रोबोटिक सर्जरी से आप्रेशन किए जाना कितना फायदेमंद है?

एक वेबसाइट है .. www.healthnewsreview.org …यहां पर प्रिंट,इलैक्ट्रोनिक एवं न्यू मीडिया पर अंग्रेज़ी में छपी मैडीकल न्यूज़-रिपोर्ट की खबर ली जाती है….इनके कुछ बढ़िया से मापदंड हैं जिन के द्वारा यह तय करते हैं कि जो मैडीकल न्यूज़ छपी है …यह कहीं गुमराह करने वाली तो नहीं है….हां, ये मैडीकल विषय पर छपी ख़बरों को उन की श्रेष्ठता के अनुसार स्टार दिये जाते हैं ..जिस स्टोरी की कवरेज बिल्कुल संतुलित एवं इमानदारी से की गई होती है उसे पांच स्टार दिये जाते हैं ..इस वेबसाइट पर अभी तक की सभी पांच सितारा स्टोरियों के लिंक भी पड़े हुये हैं।

अभी देख रहा था कि इन्होंने एक बहुत अनुभवी सर्जन के ब्लॉग के ऊपर टिप्पणी की थी … ब्लॉग में उस सर्जन ने रोबोटिक सर्जरी के बारे में अपना दिल खोला था … उस ने लिखा है कि यह किसी भी तरह से पारंपरिक लैपरोस्कोपिक सर्जरी से उत्तम विकल्प नहीं है…. ब्लॉग का नाम ही बहुत बढ़िया लगा … Skeptical scalpel.

यह जानकारी बहुत ज्ञानवर्धक है … इसे आप को भी देखना चाहिए ….पहले तो आप हैल्थ-न्यूज़ रिव्यू के प्रकाशक का लेख देखें और फिर उस में दिये एक लिंक पर जा कर उस सर्जन के तथ्यों पर आधारित अनुभव पढ़िए — केवल यह जानने के लिये कि ज़रूरी नहीं कि कोई तकनीक अति आधुनिक है तो उस के उतने फायदे भी होंगे।

आज वैसे भी चिकित्सा अनुसंधान मार्कीट शक्तियों के हाथों की कठपुतली सा बनता जा रहा है ..ऐसे में किसी की सच्ची एवं इमानदार बातें इस तपिश में हवा के ठंडे झोंके सा काम करती हैं।

Advertisements

एक्सपॉयर दवाईयों को आप कैसे फैंकते हैं?

कुछ दिन पहले की बात है मेरे बेटे ने मेरे से अचानक पूछा कि पापा, आप इस्तेमाल किये हुये ब्लेडों का क्या करते हो, उस का कारण का मतलब था कि उन को आप फैंकते कहां हो? …मैं समझ गया… मैं उस को कोई सटीक सा जवाब दे नहीं पाया….लेकिन मुझे इतना पता है कि वह भी इन्हें घर के कचरेदान में कभी फैकना नहीं चाहेगा।

एक कारण तो यही है कि उस ने कभी मेरे को ऐसा करते देखा नहीं… क्यो? आप को भी उत्सुकता हो रही होगी कि आखिर मैं इस्तेमाल किये गये ब्लेडों का करता क्या हूं। वैसे आजकल तो मैं इलैक्ट्रिक शेवर ही इस्तेमाल करता हूं … लेकिन आजकल ह्यूमिडिटि बढ़ जाने से यह ढंग से काम नहीं करता … इसलिये वही ट्विन ब्लेड इस्तेमाल कर लेता हूं …जिसे कहीं भी फैंकने में सोचना नहीं पड़ता।

लेकिन बहुत वर्षों तक आम ब्लेड़ों से ही दाढ़ी बनाता रहा हूं लेकिन कभी भी याद नहीं पुराने ब्लेडों को कूडेदान में फैंका हो … कारण? कारण तो लंबा चौड़ा नहीं… बस इतना सा ही है कि यार, हमारी वजह से किसी को कोई चोट क्यों पहुंचे…पहले तो जो घर में जो आप के डोमैस्टिक हैल्प है उसे चोट लगने का डर, फिर घर के बाहर कचरेदान से किसी जानवर आदि के चोट लगने का अंदेशा, फिर उन वर्करों को चोट लगने का चांस जो आज भी बिल्कुल थोड़े थोड़े पैसों में ट्राली में कूडा भरने का काम करते हैं, और आगे से आगे वे रैग-पिकर उन गार्बेज ग्राउंड से कूड़ा बीनेंगे………………..कमबख्त इतने लोगों को घायल करने से अच्छा है दाढ़ी से न बनाई जाए।

