आखिर हम लोग नमक क्यों कम नहीं कर पाते ?

यह तो शत-प्रतिशत सच ही है कि नमक का ज़्यादा इस्तेमाल करने से ब्लड-प्रेशर होता ही है—वही चोली दामन वाला साथ, कितनी बार हम लोग इस के बारे में बतिया चुके हैं। लेकिन फिर भी जब मैं अपने आस पास देखता हूं तो पाता हूं कि लोग इस के बारे में बिल्कुल भी सीरियस नहीं है। हां, अगर खुदा-ना-खास्ता एक बार झटका लग जाता है तो थोड़ा बहुत बात समझने में आने लगती है।

लेकिन मेरी समस्या यह है कि मैं जब भी नेट पर नमक के बारे में कोई भी गर्मागर्म खबर पढ़ता हूं तो मुझे अपने देशवासियों का ख्याल आ जाता है — इसलिये बार बार वही घिसा पिटा रिकार्ड चलाने लग जाता हूं।

शायद ही मुझे किसी मरीज़ से यह सुनने को मिला हो कि वह नमक का ज़्यादा इस्तेमाल करता है। किसी को भी पूछने पर यही जवाब मिलता है कि नहीं, नहीं, हम तो बस नार्मल ही खाते हैं। इस के बारे में हम एक बार बहुत गहराई से चर्चा कर चुके हैं कि आखिर कितना नमक हम लोगों के लिये काफ़ी है? और दूसरी बात यह कि एक बार मैंने यह भी बताने का प्रयास तो किया था कि केवल नमक ही नमकीन नहीं है।

अच्छा तो देश में यह भी बड़ा वहम है कि पाकिस्तानी नमक कम नमकीन है। नमक तो बंधुओ नमक ही है।

अच्छा तो अभी अभी मैं पढ़ रहा था कि इस नमक की वजह से अमेरिका में भी बहुत हो-हल्ला हो रहा है क्योंकि वहां लोग ज़्यादा प्रोसैसड खाध्य पदार्थ ही खाते हैं और यह तो नमक से लैस होता ही है लेकिन हमें इतना खश होने की ज़रूरत नहीं –हम लोग भी जहां हो सके नमक फैंक ही देते हैं —लस्सी, रायता, आचार, लस्सी, गन्ने का रस, फलों के दूसरे रस (अगली बार जब जूस पीने लगें तो दुकानदार के चम्मच का साइज देखियेगा, आप को उस का हाथ रोकना चाहेंगे) …..बिस्कुट, तरह तरह के भुजिया, नमकीन, ……लिस्ट इतनी लंबी है कि एक पोस्ट भी कम पड़ेगी इसे लिखने में।

हां, तो अमेरिका में भी लोगों को नमक कम खाने की सलाह देते हुये यह कहा गया है कि वे रोज़ाना डेढ़ ग्राम से ज़्यादा नमक न लिया करें — और जो आजकल सिफारिशें हैं उस के अनुसार सभी लोगों को चाय के एक चम्मच से ज़्यादा (जिस में लगभग दो-अढ़ाई ग्राम नमक आता है) नमक नहीं लेना चाहिये और जिन लोगों को उच्च रक्तचाप है या कोई और रिस्क है उन्हें तो डेढ़ ग्राम से ज्यादा नहीं लेना चाहिये। लेकिन अभी नई पैनल ने सिफारिश की है कि कोई भी हो, डेढ़ ग्राम से ज़्यादा बिलकुल नहीं।

आज जब मैं यह लिख रहा हूं तो यही सोच रहा हूं कि अगर हम लोग बस इसी बात को ही पकड़ लें तो कितने करोड़ों लोग रोगों से बच जायेंगे, कितनों का ब्लड-प्रैशर कंट्रोल होने लगेगा, दवाईयां कम होने लगेंगी और शायद आप का डाक्टर आप का सामान्य रक्तचाप देखते हुये उन्हें बिल्कुल ही बंद कर दे।

लेकिन एक बात है कि इस डेंढ़ ग्राम नमक का मतलब वह नमक नहीं है जो केवल दाल-सब्जी में ही डलता है, इस में सभी अन्य तरह के नमक के इस्तेमाल सम्मिलित हैं। मेरी सलाह है हमें भी शुरूआत तो करनी ही चाहिये –कोई ज़्यादा मुश्किल नहीं है, मैं भी कभी भी जूस में नमक नहीं डलवाता, दही में नमक नहीं, लेकिन रायते में बिना नमक के नहीं चलता, मैं सालाद के ऊपर नमक नहीं छिड़कता….लेकिन जब बीकानेरी भुजिया खाने लगता हूं तो यह सारा पाठ भूल जाता हूं —इसलिये अब ध्यान ऱखूंगा।

किस्मत में क्या लिखा है, क्या जाने —लेकिन जहां तक हो सके तो विशेषज्ञों की राय मानने में ही समझदारी है, केवल मुंह के स्वाद के लिये हम लोग किसी चक्कर में पड़ जाएं ….यह तो बात ना हुई। अमेरिका में तो होटल वालों ने भी अपने खाद्य़ पदार्थों में नमक कर दिया है।

इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि एक नमक इंस्टीच्यूट का कहना है कि नहीं, नहीं यह डेढ़ ग्राम नमक वाला फंडा ठीक नहीं है, वे कहते हैं कि सारी दुनिया में लोग तीन से पांच ग्राम नमक रोज़ाना खाते हैं क्योंकि यह उन की ज़रूरत है।

