कुल खौफ़जदा पीला पड़ा हुआ.. उस की बेटी ने यह बताया कि इन्हें डर है कि मैं अगर खाऊंगा या खाने की कोशिश भी करूंगा तो मुझे उल्टी जैसा हो जाएगा और फिर उल्टी करने के लिए मेरे से मुंह खोला नहीं जायेगा तो मैं क्या करूंगा। जब मैंने भी इस बात की कल्पना की तो मैं भी कांप उठा, लेकिन मैंने उन्हें ढ़ाढ़स बंधाए रखा कि चिंता न करें, सब ठीक हो जाएगा। 

मेरे परिचित यह जानना चाहते थे कि क्या इन्हें टैटनस या कैंसर आदि तो नहीं है, मैंने समझाया कि नहीं टैटनस नहीं है, यह गुटखे-पानमसाले से होने वाली एक बीमारी है.. इसे सब-म्यूकस फाईब्रोसिस कहते हैं..इस में मुंह धीरे धीरे खुलना बंद हो जाता है … और मुंह की चमड़ी बिल्कुल चमड़े जैसी हो जाती है। इस व्यक्ति  के मुंह के अंदरूनी भाग बिलकुल सूखे चमड़े जैसे सख्त हो चुके थे…..मुंह के अंदर कोई औज़ार आदि डाल कर उसे देखना तक संभव न था। मुंह की इस अवस्था के बारे में मेरे कईं लेख मेरे विभिन्न ब्लॉगों ने सहेज रखे हैं।

मैंने उन सब को अच्छे से समझा दिया कि जगह जगह डाक्टरों के पास जाने की ज़रूरत नहीं है, यहां पर एक सरकारी डैंटल कालेज अस्पताल है, वहां पर एक विभाग होता है..ओरल सर्जरी .. उन के अनुभवी डाक्टरों का रोज़ का काम है इस तरह के मरीज़ों को देखना और उन की मदद करना। वे इस तरह के मरीज़ों के इलाज में सक्षम होते हैं…….वे मुंह के अंदर कुछ टीके आदि लगा कर मुंह को खोलने की कोशिश करते हैं……..फिर आप्रेशन के द्वारा मुंह के अंदर की जकड़न को मिटाने का प्रयास करते हैं। कहने का मतलब एक ओरल सर्जन (डैंटल सर्जन जिन्होंने ओरल सर्जरी में एमडीएस की होती है) ही इस का सब से बेहतर इलाज कर सकता है।

गुटखा इस बंदे ने छोड़ तो दिया है…….लेकिन इतनी देर से, यह देख कर बहुत दुःख हुआ। वैसे तो इसे कैंसर की एक पूर्वअवस्था ही कहते हैं…..(प्री-कैंसर अवस्था) …लेकिन अगर समुचित इलाज हो जाए और गुटखे पानमसाले की लत को हमेशा के लिये लत मार दी जाए तो बहुत से मरीज़ों को अच्छा होते देखा है। वरना अगर डाक्टर की बात माननी नहीं  तो इस तरह की ओरल प्री-कैसर अवस्था भी क्या किसी तरह से कैंसर से कम है?

….  न आदमी खा-पी पाए.. न ही मुंह की सफ़ाई, कुल्ला तक कर नहीं पाए, और हर समय यही टेंशन की अगर उल्टी आने को हो तो क्या होगा, यह सब कुछ सुनना क्या किसी के भी मन में इस भयानक गुटखे-पानमसाले के प्रति नफ़रत पैदा करने के लिए काफ़ी नहीं है।

अगर मेरी कही बात की कुछ भी तासीर है तो अगर इसे पढ़ कर आप में से एक ने भी गुटखे-पानमसाले से हमेशा के लिए तौबा कर ली, तो मेरी मेहनत सफ़ल हो गई, वरना मुझे तो अपना काम करना ही है…..कोई सुने या ना सुने, क्या फ़र्क पड़ता है!