मैं इस्तेमाल किये ब्लेड़ों को ऐसे ही कहीं अपनी स्टडी रूम की खिड़की आदि में रख दिया करता था .. जहां पर उसे पड़े पड़े इतना जंग लग जाया करता था ….. पता नहीं, ऐसी वस्तुओं ..ब्लेड, सूईंयों, कांच के टुकड़ों को कचरेदान में फैंकते डर लगता है । मुझे याद है एक बार मैं इन सब ब्लेडों को इक्ट्ठे कर के अस्पताल ले गया था क्योंकि वहां पर sharp objects को डिस्पोज ऑफ करना का अपना सलीका होता है क्योंकि Pollution Control Board की आजकल निगाहें अस्पतालों पर तो खासकर टिकी रहती हैं….अच्छा भी है, इस में सब की भलाई निहित है।

हां, तो इस बात का ध्यान आज ऐसे आया कि नेट पर एक शीर्षक दिख गया कि इस्तेमाल करने के बाद बची हुई दवाईयों (इस का मतलब एक्सपॉयर लें) को कैसे फैंकें? मैं जिस लेख की बात कर रहा हूं उस में लिखा था कि बची हुई दवाईयों को सिंक में या टायलेट में न गिराएं …इस से जल प्रदूषण तो होता ही है जिस की वजह से साथ में जानवर एवं अन्य लोग बीमार पड़ सकते हैं। और साथ में यह सिफारिश की गई थी …

Remove the label from the bottle, then place the bottle inside a sealed plastic bag.
Throw the sealed bag in the garbage, and keep pets and children away from this trash.
If you need to dispose of pills, grind them up first. Mix the crushed pills into used coffee grounds, sand or cat litter.

हां, बोतल से लेबल हटाने की बात ठीक है, लेकिन फिर उसे किसी प्लास्टिक बैग में सील कर के कूड़ेदान में फैंकने के लिये कहा गया है और साथ में कहा गया है कि पालतू जानवरों को और बच्चों को इस क्लेश से दूर रखिए …..चलिए, इतनी ज़हमत उठा भी ली, लेकिन क्या बाहर घूमने वाले पशु इस प्लास्टिक को नहीं खा जाएंगे, आए दिन अखबारों में देखते हैं किस तरह से इन जानवरों की प्लास्टिक खाने से मौत हो जाती है। अगर ये पालतू नहीं हैं तो फालतू भी नहीं हैं …. इसलिये हम लोग इस तरह की दवाईयों से कैसे निजात पाया करें, इस के लिये आप भी कुछ सोचें और सुझाव लिखिए …

और गोलियों (टैबलेट) को फैंकने से पहले कहा गया है कि पहले उन्हें पीस लें, फिर उन्हें इस्तेमाल की गई कॉफ़ी से या रेत आदि से मिला कर फैंक दें ……………….थोड़ा मुश्किल सा नहीं लगा काम, या मुझे ही ऐसा लगा …लेकिन हम लोग एक्सपॉयरी आदि वाली टैबलेट्स को उन की स्ट्रिप से निकाल कर —बहुत बार हाथ ही से तोड़ कर कचरेदान में फैक देते हैं … आप के क्या सुझाव हैं ? ..मैं आप के सुझावों का इंतज़ार कर रहा हूं।

सुझाव देना मत भूलिये ….

नहाने वाले पावडर (Bath salts) पर क्यों हो रहा है हंगामा

Bath Salts का अगर हिंदी में अनुवाद करना हो तो यही तो कहेंगे— नहाने वाले पावडर या फिर बिल्कुल देसी भाषा में नहाने वाले मसाले। सुना तो मैंने इन के बारे में बहुत बार था …लेकिन कभी विस्त्तृत से इन के बारे में जानने की कोई कोशिश नहीं की। याद आ रहा है कि जहां पर भी इन के बारे में पढ़ा बड़ा नैगेटिव सा पढ़ा जैसे कोई इन्हें इस्तेमाल कर के बहुत बुरा काम कर रहा है। जो भी हो, मेरी सोच यही थी कि ये bath salts कुछ पावडर-वाउडर होंगे जो बाहर देशों में नहाने के समय पानी में डाल लेते होंगे। लेकिन मेरा अनुमान केवल आंशिक रूप तक ही सही था, इस की थोड़ी चर्चा करते हैं।

आज सुबह भी जब मैं न्यू-यार्क टाइम्स देख रहा था तो फिर एक बार कुछ ऐसी खबर दिखी कि बॉथ-साल्ट के ऊपर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। सुबह समय मेरे पास कम था लेकिन मैंने सोचा कि आज तो इन के बारे में जानना ही होगा कि इन के इस्तेमाल का आखिर लफड़ा है क्या। मैंने तभी गूगल बंधु की सहायता से इस के बारे में जानना चाहा।

मैं बहुत खुश हुआ कि मेरा अनुमान सही निकला कि यह तो बस कुछ साल्ट हैं जिन्हें नहाते समय पानी में मिला कर ताज़गी का अहसास हो जाता है, स्फूर्ति सी महसूस होने लगती है। इस के बारे में और पढ़ कर पता चला कि ये समुद्र से प्राप्त होने वाले साल्ट हैं (‌sea salts) हैं….और अगर ये शुद्ध रूप में मिलते हैं तो ताज़गी का अहसास होता है, नहाने वाला हल्कापन महसूस करता है…नहाने समय इस पावडर की केवल एक चुटकी ही काफ़ी है…..और बताया गया था कि अगर इस को किसी तरह से मार्कीट में मॉडीफाई किया जाता है तो इस के बहुत से गुण नष्ट हो जाते हैं।

