तंबाकू दिवस पर तंबाकू को पैरों तले रोंदा नहीं?

आज विश्व तंबाकू निषेध दिवस है और मैं कुछ बातें दिल से करना चाहता हूं। मुझे व्यस्कों को बीड़ी-सिगरेट-तंबाकू का इस्तेमाल करते हुये देख कर कुछ दुःख होता है लेकिन ऐसे छोटे छोटे बच्चों को देख कर तो बहुत ही दुःख होता है जिन के मां-बाप तंबाकू का किसी भी रूप में इस्तेमाल करते हैं। और दुःख स्कूली बच्चों को बीड़ी-सिगरेट पीते देख कर भी बहुत होता है।
वैसे मुझे हार तो नहीं माननी चाहिये लेकिन पता नहीं मुझे क्यों लगता है कि जो व्यस्क हैं, कुछ वर्षों से तंबाकू का इस्तेमाल कर रहे हैं, डाक्टर लोग उन के लिये ज़्यादा से ज़्यादा क्या कर लेंगे? मेरा अनुभव कहता है कि बहुत कम ही इन लोगों के लिये कुछ किया जा सकता है। इस का कारण यह है कि ये लोग पक चुके हैं, तंबाकू के आदि हो चुक हैं, किसी की सुन के राजी नहीं हैं, और अकसर ये लोग तंबाकू को त्यागने का नाटक तो करते हैं—लेकिन पता नहीं कितने सीरियस होते हैं, मैं आज तक समझ नहीं पाया।
जो व्यस्क लोग तंबाकू के आदि हो चुके हैं, मैं समझता हूं कि वे अपनी च्वाइस से ऐसा कर रहे हैं। वैसे हम लोग तंबाकू की चेतावनियों के बारे में अकसर टिप्पणी तो करते हैं लेकिन समझ में नहीं आता कि क्यों ये लोग डरावनी चेतावनियों का इंतज़ार करते रहते हैं।
सब से ज़्यादा दुःख मुझे छोटे छोटे स्कूली एवं कॉलेज के छात्रों को तंबाकू का किसी भी रूप में सेवन करते हुये होता है। क्योंकि मुझे लगता है कि यह एक राष्ट्रीय त्रासदी है—ये लोग एक बार इस ज़हर के, इस शैतान के भंवर में फंस गये तो समझो गये। बस, एक बार कुछ ही वर्षों में आदि हुये नहीं कि ढ़ेरों बीमारियां शरीर में घर कर लेती हैं। इसलिये कुछ भी कर के इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि किसी भी तरह से बच्चे इस राक्षस से दूर रहें। और इस के लिये शुरूआत पहले मां बाप को करनी होगी —-तंबाकू के सभी उत्पादों को हमेशा के लिये त्याग कर।
और फिर मुझे यह भी बहुत बुरा लगता है कि जब कोई परिवार कहीं बैठा है या यात्रा कर रहा है तो आदमी बीड़ी पर बीड़ी फूंके जा रहा है और इस से उठने वाले धुयें से उस का बच्चा जिसे उस की बीवी ने गोद में उठाया होता है, वह परेशान होता रहता है। हो सकता है कि उस आदमी को इस का आभास न हो, लेकिन अगर सारा संसार चीख चीख कर कह रहा है कि पैसिव स्मोकिंग के भी बहुत नुकसान हैं तो हैं। इसी तरह से गर्भवती महिलायें भी अपने पतियों के तंबाकू के धुयें का शिकार होती रहती हैं।
मेरा चिट्ठा है, दिल की बात इधर न लिखूंगा तो कहां लिखूंगा—-सच में लिख रहा हूं कि मुझे उम्र में बड़े लोगों के तंबाकू की लत में फंसे होने का बहुत कम दुःख होता है —अब पॉलिटिकली करैक्ट तो लिखना ही है कि दुःख तो होता ही है….. क्योंकि मुझे लगता है कि अकसर इस तरह के लोग किसी की सुनते नहीं, इन्हें बाकी सभी नफ़े-नुकसान तो अच्छे से पता है लेकिन तंबाकू के लिये क्यों ये चाहते हैं कि आसमान से फरिश्ता उतर कर इन की मदद करे। ऐसा कैसा हो सकता है —सभी अस्पतालों के डाक्टर सारा दिन तंबाकू से होने वाले नुकसान को ठीक करने की हारी हुई जंग लड़ने में व्यस्त रहते हैं। जंग तो उस्ताद हारी हराई ही होती है
हम तो पैसिव स्मोकिंग की बात कर के छुट्टी कर लेते हैं – बस यही सोचते हैं कि कैसे किसी दूसरे को टोकें कि यार, तुम्हारी सिगरेट,बीड़ी से मुझे दिक्कत हो रही है। मैं कल कही पढ़ रहा था कि पैसिव स्मोकिंग से लाखों-करोड़ों लोग मारे जाते हैं —अर्थात् उन्होंने स्वयं तो कभी तंबाकू का इस्तेमाल किया नही लेकिन उन के आस पास के लोगों की तंबाकू की आदत ने उन की जान ले ली।
सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट-बीड़ी पीना सख्त मना है—शायद कानूनी अपराध है या शायद केवल ज़ुर्माने का ही प्रावधान है —क्या बसों में, गाड़ियों में , बस अड़्डों पर, रेलवे स्टेशनों पर लोग अब बीड़ी सिगरेट नहीं पीते? मैंने तो बहुत से लोगों को पब्लिक जगहों पर फेफड़े सेंकते देखता हूं। लेकिन मैं कहता किसी से कुछ नहीं हूं —क्योंकि मैं बिना वजह किसी झगड़े से बचना चाहता हूं। यहां तक कि कॉलेज के बच्चों को भी तंबाकू का इस्तेमाल करते देखते हुये भी इन्हें कुछ कहने से डरता हूं कि कहीं बीच सड़क में पिट गया तो किसी को बता भी नहीं पाऊंगा।
और तंबाकू छुड़वाने के लिये तरह तरह के च्यूईंग गम आदि के मार्केटिंग के लोग मेरे तक भी पहुंचते तो हैं लेकिन मैंने आज तक किसी एक भी मरीज़ को इसे लेने की सलाह नहीं दी। कारण ? –मुझे लगता है कि जिस बंदे को तंबाकू छोड़ने के लिये निकोटिन-च्यूईंग गम आदि का पता है वह मेरी हरी झंडी की तो इंतज़ार कर नहीं रहा। खरीद कर खा ही लेगा अगर इतना व्याकुल होगा तंबाकू को लात मारने के लिये। और मैं ऐसे कैसे अढ़ाई रूपये की बीड़ी मारने वाले को पचास रूपये की निकोटिन च्यूईंग गम चबाने के लिये कह दूं—–यह अपने से नहीं होता।
