व्यंग्य …..हिंदी अखबारों का संपादकीय पन्ना

हर बंदे की अपनी दुनिया होती है …मेरी भी है …..लेकिन पारिवारिक, कामकाजी, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पालिटिक्स के बारे में मैं बिल्कुल ही ज़ीरो हूं ….इस में कभी रूचि ली ही नहीं …..पारिवारिक एवं कामकाजी पालिटिक्स के लिये कभी टाइम ही नहीं मिला और शायद प्रवृत्ति भी बिल्कुल ऐसी है नहीं ……राष्ट्रीय एवं इंटरनैशनल मसले समझने के लिये पहले इतिहास भूगोल का ज्ञान होना तो ज़रूरी है ही।

और यह इतिहास भूगोल का ज्ञान भी न के ही बराबर है … बिल्कुल न के बराबर ….. केवल उतना ही है जितना अमिताभ बच्चन या शारहरूख कौन बनेगा करोड़पति में सिखा गये हैं। इस में मैं अपने मास्टर लोगों को दोष मानता हूं … स्कूल में इस विषय के जितने भी मास्टर मिले वे कभी भी इन विषयों में रूचि पैदा ही नहीं कर पाये।

बस जैसे तैसे ऐसे ही कुछ मास्टरों की छत्र छाया में रहते रहते यह तो लड़कपन में ही समझ लिया था कि हिस्ट्री-ज्योग्राफी के पेपर कोई पड़ता नहीं, बस उत्तरों की लंबाई देख कर अंक लुटाये जाते हैं…… तो फिर हम क्या कम थे, हम ने भी गप्पे हांकनी बचपन में ही सीख लीं (इस में तो आप को भी कोई शक नहीं होगा!) …. हर क्लास में इन पेपरों में वहीं गप्पें हांक हांक के थक गये …. लेकिन यह सब सुलेख लिखना कभी नहीं भूले ….. न ही कभी कोई कांट छांट की ….अगर पेपर चैक करने वाले ने देख लिया तो हो गई छुट्टी …..

बस, दनादन ऐसे ही क्लासें पास की जा रही थीं … इतने में आ गई मैट्रिक की परीक्षा …अब अगर कुछ भी बेसिक ज्ञान हो तो लिखें, तो ही नक्शे में बताएं कि पटसन कहां होती है और कोयले की खाने कहां पर हैं…….बहुत ही पीढ़ा के साथ जैसे तैसे नक्शों में भी तुक्के मार मार के, और डिस्क्रिप्टवि उत्तरों में भी पता नहीं कितनी कहानियां लिख लिख कर ..पेपर तो लिख दिया….. वो एक राजा था न जो बहुत खाता था, बस उस का डाइट चार्ट लिखने की नौबत आ जाया करती थी, और कुछ पता हो तो लिखें।.

मुझे याद है मैट्रिक के पेपर देने के बाद अगले दो-तीन महीने तक मेरा दिन का चैन और रातों की नींद उड़ी रही थी कि बाकी विषयों में तो आ जायेगी डिस्टिंकशन और हिस्ट्री-ज्योग्राफी में हो जाऊंगा फेल. ….लेकिन जब रिजल्ट आया तो 150 में से 94 अंक पाकर जितनी खुशी हुई उस का आप अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते…..मन ही मन उस रूह का धन्यवाद किया जिस ने बचा लिया।

लेकिन ऐसे पास होने से क्या हुआ ? …कुछ नहीं …..बस अभी तक इन विषयों में फिसड्डीपन बरकरार है, बहुत बार सोचा कि थोड़ा तो पढ़ लूं इन के बारे में लेकिन अगर मास्टर चौहान के थप्पड़ हमें कुछ पढ़ने पर मजबूर न कर सके तो अब कैसे पढ़ लें !!(कुछ मास्टर ऐसे थे जिन्होंने समझा कि क्लास में हमारी बेइज्जती कर के, चपेड़ें मार मार के, हाथ की उंगलियों में पैंसिल फसा फसा कर कुछ सिखा देंगे …..लेकिन हम भी ठहरे ढीठ प्राणी ……..!!)

हां, तो यह सारी भूमिका मुझे इसलिये बांधनी पड़ी कि मैंने यह कहना था कि अगर मुझे किसी इंटरनैशनल मसले के बारे में कुछ सीखना होता है, तो मैं हिंदी अखबार के संपादकीय पन्ने का रूख कर लेता हूं …..ऐसी बातें मुझे केवल उसी पन्ने से ही समझ आती हैं…क्योंकि उस पन्ने पर कोई दिग्गज मुझे मेरी ही भाषा में मेरे स्तर पर आकर सब कुछ सिखा रहा होता है, बिल्कुल स्कूल के मास्टर की तरह ……… और काफी कुछ समझ में आ ही जाता है।

हिंदी अखबार के संपादकीय पन्ने को रोज़ाना देखने का श्रेय मै अपनी 80 वर्षीय मां को देता हूं …. वे प्रतिदिन इसे देखती हैं और मुझ से पूछती हैं कि आज तूने तवलीन सिहं का लेख देखा, विष्णु नागर को पढ़ा …..और भी बहुत से लेखकों के नाम लेती हैं …….और यह मुझे ग्वारा नहीं होता कि मेरी मां के सामने भी मेरे फिसड्डीपन की पोल खुल जाए …..इसलिए हिंदी अखबार के संपादकीय पन्नों से मैं सीखने लायक बहुत सी बातें सीखता हूं, समझता हूं ………….