लेकिन मेरी उत्सुकता बढ़ रही थी ….भला ऐसी छोटी मोटी चीज़ को प्रतिबंधित किये जाने का क्या फितूर है? लेकिन एक दो पन्ने देखने पर सारी बात समझ में आ गई।

हां, तो bath salts (बॉथ-साल्ट) जिन पर प्रतिबंध लगाने की बात की जा रही है उस का इन नहाने वाले बाथ-साल्ट (जो कि समुद्री साल्ट है) से कोई संबंध नहीं है।

बाथ-साल्ट के नाम से दरअसल कुछ नशे मिलते हैं … और ये पावडर एवं क्रिस्टल रूप में बिकने वाले नशे समुद्री साल्ट (बाथ साल्ट) की तरह दिखते हैं इसीलिये इन्हें बॉथ-साल्ट कह दिया जाता है …..एक बहुत ही भयानक तरह की नशा है..इस नशे को अधिकतर ऑन-लाइन खरीदा जाता है –इस का इंजैक्शन लगाया जाता है, या तो इसे किसी सिगरेट आदि में डाल के पी लिया जाता है(smoking) ..या फिर इसे नसवार की तरह सूंघ कर ही काम चला लिया जाता है।

बाथ-साल्ट नामक नशे में भयानक साल्ट – Mephedrone एवं methylenedioxypyrovalerone (MDPV) होते हैं और इन के इस्तेमाल से नशा इतना गहरा होता है कि आदमी बिल्कुल अजीबो-गरीब हरकतें करना लगता है, उसे यह लगने लगता है कि कोई उसे मार देगा या बहुत बड़ा नुकसान पहुंचा देगा (paranoid symptoms) ….बिल्कुल अजीबो गरीब हरकतें ….और इन की वजह से इन्हें एमरजैंसी विभागों में लेकर जाना पड़ता है।

तो एक बात अब समझ में आ गई कि यह जो बाथ-साल्ट हैं इन में आदमी के बनाए हुये कैमीकल(रासायन) मौजूद रहते हैं — Mephedrone एवं methylenedioxypyrovalerone (MDPV) जिन का प्रभाव बिल्कुल ख़त के पत्तों जैसा होता है …अब यह ख़त के पत्ते किस बला का नाम है, इसे जानने के लिये मेरे इस लेख पर चटका लगाएं।

यह बाथ-साल्ट बहुत महंगे मिलते हैं … 50 मिलीग्राम (एक ग्राम का बीसवां हिस्सा) 25 से 50 यूएस डालर में मिलता है… पहले यह नशा ब्रिटेन में खूब चलता था लेकिन वहां पर इस पर प्रतिबंध 2010 में लगा दिया गया था …. बस ज़रा ठहरिये … किसी ऐसी वैसी बात में हम कैसे पीछे रह जाएं … विशेषज्ञों का कहना है कि इन बाथ-साल्टों की अधिकतर सप्लाई चीन एवं भारत से आती है क्योंकि वहां पर कैमीकल बनाने वाली फैक्टरियों के ऊपर सरकारी निगरानी इतनी पुख्ता नहीं है … यह मेरी स्टेटमैंट नहीं है …न्यू-यार्क टाइम्स के इस लेख में ऐसा ही कुछ लिखा है।

बात एक और भी है, अधिकतर सप्लाई चीन और भारत से जाए और यहां के बशिंदे इस से महरूम रह जाएं ….लगता नहीं ना ऐसा हो सकता है ….तो फिर का मतलब यह कि ये सब नशे इस देश में भी इस्तेमाल तो ज़रूर होते होंगे ….किसी दूसरे नाम से …. कभी यह बाथ-साल्ट नाम पहले नहीं सुना…..लेकिन नशा करने वालों को नाम से क्या लेना देना, नाम में रखा ही क्या है। खैर, मेरा काम था आगाह करना और इस बाथ-साल्ट की मिस्ट्री को हल करना………………ये नशीले बाथ-साल्ट नहाने वाले बेकसूर बाथ-साल्ट से बिलकुल अलग हैं, दूर दूर से भी कुछ भी लेना देना नहीं।

सेहत खराब करने वाली दवाईयां आखिर बिकती ही क्यों हैं?