और एक बात — कुछ क्लीनिक व्यसन-मुक्ति के लिये भी चल रहे हैं — जहां पर ड्रग्स एवं दारू आदि से मुक्ति दिलाई जाती है। लेकिन मुझे कभी भी नहीं लगा कि मैं किसी मरीज़ को इन जगहों पर जाने की सलाह दूं —अगर किसी ने जाना होगा तो चला जायेगा। पिछले 25 सालों में तो मैंने अपने व्यक्तिगत अनुभव में किसी को इस तरह के स्थान पर जा कर तंबाकू को त्याग कर आते तो देखा नहीं —-शायद यह मेरा अल्प अनुभव होगा, शायद यह सब मुमकिन होता होगा।
तो मैंने कैसे केस देखे हैं जहां पर लोग तंबाकू को गाली निकाल कर लात मार देते हैं। जब किसी नज़दीकी सगे-संबंधी को तंबाकू के उपयोग से जुड़ी कोई जटिलता उत्पन्न हो जाती है या फिर तंबाकू का इस्तेमाल करने वाले के सीने में दर्द उठता है और डाक्टर ऐंजियोग्राफी करवाने की सलाह देता है तब मैंने लोगों को तुरंत इस ज़हर को हमेशा के लिये थूकते देखा है। और मैंने यह भी देखा है कि जो समर्पित डाक्टर हैं वे मरीज़ों के मुंह में झांक कर उन्हें तंबाकू से होने वाली तरह तरह की बीमारियों के बारे में आगाह भी करते रहते हैं————बात तो उस्ताद वही है, कि मरीज़ चाहे खुद छोड़े या कोई छुड़वाये, ये सब दिल से करने वाली बातें है।
मैं जिस हस्पताल में काम करता हूं वहां पर हज़ारों कर्मचारी इलाज के लिये पंजीकृत हैं —इसलिये मैं उन के मन में पैसिव स्मोकिंग के प्रति ज़हर भरता ही रहता हूं —-बस बातों बातों में उन्हें उकसाता रहता हूं कि अगर साथी सिगरेट-बीड़ी पीता है तो वह तुम्हारी सेहत की भी ऐसी तैसी फेर रहा है, उसे प्यार से रोक दिया करो। वर्क प्लेस पर ही नहीं, मुझे लगता है कि अब वे दिन भी दूर नहीं जब बीवी तंबाकू पीने वाले पति से दूर रहने की फिराक में रहेगी —उसे बार बार ताने मारेगी, अपने छोटे छोटे बच्चों की सेहत का वास्ता देकर, अपने पेट में बढ़ रहे बच्चे की जान की खातिर इस शैतान का साथ छोड़ने की बात कहेगी और कितना अच्छा हो कि बच्चे ही घर में हड़ताल कर दें कि वे खाना तभी खाएंगे जब बाप बीड़ी पीना बंद करेगा या तो फिर अगर उसे तंबाकू पीना ही है तो घऱ के बाहर ही पी कर आया करे —-क्योंकि उस का मुंह बास मारता है और पैसिव स्मोकिंग से उन के फेफड़े भी जलते हैं। वैसे इस तरह की पैसिव स्मोकिंग के खतरों के बारे में जागरूक करने वाले कुछ पाठ अगर स्कूल-कॉलेज की किताबों में रहेंगे तो कैसा रहेगा ?
चलो यार, बहुत बातें हो गईं –अब खत्म करते हैं लेकिन इसी ताकीद के साथ कि अगर तंबाकू का इस्तेमाल आप कर रहे हैं तो तुरंत छोड़ दें —–इस में कोई आप की मदद नहीं करेगा —यह काम आप को ही करना होगा—कैसे भी …किसी भी तरह से ……लेकिन एक बात का विशेष ध्यान रखें कि अगर आप को पता लगे कि आप का बच्चा छुप छुप कर बाथरूम में कभी कभी कश मारने लगा है तो भी इसे एक एमरजैंसी समझ कर इस से निपट लें। वैसे तो मैं बच्चों के साथ किसी तरह की ज़ोर-जबरदस्ती का घोर विरोधी हूं लेकिन इस तंबाकू, सिगरेट, बीड़ी, गुटखा, दारू, बीयर के बारे में आप कोई भी साधन अपनायें —क्या कहते हैं —–वह मुझे ठीक से याद भी तो नहीं —साम, ढंड,भेद … ………।
क्या आप को नहीं लगता कि 31 मई का दिवस तंबाकू निषेध दिवस तो है ही —लेकिन जिन परिवारों में लोग इस तरह के व्यसन के आदि हैं क्या उन के लिये यह शोक दिवस नहीं है? —-हर साल यह दिन उन में और एक अंधी खाई के दरमियान के फासले कम करता जा रहा है।
भारत वैसे है ग्रेट देश —–मेरे जैसे लोग बीस-तीस सालों तक माथा पीटते रहते हैं और चंद लोगों को तंबाकू छुड़ाने में शायद सफल हो पाते हैं लेकिन यहां पर जो संत लोग हैं, मैं बहुत हैरान होता हूं कि सतसंग में उन के संपर्क में आने पर हज़ारों लोग तंबाकू, दारू, जुआ छोड़े देते हैं —–क्या कहा? यह अंधविश्वास है, अंध श्रद्धा है, आप इसे नहीं मानते ———-कोई बात नहीं, आप की मर्जी, लेकिन मैं इस तरह के लोग रोज़ देखता हूं जो सतसंग में जाने के बाद (अगर और जानकारी चाहिये तो मुझे ई-मेल करियेगा drparveenchopra@gmail.com ) पूरी तरह से बदल जाते हैं, व्यसन से दूर भागते हैं…………….बस, इसीलिये भारत तो बस भारत ही है। यहां पर बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन्हें दिमाग से नहीं बल्कि दिल से समझा जा सकता है।
इसलिये बेहतर होगा कि तंबाकू की लत की ऐसी की तैसी करने के लिये न तो किसी कानून की इंतज़ार ही की जाए कि कोई कानून आ कर आप के हाथ से बीड़ी छीन लेगा और न ही सिगरेट के पैकटों पर भयानक चेतावनियों की बाट जोहते रहें —-सियासत करने वालों को जम कर सियासत करने दें —-आप अपना काम करिये — जलती सिगरेट, सुलगती बीड़ी को अपने जूते के तले हमेशा के लिये रोंध दे और तंबाकू थूक दें……………शाबाश!! यह हुई न बात !!
PS……आज यह पोस्ट लिखते समय इतना ज़्यादा गाली गलौज़ करने की इच्छा हो रही थी कि पता नहीं कैसे काबू कर पाया हूं —मन ही मन मैंने इस कमबख्त तंबाकू को पंजाबी भाषी में उपलब्ध बीसियों मोटी मोटी गालियां बक दी हैं —-आप मेरे बिना लिखे ही समझ लेना कि वे क्या क्या हो सकती हैं। सच में इस ने सारे संसार की सेहत की ऐसी की तैसी की हुई है और लोग हैं कि इस पर भी सियासत से बाझ नहीं आते। केवल जागरूकता ही इस से बचने का अस्त्र है।
Advertisements