यार यह क्या, पब्लिश का बटन दबाते ही ध्यान आ गया इस पोस्ट के शीर्षक का… ऐसे मुंह नहीं खुलना तो एक गंभीर समस्या है ही, तो फिर वैसे मुंह न खुलना क्या हुआ। वैसे मुंह न खुलने का मतलब यह कि अन्याय, शोषण के प्रति मुंह न खोलना…वह भी एक खतरनाक लक्षण है…..इसी की वजह से ही देश में कईं तथाकथित बाबाओं ने बच्चियों तक का शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक शोषण कर डाला …और जब एक निर्भीक परिवार की बच्ची ने मुंह खोला तो कैसे तहलका मच गया…बाबा भी अंदर, लाडला भी अंदर…….जिस तरह की करतूतों से पर्दाफाश हो रहा है आए दिन उस से तो यही लगता है कि यह खुद को बाबा कहलवाते हैं लेकिन क्या ये मानस भी हैं ?…..इतने ठाठ-बाठ से इतने ऐश्वर्य से ये भोगी बाबा क्या क्या नहीं कर डालते होंगे …ज़ाहिर सी बात है कि जो सामने आता है वह तो आटे में नमक के समान ही होता है……….और यह थी वैसे मुंह खोलने वाली बात………

अब मुझे दे इज़ाज़त….मेरा मुंह भी बार बार खुल रहा है … बड़ी बड़ी जम्हाईयों की वजह से।

अधिक जीते हैं क्रिएटिव लोग ..

काफी दिन पहले एक समाचार पत्र में यह स्पेशल रिपोर्ट पढ़ी थी..

पसंद का काम करने और खुश रहने से मानसिक, शारीरिक सेहत अच्छी रहती है।

अमेरिका के न्यूयॉर्क की एक शानदार इमारत का निर्माण एक अत्यंत बुजुर्ग व्यक्ति ने किया है। प्राकृतिक रोशनी से आलोकित और बर्फ़ जैसे सफ़ेद रंग से जगमगाते भवन के पीछे फ्रेंक लॉयड राइट की कल्पना शक्ति झांकती है। राइट ने १९४३ में भवन का डिजाइन बनाना शुरू किया तब जब वे ७६ वर्ष के थे।

गोया ने अपनी सर्वाधिक खूबसूरत पेटिंग ७०वर्ष की अधिक आयु में बनाई थी।

गोएथ की उत्कृष्ट रचना फाउस्ट ८१ वर्ष की अायु में लिखी गई।

गैलीलियो की एक महत्वपूर्ण खोज ७४ वर्ष की आयु में पूरी हुई थी।

अमेरिकी अभिनेत्री मैगी स्मिथ ७८ वर्ष की हो चुकी हैं, फिर भी फिल्मों और टीवी सीरियल में काम कर रही हैं।

८३ साल के वारेन बफेट कारोबार की दुनिया में झंडे गाड़ रहे हैं।

९१ साल की आयु में दुनिया से विदा लेने वाले पाब्लो पिकासो अंत तक पेन्टिग करते रहे।

९८ वर्ष के हरमन वूक ने अपना नया उपन्यास पिछले साल पूरा किया था।

१०० साल तक जीने वाले कामेडियन जॉज बन्रर्स ने ९५ साल की आयु में दो साल का एक कांट्रेक्ट किया था।

मेरे नाना जी ८० वर्ष की ऊपर अवस्था में भी ट्यूशन पढ़ाते थे…….यह १९८० के दशक के शुरूआती दिनों की बात है।

बात आस्था की..

मुझे आज एक बार फिर से यह अहसास हुआ कि हमारी उम्र इतनी बड़ी हो गई लेकिन हम लोग अपने देश के बारे में कितना कम जानते हैं, कुछ खास नहीं जानते।  चलिए आप से पूरी बात साझी कर लेता हूं।

मैं आज शाम को साईकिल पर टहल रहा था, साईकिल की एक दुकान पर रूक गया.. उस की ब्रेक ठीक से नहीं लग रही थी। यह साईकिल की दुकान एक मस्जिद के दरवाजे के बिल्कुल बाहर है।