परसों मेरा एक मित्र मुझ से पूछने लगा कि वज़न बढ़ाने के लिये ये जो फूड-सप्लीमैंट्स आते हैं इन्हें खा लेने में आखिर दिक्तत है क्या। मैंने कहा कि लगभग इन सब में कुछ ऐसे प्रतिबंधित दवाईयां –स्टीरॉयड आदि – होते हैं जो कि सेहत के लिये बहुत नुकसानदायक हैं। अच्छा, आगे उस ने कहा कि यह जो जिम-विम वाले हैं वे तो कहते हैं कि जो डिब्बे वो बेच रहे हैं, वे बिल्कुल ठीक हैं। बात वही है कि अगर उन्होंने इन डिब्बों को आठ-नौ सौ रूपये में बेचना है तो इतना सा आश्वासन देने में उन का क्या जाता है, कौन सा ग्राहक इन की टैस्टिंग करवाने लगा है, और सच बात तो यह है कि किसी को पता भी तो नहीं कि यह टैस्टिंग हो कहां पर सकती है।

पिछले सप्ताह अस्पताल में एक युवक मेरे से कोई दवाई लेने आया …अच्छा, अब पता झट चल जाता है कि सेहत का राज़ क्या है, शारीरिक व्यायाम, पौष्टिक आहार या फिर वही डिब्बे वाला सप्लीमेंट से डोले-शोले बना रखे हैं ….मुझे लगा कि यह डिब्बों वाला केस है …मेरे पूछने पर उस ने बताया कि सर, दो महीने डिब्बे खाये हैं, पहले महीने तो मुझे अपने आप में लगा कि मुझ में नई स्फूर्ति का संचार हो रहा है तो दूसरे महीने मुझे देख कर लोगों ने कहना शुरू कर दिया। आगे पूछने लगा कि सर, क्या आप अपने बेटे को ये सप्लीमैंट्स खिलाने के लिये पूछ रहे हैं…..उस के बाद मुझे इन सप्लीमैंट्स की सारी पोल खोलनी पड़ी।

हां, तो मैं उस मित्र की बात कर रहा था जो कह रहा था कि जिम संचालक तो कहते हैं कुछ नहीं इन में सिवाए बॉडी को फिट रखने वाले तत्वों के ……लेकिन जो बात उस ने आगे की, मुझे वह सुन कर बहुत शर्म आई क्योंकि मेरे पास उस की बात का कोई जवाब नहीं था।

हां, जानिए उस मित्र ने क्या पूछा….उस ने कहा ..डाक्टर साहब, मैं आप के पास आया हूं, आप ने बता दिया और मैंने मान लिया …लेकिन उन हज़ारों युवकों का क्या होगा जो ये सप्लीमैंट्स खाए जा रहे हैं…. उस ने यह भी कहा कि इन डिब्बों पर तो स्टीरायड नामक प्रतिबंधित दवाईयों के उस पावडर में डाले जाने की बात कही नहीं होती।

अब इस का मैं क्या जवाब देता ? – बस, यूं ही यह कह कर कि कोई कुछ भी कहें, इन में कुछ प्रतिबंधित दवाईयां तो होती ही हैं जो शरीर के लिये नुकसानदायक होती हैं। लेकिन उस का प्रश्न अपनी जगह टिका था कि अगर ये नुकसानदायक हैं तो फिर ये सरे-आम बिकती क्यों हैं, अब इस का जवाब मैं जानते हुए भी उसे क्या देता!! बस, किसी तरह यह बात कह कर इस विषय को चटाई के नीच सरका दिया कि लोगों की अवेयरनेस से ही सारी उम्मीद है। लेकिन उस बंदे के सारे प्रश्न बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करने वाले हैं।

परसों उस मित्र से होने वाली इस बातचीत का यकायक ध्यान इसलिए आ गया क्योंकि कल मैंने अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की साइट पर एक पब्लिक के लिये नोटिस देखा जिस में उन्होंने जनता को आगाह किया था एक गर्भनिरोधक दवाई न लें क्योंकि वह नकली हो सकती है, इस से नुकसान हो सकता है…..यह उस तरह की दवाई थी जो एमरजैंसी गर्भनिरोधक के तौर पर महिलाओं द्वारा खाई जाती है…..असुरक्षित संभोग के बाद (unprotected sex) ….. वैसे तो अब इस तरह की दवाईयों के विज्ञापन भारतीय मीडिया में भी खूब दिखने लगे हैं….इन की गुणवत्ता पर मैं की प्रश्नचिंह नहीं लगा रहा हूं लेकिन फिर भी कुछ मुद्दे अब महिला रोग विशेषज्ञ संगठनों ने इन के इस्तेमाल से संबंधित उठाने शुरू कर दिये हैं।

सौजन्य .. फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन
पहला तो यह कि कुछ महिलाओं ने इसे रूटीन के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है … दंपति यह समझने लगे हैं कि यह भी गर्भनिरोध का एक दूसरा उपाय है….लेकिन नहीं, यह एमरजैंसी शब्द जो इन के साथ लगा है यह बहुत ज़रूरी शब्द है. वरना रूटीन इस्तेमाल के लिये अगर इसे गर्भनिरोधक गोलियों (माला आदि) की जगह इसे इस्तेमाल किया जाने लगेगा तो अनर्थ हो जाएगा, महिलाओं की सेहत के ऊपर बुरा असर – after all, these are hormonal preparations– और दूसरी बात यह कि लोगों को यह गलतफहमी है कि इस तरह का एमरजैंसी गर्भनिरोधक लेने से यौन-संचारित रोगों की चिंता से भी मुक्ति मिलती है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है।