नोट ……अगर कोई मेरा मैट्रिक का हिस्ट्री-ज्योग्राफी का पेपर निकलवा के देख ले, तो सारी पोल खुल जाएगी.. लेकिन रोल नंबर किसी को पता चलेगा तब न …….और मेरी प्रोफाइल पर जो स्कूल के ज़माने के दोस्त हैं, वे इतने पक्के हैं कि किसी भी तरह से यह राज़ खोलेंगे नहीं …… पता नहीं, स्कूल के दोस्तों से इतना लगाव कैसे होता है कि हम इतने सालों बाद भी अपनी ज़िंदगी की पूरी की पूरी किताब खुली रख सकते हैं ……………..कारण ? ….हमें ये अपने परिवार के सदस्यों की तरह ही प्रिय होते हैं, हमें आपसी भरोसा होता है, इन से कोई डर नहीं होता …..और फिर जैसे जैसे हम जि़ंदगी में तीसमार बनते जाते हैं और दोस्त जुड़ते जाते हैं………कहीं न कहीं खुलेपन से सारी बातें उन दोस्तों के साथ शेयर करने में संकोच बढ़ता जाता है …………….है कि नहीं ??

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जटरोफा खाने से बार बार बीमार होते बच्चे

आज सुबह तो मैं डा बशीर की डायरी ही पढने में मसरूफ रहा, सोचा आज के लिये इतनी ही काफी है…बाकी फिर कभी।

आज सुबह ही मैं दो दिन पुरानी अमर उजाला में एक खबर देख रहा था कि कैथल में जटरोफा खाने से 15 बच्चे बीमार हो गये। कुछ ही समय बाद मुझे मेरे चार साल पहले लिखे एक आर्टीकल की कापी दिख गई जो एक नेशनल न्यूज़-पेपर में छपा था, इसलिये आज जटरोफा के बारे में ही बात करते हैं।

जटरोफा कुरकास (जंगली अरंडी) सारे भारतवर्ष में पाया जाने वाला एक आम पौधा है—इस के बीजों में 40 प्रतिशत तक तेल होता है। भारत एवं अन्य विकासशील देशों में जटरोफा से प्राप्त तेल (बॉयोडीज़ल) पैदा करने हेतु सैंकड़ों प्रोजैक्ट चल रहे हैं।

दिल्ली से मुंबई जाने वाली रेल लाइन के दोनों तरफ़ जटरोफा के पेड़ लगाए गये हैं। कुछ गाड़ियां भी इसी जटरोफा से प्राप्त 15-20 प्रतिशत बॉयोडीज़ल पर चलती हैं। जटरोफा की एक हैक्टेयर की खेती से 1892 लिटर डीज़ल मिलता है।

जटरोफा के बीजों से प्राप्त होने वाला तेल मनुष्ट के खाने योग्य नहीं होता। बॉयो-डीज़ल पैदा करने के इलावा इसे मोमबत्तियां, साबुन इत्यादि बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद में भी इस पौधे के विभिन्न भागों को तरह तरह की बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है।

जटरोफा के बीजों का उत्पात …
जटरोफा के विषैले गुण इस में मौजूद कुरसिन एवं सायनिक एसिड नामक टॉक्स-एल्ब्यूमिन के कारण होते हैं। वैसे तो पौधे के सभी भाग विषैले होते हैं लेकिन उस के बीजों में उस की सर्वाधिक मात्रा रहती है। उन बीजों को खाने के बाद शरीर में होने वाले बुरे असर मूल रूप से पेट एवं आंतों की सूजन के कारण उत्पन्न होते हैं। गलती से जटरोफा के बीज खाने की वजह से बच्चों में इस तरह के हादसे आये दिन देखने सुनने को मिलते रहते हैं।

उन आकर्षक बीजों को देख कर बच्चे अनायास ही उन्हें खाने को आतुर हो जाते हैं। उस के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता कि इस पौधे के कितने बीज खाने पर विषैलेपन के लक्षण पैदा होते हैं। कुछ बच्चों की तो तीन बीज खा लेने से ही हालत पतली हो गई जब कि कुछ अन्य बच्चों में पचास बीज खा लेने पर भी बस छोटे मोटे लक्षण ही पैदा हुये।
आम धारणा यह भी है कि इन बीजों को भून लेने से विष खत्म हो जाता है लेकिन भुने हुये बीज खाने पर भी बड़े हादसे देखने में आये हैं।

उल्टियां आना एवं बिलकुल पानी जैसे पतले दस्त लग जाना इन बीजों से उत्पन्न विष के मुख्य लक्षण हैं.. पेट दर्द, सिर दर्द, बुखार एवं गले में जलन होना इस के अन्य लक्षण हैं। इस विष से प्रभावित होने पर अकसर बहुत ज़्यादा प्यास लगती है, इस के विष से मृत्यु की संभावना बहुत ही कम होती है।

क्या करें ?

बेशक जटरोफा बीज में मौजूद विष को काटने वाली कोई दवा (ऐंटीडोट) नहीं है, फिर भी अगर बच्चों ने इस बीजों को खा ही लिया है तो अभिभावक घबरायें नहीं…..बच्चों को किसी चिकित्सक के पास तुरंत लेकर जाएं …अगर बच्चा सचेत है, पानी पी सकता है तो चिकित्सक के पास जाने तक भी उसे पेय पदार्थ (दूध या पानी) पिलाते रहें जिससे कि पेट में मौजूद विष हल्का पड़ जाए।

चिकित्सक के पास जाने के पश्चात् अगर वह ज़रूरी समझते हैं तो अन्य दवाईयों के साथ साथ वे नली द्वारा ( आई-व्ही ड्रिप – intra-venous fluids) कुछ दवाईयां शुरू कर देते हैं। छः घंटे के भीतर अकसर बच्चे सामान्य हो जाते हैं।

रोकथाम ….