छाती की जलन के लिये ली जाने वाली दवाई बढ़ा देती है फ्रैक्चर रिस्क

आज की आधुनिकता की अंधी दौड़ की एक देन तो है कि हर दूसरा आदमी छाती की जलन से परेशान है और इस के लिये बहुत बार बिना किसी डाक्टरी नुस्खे के ही अपने आप ही पेट में एसि़ड कम करने वाली दवाईयां लेना शुरू कर देते हैं।

और इस तरह की दवाईयों की हाई डोज़ अथवा लंबे समय तक सामान्य डोज़ लेना रिस्क से खाली नहीं है, वैज्ञानिकों की खोज से पता चला है कि हाई डोज़ अथवा लंबे समय तक इन दवाईयों को लेने से हिप (कुल्हा), कलाई एवं स्पाईन (रीढ़ की हड्डी) का फ्रैक्चर होने का रिस्क बढ़ जाता है।

पता नहीं आज कल इन दवाईयों का चलन बहुत ही ज़्यादा बढ़ गया है —जिन हस्पतालों में दवाईयां मुफ्त वितरित की जाती हैं वहां भी मरीज इन दवाईयों का नाम ले कर इस तरह से मांगते हैं जैसे पिपरमिंट की गोलियों हों। और खाने पीने संबंधी बदलाव की सलाह देने पर वही जवाब होता है कि हम तो पहले ही से सावधानी बरतते हैं।

क्या आप को नहीं लगता कि हमारे शरीर में जो कुछ भी पदार्थ (सिक्रेशन्ज़– secretions) आदि बन रहे हैं उन का अपना बहुत महत्व है–वे कईं शारीरिक क्रियाओं में अहम् भूमिका निभाते हैं। इस लिये अपनी मरजी से इस तरह की बिल्कुल हानिरहित सी दिखने वाली दवाईयां ले लेने से हम लोग कईं रिस्क मोल ले लेते हैं।

लेकिन अगर क्वालीफाईड डाक्टर कुछ समय के लिये इस तरह की दवाईयां खाने का नुख्सा दे तो अवश्य लें—वैसे तो इस रिपोर्ट में डाक्टरों को भी इन दवाईयों को लंबे समय तक मरीज़ों को देने के बारे में अच्छा खासा चेताया गया है।

बिल्कुल छोटे छोटे से तो देखते थे कि नानी-दादी इस काम के लिये थोड़ा सा मीठा सोड़ा पानी में घोल कर पी लिया करती थीं— घर में बात करते हैं कि मेरी दादी पकौड़ों की बहुत शौकीन थीं — और इन्हें खाने के बाद मीठे सोडा तो उन्हें चाहिये ही था। फिर समय आया जब हम लोग 15-20 साल के हुये तो टीवी पर हाजमा दुरूस्त करने के लिये एक पावडर का विज्ञापना बहुत आता था जिस की शीशी को लोगों ने घर में रखना एक स्टेट्स सिंबल समझना शुरु कर दिया था।

फिर हम लोग मैडीकल की पढ़ाई पढ़ने लगे तो देखा कि एंटासि़ड की गोलियां और पीने वाली दवाईयां खूब पापुलर हो गई हैं। और पिछले कुछ सालों से तो लोगों का इन एंटासिड की गोलियों एवं सिरिपों से भी कुछ नहीं बनता —अब तो वे चाहते हैं कि किसी तरह से पेट में पैदा होने वाले एसिड् को समाप्त ही कर दिया जाये, लेकिन इस तरह की दवाईयां मनमर्जी से एवं लंबे समय तक लेने से होने वाले रिस्क आप जान ही गये हैं।

दवाई तो दवाई है —- साल्ट है, ऐसे कैसे हो सकता है कि किसी भी साल्ट का कोई भी दुष्परिणाम न हो। और हां, जिन एंटासिड की गोलियों एवं सिरिपों की बात हो रही थी उन के अंधाधुंध इस्तेमाल से होने वाले दुष्परिणामों ( जैसे कि फ्रैक्चर रिस्क बढ़ना) के बारे में भी कुछ समय पहले खूब रिपोर्ट दिखीं थीं।

और तो और कुछ समय से यह भी सुनने में आ रहा है कि ये जो कोलेस्ट्रोल कम करने के लिये इस्तेमाल की जाने वाली दवाईयां है इन के भी लिवर पर, किडनी पर बुरे प्रभाव हो सकते हैं और इन के उपयोग से सफेद मोतिया भी हो सकता है —अब बात यह है कि अगर कोई पहले से ऐसी दवाईयां ले रहा है तो क्या वह इसे बंद कर दे। नहीं, ऐसा करना उचित नहीं है, फ़िज़िशियन ने आप के लिये वे दवाईयां लिखी हैं तो लेनी ही होंगी ताकि आप के हृदय की सेहत की रक्षा की जा सके।

लेकिन यह ध्यान भी रखा जाना ज़रूरी है कि इस तरह की दवाईयां लेते समय अगर कोई भी ऐसे वैसे अजीब से लक्षण दिखें तो डाक्टर से संपर्क अवश्य करें और मैं कुछ दिन पहले कहीं पढ़ रहा था कि ऐसे ज़्यादातर दुष्परिणाम इस तरह की दवाईयां शुरू करने के एक साल के भीतर होने की संभावना ज़्यादा होती है।

वैसे आप को भी लगता होगा कि इस तरह की कोलैस्ट्रोल कम करने वाली दवाईयों को अगर एक बैशाखी के रूप में इस्तेमाल किया जाए तो ही बेहतर है —ठीक है, डाक्टर कहते हैं तो लेनी ही पड़ती हैं लेकिन क्यों न अपने खाने-पीने के तौर-तरीके और जीवन शैली इस कद्र बदल दिये जाएं कि डाक्टर लोग जब लिपिड प्रोफाईल जैसा टैस्ट करवायें और वे इतने आश्वस्त हो जाएं कि इन्हें बंद करने की सलाह ही दे डालें।

हां, बात शूरू हुई थी छाती में जलन से इसलिये बात खत्म भी वही होनी चाहिये —-मेरे को भी महीने में एक-आध बार इस तरह की समस्या तो होती ही है —कईं बार तंग आ कर मैं भी इस तरह के कैप्सूल ले तो लेता हूं लेकिन बहुत बार मैं इस काम के लिये आंवले के पावडर का एक चम्मच ले कर सैट हो जाता हूं —-आप भी इसे आजमा सकते हैं।

हार्ट-अटैक के बाद संभोग से इतना खौफ़ज़दा क्यों ?