लेकिन मैं तो उस डेढ़ ग्राम नमक वाली बात की ही हिमायत करता हूं क्योंकि मैं नमक ज़्यादा खाने से होने वाले रोगों के भयंकर परिणाम देखता भी हूं, रोज़ाना सुनता भी हूं। वैसे आपने क्या फैसला किया है। लेकिन यह क्या, आप कह रहे हैं कि यार, अब शिकंजी, लस्सी भी फीकी ही पिलाओगे क्या ? —-बंधओ, इतने अच्छे बच्चे बनने की भी क्या पड़ी है, कभी कभी तो यह सब चलता ही है। वैसे शिंकजी में कभी कम नमक डाल कर देखिये।

जाते जाते यह बात लिखना चाह रहा हूं कि हम लोग गर्म देश में रहते हैं, गर्मियों में पसीना खूब आता है —जिस से नमक भी निकलता है, इसलिये हमें गर्मी के दिनों में थोड़ी रिलैक्सेशन मिल सकती है —लेकिन वह भी ब्लड-प्रैशर से पहले से ही जूझ रहे लोगों को तो बि्लकुल नहीं। मुद्दा केवल इतना है कि दवाईयों से भी कहीं ज़्यादा नमक की मात्रा के बारे में जागरूक रहें……………आप के स्वास्थ्य की कामना के साथ यहीं विराम लेता हूं। .

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इंटरनेट लेखन के दांव-पेच…पाठ संख्या 5.

मेरे विचार में एक दिन के चार पाठ ठीक हैं —इतनी थ्यूरी ठीक है– अब ज़रा प्रैक्टीकल के लिये लैब का रूख करते हैं। हां, तो अब मैं आप से अपनी सब से मनपसंद साइट के बारे में दो बातें करना चाहूंगा।

मुझे BBC news की साइट बेहद पसंद है— यह रहा इस का होम-पेज। मैं कंटैंट के ऊपर कुछ ज़्यादा कहना नहीं चाहता क्योंकि मुझे कुछ ज़्यादा पढ़ने का समय ही नहीं मिल पाता। लेकिन जिस इंटरनेट लेखन की बात हम लोग सुबह से कर रहे हैं और जिस के दांव-पेच आप जैसे धुरंधर लिक्खाड़ों को मैं बताने की हिमाकत कर रहा हूं — उस इंटरनेट लेखन का नमूना जानने के लिये हमें वेब-राइटिंग वर्कशाप के दौरान बीसियों बार बीबीसी न्यूज़ की साइट पर घुमाया गया।

अभी तो आप इस साइट को निहारिये — उदाहरण के लिये यह रहा इस के हैल्थ सैक्शन का होमपेज और किसी एक हैल्थ स्टोरी पर क्लिक करने पर आप देखेंगे कि कितने जबरदस्त तरीके से न्यूज़-स्टोरी को प्रस्तुत किया गया है।

बीबीसी की हिंदी साइट पर क्या आप कभी गये हैं? इस के विज्ञान के होमपेज को देखिये और एक खबर पर क्लिक करने पर यह देखिेये कौन सी खबर आ गई —ब्रश करें दिल के रोग से बचें!

अच्छा तो आप इस साइट की विशेषताओं के बारे में सोचिये –शीर्षक, पैराग्राफ, सीधी सादी भाषा और सब तरह से बढ़िया प्रस्तुति। इस का विश्लेषण बाद में करेंगे कि क्यों यह साइट मुझे बेहद पसंद है। यह मेरे व्यक्तिगत मत भी हो सकता है लेकिन मैं इसे विस्तार से आप के साथ कभी शेयर करूंगा।

मुझे यह साइट (विशेषकर अंग्रेज़ी वर्ज़न) इतनी पसंद है कि मैं इसे रोज़ाना देखता हूं —यह मुझे अपने लेखन की कमियों की तरफ़ झांकने के लिये प्रेरित करती है। आप से भी अनुरोध है कि आप भी इस साइट (अंग्रेज़ी अथवा हिंदी वर्ज़न) को बुकमार्क कर लें। बहुत कुछ सीखने को मिलेगा अगर रोज़ाना इसे देखेंगे —वैसे हम इसी साइट के बारे में विस्तार से चर्चा तो करेंगे ही।

पता नहीं इस की हिंदी साइट का फांट बहुत छोटा लगता है, लिखा तो था मैंने उन को कि फांट का कुछ हो सके तो देखो —-और पता नहीं क्यों हिंदी वर्जन के पन्ने फीके-फीके से लगते हैं——बिल्कुल मेरी मैट्रिक की क्लास की भूगोल विज्ञान की किताब की तरह? क्या मेरे को ही ऐसा लगता है या आप को भी ऐसा कुछ लगा, हो सके तो बताना। मैं इस बात को समझना चाहता हूं —- और हां, एक बात और इस साइट पर हिंदी के ब्लाग भी हैं साइट पर टिप्पणी देकर आप को शायद एक-दो दिन का इंतज़ार करना पड़ सकता है कि ब्लागर साहब की नज़रे एनायत हुईं कि नहीं —अगर हो गईं तो आप की टिप्पणी दिख जाएगी—————-वरना। निःसंदेह अंग्रेज़ी वर्जन में बहुत ज़्यादा खुलापन (interactivity) है जो होमपेज पर नज़र डालने से ही पता लग जाता है।