बच्चों को इस पौधे के बीजों के बारे में पहले से बता कर रखें…उन्हें किसी भी पौधे को अथवा बीजों को ऐसे ही खेल खेल में खा लेने के लिये सचेत करें। स्कूल की किताबों में इन पौधों का विस्तृत्त वर्णन होना चाहिये व अध्यापकों को भी इस से संबंधित जानकारी देते रहना चाहिए।

डा. बशीर की डायरी —-पेज 2.

पिछली पोस्ट …डा बशीर का डायरी –पेज 1 से आगे …..

जब बशीर ने उन से उस एक्स-रे के बारे में पूछा कि वह कहां पर है? उन्होंने बताया कि वह तो एक्स-रे विभाग में जमा हो गया था … उस ने उन्हें वह लाने को कहा। वहां पर वे एक-डेढ़ घंटा धक्के खाने के बाद वापिस आ गये कि वहां से तो कहते हैं कि हम इतना पुराना एक्स-रे नहीं ढूंढ सकते।

बशीर उन के साथ एक्स-रे रूम तक गया … वहां पर स्टॉफ को कहा कि देखो, बई, इन का एक्स-रे ढूंढो कैसे भी, कहीं से भी, इन का स्वास्थ्य देख ही रहे हैं आप! आधे घंटे के बाद वे दंपति एक्स-रे लेकर वापिस बशीर के पास आ गये।

बशीर ने फिर से पूछा कि बाकी सब तो ठीक है ना, उस ने साफ साफ अक्षरों में यह भी पूछ डाला कि बवासीर जैसी कोई बात तो नहीं! इतना सुनते ही उस वृद्दा ने बहुत ही झिझकते झिझकते बोला कि इन्हें टायलेट के साथ खून आता है। पूछने पर उस ने आगे बताया कि यह तो बहुत दिनों से हो रहा है। बशीर ने पूछा कि क्या यह तकलीफ़ आप ने अपने डाक्टर को पहले कभी बताई? जवाब मिला कि उन्हें लग रहा था कि गर्म दवाईयों की वजह से यह सब हो रहा है, अपने आप ठीक हो जायेगा। और रही बात, अपने डाक्टर के साथ बात करने की, यह बात किसी ने पूछी नहीं और उन्हें स्वयं यह बात करने में शर्म आती थी क्योंकि डाक्टर के कमरे में हमारी जान-पहचान के और भी बहुत से लोग इक्ट्ठे होते हैं।

बहरहाल , बशीर ने उन के नुस्खे पर यह टायलेट के रास्ते रक्त निकलने की बात लिख कर उसे वापिस डाक्टर के पास भेज दिया … और डाक्टर ने छाती का एक्स-रे देख कर उन्हें अगले दिन फ़िज़िशियन को दिखाने के लिये बुला लिया।

बशीर आगे लिखता है कि जिस बड़े अस्पताल में वह काम करता है, वह बिल्कुल नाम का ही बड़ा है, पंद्रह डाक्टरों की जगह चार डाक्टर काम कर रहे हैं…विशेषज्ञ कोई भी नहीं टिकता, चुस्त चालाक लोग कोई भी जुगाड़ कर के बड़े शहरों में लपक जाते हैं… केवल एक फ़िज़िशियन है। आगे जो लिखा था वह पढ़ कर मन दुःखी हुआ….लिखता है कि एक एक डाक्टर दिन भर में 80-90 मरीज़ “भुगता” देता है, वह भी यह सोच कर हैरान है कि यह कैसे हो सकता है ! लेकिन बड़े दुःखी मन से आगे लिखता है कि डाक्टर चाहे एक भी हो….(और चाहे न भी हो !!) , सिवाए मरीज़ के किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, सब मस्ती मार रहे हैं, टूर जाने वाले टूर पर जा रहे हैं, छुट्टी पर जाने वाले छुट्टी काट रहे हैं, खूब राजनीति भी चल रही है, लेकिन अगर मरीज़ों की तरफ़ से कोई शिकायत नहीं है, तो किसी को भी किसी से कोई भी शिकायत नहीं है ….

बशीर भी जब दिल की बात लिखने लगता है ….तो फिर सब कुछ लिख ही देता है … उस ने लिखा था ….मरीज़ों का क्या है, वे घंटा शिकायत करेंगे, उन्हें पता कैसे चलेगा कि उन के साथ कम से कम दस मिनट बिताने की जगह अगर आधा मिनट बिताया गया है तो इस का सीधा सीधा मतलब उन की सेहत के लिये आखिर है क्या ! लेकिन छोड़िए, किसी को कोई परवाह नहीं, सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा… आगे लिखता है कि उस के अस्पताल का सीधा सीधा फंडा है कि बस उन पांच दस लोगों को “ हर कीमत पर” हर तरह से खुश रखा जाए…( पंजाबी में एक कहावत है …किसे अग्गे कोड़ा होना….बस लिखदा ऐ कि अजेहे पंजा-दसां लोकां अग्गे बस कोडे होन दी ही कसर रह जांदी ऐ !!) …..बशीरे, तूं वी जदों दिल नाल लिखदैं फेर कुछ नहीं वेखदा …….लेकिन लगता है कि वह इधर उधर देखता भी क्यों, अपनी डायरी में अपनी मस्ती में लिख रहा था।

मैं बशीर की डायरी पढ़ते पढ़ते सोच रहा था कि बशीर क्यों इतनी हिम्मत हारता दिखाई दे रहा है, हर बात का इलाज तो है, खैर मैं वापिस उस की डायरी के दूसरे पन्ने पर ही वापिस आ जाता हूं…..