हम भी कहां के कहां निकल गये ….वापिस लौटते हैं उस अमेरिकी एफडीआई की चेतावनी की तरह जिस में उन्होंने एक ऐसे ही प्रोडक्ट की फोटो अपनी वेबसाइट पर डाल दी है ताकि समझने वाले समझ सकें, लेकिन मेरी भी तमन्ना है कि जो किसी भी नागरिक के लिये खराब है …पहली बात है वो कैमिस्टों की दुकानों पर बिके ही क्यों और दूसरी यह कि क्यों न अखबारों में, चैनलों पर इन के बारे में जनता को निरंतर सूचित किया जाए ……….आखिर चैनल हमें प्रवचनों की हैवी डोज़ या फिर सास-बहू के षड़यंत्र दिखाने-सिखाने के लिए ही तो नहीं बने….सामाजिक सरोकार तो भी कोई चीज़ है। कोई मेरी बात सुन रहा है या मैं यूं ही चीखे जा रहा हूं?

संबंधित लेख …
सप्लीमैंट्स से सावधान

तंबाकु धुएं वाला नहीं तो भी कोई बात कैसे नहीं….

एक तंबाकू जिसे चबाया जाता है, चूसा जाता है, गाल के अंदर-होठों के अंदर दबा कर रख दिया जाता है, गुटखा चबाया जाता है, खैनी खाई जाती है, मशेरी (powdered tobacco) जिसे दांतों पर घिसा जाता है, नसवार (Snuff) जो नाक से सूंघी जाती है, मसूड़ों पर लगाई जाती है… अकसर तंबाकू के ये वे रूप हैं जिन के साथ धुआं नहीं दिखता…….लेकिन कोई बात नहीं धुआं चाहे उस वक्त न दिखे लेकिन बाद में कभी न कभी तो ये सब वस्तुएं बंदे का धुआं निकाल के ही दम लेती हैं।

इस देश में हथेली में तंबाकू-चूना मसल के, और फिर उस को दाएं हाथ से छांट के जब आपस में थोड़ा थोड़ा बांटा जाता है तो राष्ट्रीय एकता का नज़ारा देखते बनता है …लेकिन उस एकता का आचार डालें जिस में ज़हर ही बंटे।
हां, तो मुझे भी कईं बार मरीज़ पूछते पूछते झिझक से जाते हैं कि ना ना कोई बीड़ी सिगरेट नहीं, बस थोडा सा तंबाकू दिन में दो-एक बार और वह भी बस थोड़ा पेट की सफ़ाई के लिए।

अब मीडिया में इस धुएं-रहित तंबाकू के मुद्दे भी उछलते रहते हैं इसलिये लोग थोड़ा सा समझने तो लगे हैं कि इस से कैंसर –विशेषकर मुंह का कैंसर – होता है। और लगभग यह भी लोग जानते तो हैं कि इस से दांतों में सड़न होती है, मसूड़ों की बीमारी होती है और मसूड़े दांतों को छोड़ने लगते हैं। लेकिन तीन चीज़ें इस के अलावा जो लोग नहीं जानते उन्हें यहां रेखांकित किया जाना ज़रूरी है ..

1. अगर गर्भवती महिला इस तरह के तंबाकू का सेवन कर रही है तो उस में गर्भवस्था में होने वाली जटिलताओं जैसे कि शरीर में सूजन आ जाना (preeclampsia) , नवजात् शिशु का जन्म के समय वजन कम होना और समय से पहले ही बच्चा पैदा हो जाना(premature babies)

2. ऐसा भी नहीं है कि महिलाओं में तंबाकू अपने बुरे असर दिखाता है… पुरूषों में भी फर्टिलिटि से संबंधित इश्यू हो जाते हैं जैसे कि शुक्राणु का असामान्य हो जाना और शुक्राणुओं की संख्य़ा कम हो जाना।

3. और एक बहुत बड़ा पंगा यह है कि शौक शौक में चबाया जाने वाला तंबाकू वाला पान, खैनी, गुटखा, नसवार (creamy snuff) …धीरे धीरे फिर यह बंदे को सिगरेट-बीड़ी की तरफ़ ले ही जाता है क्योंकि अगर कोई बिना धुएं वाला तंबाकू ही इस्तेमाल कर रहा है फिर भी उस में निकोटीन होने की वजह से इस की लत लगना तो लाजमी है ही।

हमारे देश में इस धुएंरहित तंबाकू की समस्या बहुत विकराल है। महिलाएं भी गांवों में बिंदास तंबाकू चबाती हैं …किसी भी रूप में …चाहे पान में डाल कर, चाहे पावडर-तंबाकू को दांतों पर घिस कर ..या फिर तंबाकू वाली पेस्टें मसूड़ों एवं दांतों पर घिस घिस कर मुंह के कैंसर को बुलावा दे बैठती हैं।