बस, आज के दिन के पाठ यहीं खत्म होते हैं —दोपहर में ऐसे ही बैठे बस विचार आया कि इस तरह के पाठ ही दोहरा लूं, सो बैठ गया यह सब लिखने —आप से कहीं ज़्यादा अपने आप को ये सब बातें याद दिलानें कि वेब-राइटिंग के दांव-पेचों को अभ्यास करने का समय यही है —-इस से पहले की कैसे भी कुछ भी लिख कर छुट्टी कर लेने की मेरी पुरानी आदतें पक जाएं।

इंटरनेट लेखन के दांव-पेच….. पाठ संख्या 4

क्यों दूं मैं लिंक अपने लेख में? मेहनत करूं मैं और इस का फल चखें बाकी सब? मुझ से यह ना होगा कि मैं सब को बताता फिरू कि अपने लेख के आइडिया मुझे आते कहां से हैं? क्या ज़रूरत है सारे जग को बताने की इतनी बढ़िया जानकारी आखिर नेट पर पड़ी कहां है ? — अजीब सी बातें लगती हैं ना दोस्तो, लेकिन यह वेब-राइटिंग वाला ट्रेनिंग कोर्स से पहले मेरी सोच बिल्कुल ऐसी ही थी।

लेकिन इस इंटरनेट लेखन के प्रोग्राम के दौरान नेट पर कंटैंट मुहैया करवाने के बारे में मेरे विचारों में इतना शिफ्ट आया कि मैं ब्यां नहीं कर सकता। जब मैंने कोर्स ज्वाइन किया तो मेरे आइडिया बिल्कुल फिक्सड कि यार, क्या मुसीबत है अपने लेखों में तरह तरह के लिंक देने की ज़हमत उठाने की। जिसे ज़रूरत होगी खुद ढूंढ लेगा—ऐसे संकीर्ण विचार मैंने अपने मन में पाल रखे थे।

लेकिन इंटरनेट लेखन पर वर्कशाप में शिरकत करने पर सही में पता चला कि इंटरनेट की आत्मा आखिर है क्या? — जब हम इंटरनेट (अंतर्जाल) की बात करते हैं तो हमें मकड़ी के जाल की तरह एक दूसरे के कंटैंट पर लिंक तो करना ही चाहिये। दरअसल इंटरनेट की सुंदरता ही इस लिंक्स की वजह से है —इस लिये एक अहम् सबक जो मैं उस वर्कशाप से लेकर आया और जिसे मैं हमेशा प्रैक्टिस भी करूंगा —–लिंक लगाएं, लिंक लगाएं और लिंक लगाएं।

लेकिन अपने लेखों में लिंक (हाइपरलिंक) लगाने के भी कुछ संदर से कायदे हैं, नियम हैं जिन्हें मानने से वे लिंक हमारे लेखों की शोभा में चार चांद लगा देते हैं। हां, तो मैं बात कर रहा था कि इस वर्कशाप से पहले मैंने जितना भी कंटैट अपने ब्लॉग पर डाला है उस में लिंक ही नहीं डाले –इस का कारण मैं पहले ही बता चुका हूं।

लेकिन वर्कशाप से लौटने के बाद मैंने जो भी लिखा है उस पर समुचित लिंक डाले हुये हैं— एक फायदा यह भी है कि लिंक डालने से हमारी ही विश्वसनीयता बढ़ती है और इस से बढ़ कर वैसे देखा जाए तो है ही क्या? अब अगर मैं किसी इलाज की समीक्षा कर रहा हूं, किसी नईं दवाई के बारे में लिख रहा हूं तो क्या एक लिंक के द्वारा पाठकों को यह जानने का भी अधिकार नहीं है कि आखिर मेरी जानकारी का स्रोत क्या है ? मेरे कुछ भी कहने को वे आखिर मानें क्यों ? –क्या पता कुछ लिखने के पीछे मेरा कोई निजी स्वार्थ हो !!

और दूसरी बात यह है कि हम अपने पाठकों को जितने विकल्प देंगे, वे हमारे लेखों पर आने में उतनी ही रूचि दिखायेंगे। लेकिन जब तक समझ नहीं थी तो मैं भी कहां इस तरह के विकल्प देकर राजी था, बस अपना ही राग अलापने में सुख मिलता था। लेकिन फिर धीरे धीरे अपने लेखों में अपनी ही अन्य पोस्टों के लिंक (internal links — इंटरनल लिंक्स) देने लगा —- फिर बाद में बाहर के लिंक्स (external links) देने की हिम्मत आने लगी.

हिम्मत शब्द का इस्तेमाल इसलिये कर रहा हूं क्योंकि शूरू शूरू में शायद हमें लगता है कि पहले ही इतनी मुश्किल से कोई पाठक हमारे लेख तक पहुंचा है, बाहर का लिंक देने से तो कहीं यह भी न भाग जाये। लेकिन यह इंटरनेट — web 2.0 की भावना नहीं है,आज इंटरनेट की स्पिरिट है, बात करने की , बात सुनने की, पाठकों को अधिक से अधिक विकल्प मुहैया करवाने की—–पाठक हमारे एक लेख से अगले पल कहीं और उस से अगले पल कहीं और पहुंचता है तो आखिर हमें एतराज़ क्यों? नेट पर हम भी तो ऐसा ही करते हैं जहां हमें बेहतर विक्लप मिलते हैं हम उधर घूमने निकल पड़ते हैं।