हार्ट-अटैक के इलाज के बाद जब मरीज़ को हस्पताल से छुट्टी मिलती है तो डाक्टर लोग उससे उस की सैक्स लाइफ के बारे में कुछ भी चर्चा नहीं करते। ना तो मरीज़ ही खुल कर इस तरह की बात पूछने की “हिम्मत” ही जुटा पाते हैं… और इसी चक्कर में होता यह है कि हार्ट-अटैक से बचने पर लोग सैक्स से यह सोच कर दूर भागना शुरू कर देते हैं कि संभोग करना उन के लिये जानलेवा सिद्ध हो सकता है।

अब आप बीबीसी आनलाइन पर प्रकाशित इस रिपोर्ट — Heart attack survivors ‘fear sex’ —को देखेंगे तो आप भी यह सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि अगर अमेरिका जैसे देश में जहां इस तरह के मुद्दों पर बात करने में इतना खुलापन है —अगर वहां यह समस्या है तो अपने यहां यह समस्या का कितना विकराल रूप होगा।

इस तरह का अध्ययन अमेरिका में 1700 लोगों पर किया गया –और फिर इन वैज्ञानिकों नें अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की एक मीटिंग में अपनी रिपोर्ट पेश करते हुये साफ शब्दों में यह कहा है कि हार्ट-अटैक से ठीक हो चुके जिन मरीज़ों के डाक्टर उन के साथ उन की सैक्स लाइफ के बारे में बात नहीं करते, वही लोग हैं जो सैक्स के नाम से भागने लगते हैं।

और देखिये विशेषज्ञों ने कितना देसी फार्मूला बता दिया है कि वे लोग जिन्हें कुछ समय पहले हार्ट अटैक हुआ है और वे अब ठीक महसूस कर रहे हैं तो अगर वे कुछ सीढियां आसानी से चढ़ लेते हैं तो वे पूर्ण आत्मविश्वास के साथ संभोग करना भी शुरू कर सकते हैं।
और यह जो फार्मूला बताया गया है यह बहुत ही सटीक है। यह नहीं कि कोई ऐसा मरीज़ अपने डाक्टर से पूछ बैठे कि वह कितने समय तक सैक्सुयली सक्रिय हो सकता है तो एक डाक्टर कहे दो महीने बाद, कोई कहे छः महीने बाद —और कोई मरीज़ को आंखे फाड़ फाड़ कर देखते हुये उसे यह आभास करवा दे कि कहीं उस ने ऐसा प्रश्न पूछ कर कोई गुनाह तो नहीं कर दिया——तो सब से बढ़िया जवाब या सुझाव जो आप भी अपने किसी मित्र को देने में ज़रा भी हिचक महसूस नहीं करेंगे —- अगर सीढ़ियां ठीक ठाक बिना किसी दिक्कत के चढ़ लेते हो तो फिर समझ लो तुम अपने वैवाहिक जीवन को भी खुशी खुशी निबाह पाने में सक्षम है ——–और वैसे भी हिंदोस्तानी को तो बस इशारा ही काफी है।
लेकिन कहीं आप यह तो नहीं समझ रहे कि यह मार्गदर्शन केवल पुरूषों के लिये ही है —ऐसा नहीं है, महिलाओं के लिये भी यही सलाह है। इस बात का ध्यान रखे कि महिलायें भी हार्ट अटैक जैसे आघात से उभरने के बाद तभी सैक्सुयली सक्रिय हो पाने में सक्षम होती हैं जब वे सीढ़ियां आराम से चढ़ना शुरू कर देती हैं। और इस अवस्था तक पहुंचने में हर बंदे को अलग अलग समय लग सकता है।
मुझे इस रिपोर्ट द्वारा यह जान कर बहुत हैरानगी हुई कि वहां पर भी लोग इस तरह के अहम् मामले में बात करते वक्त इतने संकोची हैं और दूसरी बात यह महसूस हुई कि हमारे यहां तो फिर हालात एकदम फटेहाल होंगे —-शायद कुछ लोग एक बार हार्ट अटैक होने पर इसी तरह के डर से अपना आत्मविश्वास डगमगाने की वजह से लंबे समय तक संभोग से दूर ही भागते रहते होंगे। और बात केवल इतनी सी कि न तो उन के चिकित्सक ने उन से इस मुद्दे पर बात करना उचित समझा और दूसरी तरफ़ बेचारा मरीज — हम हिंदोस्तानी लोग खुले में इस तरह की “गंदी बातें” कैसे पूछें, हम तो अच्छे बच्चे है………अंदर ही अंदर कुढ़ते रहें, कुठित होते रहे लेकिन …….।
दरअसल जैसा कि इस रिपोर्ट में भी कहा गया है कि सैक्स भी मरीज़ों की ज़िंदगी का एक अहम् भाग है और इसलिये शायद वे यह अपेक्षा भी करते हैं कि डाक्टरों को इस के बारे में भी थोड़ी बात करनी चाहिये। क्या आप को नहीं लगता कि मरीज़ों का ऐसा सोचना एकदम दुरूस्त है।
इस तरह के कुछ मरीज़ों को यह भी डर लगता है कि संभोग में लगने वाली परिश्रम की वजह से कहीं से दूसरे हार्ट अटैक को आमंत्रित न कर बैठें, लेकिन ऐसा बहुत ही बहुत ही कम बार होता है —आप यही समझें कि यह रिस्क न के ही बराबर है —–क्योंकि रिपोर्ट में शब्द लिखा गया है —extremely unlikely. अब इस से ज़्यादा गारंटी क्या होगी ?
एक बात और भी है कि हार्ट के किसी रोगी में जैसे कोई भी शारिरिक परिश्रम कईं बार छाती में थोड़ा बहुत भारीपन ला सकता है वैसे ही अगर संभोग के दौरान भी अगर ऐसा महसूस हो तो वह व्यक्ति ऐसी किसी भी अवस्था के समाधान के लिये स्प्रे (यह “वो वाला स्प्रे” नहीं है….. जिस के कईं विज्ञापन रोजाना अखबारों में दिखते हैं) का या जुबान के नीचे रखी जाने वाली उपर्युक्त टेबलैट का इस्तेमाल कर सकता है, जिस से तुरंत राहत मिल जाती है।
और इस रिपोर्ट के अंत में लिखा है —
“Caressing and being intimate is a good way to start resuming sexual relationships and increase your confidence.” अब इस का अनुवाद मैं कैसे करूं, हैरान हूं —मेरी हिंदी इतनी रिफाइन्ड है नहीं, अच्छी भली संभ्रांत भाषा को कहीं अश्लील न बना दूं —–इसलिये समझने वाले समझ लो।
मुद्दा बहुत गंभीर है— लेकिन इसे हल्के-फुल्के ढंग से इसलिये पेश किया है ताकि बात सब के मन में बैठ जाये। आप इस पोस्ट में लिखी बातों के प्रचार-प्रसार के लिये या इस में चर्चित न्यूज़-रिपोर्ट के लिंक को बहुत से दूसरे लोगों पर पहुंचाने में क्या मेरा सहयोग कर सकते हैं ?
क्या आप को नहीं लगता कि कईं बार हम लोग कुछ ऐसा पढ़ लेते हैं, देख लेते हैं जिस को आगे शेयर करने से हम अनेकों लोगों की सुस्त पड़ी ज़िंदगी में बहार लाने के लिये अपनी तुच्छ भूमिका निभा सकते हैं ? मैं तो बड़ी शिद्दत से इस बात को महसूस करता हूं।

चलिये ज़रा देखते हैं हमारे गुर्दे कैसे काम करते हैं ?