इस हैल्थ-टिप — Smokeless Tobacco Isn’t a Safe Alternative…जो आप तक अमेरिका की सरकारी संस्था –सैंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल के सौजन्य से प्राप्त हो रही है, इस में लिखा एक एक शब्द आप कह सकते हैं पूर्णतया तथ्यों एवं सत्य पर आधारित होता है…. नो तीर, नो तुक्का, प्लेन सच।

आज कल अमेरिका जैसे देशों में भी स्मोकलैस तंबाकू काफी चलने लगा है… विशेषकर युवा वर्ग और खिलाड़ी इस स्मोक-लैस (धुएं रहित तंबाकू) तंबाकू का सेवन नसवार के रूप में करते हैं……इसलिये वहां पर किसी भी हालत में इस व्यसन को आगे नहीं बढ़ने के लिये सरकार कृत्त-संकल्प है ……….बिल्कुल जैसे हमारे यहां है…..क्या कहा? ..मुझे सुना नहीं …. नहीं, नहीं, आप यह कैसे कह सकते हैं कि हम लोग इस लत को जड़ से उखाड़ फैंकने के लिये कृत्त-संकल्प नहीं हैं, अरे यार, हम लोग कितने कितने वर्ष इन के पैकेटों पर दी जाने वाली डरावनी तस्वीरों पर राजनीति करते हैं !!

तंबाकू से संबंधित लेखों का पिटारा यह है …..तंबाकू का कोहराम

डिप्रेशन से उभरने के लिए क्या करते हैं हिंदोस्तानी?

आज जो मैंने एक खबर देखी कि अमीर देशों में लोग डिप्रेशन के ज़्यादा शिकार होते हैं .. अमेरिका में ही कहा जा रहा है कि 30 प्रतिशत से भी ज़्यादा जनसंख्या अवसाद में डूबी हुई है लेकिन साथ ही भारत का भी नाम लिखा हुआ है कि यहां भी अवसाद के बहुत से केस हैं। मैडलाइन पर यह खबर दिखी .. Depression higher in wealthier nations.

भारत में अवसाद के अधिकतर रोगियों की समस्या यह है कि वे कभी किसी मनोरोग विशेषज्ञ के पास गये ही नहीं… अब इन के किसी विशेषज्ञ के पास न जाने के दो पहलू हैं…इसी हम सीधा यह नहीं कह सकते कि ये किसी विशेषज्ञ से परामर्श न लेकर ठीक नहीं कर रहे।

कभी कभी मीडिया में बताया जाता है कि अवसाद जैसे रोगियों की संख्या भारत में बहुत ज़्यादा हैं लेकिन अकसर लोग सोचते हैं कि इस के बारे में किसी विशेषज्ञ के पास जाने से उन की लेबलिंग कहीं यह न हो जाए कि इस का दिमाग खिसका हुआ है, चाहे है यह भ्रांति लेकिन है तो !

मैडीकल नज़रिये से नहीं कह रहा हूं और न ही कह सकता हूं …लेकिन व्यक्तिगत विचार लिख रहा हूं कि बहुत कम लोग हैं जो डिप्रेशन के लिये अंग्रेज़ी दवाईयां लेकर ठीक होते मैंने देखा है। हां, अगर अवसाद इस तरह का है कि दैनिक दिनचर्या में ही रूकावट पैदा होने लगी है… तो समझा जा सकता है कि एमरजैंसी उपाय के रूप में थोड़ी अवधि के लिये अंग्रेज़ी दवाईयां लेना उचित सा लगता है। एक बार फिर से लिख रहा हूं कि यह मेरी अनुभूति हो सकती है …क्योंकि मैंने अकसर देखा है कि इस तरह की दवाईयां लेने वाले सुस्त से रहते हैं ….वो चुस्ती वाली कोई बात देखी नहीं। और भी एक बात है कि लोगों के मन में यह भी डर रहता है कि कहीं इन दवाईयों की लत ही न लग जाए ….अब काफ़ी हद तक लोगों का यह सोचना ठीक भी है।

अच्छा, अवसाद के लिये श्रेष्ठ चिकित्सक है आप का फैमिली डाक्टर जो आप के सारे परिवार को, स्रारी पारिवारिक परिस्थितियों को जानता है … अकसर मनोरोग चिकित्सक के पास आम लोग जा ही नहीं पाते … उन के पास भी काउंसिलिंग तकनीक द्वारा मरीज को अवसाद से बाहर निकालने की क्षमता होती है लेकिन मैंने यह देखा है लोग अकसर इस चक्कर में पड़ते नहीं… बस, यूं ही कुछ भी जुगाड़ कर के अपने आप इस अवसाद की खाई से बाहर निकलते रहते हैं, फिर फिसलने लगते हैं, फिर किसी सहारे की मदद मिल जाती है।