और तो और, हम लोग जब नेट पर कोई लेख आदि देख रहे होते हैं तो इतनी सूझबूझ से लगाये गये लिंकों की वजह से हमारा काम कितना आसान और अनुभव कितना सुखद हो जाता है —-तो हम दूसरों को विशेषकर हिंदी के पाठकों को इन सुखों से क्यों वंचित रखें? यह मैं इसलिये कह रहा हूं क्योंकि हिंदी के लेखों में, चिट्ठों के अलावा भी विभिन्न हिंदी न्यूज़-साइटों पर मुझे इन लिंक्स की कमी खलती है। इस से कहीं न कहीं लेखक की क्रेडिबिलिटी पर चाहे बिलकुल फीका ही सही लेकिन चिंह तो लगता ही है।

हमें उस वेब-राइटिंग वर्कशाप के दौरान यह भी आभास दिलाया गया कि ये जो हाइपरलिंक्स हैं, ये सारे लेख में अच्छे ढंग से बिखरे से हों, ऐसी कोशिश रहनी चाहिए — हमारे ट्रेनर्ज़ शब्द इस्तेमाल करते थे —links should be sprinkled throughout the online article. लेकिन लिंक बस नाम के लिये ही टिका देने से भी पाठक चिढ़ से जाते हैं और समझ जाते हैं।

केवल अपने लेख से संबंधित लिंक ही डालें —- और लिंक्स हम लोग नेट पर मौजूद फोटो के लिये और दूसरे तरह के रिसोर्सेज़ के लिये भी डाल सकते हैं। आप देखिये यह जो आज कल हम लोगों के चिट्ठों पर यह आइकन लगा है —आप इसे भी पसंद करेंगे और इस के साथ ही तीन-चार पुरानी पोस्टें दिखती हैं, यह भी अच्छा आइडिया है (मेरे ब्लॉग पर भी यह लगा हुआ है) ।

लेकिन लिंक डालते समय इस बात का भी ध्यान रखें कि एक ही लेख में एक लिंक को दोबारा न टिकाया जाए। इस से पाठक को खुन्नस आती है——और डैड-लिंक्स —-Dead links — बाप रे बाप, इन का तो विशेष ध्यान रखें —-पाठक ने किसी लिंक पर क्लिक किया और वह डैड-लिंक (अर्थात् कोई पेज खुला ही नहीं) निकला तो समझ लें पाठक नाराज़।

हम सब चाहते हैं ना कि हमारे चिट्ठे के लिंक लोग अपने लेखों में, अपने चिट्ठों पर डालें लेकिन पता नहीं हम दूसरों के लिये क्यों आलसी बन जाते हैं –आज जब मैंने इन दांव पेचों को आप के साथ बांटना शुरू किया तो मैंने रवि रतलामी जी के ब्लाग का और समीर लाल जी के ब्लाग का ज़िक्र किया तो मेरा कर्तव्य बनता था कि मैं वहां इन के चिट्ठों के लिंक देता ……लेकिन बस छोटे छोटे कामों के लिये यह आलस के कीड़े का बहाना सा बनाने की आदत हो गई है —————–लेकिन आप कभी भी लिंक्स डालने में आलस न करें—–यह हमारे लेखन को निखारता है, पारदर्शिता के साथ साथ हमारे कहे को विश्वसनीयता प्रदान करता है।

इंटरनेट लेखन के दांव-पेच–पाठ संख्या 3.

हां तो अपनी चर्चा चल रही थी कि इंटरनेट पर लिखे लेख का शीर्षक कैसा होना चाहिए ? बिल्कुल दुरूस्त टिप्पणीयां आईं कि शीर्षक ऐसा तो हो कि पाठक को आकर्षक लगे। तो आइये इसी बात को थोड़ा सा विस्तार से देखते हैं ..

वैसे यहां पर मैं जिन बिंदुओं को रेखांकित करूंगा वे ज़्यादातर न्यूज़-स्टोरी के लिये लागू होते हैं–चूंकि अब ब्लागिंग एवं न्यूज़-रिपोर्टिंग के बीच की दूरी तेज़ी से खत्म होती दिख रही है इसलिये ये सब बिंदु हमारे चिट्ठों के लिये भी उतने ही लागू होते हैं।