अगले दिन वो दंपति आते हैं …फिज़िशियन को दिखाने के लिये….किसी पड़ोसी की कार मांग कर क्योंकि उस बंदे से चला नहीं जा रहा था लेकिन उन के अस्पताल पहुंचने पर पता चलता है कि फिज़िशियन साहब तो आज छुट्टी पर हैं । मायूस हो कर जाने के सिवाए कोई चारा नहीं था।

 अगले दिन वे दंपति आते हैं, फिज़िशियन को दिखाने के बाद बशीर के पास आते हैं….फिज़िशियन ने भी उन के छाती के एक्स-रे में दिखने वाली गड़बड़ी के बारे में लिखा था और टीबी के जीवाणु देखने के लिये लगातार तीन बार लार की टैस्टिंग (sputum test) के लिये कहा था। आज फिर बशीर ने पूछ ही लिया कि वह जो टायलेट के साथ रक्त आता है, उस का क्या हाल है ?

इतना बात सुनने पर पता नहीं कैसे बेचारी उस वृद्दा के सब्र का बांध टूट गया कि उस ने दिल की बात खोल ही दी …डाक्टर साहब, यह तकलीफ़ इन्हें पिछले काफी दिनों से है, बड़ी बेबसी से, बशीर लिखता है, उस ने कहा कि मैं थक गई हूं इन का खून से लथपथ पायजामा और कच्छा (अंडरवियर) धोते धोते…… मुझे उल्टी जैसा होने लगता है, लेकिन बहुओं-बेटों वाला घर है, किसी से कुछ भी कहते शर्म आती है !! मैं तो यह बात आपसे भी न करती, पता नहीं कैसे आज हिम्मत आ गई !! और उस ने आगे कहा कि उसे लगता है कि इन की उस जगह पर कुछ तो गड़बड़ है क्योंकि जिस तरह खून के थक्के निकलते हैं, मुझे बहुत डर लगता है….

बशीर ने आगे लिखा कि उसे समझ मे आ रहा था कि इन्हें किसी सर्जन को दिखाया जाना बेहद ज़रूरी है…. जिस के लिये उन्हें चालीस मील दूर जाना होगा……लेकिन वे अभी कहते हैं कि पहले वे थूक का टैस्ट करवा के उस तकलीफ़ से निपट लें, यह तकलीफ़ को थोड़े दिनों बाद देख लेंगे……..क्रमशः
कड़ी जोड़ने के लिये देखिए
डा बशीर की डायरी –पहला पन्ना 

डा बशीर की डायरी … पहला पन्ना

कुछ दिन पहले मुझे बहुत वर्षों के बाद एक कॉलेज के दिनों का मित्र मिला… खूब बातें हुईं… प्रोफैशन, दुनिया और इधर उधर की हर तरह की बहुत सी बातें। प्रोफैशन की बातों से ध्यान आया …उस ने मेरे को अपनी डायरी ही पढ़ने के लिये दे दी …. कुछ बातें ऐसी पढ़ीं जिन्हें मैं यहां पाठकों के साथ साझा करना ज़रूरी समझता हूं।

मेरा यह दोस्त एक डैंटिस्ट है डा. बशीर (नाम बदल दिया है).. डायरी में उस ने एक बुज़ुर्ग के बारे में लिखा था कि एक 70-75 वर्ष का व्यक्ति था, वह दो एक साल पहले दांतों के उपचार के लिये उस के पास अकसर आया करता था …जब सब कुछ दुरूस्त हो गया तो उस से मुलाकात होनी बंद हो गई। उस के बारे में उस ने लिखा था कि बड़ा हंसमुख, ज़िंदादिल इंसान था…..अपनी ज़िदगी के किताब के कुछ पन्ने बशीर के सामने खोल लिया करता था।
हां, तो बशीर ने आगे लिखा था कि उसने उस बुज़ुर्ग को पिछले कुछ महीनों में तीन चार बार बाज़ार में देखा … उसे देख कर बहुत ताजुब्ब हुआ करता था कि वह बहुत कमज़ोर सा दिखने लगा था।

अभी कुछ दिन पहले ही की बात है कि वह बुज़ुर्ग और उस की वृद्ध पत्नी डा बशीर को अस्पताल के बाहर ही मिल गये….अच्छी तरह से मिले …लेकिन वह बंदा बहुत ही कमज़ोर दिख रहा था…बशीर ने उनसे पूछा कि क्या बात है, वजन बहुत कम लग रहा है, सब ठीक तो है? इस पर उस की पत्नी ने बताया कि बस, अब इन की तबीयत ऐसी ही रहती है, पिछले कुछ दिनों से पेट में दर्द भी है, बस, दिन प्रतिदिन इन की सेहत गिरती जा रही है, बस किसी तरह से यह अस्पताल में भर्ती हो जाएं।

बशीर जल्दी में था … उस ने उन का मार्गदर्शन किया कि वे किस डाक्टर के पास जाएं और वहां दिखाने के बाद उस से मिल कर जाएं…. और कोई भी दिक्कत होने पर उस के कमरे में आकर  मिलने के लिये भी कह दिया।

लगभग डेढ़ घंटे के बाद वह बुज़ुर्ग और उन की बीवी बशीर के कमरे में पहुंचे ….. उस ने उन्हें सम्मानपूर्वक बिठाया, अच्छे से बात की और सब हाल चाल पूछा … उस वृद्दा ने डाक्टरी नुस्खा उस के आगे कर दिया। उस ने देखा कि डाक्टर ने उस के लिये पेट और सिरदर्द की दवाई लिखी हुई थी … लेकिन यह देख कर बशीर को तसल्ली नहीं हुई…उसे लगा कि यह बंदा बीमार तो इतना ज़्यादा लग रहा है और ये पेट-सिरदर्द की दवाईयां आखिर कौन सा जादू कर देंगी!