चाहे हम कुछ भी कहें अभी भी भारत में ऐसी परिस्थितियों के लिये सोशल-बैकअप भी काफ़ी हद तक कायम ही है ….थोड़ा बहुत अवसाद घेरने लगता है तो किसी के यहां मिलने चले जाते हैं, कोई इन्हें मिलने आ जाता है, हंसी ठठ्ठा हो जाता है, बस मजाक मजाक में इन्हें अच्छा लगने लगता है।

और एक खूबसूरत बात देश में यह है …अधिकांश लोग अपनी आस्था के अनुसार किसी मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे या किसी अन्य धर्म-स्थल में जा बैठते हैं …कीर्तन –पूजा-पाठ , भजन, प्रवचन करते हैं, सुनते हैं और इन्हें अच्छा लगने लगता है। कहने का मतलब यही है कि यहां बैक-अप है, लोग अभी भी आपस में बात करते हैं, त्योहार एक साथ मनाते हैं, हर्षोल्लास में भाग लेते हैं …………..यही ज़िंदगी है … बाकी तो जितना किसी मैडीकल विषय की पेचीदगीयों में पड़ेंगे, कुछ खास हासिल होने वाला नहीं है।

और ये जो बातें मैंने लिखी हैं अवसाद से निकलने के लिये ये कोई अंधश्रद्धा को बढ़ावा देने वाली नहीं हैं….मैं ऐसे अध्ययन देख चुका हूं जिनमें विकसित देशों के वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि जो लोग आध्यात्मिक बैठकों आदि से जुडे रहते हैं वे अकसर ऐसी तकलीफ़ों से दूर रहते हैं……अच्छा, आप एक बात बताईए, आप जिस भी सत्संग में जाते हैं वहां आप को कभी कोई उदास सा, बिल्कुल हारा हुआ, बिल्कुल चुपचाप, गुमसुम बंदा दिखा है………………..कोई जल्दी नहीं, आराम से सोच विचार करना कि आंकड़ें चाहे जो भी कहें कि इतने ज़्यादा भारतीय अवसाद के शिकार हैं, लेकिन फिर भी ये सीमित संसाधनों के बावजूद भी, बहुत सी दैनिक समस्याओं को झेलते हुए ..बस किसी तरह खुश से दिखते हैं।

इसीलिए मुझे कोई उदास सा प्राणी दिखता है तो मैं उसे किसी मनोरोग विशेषज्ञ का रूख करने की बजाए किसी सत्संग में जाने की सलाह दिया करता हूं … मनोरोग विशेषज्ञ चाहे कहें कि मैं ठीक नहीं करता ….लेकिन मैं तो ऐसा ही ठीक समझता हूं और ऐसा ही करता हूं।

संबंधित लेख
अवसाद के लिए टेबलेट — हां या ना?

अस्पताल जाने से ज़्यादा सुरक्षित है हवाई यात्रा—ऐसा क्या?

दो-तीन दिन पहले जब मैंने भी ऐसी बात पढ़ी तो मैं भी सकता में आ गया कि अब यह क्या नया लफड़ा है लेकिन जब पूरी बात पता चला तो समझ में आ गया कि कुछ लोग हवाई-यात्रा का यूं ही डर पाले बैठे हैं, अस्पताल में इलाज करवाने से आगे तो यह रिस्क कुछ भी नहीं!

वैसे यह ऊपर दिया गया व्यक्तव्य मेरा नहीं है, यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के सौजन्य से मैडलाइन में पढ़ने को मिला है कि विश्व भर में लाखों लोग चिकित्सा से संबंधी गल्तियों एवं हेल्थ-केयर व अस्पताल से ग्रहण किये गये संक्रमणों (infections) का शिकार हो जाते हैं।

“If you were admitted to hospital tomorrow in any country… your chances of being subjected to an error in your care would be something like 1 in 10. Your chances of dying due to an error in health care would be 1 in 300,” Liam Donaldson, the WHO’s newly appointed envoy for patient safety, told a news briefing.

This compared with a risk of dying in an air crash of about 1 in 10 million passengers, according to Donaldson, formerly England’s chief medical officer.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े हैं कि अमेरिका में हर वर्ष इस तरह के अस्पताल से मिलने वाले संक्रमणों के 17 लाख केस होते हैं जिन में से एक लाख अल्ला को प्यारे हो जाते हैं। और यूरोप में यह वार्षिक आंकड़े 45 लाख बताये जा रहे हैं जिन में से 37 हज़ार लोग इस अस्पताल संक्रमण का शिकार हो जाते हैं।

यह पढ़ते पढ़ते आप को भी शायद ध्यान आ रहा होगा कि यार, हमें तो भारत के आंकड़े बताओ। अफ़सोस ऐसे आंकड़े मैंने तो कहीं देखे नहीं … और शायद यह कभी दिखेंगे भी नहीं। मुझे ध्यान है इस संबंध में कुछ आंकड़े आज से बीस साल पहले टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ हैल्थ साईंसस में हास्पीटल एडमिनिस्ट्रेशन पढ़ते हुये कुछ हमें बताया करते थे कि अस्पताल से होने वाले संक्रमणों की तादात 35-40 प्रतिशत है … लेकिन मैंने कभी अपने यहां के आंकड़ें देखे ही नहीं…. भरोसेमंद या गैर-भरोसेमंद आंकड़ों की बहस तो तब शुरू हो अगर ये कहीं दिखे…तभी तो।