  1. नेट पर कहीं भी हमें कोई अलग थलग पड़ा हुआ शीर्षक भी मिल जाए तो हमें उसे से यह तो पता लगना ही चाहिये कि उस शीर्षक के अंतर्गत लेखक क्या कहना चाह रहा है। In other words, headlines has to tell us what the story is about.
  2. जहां तक हो सके शीर्षक में एक क्रियात्मक शब्द तो होना ही चाहिये — जिसे हम लोग अंग्रेज़ी में verb कहते हैं –यानि कि पता लगना चाहिये शीर्षक से क्या चल रहा है, और जहां तक हो सके यह strong verb होना चाहिए।
  3. जैसा कि अपने ही साथी ब्लॉगरों ने विचार रखे हैं कि हमारे लेखों के शीर्षक कमबख्त इतने आकर्षक हों कि पाठक वहीं रूक जाए और उस का नोटिस लेने पर मजबूर हो जाए। Headlines should be catchy, punchy, and must attract attention.
  4. एक बहुत महत्वपूर्ण बात यह भी है जहां तक हो सके शीर्षक छोटा, सटीक ओर एकदम सीधा तीर की तरह जाने वाला हो — It should be short, to-the-point and snappy.
  5. शायद आपने भी नोटिस किया होगा कि बीबीसी की स्टोरीज़ के शीर्षक आम तौर पर चार शब्दों के ही होते हैं लेकिन जहां तक हो सके छः शब्दों से ज़्यादा शब्द शीर्षक में नहीं रखने चाहिये।
  6. एक बात कहते हैं ना कि KISS principle को पूरी तरह फॉलो करना चाहिये —- चलिये लगे हाथ इस KISS का राज़ भी खोल ही देते हैं — Keep it short and simple!!
  7. शीर्षक लगभग हमेशा वर्तमान टैंस में ही लिखा होना चाहिये — Present tense is used. मेरा विचार है कि चिट्ठाकारी करते समय अकसर हमें इस नियम से हटना पड़ सकता है। लेकिन लेखन की सुंदरता इसी में है कि कैसे इस नियम का भी पालन कर सकें। वर्तमान टैंस होने से शीर्षक पाठक को लुभाता, पाठक में कुछ प्रासांगिक मिलने की आतुरता रहती है।
  8. यह तो सुनिश्चित किया ही जाना चाहिये कि शीर्षक में कोई गलतियां आदि न हों, इस से पाठक चिढ़ जाता है और कईं बार लेखक के बारे में शीर्षक देख कर ही अपनी राय बना बैठता है।
  9. जहां तक हो सके शीर्षक में ऐब्रीविएशन (abbreviations) का इस्तेमाल न किया जाए — लेकिन कुछ बहुत ही प्रचलित छोटे नामों के लिये यह छूट ली जा सकती है जैसे कि यू.एन, यू एस ए, यू के आदि।

और जाते जाते वही पुरानी बात —धन्यवाद है ब्लागवाणी का, चिट्ठाजगत का —हमें अपने सभी परिचितों के चिट्ठे एक साथ मिल जाते हैं और काफी तो हम ने बुकमार्क कर रखे हैं, सब्सक्राइब कर रखे हैं, लेकिन अब सोचने की बात है कि जब भी हम लोग अपने किसी भी लेख के लिये शीर्षक लिखने लगें तो थोड़ा यह अवश्य सोच लें कि अगर इस तरह का शीर्षक मुझे नेट पर कहीं अलग-थलग (isolated) पड़ा दिख जाएगा तो क्या उस पर क्लिक कर के लेख तक जाने की ज़हमत उठाना चाहूंगा कि नहीं ?

चलिये, आप के लिये भी एक अभ्यास (exercise) — यह पाठ पढ़ने के बाद आप एक बार ब्लागवाणी या चिट्ठाजगत पर आज प्रकाशित चिट्ठों पर जल्दी से नज़र दौड़ाएं और फिर सोचें कि हम कैसे और भी अच्छे, उम्दा और आकर्षक शीर्षक लिख सकते हैं। वैसे भी आजकल तो पैकिंग पर इतना ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है, तो फिर हम लोग क्यों किसी से पीछे रहें !

इंटरनेट लेखन के दांव-पेच…पाठ संख्या 2.

आज मैं सोच कर हंस रहा हूं कि जब मैंने शूरू शूरू में नेट पर लिखना शुरू किया तो मेरे हैल्थ-टिप्स वाले ब्लॉंग पर कुछ इस तरह के शीर्षक मैंने अपनी पोस्टों को दिये —-
पहले तो मैं इन शीर्षकों आदि के बारे में जागरूक न था लेकिन उस वेब-राइटिंग ट्रेनिंग के दौरान यह सीखने का मौका मिला कि ये शीर्षक नेट पर लिखते समय कितने महत्वपूर्ण हैं —अब कोई मेरे को कहें कि भलेमानुस, यार, तुम बताओ हम लोग जूस पीने जाएं या ताड़ी पीने —तुम से मतलब ? और उस गन्ने के रस वाली पोस्ट पढ़ कर कोई चाहे तो मुझे यह ही कह दे –क्यों भाई तुम नहीं पीते ? और राजू वाली पोस्ट का हैडिंग देख कर कोई कहे —यार, राजू मुसीबत में है तो हुआ करे, हमें क्यों यह सब सुना के परेशान कर रहा है?
तो मेरे ब्लॉग से ही बुरे शीर्षकों के उदाहरण आपने देख लिये। अब एक बात का जवाब दीजिये कि अगर इस तरह के शीर्षक आप को नेट पर इधर उधर यहां वहां बिखरे दिख जाएं तो क्या आप उन्हें पढ़ना चाहेंगे……शायद नहीं। क्योंकि न तो शीर्षक का कोई सिर है, न पैर है —न ही उस से पता चल रहा है कि लेखक आखिर कहना क्या चाहता है —-ऐसे में क्यों आयेगा हमारे लेख कर कोई बंदा ?
एक बात जो बहुत ही अहम उस ट्रेनिंग के दौरान मैंने सीखी और समझी वह यह कि हम अपने लेखों पर दिये जाने वाले शीर्षकों को कभी भी हल्केपन से न लें. और विशेषकर जब इंटरनेट पर लिखे लेखों की बात चलती है तो इन का महत्व तो कहीं ज़्यादा है —-क्योंकि हमारे लेखों के ये शीर्षक नेट पर अलग अलग जगहों पर बिखरे पड़े हैं —-कुछ ब्लॉग एग्रीगेटरों के अलावा बहुत ही अन्य साइटें भी हैं जहां ये शीर्षक हमारी सोच के नमूने के रूप में सजे हैं। और बहुत हद तक तो ये शीर्षक ही तय करते हैं कि नेटयूज़र उस पर क्लिक कर के हमारे लेख तक पहुंचता है कि नहीं ? मुझे तो यह बात झट से समझ आ गई थी —और उस ट्रेनिंग के बाद इस के बारे में थोड़ा बहुत सजग रहता हूं।
अब आप के मन में यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि आखिर पता तो चले कि बढ़िया सा शीर्षक लगाने की रैसिपी है क्या ? दोस्तो, वेबराइटिंग के इस पहलू को हमारे सूस्त दिमाग में डालने के लिये ट्रेनिग के दौरान पूरा एक दिन इन शीर्षकों को ही समर्पित था–हमें तरह तरह के लेख दिये गये —-सभी प्रतिभागियों से अलग अलग किस्से सुनने के बाद हम से पूछा गया कि अगर आपने इस घटना को कोई शीर्षक देना हो तो आप क्या हैडिंग देंगे। और इस तरह से काफी कुछ सीखने को मिला।
बस, एक बात का ज़रा करने का ज़रूरत है कि जब हम नेट पर कोई लेख प्रकाशित करते समय अपने लेख को कोई शीर्षक दें तो इतना तो कर ही करते हैं कि अपने आप से इतना पूछ लें कि अगर इस तरह का शीर्षक नेट पर कहीं पड़ा मिल जायेगा तो क्या मैं उस लेख को पढ़ना चाहूंगा ?
चूंकि पोस्ट लंबी हो गई है, इसलिये एक बढ़िया शीर्षक तैयार करने की आखिर रैसिपी क्या है, इस के लिये अगली पोस्ट में बात करते हैं। ठीक लग रहा है ना, कहीं बोर तो नहीं हो रहे, बता देना, भाईयो. कहीं बाद में पता चले कि मैं इन दांव-पचों के भाषण के चक्कर में आप का बढ़िया सा रविवार बेकार करता रहा !!