बहरहाल बशीर ने उस नुस्खे को फिर से देखना शुरू किया …उस ने देखा कि दो महीने पहले इस बंदे का छाती का एक एक्स-रे हुआ था जिस की रिपोर्ट कुछ गड़बड़ थी …
क्रमश…..

प्रो-बॉयोटिक्स ड्रिंक्स में ऐसा क्या है जो दही में नहीं !

आज शाम को मैं एक शापिंग माल गया हुआ था…वहां मैंने देखा कि एक खूब लंबी शेल्फ प्रो-बॉयोटिक की छोटी छोटी बोतलों से सजी पड़ी थी। मैंने देखा कि यह 65 मि.ली की पांच बोतलों के पैक हैं….दस रूपये की एक बोतल और पांच बोतलें पचास रूपये की… खुली नहीं मिलती, पूरा पैकेट लेना ही होगा। ब्रांड का नाम तो चाहे कोई जापानी सा ही था लेकिन तैयार कहीं यहीं दिल्ली विल्ली के पास ही हुआ था …..वैसे भी उस पर Fermented Milk Drink लिखा हुआ था और साथ में प्रो-बॉयोटिक की प्रशंसा के पुल बांधे गये थे।

और यह भी लिखा गया था कि अच्छी सेहत के लिये इसे रोज़ाना इस्तेमाल किया करें …एक्सपॉयरी तारीख तैयार होने के छःमहीने तक थी। मैं इसी सोच में पड़ गया कि यार, सुबह का दही तो इस देश में शाम को लोगों के हलक से नीचे नहीं उतरता कि यह खट्टा है, यह पुराना है, यह वो और यह वो …… लेकिन अब जापानी नाम वाले ब्रांड हमें यह पतले दही जैसा पेय भी छः छः महीने पुराना खिला के छोड़ेंगे !!

बड़ी बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां इन प्रो-बॉयोटिक प्रोडक्ट्स की तारीफ़ों के जितने भी पुल बांध लें, लेकिन हिंदोस्तानी दही इन सब से कईं गुणा बेहतर है।

प्रो-बॉयोटिक ड्रिंक्स में कुछ ऐसे जीवाणु होते हैं जो हमारे पेट एवं आंतड़ियों के स्वास्थ्य के लिये बहुत लाभदायक होते हैं, इन्हें लैक्टोबैसिलाई (Lactobacilli) कहा जाता है, वैसे तो ये हमारे पाचन-तंत्र अर्थात् आंतड़ियों में हमेशा उपलब्ध रहते हैं और भोजन को पचाने में सहयोग देते हैं लेकिन कईं बार शरीर में कुछ रोगों की वजह से अथवा कुछ दवाईयों के कारण इस तरह के लाभदायक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं जिस की वजह से इन्हें बाहर से दिया जाना होता है। अधिकतर केसों में इस तरह की कमी रोज़ाना दही का इस्तेमाल करने से पूरी हो जाती है लेकिन बहुत कम बार ऐसा भी होता है कि फिज़िशियन इस तरह के जीवाणुओं को कैप्सूल के रूप में भी चंद दिनों के लिये लेने की सलाह देते हैं….लेकिन यह बहुत कम ही होता है।

अकसर पेट-वेट खराब होने पर आप के फैमली डाक्टर भी आप को दही भात, खिचड़ी दही, दही केला आदि ही लेने की सलाह देते हैं, और लोग ये सब खाने से एक दम फिट हो जाते हैं।

ऐसे में इन प्रो-बॉयोटिक ड्रिंक्स के चक्कर में पड़ने से क्या होगा ! — कुछ भी नहीं होगा, अगर आप रोज़ाना दही लेते हैं तो इन सब के चक्कर में पडने की कोई ज़रूरत है नहीं। और अगर दही वही नहीं लेते तो फिर उस कमी को पूरा करने के लिये बहुत से प्रयास करने पड़ सकते हैं।

इस प्रो-बॉयोटिक ड्रिंक पर यह तो लिखा ही गया था – fermented milk product .. फर्मैंट से मतलब वही जामन लगा कर खमीर करने वाली बात, और इस के लिये स्किमड् मिल्क (skimmed milk) के इस्तेमाल करने की बात की गई है — जो भी हो, मुझे लगता है कि इस तरह के प्रोडक्ट्स साधारण दही का कहां मुकाबला कर पाते होंगे — दही इतना संवेदनशील और सजीव कि तैयार होने के कुछ घंटों के बाद ही उस की प्रवृत्ति ही बदल जाती है लेकिन ये बाज़ारी प्रोडक्ट्स छः छः महीने तक ठीक रह सकते हैं, इन्हें तो पता नहीं कैसे हम लोग पचाएंगे, जबकि यह बात ही नहीं पच रही।

इसे छः छः महीने तक ठीक रखने के लिये कुछ तो प्रोसैसिंग होती ही होगी, कुछ तो अन्य कैमीकल इस्तेमाल होते ही होंगे … शापिंग माल में दूसरे अन्य प्रोसैसेड फूड्स की क्या कमी थी कि उस में ये प्रो-बॉयोटिक ड्रिंक्स भी शामिल कर दिये गये हैं। इसलिये बिना वजह इन के चक्कर में न ही पड़ा जाए तो बेहतर होगा। जिस तरह से इस तरह की वस्तुओं की बिक्री को बढ़ावा देने के लिये विज्ञापन दनादन आते हैं लगता तो यही है कि ये कंपनियां भी अपने मंसूबों में देर-सवेर कामयाब हो ही जाएंगी।

दही की इतनी तारीफ़े तो कर डाली लेकिन इस बात का ध्यान रखना तो ज़रूरी है ही कि यह भी तो कहीं कैमिकल युक्त दूध से तो तैयार नहीं किया गया !