तो हमारे देश की समस्या इन अस्पताल संक्रमणों के संदर्भ में तो और भी गंभीर है। कारण? –हर जगह लीपा-पोती वाली अप्रोच …कैसे भी जुगाड़बाजी कर के अस्पताल की बात बाहर न निकलने पाए ..वरना मार्केट में जो दूसरे अस्पताल हैं, उन को बात उछालने का मौका मिल जाएगा।

और यह जो मैडीकल ऑडिट की बात है, यह भी अपने देश में तो बस जुबानी जमा-खर्ची तक ही सीमित है …मैडीकल ऑडिट का मतलब है ऐसी व्यवस्था जिस के अंतर्गत मैडीकल जगत को अपनी गलतियों से सीखने का अवसर मिलता है ….अच्छे अच्छे अस्पतालों में जब कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है तो छोटे मोटे अस्पतालों की तो बात ही क्या करें।

जब मैं एक आलेख पढ़ रहा था जिसमें लिखा था कि मरीज़ों को प्रश्न पूछने की आदत डालनी चाहिए और अपने इलाज के लिये जाने वाले निर्णय में उन की भागीदारी होनी चाहिए ….यह पढ़ कर मुझे यही लगा कि कहने को तो गालिब यह ख्याल अच्छा है ….बस, अगली पंक्ति नहीं पाती।

इसी रिपोर्ट में मैं एक जगह पढ़ रहा ता कि आज कल चिकित्सा व्यवस्था बड़ी आधुनिक हो गई है ..उदाहरण दी जा रही थी कि हृदय-रोग के लिये आप्रेशन के लिये लगभग 60 लोगों की टीम काम करती है और इतनी ही टीम एक जंबो-जैट को चलाने के लिये चाहिए होती है। कहने का भाव, आज हर चिकित्सा कर्मी तनाव में काम कर रहा है, और ऊपर से यह चिकित्सा ढांचा की अपना-बचाव-कर-लो वाली प्रवृत्ति भी इस तनाव को बढ़ाने का काम कर रही है। लेकिन कहीं न कहीं ऐसा करने में उन की भी अपनी मजबूरी है।

कुछ बातें जो नोट की जा सकती हैं… अगर सभी चिकित्सक मरीज़ों का इलाज करने से पहले अच्छी तरह से साबुन से अपने हाथ धोने लगें तो यह समस्या पचास फ़ीसदी तक कम हो सकती है और इस के साथ साथ अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बनाई सर्जरी चैक-लिस्ट की तरफ़ पूरा ध्यान दिया जाए तो मैडीकल गल्तियां काफ़ी हद तक टल सकती हैं।

जितना ज़्यादा किसी मरीज़ को आईसीयू (गहन चिकित्सा केंद्रों) में रखा जाता है.. उस में अस्पताल से ग्रहण करने वाले संक्रमणों का खतरा उतना ही बढ़ जाता है, यही हाल है…कैथीटर डले हुये मरीज़ों का जितना लंबे समय तक कैथीटर (पेशाब की थैली) किसी को लगा रहता है उतना ही रिस्क तरह तरह के इंफैक्शन का बढ़ जाता है। उसी तरह से नवजात शिशुओं को जब गहन चिकित्सा के लिये रखा जाता है….. तो उन का भी स्टे ज़्यादा होने पर अस्पताल संक्रमण जैसी समस्या उत्पन्न हो सकती है।

लिखने को हम कितना भी लिख लें ….लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि यह बिल्कुल ग्रे-एरिया है… न तो कोई मरीज़ और न ही उस के अभिभावक ऐसे निर्णय ले पाने में सक्षम होते हैं …. और एक बात, ये जो झोलाछाप हैं, गांवों कसबों में जो नीम-हकीम बैठे हैं, बंदे बंदे को ग्लुकोज़ की बोतलें चढ़ा देते हैं, दूषित सिरिंजों एवं सूईंयों से इंजैक्शन लगाते रहते हैं, सर्जीकल औज़ार –जिन से पट्टी वट्टी करते हैं उन्हें जीवाणुरहित करते नहीं ………..सब कुछ अनाप-शनाप चलाते जा रहे हैं, ऐसे में तो ये अमेरिका और यूरोप के अस्पताल इंफैक्शन के आँकड़े पढ़ के आप को कहीं डर तो नहीं लग रहा कि अच्छा है, हमें अपने यहां के आंकड़ें पता नहीं हैं…………………लेकिन क्या कबूतर की आंखें बंद कर लेने से बिल्ली उस पर झपटने से गुरेज कर लेगी? …. नहीं ना !!

संबंधित लेख ..
अस्पताल में होने वाली इंफैक्शन की व्यापकता
Idea — Going into hospital far riskier than flying