शाम की अज़ान का समय होने वाला था, तो मस्जिद के गेट पर कुछ महिलाएं इक्ट्ठी होनी शुरू हो गईं.. दो-तीन-चार..पांच..इन की गिनती बढ़ती जा रही थी। और लगभग हर महिला की गोद में एक छोटा सा बच्चा दिखाई दिया।

lko1जैसा कि अकसर होता है ..मेरे जैसे लोग आज कल कुछ ज़्यादा ही टैक-सेवी होने का ढोंग करते दिखते हैं ..है कि नहीं? …इसलिए मैं उस साईकिल की दुकान के जिस बैंच पर बैठा हुआ था, वहां से एक तस्वीर खींच ली, जिसे आप यहां ऊपर देख रहे हैं।

और तुरंत इसे फेसबुक पर अपलोड कर दिया। और उस फोटो के साथ अपनी बेवकूफ़ी से भरी बात भी कह डाली.. अंग्रेज़ी में …लखनऊ के किसी धार्मिक स्थल के बाहर दानवीरों की इंतज़ार में।

इतने में क्या हुआ … नमाज़ अदा करने के बाद बंधु बाहर निकलने शुरू हो गये.. मैं देखना चाह रहा था कि क्या ये लोग इन महिलाओं को कुछ दान-वान देंगें क्या ! किसी को देखा नहीं किसी को दान देते लेकिन अचानक मैंने देखा कि ज़्यादातर मुस्लिम भाई-बुज़ुर्ग जो बाहर निकल रहे थे ..वे हर महिला के बच्चे के मुंह पर फूंक मार कर आगे निकल रहे थे। दो-तीन-चार — मेरी उत्सुकता बढ़ती गई… यार, यह क्या चल रहा है, मेरे से रहा नहीं गया। सब से पहले तो इस तस्वीर को मैंने फेसबुक पेज़ से तुरंत डिलीट किया क्योंकि यह बात वह नहीं थी जो मैं सोच रहा था।

उस साईकिल रिपेयर दुकानवाला भी मुस्लिम भाई था। मैंने उस से पूछा कि ज़रा यह तो बताओ कि ये लोग हर बच्चे के मुंह के ऊपर फूंक क्यों मार रहे हैं। उस ने तुरंत जवाब दिया… जिन बच्चों को नज़र जल्दी लग जाती है, उन की  माताएं अपने बच्चों की नज़र उतरवाने के लिए शाम की नमाज़ के समय इन्हें ले कर यहां आती हैं… और इस से इन के बच्चों को नज़र नहीं लगती।

दुकानदार ने आगे बताया कि यह फूंक मारने तक तो ठीक है, लेकिन कुछ माताएं पानी या दूध के गिलास भी साथ लेकर आती हैं, और फिर उन में भी फूंक मरवाने की ख्वाहिश रखती हैं। लेकिन उस ने बताया कि वह उन को ऐसा दूध या पानी में फूंक मरवाने से मना करता रहता है। मेरे प्रश्न को भांप लिया शायद उसने…अपने आप ही कहने लगा कि आप स्वयं ही देखो कि मेरे जैसा ५० का आदमी दूध-पानी में फूंक मारेगा तो ज़रासीम (कीटाणु) भी १-२ साल के बच्चों के शरीर में जाने के इमकाईनात रहते हैं। मैं उस की बात ध्यान से सुन रहा था……कहने लगा कि हमें तो अपने बच्चों का भी मुंह नहीं चूमना चाहिए….कहने लगा मुंह से मतलब कि ऐसे नहीं चूमना चाहिए कि हमारी लार बच्चे के मुंह में चली जाए……..मैं उस की बात से पूरी तरह इत्तफाक रखता हूं।

मैं यही सोचने लगा कि बातें तो यह सारी बड़े पते की कर रहा है… अभी मैं इतनी बात कर ही रहा था कि देखते ही देखते जो १०-१२ बच्चों वाली महिलाएं तुरंत अपने अपने घर लौट रही थीं।