Further reading —
An Introduction to Probiotics
एक प्रश्न जिस से मैं बहुत परेशान हूं 

दवाओं के धंधे में हो रहे गोरखधंधे की सुनामी

मेरी कोई जान पहचान वाला कैमिस्ट तीन सौ रूपये के बिल पर तीस रूपये कम कर दे और साथ खड़े लोगों से एमआरपी चार्ज कर रहा होता है तो मुझे इस से बिल्कुल भी खुशी नहीं होती… मुझे शायद इस छूट की ज़रूरत भी नहीं है, बात यह है कि अगर मुझे यह छूट दी जा रही है तो वह अपनी जेब से तो दे नहीं रहा, फिर पब्लिक क्यों इस तरह की छूट से महरूम रहती है, मुझे यह ठीक नहीं लगता।

दो तीन दिन पहले एक परिचित से मुलाकात हुई —अपने पास पड़ी दवाईयां दिखाने लग गया कि उस का एक मित्र है जो दवाईयों का थोक-विक्रेता है…आगे बताने लगा कि यह जिस स्ट्रिप पर साठ रूपये लिखा है, पता है यह मुझे कितने में मिलती है ….केवल आठ रूपये में। ऐसी अन्य दवाईयां भी मुझे दिखलाने लग गया।

25 वर्ष से भी ज़्यादा हो गये हैं मुझे प्रोफैशन में ….लेकिन अभी तक जो बात मैं समझ नहीं पाया वह यह है कि जैनरिक एवं एथीकल—अर्थात् ब्रैंडेड (Generic and Ethical medicines) दवाईयों में आखिर अंतर है क्या !! कानूनी भाषा मैं ठीक के समझता हूं… टैक्नीकली भी समझता ही हूं लेकिन जो बात सब से अहम् है वह मैं अभी तक समझ नहीं पाया हूं वह यह है कि मेरे को कोई स्ट्रिप थमा दे और मेरे से पूछे कि क्या यह जैनरिक है या एथिकल रेंज है, तो मेरे पास इस का कोई जवाब है ही नहीं !!

1992-93 में मैं मुंबई की टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साईंसिज़ में एक वर्ष के लिये हास्पीटल एडमिनिस्ट्रेशन पढ़ रहा था … एक विषय भी होता था ..Drug Policy Administration….उस दौरान दवाईयों के गोरखधंधों के बारे में बहुत कुछ समझने का अच्छा मौका मिला था। उस में काफ़ी कुछ याद भी है। लेकिन यह प्रिंटिंग दाम और बिक्री दाम में अंतर का गोलमाल मेरी समझ से अभी भी परे की बात है।

और मैं पिछले दस-बारह वर्षों में बहुत बार सुन चुका हूं कि इतने ज़्यादा प्रिंटिंग दाम वाली दवा इतने कम दाम में हासिल कर ली गई। हासिल कर ली, जिन्होंने इसे हासिल किया, वे मुकद्दरवाले हैं लेकिन यह तो जगजाहिर है ही कि ये सब चोंचलेबाज़ियां एक आम आदमी के हित में नहीं हैं…. अब देखिये मैं कोई दवाई लेने गया तो किसी परिचित कैमिस्ट ने दस प्रतिशत कम कर दिया, उस का कोई रिश्तेदार गया तो उस ने तीस प्रतिशत कम कर दिया, किसी सरकारी संस्था को अपनी ऑफर भेजते समय यह कह दिया कि हम तो प्रिंटिंग दाम पर पचास या साठ प्रतिशत की छूट देंगे………यह सब क्या है…. इस तरह के धंधे से सब से ज़्यादा चपत उस एक आम आदमी को लगती है जिसे साठ रूपये प्रिंटिंग वाली दवाई साठ रूपये में ही खरीदनी होगी। और तो और, बिल मांगने की वह कभी हिम्मत करेगा नहीं……………इसीलिये ये सब तरह के गोरखधंधे दिनप्रतिदिन पनपते ही जा रहे हैं।

आप मेरी दुविधा समझ रहे हैं ना …एक तो अस्सी रूपये वाली कोई दवाई दस रूपये में बिक रही है तो उस के ऊपर दस ही क्यों नहीं लिखा हुआ…. यह कोई चाइनीज़ गेम थोड़े ही है … मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि इस तरह की लुका-छुपी से हर तरह के भ्रष्टाचार को सिर उठाने का मौका मिल जाता है। अगर कोई भी मेरी बात से सहमत नहीं है तो वह बिना किसी बात की परवाह किए बिना इस लेख की टिप्पणी के रूप में लिखे….. I shall be too happy to hear a different viewpoint.