इंटरनेट लेखन के दांव-पेच

मुझे पता था कि आप शीर्षक देख कर यही कहने वाले हैं कि क्या यार, जुम्मा जुम्मा दो रोज़ हुये नहीं नेट पर लिखते हुये और तू हम धुरंधरों को बतायेगा ये दांव-पेच कि नेट पर कैसे लिखना होगा। लेकिन बात तो सुनिये —हमें हर एक की बात सुन तो लेनी ही चाहिये –मानना ना मानना तो आप के हाथ में है।

तो सुनिये मुझे आज सुबह ही विचार आया है कि मुझे इंटरनेट लेखन के ऊपर थोड़ा बहुत लिखना चाहिये। कारण? —दरअसल यह विषय मेरे दिल के करीब है। कुछ अरसा पहले जर्मनी की स्टेट ब्राडकॉस्टिंग (Deutsche welle) से विशेषज्ञ आये.. और दिल्ली में मुझे उन से एक महीने की इसी वेब-राइटिंग पर ट्रेनिंग लेने का अवसर मिला। बहुत कुछ सीखने का मौका मिला और अब मैं उन सब अनुभवों को आप के साथ बांटने के लिये तैयार हूं।

इस तरह से यह ज्ञान बांटने के पीछे मेरा एक स्वार्थ भी है —मेरा पाठ भी पक्का हो जायेगा क्योंकि वहां उस ट्रेनिंग के दौरान बहुत ही ऐसी बातें सीखी हैं जिन्हें मैं अभी प्रैक्टिस नहीं कर पा रहा हूं।

मैं भी दोस्तो पिछले लगभग अढाई साल से नेट पर लिख रहा हूं। आज कल जो लिख रहा हूं —मैं कंटैंट की बात नहीं कर रहा हूं —वो तो जैसा भी होता है हरेक के मन की मौज है—लेकिन मैं प्रस्तुति की बात कर रहा हूं—— हां, तो अपने लिखने के बारे में कह रहा हूं कि जब मैं अपने आज कल के लेखों की शुरूआती दौर के लेखों से तुलना करता हूं तो पाता हूं कि यार, हिम्मत है उन शुभचिंतकों की जिन्होंने उन्हें पड़ने की मशक्कत की और फिर टिप्पणीयां भी लिखीं। कभी मौका मिला तो इन सब शख्शियतों का व्यक्तिगत रूप से शुक्रिया करूंगा।

सब से पहले तो बात करते हैं —लिखने के अंदाज़ की। ऐसा भी नहीं कि जो बातें मैं लिखूंगा वे कोई नई बातें हैं, बिल्कुल मामूली बातें हैं —लेकिन कईं बार इन्हें बार बार दोहराना ज़रूरी सा हो जाता है।

यह तो हम सब जानते ही हैं कि जो बंदा इंटरनेट पर बैठा है वह बहुत जल्दी में है, पूरी संभावना है कि वह एक तो नेट पर म्यूज़िक का आनंद ले रहा है–यू-ट्यूब पर,साथ में शायद अपने दोस्तों के साथ चैटिंग पर मसरूफ है— साथ में शायद कुछ अपने मतलब की गूगल-सर्च भी कर रहा है—और इतनी मसरूफीयत के बावजूद अगर उस ने हमारे ब्लॉग की भी विंडो खोल कर हमारा लेख पढ़ने की हिम्मत जुटा ही ली है तो हम आखिर क्यों उस के सब्र का इम्तिहान लें?