एक बात ध्यान से मैंने नोटिस की ये सभी मुस्लिम वर्ग की महिलाएं ही न थीं, जो मैंने समझा। इस देश में आम आदमी तो बिल्कुल प्रेम, भाईचारे और तखल्लुस से रहते हैं, मैं देख रहा था जिस शिद्दत से वे नमाज़ी बंधु इन बच्चों के चेहरों पर फूंक मार रहे थे ..ऐसे लग रहा था कि इन के अपने ही बच्चे हैं ये सब। अच्छा लगा यह सब देख कर।

मैं सोच रहा था कि हमें स्वयं भी और अपने बच्चों को भी सभी धर्म के धार्मिक स्थलों पर लेकर जाना चाहिए….इस से हमें एक दूसरे को अच्छे से समझने में मदद मिलेगी, प्यार बढ़ेगा। लेकिन जो अकसर देखने में आता है कि एक धर्म का बंदा दूसरे धर्म के धार्मिक स्थान से इस तरह से थोड़ा झिझक कर, शायद थोड़ा कहीं न कहीं डर कर निकलता है जैसे कर्फ्यू लगा हुआ है। नहीं, यह झिझक हमें दूर करनी होगी…….मैं जितना मंदिर में जाना पसंद करता हूं, उतना ही गुरूद्वारे और चर्च में जाना भी मुझे अच्छा लगता है, पीरों की जगह पर, दिल्ली की जामा मस्जिद (बाहर बाहर से), हज़रत निजामुद्दीन ओलिया,  बंबई के हाली अली दरगाह पर जा चुका हूं, इधर लखनऊ में बड़े इमामबाड़े में स्थित मस्जिद में ही हो कर आया हूं. लेकिन सोचता हूं मस्जिदों में और भी जाना चाहता हूं……..

लेकिन आप को अपना अनाड़ीपन  बता दूं …मुझे यही नहीं पता कि क्या गैर मुस्लिम समुदाय के लोग मस्जिद में जा कर प्रार्थना कर सकते  हैं, शायद मेरी यही झिझक है, मुझे यह भी नहीं पता कि वहां पर किस तरह से सजदा करते हैं, बस यही बातें रोक लेती हैं…और हिमाकत से भरी यह बात कि आज लिखते हुए इस बात का ध्यान आ गया ..कभी किसी से इस के बारे में चर्चा करने की शायद ज़रूरत ही नहीं समझी…… बड़े इमामबाड़े में भी जिस समय गया वहां पर मस्जिद बिल्कुल खाली पड़ी थी। लेकिन मुझे पता है कि किसी भी धार्मिक जगह पर कोई कोड-ऑफ-कंडक्ट नाम की चीज़ नहीं होती, हम अपने मन में ही ख्यालों का पुलाव बना कर पकाते रहते हैं।

चलिए अब सोचता हूं कि अपने मित्र ज़ाकिर अली के साथ मस्जिदों में खूब जाऊंगा।

और एक बात, यह पोस्ट आस्था की थी, मैंने साईंस के बारे में कोई बात नहीं की…..इस की साईंस पर किसी दूसरे दिन बात कर लेंगे, क्या जल्दी है। बस, अभी तो इतना ध्यान आ रहा है कि नज़र तो हमारी भी उतरती रही है, कभी मां ने तो कभी उम्र में १० वर्ष बड़ी बहन बचपन में मुझे अच्छे से तैयार-वैयार कर के, केश सज्जा कर के और पावडर इत्यादि लगा कर मेरे मुंह पर सुरमचू (सुरमे दानी का वह हिस्सा जिस से हम सुरमा डाला करते थे) से नज़र बट्टू कभी कभी लगा दिया करती थीं….. बुरी नज़र से बचाने के लिए।

 

 

कोलेस्ट्रोल कम करने वाली दवाईयां — हां या ना..