इस वीडियों में आप देख सकते हैं कि हमारे गुर्दे काम कैसे करते हैं — मैंने हिंदी भाषा का सहारा लेकर इसे थोड़ा आसान सा करना चाहा है।

यूरिनरी ट्रैक्ट में हमारे गुर्दे, यूरेटर्ज़, ब्लैडर एवं यूरैथरा शामिल हैं। हरेक गुर्दे में मूत्र बाहरी कोरटैक्स से अंदरूनी मैडुला की तरफ़ आता है। और रिनल पैल्विस(renal pelvis) एक फनल का काम करती है जिस से होकर मूत्र गुर्दे से निकल कर यूरेटर में बह जाता है।
गुर्दे से गुज़रते गुज़रते यूरिन अच्छा खासा कंसैनट्रेट्ड हो जाता है। और जब यह कुछ ज़्यादा ही कंसैनट्रेटैड हो जाता है तो कैल्शीयम, यूरिक एसिड साल्ट और अन्य कैमीकल जो कि मूत्र में मिले रहते हैं वे क्रिस्टैलाइज़ होना शुरू कर देते हैं जिस से गुर्दे में पत्थरी बन जाती है — kidney stone(renal calculus).
आम तौर पर यह पत्थरी एक छोटे से कंकर के आकार की होती है लेकिन यूरेटर्ज़ की बनावट ऐसी होती है कि जब पत्थरी के कारण इन में खिंचाव आता है तो बहुत ज़्यादा दर्द होने लगता हैआम तौर पर लोगों को तब तक पता ही नहीं होता कि उन के गुर्दे में पत्थरी है जब तक कि उन्हें इस तरह का दर्द नहीं सताता। खुशकिस्मती यह है कि चोटे पत्थर गुर्दे से और आगे यूरेटर्ज़ से होकर अपने आप बिना किसी तकलीफ़ के बाहर निकल जाते हैं।
लेकिन यह बात तो है कि कईं बार इस पत्थरी की वजह से तब बहुत दिक्कत हो जाती है जब ये मूत्र के बहने में ही रूकावट पैदा कर देते हैं।
PS….कभी कभी जब मुझे इस तरह से थोड़ी अंग्रेज़ी को सरल अनुवाद कर के हिंदी में लिखना होता है तो मेरी खाट खड़ी हो जाती है और फिर मुझे लगने लगता है कि बेपरवाह हो कर लिखना बिलकुल बेपरवाह बहती जलधारा के समान है और इस तरह से अनुवाद कितना कठिन, दुर्गम, उबाऊ और थकाने वाला काम है, बहरहाल आज तो कर दिया है, फुर्सत हो तो ऊपर जिस वीडियो का लिंक मैंने दिया है उसे ज़रूर देखें। शायद इस के लिये आप को प्लग-इन इंस्टाल करने की ज़रूरत होगी जो उसी पेज़ पर दिये गये लिंक से आसानी से हो सकती है। और मैडलाइन-न्यूज़ की साइट ऐसी बीसियों वीडियो पड़ी हैं जिन के द्वारा आप अपने शरीर की कार्य-प्रणाली के बारे मे जानकारी हासिल कर सकते हैं।

विवाह-शादियों में शिरकत तो करें लेकिन आखिर खाएं क्या?

कल ऐसे ही हम कुछ दोस्त लोग बैठे हुये थे तो चर्चा चली कि आखिर क्यों किसी विवाह-शादी या पार्टी-वार्टी में खाकर तबीयत क्यों बिगड़ सी जाती है, हम लोग ऐसे ही मज़ाक कर रहे थे कि पहले तो हम डाक्टर लोग ही कह दिया करते थे कि इन पार्टियों आदि में तो बस थोड़ा दही-चावल लेकर छुट्टी करनी चाहिए। लेकिन अब तो वह दही भी उस लिस्ट में गायब होने लगा है।