दरअसल होता यह है कि नेट पर बड़े बड़े लेख देख कर अकसर कोई भी झट से क्लिक मार से कहीं से कहीं निकल जाता है। इसलिये नेट पर कंटैट के साथ साथ लेखों की लंबाई-चौड़ाई की तरफ़ ध्यान देना भी बहुत ज़रूरी है। लंबाई तो हो गई लेकिन यह लेख की चौड़ाई का क्या चोंचला है, इस के बारे में भी बात करेंगे।

नेट पर लिखते समय बिल्कुल बोलचाल वाली भाषा हो तो मजा ही आ जाए—- दरअसल किसी लेख को पढ़ते वक्त मेरे जैसे को कुछेक शब्द ऐसे मुश्किल से मिल जाते हैं जिन के शब्दार्थ के बारे में मैं कोई तुक्का भी नहीं मार सकता —तो मैं जैसे तैसे अगले पैराग्राफ में झांकने की कोशिश करता हूं –लेकिन अगर वहां पर भी यह समस्या दिखती है तो आप को पता ही है कि हम लोगों के पास सब से बढ़िया हथियार जो हमें किसी भी विपदा से बचा लेता है —माउस —- बस क्लिक करते ही पहुंच गये कहीं के कहीं और मिल गया सभी मुसीबतों से छुटकारा। क्या ख्याल है हम सब लोग यह हथियार इस काम के लिये भी इस्तेमाल करते हैं ना —है कि नहीं ?

इसलिये नेट पर लिखते समय बिल्कुल छोटे छोटे वाक्य, छोटे छोटे पैराग्राफ हों तो ठीक रहता है। मैं हाथ जोड़ कर सभी चिट्ठाकारों से क्षमाप्रार्थी हूं कि चाहते हुये भी मुझे बहुत ज़्यादा पढ़ने का अवसर नहीं मिल पाता —सर्विस की वजह से मसरूफ रहना, फिर अपने लेख लिखने के लिये रिसर्च करना ….। लेकिन मुझे इस समय समीर लाल जी की उड़न तश्तरी और रवि रतलामी जी के ब्लाग का ध्यान आ रहा है —वाक्यों की रचना में और पैराग्राफ की लंबाई में वे इस के बारे में बहुत सजग हैं। लेखों की लंबाई के बारे में फिर कभी सोचेंगे।

क्या है ना —वेब पर बैठा आदमी इतनी जल्दी से है कि उसे तो बस बुलेटेड लि्स्ट के माध्यम से जानकारी चाहिये —यानि 1,2,3 ……..और यह गया लेख और वह हो गया फ्री। ऐसे में यह काफी हद तक हमारे ऊपर है कि कैसे कम उस का ध्यान अपने लेख की तरफ़ लेकर आएं और उसे वही टिकने पर मजबूर कर दें।

इस पोस्ट को इधर ही खत्म करता हूं –कहीं आप यह ही न समझ लें कि यार तू दांव पेच क्या दिखायेगा —तुम तो स्वयं ही उन्हें फॉलो नहीं करते । सो, इसी डर के साथ यहीं विराम लेता हूं —अगली पोस्ट कुछ घंटों के बाद।