और दूसरी व्यथा यह कि … लोगों को अभी तक यही समझ है कि जैनरिक दवाईयां हैं तो वे किसी ब्रांड के नाम से नहीं जानी जाएंगी …उन पर केवल कंपनी का नाम और साल्ट ही लिखा होगा। लेकिन मैं कईं बार किसी कैमिस्ट के यहां यह देख कर चौंक गया हूं कि कुछ ब्रांड नाम से बिकने वाली दवाईयां भी जैनरिक कैटेगरी में ही आती हैं.

सीधी सी बात …. कंपनी कह दे या कैमिस्ट कह दे कि यह जैनरिक और यह ब्रांडेड तो वही सच है, हमारे पास ऐसी कोई कसौटी नहीं कि हमें अपने आप पता चल सके दवाई को देख कर कि यह जैनरिक है या ब्रांडेड। क्या आप मेरी बात से सहमत हैं?

अकसर कंपनियां अपनी दवाईयां बेचते समय जैनरिक पर बहुत ज़्यादा और ब्रेंडेड पर बिलकुल कम छूट देती हैं …एक बात तो मुझे सूचना के अधिकार नियम के अंतर्गत यह भी पता चली कि कहीं पर तो ब्रांडेड-जैनरिक नाम की श्रेणी भी बना दी जाती है, मैंने भी इस तरह की श्रेणी के बारे में पहली बार ही सुना था।

जो भी हो, एक बात की आप कल्पना कीजिए .. कोई दवाई ब्रेंडेड होते हुये अगर जैनरिक है ….(so-called Branded-generic drugs?…यह क्या माजरा है, मेरी समझ से परे है!) और अगर उस पर साठ-सत्तर प्रतिशत की छूट की बजाए ब्रेंडेड दवाई जैसी कम छूट दी जाती होगी, और देश में करोड़ों अरबों रूपयों की दवाईयां तो खरीदी जाती ही होंगी …….क्या यह सब किसी सुनामी से कम है? बस, इस के आगे मैंने अपने होंठों पर ताला लगा लिया है, कुछ भी नहीं कहूंगा, बिल्कुल कुछ भी नहीं……क्योंकि फिर आप ही कहेंगे कि मैं ज़्यादा बोल देता हूं………………लेकिन क्या करूं, कहीं पर भी लफड़ा दिखता है तो कंट्रोल नहीं होता !!

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कैमिस्ट से बिल मांगते हुए झिझक क्यों ?

तंबाकू निषेध को किसी धर्म विशेष से जोड़ने की नासमझी….

अमृतसर से अंबाला आते हुये पंजाब और हरियाणा का बार्डर है शंभु…अनेकों बार ऐसा मंज़र देखा है कि ट्रेन के शंभु क्रॉस करते ही लोग अपने बीढ़ी, सिगरेट के बंडल निकाल लिया करते थे. इस का कारण? …ऐसा भी मैंने कईं बार देखा है कि किसी सिक्ख (सरदार जी) की किसी बीढ़ी सुलगाने की तैयारी कर रहे बंदे की तरफ़ एक टेढ़ी नज़र ही काफ़ी हुआ करती थी….शायद किसी को टोकने की ज़रूरत पड़ती ही न थी। पंजाब की बसों में तो कोई सिगरेट-बीड़ी सुलगाने की सोच ही नहीं सकता था !!

किसी डिब्बे में अगर कोई सरदार जी बैठे हुये हैं तो शंभु तक तो किसी की क्या मजाल कि बीढ़ी सुलगा जाए … और अगर कोई निहंग सिक्ख है तो धूम्रपान करने वालों की ऐसी की तैसी। लेकिन वह भी शंभु तक ही।
और मैं देखा करता था कि शंभु स्टेशन पर पहुंचते ही लोग अपने अपने बीढ़ी के बंडल, सिगरेट के पैकेट यूं निकाल कर इत्मीनान की सांस लिया करते थे जैसे चंबल के बीहड़ों से बाहर निकल आये हों।

मैं तब भी सोचता था और आज भी वैसा ही सोचता हूं कि यह कैसा सिरफिरापन है. अच्छी से अच्छी बात को धार्मिक कट्टरवाद से जोड़ कर ही क्यों देखा जाता है, यह बात मैं बहुत से लोगों से सांझी करता हूं। हमें तो शुक्रगुज़ार होना चाहिये ऐसी लोगों का , गुरू की ऐसी बढ़िया सिखलाई का जो चार घंटे तक (अमृतसर से शंभु तक का ट्रेन सफ़र) हज़ारों लोगों के फेफड़े सिंकने से बचा लेती थी।

ध्यान आता है कि ऐसा रोकने टोकने का मतलब केवल यही क्यों लिया जाए कि इस से फायदा केवल सरदारों को ही होगा, सब के सब बच जाते हैं इस ज़हर से ..पीने वाले भी, साथ बैठे लोग, माताएं, बहनें और गर्भवती महिलाएं भी … इस के प्रकोप से बचे रहते हैं। इसलिये आज भी जब कोई सरदार जी किसी बस में या गाड़ी में किसी बीढ़ीबाज़ को टोकता है तो मुझे बेहद खुशी होती है कि किसी ने तो हिम्मत की। और बहुत बार इस का तुरंत असर दिख जाता है… बहुत बार कहा सुनी हो जाती है जैसा कि मेरा अपना अनुभव रहा।