न ही तो मैं इस प्रश्न का उत्तर दे पाने के लिए क्वालीफाईड हूं और न ही इस के बारे में किसी तरह का विशेष ज्ञान अथवा अनुभव है लेकिन फिर भी एक साफ़ सी तस्वीर तो सामने रख ही सकता हूं जिस के लिए मैं प्रोफैशनली ओवर-क्वालीफाइड भी हूं।

पिछले कईं महीनों में कईं बार इन कोलेस्ट्रोल कंट्रोल दवाईयों जिन्हें स्टेटिंस भी कहते हैं, काफी कुछ नेट पर देखने-पढ़ने को मिला।

आज सुबह टाइम्स ऑफ इंडिया में इस खबर का शीर्षक दिखा…. Wonder drug statin saves 40-plus diabetics from all heart troubles. इसे देखते ही मुझे दा हिंदु के एक आर्टीकल का ध्यान आ गया जो मैंने लगभग तीन सप्ताह पहले देखा था..वह पेपर अभी मेरी स्टडी-टेबल पर ही पड़ा हुआ था। उस का शीर्षक यह है .. A plant poison becomes a money spinner.  

यह जो दा हिंदु वाला आर्टीकल है, इसे प्रोफैसर बी एम हेगड़े ने लिखा है जो देश के एक प्रख्यात हृदय रोग विशेषज्ञ और मनीपाल यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस-चांसलर हैं…. इन्होंने इन दवाईयों की अच्छी पोल खोली है और अपने जीवन भर का अनुभव इस में शेयर कर दिया है।

प्रोफैसर हेगड़े के आर्टीकल के नीचे एक पैराग्राफ है जिसे मैं यहां हिंदी में लिखना चाहता हूं..

स्टेटेंस नामक दवाईयां एक बहुत बड़े उस षड़यंत्र का हिस्सा हैं जिस का उद्देश्य पब्लिक को बेवकूफ बनाना और उन की सेहत खराब करने है। सच्चाई यह है कि अधिकांश अध्ययनों से पता चला है कि ऐसे पुरूष उन महिलाओं की तरह दिल की बीमारी से ज्यादा मरते हैं अगर उन का कोलेस्ट्रोल लेवल नीचे होता है। फिर भी डाक्टर विश्व भर में करोड़ों पुरूषों को कोलेस्ट्रोल कम करने वाली दवाईयों के नुस्खे लिखने में व्यस्त हैं…    Campbell -Mcbride

मैं अकसर सोचता हूं कि लोगों के लिए सही डाक्टर का चुनाव करना वैसे ही कितना मुश्किल है ..है कि नहीं, हम सब जानते हैं पब्लिक एकदम कँफ्यूज है। छोटी से छोटी तकलीफ़ के लिए १०-१२ हज़ार के टेस्ट और वह भी किसी विशेष लैब से … क्या कहें…….ऊपर से इस तरह की खबरें जो बिल्कुल विपरीत बात कहती हैं …….पब्लिक के लिए निर्णय लेना कितना मुश्किल होता है।

तस्वीर सामने रखना मेरा काम है और वह मैंने कर दिया .. आखिर निर्णय लेगा कौन, मैं भी तय नहीं कर पा रहा हूं लेकिन मैं प्रोफैसर हेगड़े के आर्टीकल को ज्यादा विश्वसनीय मानता हूं …यह मेरे व्यक्तिगत विचार हैं …आप इस मामले में मेरे ओपीनियन से कृपया प्रभावित न हों, एक बार फिर से कह रहा हूं यह एक क्वालीफाइड ओपीनियन नहीं है. मुझे लगता है जैसे मैंने यह लिख कर अपना पल्ला झाड़ लिया है ……..लेकिन और कर भी क्या सकता हूं……….please find out your own answer!  करोड़ों अरबों रूपयों की ये दवाईयां बिक रही हैं।

Take care.. wish you pink of health…….