डा महेश सिन्हा की पोस्ट—ब्रेन हैमरेज के रोगी की पहचान…

अभी अभी ब्लागवाणी देख रहा था तो डा महेश सिन्हा की एक बहुत उपयोगी पोस्ट दिख गई —-मस्तिष्क आघात के मरीज़ को कैसे पहचानें? मस्तिष्क आघात –जी वही, जिसे कईं बार ब्रेन-स्ट्रोक भी कह दिया जाता है अथवा आम भाषा में दिमाग की नस फटना या ब्रेन-हैमरेज भी कह देते हैं।
इस के बारे में पोस्ट डाक्टर साहब को किसी मित्र से मिली है —
वे लिखते हैं —- एक पार्टी चल रही थी, एक मित्र को थोड़ी ठोकर सी लगी और वह गिरते गिरते संभल गई और अपने आस पास के लोगों को उस ने यह कह कर आश्वस्त किया कि सब कुछ ठीक है, बस नये बूट की वजह से एक ईंट से थोड़ी ठोकर लग गई थी। (आस पास के लोगों ने ऐम्बुलैंस बुलाने की पेशकश भी की).
साथ में खड़े मित्रों ने उन्हें साफ़ होने में उन की मदद की और एक नई प्लेट भी आ गई। ऐसा लग रहा था कि इन्ग्रिड थोड़ा अपने आप में नहीं है लेकिन वह पूरी शाम पार्टी तो एकदम एन्जॉय करती रहीं। बाद में इन्ग्रिड के पति का लोगों को फोन आया कि कि उसे हस्पताल में ले जाया गया लेकिन वहां पर उस ने उसी शाम को दम तोड़ दिया।
दरअसल उस पार्टी के दौरान इन्ग्रिड को ब्रेन-हैमरेज हुआ था –अगर वहां पर मौजूद लोगों में से कोई इस अवस्था की पहचान कर पाता तो आज इन्ग्रिड हमारे बीच होती।
ठीक है ब्रेन-हैमरेज से कुछ लोग मरते नहीं है –लेकिन वे सारी उम्र के लिये अपाहिज और बेबसी वाला जीवन जीने पर मजबूर तो हो ही जाते हैं।
जो नीचे लिखा है इसे पढ़ने में केवल आप का एक मिनट लगेगा —
स्ट्रोक की पहचान —
एक न्यूरोलॉजिस्ट कहते हैं कि अगर स्ट्रोक का कोई मरीज़ उन के पास तीन घंटे के अंदर पहुंच जाए तो वह उस स्ट्रोक के प्रभाव को समाप्त (reverse)भी कर सकते हैं—पूरी तरह से। उन का मानना है कि सारी ट्रिक बस यही है कि कैसे भी स्ट्रोक के मरीज़ की तुरंत पहचान हो, उस का निदान हो और उस को तीन घंटे के अंदर डाक्टरी चिकित्सा मुहैया हो, और अकसर यह सब ही अज्ञानता वश हो नहीं पाता।
स्ट्रोक के मरीज़ की पहचान के लिये तीन बातें ध्यान में रखिये –और इस से पहले हमेशा याद रखिये —-STR.
डाक्टरों का मानना है कि एक राहगीर भी तीन प्रश्नों के उत्तर के आधार पर एक स्ट्रोक के मरीज की पहचान करने एवं उस का बहुमूल्य जीवन बचाने में योगदान कर सकता है…….इसे अच्छे से पढ़िये और मन में बैठा लीजिए —
S —Smile आप उस व्यक्ति को मुस्कुराने के लिये कहिए।
T– talk उस व्यक्ति को कोई भी सीधा सा एक वाक्य बोलने के लिये कहें जैसे कि आज मौसम बहुत अच्छा है।
R — Raise उस व्यक्ति को दोनों बाजू ऊपर उठाने के लिये कहें।
अगर इस व्यक्ति को ऊपर लिखे तीन कामों में से एक भी काम करने में दिक्कत है , तो तुरंत ऐम्बुलैंस बुला कर उसे अस्पताल शिफ्ट करें और जो आदमी साथ जा रहा है उसे इन लक्षणों के बारे में बता दें ताकि वह आगे जा कर डाक्टर से इस का खुलासा कर सके।
नोट करें —- स्ट्रोक का एक लक्षण यह भी है —
1. उस आदमी को जिह्वा (जुबान) बाहर निकालने को कहें।
2. अगर जुबान सीधी बाहर नहीं आ रही और वह एक तरफ़ को मुड़ सी रही है तो भी यह एक स्ट्रोक का लक्षण है।
एक सुप्रसिद्ध कार्डियोलॉजिस्ट का कहना है कि अगर इस ई-मेल को पढ़ने वाला इसे आगे दस लोगों को भेजे तो शर्तिया तौर पर आप एक बेशकीमती जान तो बचा ही सकते हैं ….
और यह जान आप की अपनी भी हो सकती है।
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डा्क्टर साहब की यह पोस्ट को हिंदी में लिखने का ध्यान आया क्योंकि मुझे अपनी बड़ी बहन का ध्यान आ गया। बात 1990 की है, वे जयपुर में प्रोफैसर हैं, एक दिन अचानक वह अचानक दाएं पैर की चप्पल बाएं में और बाएं की दाएं की डाल कर चलने लगीं तो घर में बच्चियां हंसने लगीं — और थोड़े समय में उन की जुबान भी बताते हैं कांप सी रही थीं। जीजा जी उन्हें तुरंत फैमिली डाक्टर के पास ले गये —अब देखिये फैमिली डाकटर भी कितने मंजे होते हैं —उन्होंने उन्हें तुरंत डा पनगड़िया (जयुपर के क्या ,सारे विश्व के एक सुप्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट हैं डा पनगड़िया)की तरफ़ इन्हें रवाना कर दिया …जाते ही उन का सीटी हुआ —पता चला कि यह transient ischemic attack (TIA) है — इस दौरान दिमाग में रक्त की मात्रा अचानक बहुत कम पहुचंती है — और यह स्ट्रोक की तरफ़ भी जा सकता है। बस, उन्हें डाक्टर साहब द्वारा तुरंत एक इंजैक्शन दिया गया —शायद ट्रैंटल नाम का टीका था —-जो तुरंत छोटे मोटे थक्के (clot) को घोल देता है।
तुंरत ही मेरी बहन ठीक हो गईं और बाद में कुछ हफ्तों के लिये लेकिन उन्हें दवाई खानी पड़ी थी। भगवान की दुआ से अब बिल्कुल तंदरूस्त हैं। यह बहन की बात इसलिये लिखी की सही समय पर तुरंत डा्क्टरी सहायता मिलना कितना ज़रूरी है इस बात को रेखांकित किया जा सके और साथ में अपने फैमिली डाक्टर से हमेशा सलाह लेने में ही बेहतरी है —वरना शिक्षा से जुड़े लोगों को कहां पता रहता कि कौन न्यूरोलॉजिस्ट और किस के पास जाना है ?
बहरहाल, काम तो मैं नेट पर कुछ और करने बैठा था— लाइट है नहीं, इंवरटर पर काम चालू है। घर वाले सभी जयपुर गये हैं —बेटे को कह रहा हूं कि यार एक कप चाय पिला दो —कह रहा है कि नहीं पापा, यह ना होगा —देखता हूं शायद मुझे ही उठना होगा।
जब डाक्टर सिंहा की यह पोस्ट देखी तो रहा नहीं गया —-ऐसा लगा कि डाक्टर साहब जो निश्चेतना विशेषज्ञ हैं, अगर उन्होंने इतनी बढ़िया पोस्ट हम सब तक पहुंचा कर इतना सार्थक कार्य किया है तो अपना थोड़ा योगदान भी तो बनता ही है, बॉस.।
बहरहाल, डा सिंहा जी, गुस्ताखी माफ़ —-आप का लेख चुराने के लिये। Hope you dont mind, which i am sure you won’t.