चलिये थोड़ा विस्तार से देखें तो सही कि आखिर हम किस स्टॉल पर जाएं और किस पर ना जाएं—
आप में से कुछ लोगों को लग सकता है कि इतने भ्रम किये जाएंगे तो फिर कैसे चलेगा, लेकिन अगर हम यह सोचते हैं तो फिर पेट की तकलीफ़ों के लिये भी तैयार ही रहना चाहिये। अच्छा तो हम यहां चर्चा उन वस्तुओं की ही करेंगे जिन से बच के रहना चाहिये।
जहां तक हो सके इन समारोहों में पानी पीने से बचना चाहिये —–यह कैसे संभव है, मुझे भी नहीं मालूम—क्योंकि अकसर पानी प्रदूषित न भी हो तो भी उस की हैंडलिंग गलत ढंग से होने से बीमारीयां फैलती ही हैं। और यह जो आजकल गिलास की पैकिंग का ज़माना आ गया है अब इन में भी कितनी शुद्धता है कितनी नहीं, कौन जाने। और इस पानी को पी लेने से शायद उतनी प्यास नहीं बुझती जितना अपराधबोध हो जाता है कि यार, इस तरह के प्लास्टिक के गिलास में पानी पीना कहां से पर्यावरण की सेहत के अनुकूल है!!
चलिये, आगे चलें —अभी बारात आने में टाइम है— इसलिये पानी-पूरी के स्टॉल का चक्कर लगा कर आते हैं — अब इस में इस्तेमाल किये जाने वाले पानी के बारे में आप का विचार है, तरह तरह के इसैंस, कलर, फ्लेवर आदि को नज़र-अंदाज़ कर भी दें तो जो बंदा अपने हाथ के साथ साथ आधी बाजू को भी उस खट्टे-मीठे पानी के मटके में बार बार डाल रहा है, और किसी किसी फेशुनबल, हैल्थ-कांसियस पार्टी में उस नें डाकटरों वाले दस्ताने डाल रखे होते हैं —- आप यही पूछ रहे हैं न कि फिर पानी पूरी भी न खाएं —– यह आप का निर्णय है। और बर्फ के गोलों, शर्बत आदि में कौन सा पानी- कौन सी बर्फ इस्तेमाल हो रही है, इसे देखने की किसे फुर्सत है।
मिल्क से बने उत्पाद — पिछले तीन सालों में मिलावटी नकली दूध के बारे में इतना पढ़ सुन चुका हूं कि कईं बार सोचता हूं कि इस के बारे में तो मेरा ब्रेन-वॉश हो गया है। और यह खौफ़ इस कद्र भारी है कि मैं बाज़ार से कभी भी चाय-काफ़ी पीना पिछले कईं महीनों से छोड़ चुका हूं। अच्छा तो यह भी देखते हैं कि दूध से बनी क्या क्या वस्तुयें इन पार्टियों में मौजूद रहती हैं —- मटका कुल्फी, आइसक्रीम, पनीर, दही, कईं कईं जगहों पर रबड़ी वाला दूध — मेरे अपने व्यक्तिगत विचार इन सब के बारे में ये हैं कि ये सब ऐसे वैसे दूध से ही तैयार होते हैं —और अगर कुछ नहीं भी है तो भी मिलावट की तो लगभग गारंटी होती ही है। ऐसे में क्यों ऐसा कुछ खाकर अगले चार दिन के लिये खटिया पकड़ ली जाए।
और यह इधर क्या नज़र आ रहा है—–इतनी लंबी लाइन यहां क्यों हैं? —यहां पर फ्रूट-चाट का स्टॉल है और सत्तर के दशक में अमिताभ बच्चन की फिल्म के पहले दिन पहले शो जितनी भीड़ है — लेकिन यहां भी दो तीन चीजें ध्यान देने योग्य हैं — बर्फ जिन पर ये फल कटे हुये सजे पड़े हैं, फलों की क्वालिटी —कुछ तो लंबे सयम से कटे होते हैं और गर्मी के मौसम में तो इस से फिर पेट की बीमारियां तो उत्पन्न होती ही हैं। इसलिये अगली बार फ्रूट-चाट के स्टाल की तऱफ़ लपकने से पहले थोड़ा ध्यान करिये।
और हां सलाद के बारे में तो बात कैसे हम लोग भूल गये —-न तो ये खीरे,टमाटर,ककड़ी, प्याज ढंग से धोते हैं और न ही काटते और हैंडलिंग के समय कोई विशेष साफ सफाई का ध्यान रखा जाता है —तो फिर क्या शक है कि इन से सेहत कम और बीमारी ज़्यादा मिलने की संभावना रहती है। पता नहीं अकसर लोग घर में तो साफ-सुथरे तरीके से तैयार किये गये सलाद से तो दूर भागते हैं लेकिन इन सार्वजनिक जगहों पर तो सलाद ज़रूर चाहिये।
हां, और क्या रह गया ? —हां, उधर तरफ़ से जलेबियों और अमरतियों की बहुत जबरदस्त खुशबू आ रही है। तो, चलिये एक एक हो जाये लेकिन रबड़ी के साथ तो बिलुकल नहीं, क्योंकि पता नहीं क्यों हम भूल जाते हैं कि इतनी रबड़ी के लिये कहां से आ गया इतना दूध —–लेकिन जलेबी-अमरती भी तभी अगर उस में नकली रंग नहीं डाले गये हैं। और कृपया यह तो देखना ही होगा कि कहीं ये बीमारी परोसने वाले दोने तो नहीं है।
आप को यह पोस्ट पढ़ कर यही लग रहा है ना कि डाक्टर तूने भी झाड़ दी ना हर बात पर डाक्टरी — मैं मान रहा हूं कि आप मुझ से पूछना चाहते हैं कि फिऱ खाएं क्या— चुपचाप थोड़े चावल और दाल लेकर लगे रहें।
मुझे भी यह सब लिखते बहुत दुःख हो रहा था क्योंकि कोई अगर मेरे को पहली बार पढ़ने वाला होगा तो उसे मैं बहुत घमंडी लगूंगा लेकिन तस्वीर का दूसरा रूख दिखाना भी मेरा कर्तव्य है। मुझे इस बात का भी अच्छी तरह से आभास है कि इन पार्टियों में जो सामान इस्तेमाल हो रहा है उन में घरवालों का रती भर भी दोष नहीं है —- वे भी क्या करें, पैसा ही खर्च सकते हैं —मिलावट हर चीज़ में इतनी व्याप्त हो गई है कि वे भी क्या करें ?
और अब बात अपने आप से पूछता हूं कि अगर मेरे घर में कोई इतना बड़ा समारोह होगा तो क्या मेरे पास इन सब मिलावटी चीज़ों को खरीदने-परोसने के अलावा कोई विकल्प है—— नहीं है, तो फिर इन सब से बचते हुये अपनी सेहत की रक्षा करने का एक ही मूलमंत्र बच जाता है ———अवेयरनैस —–इन सब बातों के बारे में जगह जगह पर बात करें ताकि जनमानस को जागरूक किया जा सके।
क्या हुआ अभी आप के दाल-चावल ही खत्म नहीं हुये? —- वैसे कैसी रही पार्टी — ओ हो, जाते जाते उस मीठे पान को चबाने से पहले यह ध्यान रखिये कि उस पर उस मिलावटी चांदी का वर्क तो नहीं चढ़ा हुआ। और एक बात, दांतों में टुथ-पिक का इस्तेमाल सख्त वर्जित है।
मैं भी क्या—- आप की पार्टी का मज़ा किरकिरा कर दिया —–तो फिर इस समय यह गाना सुनिये जो मुझे भी बहुत पसंदे हैं —– विशेषकर इसके बोल —— धागे तोड़ लायो चांदनी से नूर के ………………………….वाह, भई, वाह, यह किस ने लिखा है, क्या आप बता सकते हैं ?