अभी मैं गर्भवती महिलायों की बात कर रहा था …यह तो हम पिछले कईं दशकों से सुनते आ रहे हैं कि गर्भवती महिलाएं जो धूम्रपान करती हैं उन में कईं तरह की समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं …उन में ही नहीं उन के नवजात् शिशुओं में भी और गर्भावस्था के दौरान उन में कईं तरह की जटिलताएं उत्पन्न होने की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। दूर-देशों में तो यह समस्या बहुत विकराल है, अपने यहां पर भी है, लेकिन ज़्यादातर महिलाएं बीढ़ी आदि का उपयोग करती हैं इसलिये इन के दुष्परिणामों के बारे में अलग से कुछ कहने की ज़रूरत दिखती नहीं।

लेकिन अब जिस मुख्य समस्या की बात आज मैं करना चाह रहा हूं वह यह है कि जिन गर्भवती महिलाओं को सैकेंड-हैंड तंबाकू का धुआं भी मिल रहा है … उन में भी शिशु के मृतजात होने का खतरा 23 प्रतिशत और शिशु के शरीर में होने वाली विकृतियों का रिस्क 13 प्रतिशत बढ़ जाता है…..यह किसी एक वैज्ञानिक के आंकड़े नहीं हैं, विश्व भर में पिछले कईं सालों में की गईं 19 स्टडीज़ का निष्कर्ष है यह जो अभी अभी मुझे बीबीसी न्यूज़ पर देखने को मिला है …..Passive Smoking Increases Still-birth risk, study says. 

इसलिये यह कोई अचंभित होने वाली बात नहीं अगर इस न्यूज़-रिपोर्ट में यह कहा गया है कि जो पुरूष पिता बनने वाले हैं उन्हें धूम्रपान से दूर ही रहना चाहिये…बात तो यहां तक हो रही है कि जो पुरुष पिता बनने की तैयारी कर रहे हैं उन के लिये भी तंबाकू से बचे रहने में ही समझदारी है क्योंकि इस से उन के शुक्राणुओं पर असर तो पड़ता ही है और उन की स्मोकिंग की वजह से उन की पत्नी एवं उस के गर्भ में पल रहे शिशु पर होने वाले खतरनाक परिणामों की बात पहले कर ही चुके हैं !!

और जिन गर्भवती महिलाओं के शिशु पर सैकेंड-हैंड स्मोक के बुरे असर की बात हो रही है यह स्मोक घर में स्मोक कर रहे लोगों से भी हो सकता है और अपने कार्यस्थल पर फेफड़े सेंकने वालों से भी हो सकता है और अगर सारे दिन में लगभग दस सिगरेट कोई इन महिलाओं के आसपास मौजूद व्यक्ति पी लेता है तो इन औरतों में तरह तरह की जटिलताएं होने का खतरा खासा बढ़ जाता है।

इस तरह की बातें यहां भारत में कभी होती ही नहीं हैं ….देश में औरत के इस तरह के हितों के बाते में कैसे चर्चा हो और वह भी तब जब उस की भलाई के लिये पुरुष-प्रधान समाज के “मर्दों” को कुछ छोड़ने की बात कही गई हो, आप इस के परिणामों की स्वयं कल्पना कर सकते हैं। पढ़े लिखे लोग तो है ही , ऐसे तबके की कल्पना करिये जो छोटी छोटी झोंपडीनुमा आशियानों में रहते हैं जिस में इस तरह की सैकेंड हैंड स्मोक से आस पास मौज़ूद लोगों को खतरा कईं गुणा बढ़ जाता है।

आज वह दौर आ गया है कि किसी भी सार्वजनिक स्थान पर अपने पास बैठे किसी भी बीड़ीबाज और सिगरेटधारी को टोकने-रोकने की जिम्मेदारी हम पर बनती है….सरकार क्या क्या करे, कानून बन गया है यह क्या कम है, अब हर बीड़ीबाज़ के आसपास मंडराए रखने के लिये इतने जनता हवलदार कहां से आएं?

जहां से बात शुरू की गई वापिस वहीं पर आता हूं .. अपनी ज़िंदगी के शुरूआती बेहतरीन 28 साल अमृतसर में बिताए —हर लिहाज़ से बेहतरीन — इसलिए सिक्ख समुदाय को हमेशा से मैं दूसरे लोगों के लिये तंबाकू आदि चीज़ों से बचे रहने के लिये एक रोल-माडल जैसा दर्जा देता हूं लेकिन मुझे उस समय बेइंतहा मायूसी होती है जब मैं किसी सिक्ख समुदाय से संबंध रखने वाले को तंबाकू का इस्तेमाल करते देखता हूं .. सारा दिन मुझे भी मुंह में ही झांकना होता है, इसलिये कोई ऐसी बात छुपती नहीं….. चाहे बहुत ही कम हैं ऐसे लोग और अकसर क्या कारण बताते हैं … कि कार्यक्षेत्र पर उपस्थित दूसरे लोगों की देखादेखी शुरू हो गया यह सब और कुछ बताते हैं कि यह शौक पड़ गया प्रवासी श्रमिकों की संगत में रहने से। पिछले कुछ अरसे में मैं तीन ऐसे केस देख चुका हूं सिक्ख धर्म समुदाय से संबंधित लोगों के जिन में तंबाकू की लत से मुंह का कैंसर हो गया … तीनों में से अब कोई भी नहीं है, एक साल में ही चल बसे…..।

मुझे लगता है कि मुझे टिप्पणी यह भी आ सकती है कि तंबाकू की लत से लताड़े हुये ऐसे चंद सिक्ख तो सिक्ख थे ही नहीं …गुरू की सिखलाई पर न चलने वाला कैसा गुरसिक्ख !!
तो फिर आज की इस स्टोरी से हमें क्या शिक्षा मिलती है? – क्या अभी भी यह बताने की ज़रूरत है !!
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