 

सुपर मार्कीट की दही से याद आया……

किसी भी सुपर मार्कीट में तरह तरह के ब्रांडों की दही, लस्सी, श्रीखंड आदि को देख कर यही लगने लगता है कि आखिर ये देश को परोस क्या रहे हैं, बड़े दिनों से मैं इस के बारे में सोच रहा था…

चलिए आप के साथ बीते दिनों की कुछ यादें ताज़ा कर लेते हैं… १९७० के दशक में यही १९७३-७४ के साल रहे होंगे..डीएवी स्कूल हाथी गेट, अमृतसर, हम लोग यही पांचवीं छठी कक्षा में पढ़ते होंगे…हमारे स्वर्गीय अजीज उस्ताद ..मास्टर हरीश चंद्र जी …आधी छुट्टी से दो चार मिनट पहले हम में से किसी को एक पोली थमाते (२५ पैसे के सिक्के को पंजाबी में पोली ही कहते हैं..अब तो बंद हो चुका है वह सिक्का ही) –मधुर, सतनाम, राकेश, भट्ट या फिर किसी की भी — ड्यूटी लगा देते कि जाओ दही लाओ… हमेशा उन के स्टील के रोटी के डिब्बे में एक डिब्बा खाली रहता था ..जिस में वह ताज़ा दही मंगवाते थे। और मेरे नाना जी भी मास्टर ही तो थे, वे भी अकसर आते वक्त अपने साथ बाज़ार से ताज़ा दही लाते थे… उन का खाना भी एक दम फिक्स..दो गर्मागर्म ताज़ा चपाती, एक कटोरी ताज़ी दाल-सब्जी, एक कटोरी दही ………बस।

पुराने दिनों की याद दिलाता यह दही का बर्तन

वैसे भी हम लोग दही अकसर बाज़ार में मिट्टी के बड़े बड़े बर्तनों में ही बिकता देखा करते थे…ज़माना बहुत ही बढ़िया था, अन्य बीमारियों की तरह यह लालच रूपी कोढ़ का भी नामोनिशान न था, लोग इतने शातिर न थे, बेईमानी के तरीके शायद न जानते होंगे… इसलिए उस बाज़ार की दही को भी कभी कभी खाना मन को भाता था।

होस्टल में रहते हुए तो कईं बार नाश्ते में आधा किलो दही में बर्फ़ चीनी डलवा के खाने का आनंद आ जाता था, सब कुछ बढ़िया तरीके से पचा भी लेते थे।

फिर कुछ साल बाद ये बातें सुनने में आने लगीं कि दूध में मिलावट होने लगी है, बाज़ार में बिकने वाली दही में  ब्लाटिंग पेपर मिला रहता है, लेकिन पता नहीं मुझे इस का कभी यकीं न हुआ… फिर भी बाज़ार में बिकने वाले दही से दूरी बढ़ने सी  लगी। और अभी कुछ साल पहले से जब से इस सिंथेटिक दूध और इस से बनने वाले विभिन्न उत्पादों के बारे में सुना तो बाज़ार में बिकने वाले दही-पनीर से नफ़रत हो गई।

ब्लिक की इस ऩफ़रत को भुनाने के लिए सुपर मार्कीट शक्तियां पहले ही से तैयार बैठी थीं…. इतनी तरह के दही के ब्रांड, पनीर आदि देख कर हैरानगी होती है। मान लेते हैं कि शायद सुपर मार्कीट से उठा कर अपने शापिंग कार्ट में इन्हें डालने वालों के लिए इन की कीमत कुछ खास मतलब न रखती होगी, लेकिन मिल तो यह सब कुछ बहुत मंहगे दामों में ही रहा है।

मैं अकसर सोचता हूं कि घर में तो अकसर हम लोग एक दिन का दही अगले दिन नहीं खाते …नहीं खाते ना.. फ्रिज़ में रखने के बावजूद वह खट्टी सी लगने लगती है। लेकिन ये सुपर मार्कीट में बिकने वाली दही में ऐसा क्या सुपर रहता होगा कि यह पंद्रह दिन तक खराब न होती होगी। ज़ाहिर सी बात है कि इन उत्पादों की इस तरह की प्रोसैसिंग होती होगी, इन में कुछ इस तरह के प्रिज़र्वेटिव डले रहते होंगे जो इन्हें १५ दिन तक ठीक ऱख सकते हों। लिखते लिखते ध्यान आ गया कि यह विषय शोध के लिए ठीक है, करते हैं इस पर कुछ। और जितना जितना ज़्यादा प्रोसैसेड फूड हमारे जीवन में आ रहा है, उस के सेहत पर प्रभाव हम देख ही रहे हैं। 