एशियाई समलैंगिकों एवं द्विलिंगियों(bisexual) में एचआईव्ही इंफैक्शन के चौका देने वाले आंकड़े

एशियाई समलैंगिकों एवं द्विलिंगियों में बैंकाक में एचआईव्ही का प्रिवेलैंस 30.8 प्रतिशत है जब कि थाईलैंड में यह दर 1.4 प्रतिशत है। यैंगॉन के यह दर 29.3 फीसदी है जब कि सारे मयंमार में यह दर 0.7 प्रतिशत है। मुंबई के समलैंगिकों एवं द्विलिंगियों में यह इस संक्रमण की दर 17 प्रतिशत है जब कि पूरे भर में एचआईव्ही के संक्रमण की दर 0.36 प्रतिशत है।

संयुक्त रा्ष्ट्र के सहयोग से हुये एक अध्ययन से इन सब बातों का पता चला है–और तो और इन समलैंगिकों एवं बाइसैक्सुयल लोगों की परेशानियां एचआईव्ही की इतनी ज़्यादा दर से तो बड़ी हैं ही, इस क्षेत्र के कुछ देशों के कड़े कानून इन प्रभावित लोगों के ज़ख्मों पर नमक घिसने का काम करते हैं।

न्यूज़-रिपोर्ट से पता चला है कि एशिया पैसिफिक क्षेत्र के 47 देशों में से 19 देशों के कानून ऐसे हैं जिन के अंतर्गत पुरूष से पुरूष के साथ यौन संबधों को एवं द्विलिंगी ( Bisexual- जो लोग पुरूष एवं स्त्री दोनों के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करते हैं) गतिविधियों के लिये सजा का प्रावधान है।

इन कड़े कानूनों की वजह से छिप कर रहते हैं– और इन लोगों में से 90प्रतिशत को न तो कोई ढंग की सलाह ही मिल पाती है और न ही समय पर दवाईयां आदि ये प्राप्त कर पाते हैं। कानून हैं तो फिर इन का गलत इस्तेमाल भी तो यहां-वहां होता ही है। इस के परिणामस्वरूप इन के मानवअधिकारों का खंडन भी होता रहता है।

इन तक पहुचने वाली रोकथाम की गतिविधियों को झटका उस समय भी लगता है जब इन प्रभावित लोगों की सहायता करने वाले वर्कर (out-reach services) – जो काम अकसर इस तरह का रूझान ( MSM — men who have sex with men) रखने वाले वर्कर भी करते हैं–उन वर्करों को पुलिस द्वारा पकड़ कर परेशान किया जाता है क्योंकि उन के पास से कांडोम एवं लुब्रीकैंट्स आदि मिलने से ( जो अकसर ये आगे बांटने के लिये निकलते हैं) यह समझ लिया जाता है कि वे भी इस काम में लिप्त हैं और इस तरह के सारे सामान को जब्त कर लिया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट में यह सिफारिश की गई है कि अगर इस वर्ग के लिये भी एचआईव्ही के संक्रमण से बचाव एवं उपचार के लिये कुछ प्रभावशाली करने की चाह इन एशियाई देशों में है तो इन्हें ऐसे कड़े कानूनों को खत्म करना होगा, जिन कानूनों के तहत इन लोगों के साथ भेदभाव की आग को हवा मिलती हो उन्हें भी तोड़ देना होगा, यह भी इस रिपोर्ट में कहा गया है।

विषय बहुत बड़ा है, इस के कईं वैज्ञानिक पहलू हैं, विस्तार से बात होनी चाहिये —फिलहाल आप इस लिंक पर जा कर मैड्न्यूज़ की साइट पर इस रिपोर्ट को देख सकते हैं — HIV among gay, bisexual men at alarming highs in Asia.

हार्ट चैक-अप के लिये पीटा जा रहा है ढिंढोरा

आज जब मैं सुबह कहीं जा रहा था तो मैंने सुना कि एक रिक्शे पर एक सज्जन यह घोषणा कर रहा था कि फलां फलां दिन उस बड़े हस्पताल (कारपोरेट हस्पताल) से एक बहुत बड़ा हार्ट का स्पैशलिस्ट आ रहा है जो मरीज़ों के हार्ट की फ्री जांच करेगा।

इस तरह के इश्तिहार/ पैम्फलेट कईं बार अखबारों के अंदर से तो गिरते देखे हैं लेकिन शायद आज मैं इस काम के लिये इस तरह का ढिंढोरा पिटता पहली बार देख रहा था। ढिंढोरा ही हुआ — क्या हुआ अगर ढोलकची गायब था।

कुछ समय बाद ध्यान आया कि कुछ वर्ष पहले जिन छात्रों का दाखिला मैडीकल कॉलेजों में नहीं होता था उन के शुभचिंतक उन्हें यह कह कर अकसर दिलासा देने आया करते थे —-हो न हो, ज़रूर इस में कोई भलाई ही है — डाक्टरों की तो हालत ऐसी हो रही है कि तुम देखना आने वाले समय में डाक्टर गली-मोहल्लों में स्वयं मरीज ढूंढा करेंगे——–मैं आज यह अनाउंसमैंट सुन कर यही सोचने लग गया कि आने वाला समय पता नहीं कैसा होगा?

मुझे यह बहुत अजीब सा लगता है कि हार्ट के रोगियों से हार्ट के विशेषज्ञों का सीधा संपर्क –केबल में विज्ञापन के माध्यम से, अखबार में पैम्फलेट डलवा कर और अब एक किस्म से ढिंढोरा पिटवा कर। आप को क्या लगता है कि इस तरह का मुफ्त चैक-अप क्या मरीज़ों के हित में है ? सतही तौर पर देखने से यही लगता है कि इस में क्या है, कोई दिल का मुफ्त चैक-अप कर रहा है तो इस में हर्ज़ क्या है?

चलिये, कुछ समय के लिये इस बात को यही विराम देते हैं। एक दूसरी बात शुरू करते हैं — बात ऐसी है कि अगर किसी को ब्लड-प्रैशर है या इस तरह का कोई और क्रॉनिक रोग है तो सब से पहले तो उसे चाहिये कि वह इन बातों का ध्यान करे —

सभी तरह के व्यसनों को एक ही बार में छोड़ दे या चिकित्सीय सहायता से छोड़ दे। तंबाकू का किसी भी रूप में इस्तेमाल आत्महत्या करने के बराबर है—अगर ये शब्द थोड़े कठोर लग रहे हों, तो ये कह लेते हैं कि स्लो-प्वाईज़निंग तो है ही।

शारिरिक व्यायाम एवं परिश्रम करना शुरू करे।

खाने-पीने में वे सभी सावधानियां बरतें जिन का आज लगभग सब को पता तो है लेकिन मानने के लिये प्रेरणा की बेहद कमी है।

किसी भी तरह से नमक का कम से कम इस्तेमाल करे।

तनाव से मुक्त रहे — तनाव को दूर रखने के लिये हमारी प्राचीन पद्धतियों का सहारा ले जैसे कि योग, प्राणायाम्, ध्यान (meditation).

कल एक स्टडी देख रहा था कि जो लोग रोज़ाना 10-12 घंटे काम करते हैं उन में दिल के रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।

इन सब के साथ साथ खुश रहने की आदत डालें (क्या यह मेरे कहने मात्र से हो जायेगा..!.)

अब आप यह कल्पना कीजिये कि अगर कोई बंदा इन ऊपर लिखी बातों की तरफ़ ध्यान दे नहीं रहा बल्कि ब्लड-प्रैशर के लिये सीधा हृदय रोग विशेषज्ञ से संपर्क करता है तो उस से हो क्या जायेगा ? — कहने का भाव है कि थोड़ी बहुत भी तकलीफ़ होने पर सब से पहले ऊपर लिखी बातों पर ध्यान केंद्रित किया जाए — और अपने फैमिली डाक्टर से ज़रूर संपर्क बनाये रखा जाए—– he knows your body inside out hopefully. और अगर उसे लगेगा कि किसी एम डी फ़िज़िशियन से परामर्श लेने की ज़रूरत है, वह कह देगा। यह तो हुआ एक आदर्श सा सिस्टम जिस में सारा काम कायदे से चले।

और फिर फ़िज़िशियन को भी लगेगा कि किसी दिल के विशेषज्ञ से चैकअप करवाना ज़रूरी है तो वह मरीज़ को रैफर कर देगा। लेकिन समस्या यह है कि आज कल इधर उधर से मिलनी वाली अध-कचरी नॉलेज ने मरीज़ों को और भी परेशान कर दिया है कि उन्हें लगता है अगर थोड़ी बहुत टेंशन की वजह से थोड़ा बहुत ब्लड-प्रैशर भी बढ़ गया है तो भी किसी हार्ट के विशेषज्ञ को ही दिखाना ठीक रहेगा।

लेकिन मुझे लगता है इस तरह से अपनी मरजी से ही डाक्टरों के पास पहुंच जाना ज़्यादा लोगों के लिये हितकर नहीं है। कारण ? — जो लोग अफोर्ड कर सकते हैं उन्हें शायद मेरी बात में इतना तर्क नज़र न भी आता है। शायद उन्हें लगा कि मैं तो उन्हें समय से पीछे ले कर जा रहा हूं —जब स्पैशलिस्ट उपलब्ध हैं तो फिर उन्हें दिखाया क्यों न जाए  ?

लेकिन अधिकतर लोगों के बस में नहीं होता कि वे इन सुपर स्पैशलिस्ट के पास जा कर इन की फीसें भरे और महंगे महंगे टैस्ट करवायें। वे चाहते हुये भी इन टैस्टों को कराने में असमर्थ होने के कारण अपनी परेशानियों को बढ़ा लेते हैं।

अब वापिस अपनी बात पर आते हैं —-इन हार्ट चैक्अप के लिये लगने वाले फ्री कैंपों की तरफ़। एक आधा टैस्ट जैसे कि ईसीजी वहां फ्री ज़रूर कर दी जाती है —- और शायद एक आध और टैस्ट। और इस के बाद कुछ मरीज़ों को उन की ज़रूरत के अनुसार ऐंजियोग्राफी करवाने के लिये कहा जाता है और फिर उस में गड़बड़ होने की हालत में बाई-पास सर्जरी।

अब देखने की बात है कि अधिकतर लोग इस देश में आम ही है —-अब सिचुएशन देखिये कि वह अपनी इस तरह की तकलीप़ के लिये सीधा पहुंच गया हार्ट-चैक करवाने — और उसे कह दिया गया कि तेरे तो दिल में गड़बड़ है। अब न तो यह हज़ारों रूपयों से होने वाले टैस्ट ही करवा पाये और न ही लाखों रूपये में होने वाले आप्रेशन ही करवा पाए —–वह कुछ करेगा नहीं, सोच सोच कर मरेगा — इतने पैसों का जुगाड़ कर पाता नही, और पता नहीं अगले कईं साल तक वैसे तो निकाल लेता लेकिन एक बार डाक्टर ने कह दिया कि तेरा तो भाई फलां फलां टैस्ट या आप्रेशन होना है तो समझो कि यह तो गया काम से।

मुझे इस तरह से ढिंढोरा पीटने वालों से यही आपत्ति है कि क्यों हम किसी भूखे को बढ़िया बढ़िया बेकरी के बिस्कुट दिखा कर परेशान करें —-अगर वह हमें पैसे देगा तो हम उसे वे बिस्कुट देंगे, ऐसे में क्यों हम उसे सताने का काम करें।

तो बात खत्म यहीं होती है कि कोई भी तकलीफ़ होने पर अपने खान-पान को, अपनी जीनव शैली को पटड़ी पर वापिस लाया जाए और ज़रूरत होने पर अपने फैमिली फ़िज़िशियन से मिलें —-सीधा ही सुपर स्पैशलिस्ट को दिखाना मेरे विचार में आम आदमी के हित में होता नहीं है। साधारण तकलीफ़ों के उपचार भी साधारण होते हैं।

एक बात और भी है कि मान लीजिये लाखों रूपये के बोझ तले दब कर आप्रेशन भी करवा लिया लेकिन बीड़ी-तंबाकू का साथ छूटा नहीं, सारा दिन एक जगह पर पड़े रहना और खाना-पीना भी खूब गरिष्ट, नमक एवं मसालों से लैस —–क्या आप को लगता है कि ऐसे केस में आप्रेशन से होने वाले फायदे लंबे अरसे तक चल पाएंगे ?

हां, एक बात हो सकती है कि बाबा रामदेव की खाने-पीने एवं व्यायाम करने की सारी बातें मानने से क्या पता आप को उतनी ही फायदा हो जाए ——लेकिन यह विश्वास की बात है —आस्था की बात है —- यह प्रभु कृपा की बात है —इस में कब दो गुणा दो दस हो जाएं और कब शून्य हो जाए— यह सब हम सब जीवों की समझ से परे की बात है।

आप को भी लग रहा है ना कि यार, यह तो प्रवचन शूरू हो गये —-मुझे भी कुछ ऐसा ही लग रहा है इसलिये बस एक आखिरी बात आपसे शेयर करके विराम लूंगा।

कुछ दिन पहले मैं सहारनपुर में एक सत्संग में गया हुआ था –मेरे सामने दो-तीन दोस्त बैठे हुये थे। दोस्तो, वे लोग बीच बीच में आपस में हंसी मज़ाक कर रहे थे और जिस तरह से वे खुल कर ठहाके मार रहे थे, उन्हें देख कर मै भी बहुत खुश हुआ। मैं उस समय यही समझने की कोशिश कर रहा था कि दिल से निकलनी वाली हंसी इतनी संक्रामक क्यों होती है।

कमबख्त हम लोगों की बात यह है कि हम लोग हंसना भूलते जा रहे है —किसी से साथ दिल कर बात इसलिये नही करते कि कहीं कोई इस का अन-ड्यू फायदा न ले ले —बस इसी फायदे नुकसान की कैलकुलेशन में ही पता ही कब बीमारियों मोल ले लेते हैं। टीवी पर एक बार एक हार्ट-स्पैशलिस्ट कह रहा था —-

दिल खोल लै यारा नाल,

नहीं तां डाक्टर खोलनगे औज़ारा नाल।

( बेपरवाही से अपने दोस्तों से दिल खोल कर बाते किया कर, वरना डाक्टरों को आप्रेशन करके दिल को खोलना पड़ सकता है) …..