पहले तो सुपर मार्कीट में यह देख कर ही सिर चकराने लगता है कि यार दही की भी क्या एक्सपॉयरी डेट होती है क्या। दही तो बस वही है जो जमे और सभी उस का उसी दिन आनंद ले लें। लिखते लिखते ध्यान आ गया, एक रिश्तेदार का जो दही का इतना शौकीन कि दही जमने की इंतज़ार में कईं बार ऑफिस से लेट हो जाया करता था।  और हां, ये सुपर मार्कीट वाले एक्सपॉयरी डेट वाले दिन से दो तीन दिन पहले उसे आधी कीमत पर बेचने लगते हैं। इस के बारे में मैं क्या कहूं, आप समझ सकते हैं ऐसा दही किस श्रेणी में आता होगा।

अभी उस दिन की ही बात है…मैंने देखा कि मेरे साथ खड़े एक अजनबी ने जब सुपर मार्कीट से दही का डिब्बा उठाया तो मेरे से रहा नहीं गया, मैंने कह ही दिया, आप थोड़ा फ्रेश डेट का लें… मेरी बात सुन कर वह कहने लगा ….अभी तो एक्सपॉयरी को दो दिन हैं, वैसे भी आधा रेट में मिल रहा है।

इस पीढ़ी ने तो कभी जिम ने जाकर कॉर्डियो न किए………

मेरे विचार में अगर आप के पास कोई घरेलू विक्लप नहीं है तो ही आप को इस तरह के प्राड्क्ट्स इन सुपर मार्कीट में जा कर खरीदने चाहिए….जैसा कि मेरे साथ हुआ, घर से बाहर था कुछ दिन, दही वही खा नहीं पाया, पेट  कुछ ठीक सा न था, इसलिए वहां से लेकर दही कुछ दिन खाया तो ….लेकिन कमबख्त दही ऐसा जैसा कि कोई लेसदार दवाई खा रहा हूं… फिर भी पेट तो ठीक हो ही गया…….मेरा कहने का भाव यही है कि कभी कभी एमरजैंसी के लिए इस तरह का दही-पनीर लेना तो ठीक है, लेकिन निरंतर लगातार इस तरह के प्रोडक्ट्स खरीदने में और विशेषकर अगर आप के पास घरेलू विकल्प हैं तो बात मेरे तो समझ में नहीं आती…….सोचते सोचते दिमाग की ही दही होने लगती है। पंद्रह पंद्रह दिन ठीक रहने वाले दही…………यह क्या बात है, इस पर शोध होना चाहिए। मेरी समझ तो मुझे कहती है कि इसे तो बस एक दवाई की ही तरह से ले सकते हैं.

और हां ध्यान आ गया, इन सुपर मार्कीट शेल्फों पर आजकल प्रो-बॉयोटिक की छोटी छोटी शीशियां भी तो बिकने लगी हैं, दस दस रूपये की …जस्ट शार्ट-कट–जो दही खाने की तकलीफ़ न उठाना चाहते हों बस एक अदद शीशी पी लें तो हो गया उन का लैक्टोबैसीलाई का कोटा पूरा…………जिस तरह से बंबई में टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ साथ उस का एक शार्टकट संस्करण भी बिकता है ..जिस पर बीस मिनट लिखा रहता है… उन के लिए जो बेवजह के विज्ञापन को पढ़ कर सिर को दुखाना न चाहते हों..

दुनिया बहुत बदल रही है, शायद इतनी तेज़ी की तो ज़रूरत ही नहीं है, सोचने वाली बात है कि इतनी तेज़ तर्रारी में मुनाफ़ा किस का और नुकसान किसका……….मुनाफ़ा केवल सुपरमार्कीट वालों का……और नुकसान हम सब उपभोक्ताओं का —पैसे का भी, सेहत का भी……..आप क्या सोचते हैं इस के बारे में?