दांतों में स्पेस का मतलब संपन्नता कैसे हुआ…

बहुत पहले दो लेख लिखे थे जिन में दांतों के बीचो बीच बन जाने वाले स्पेस की ही बहुत सी बातें की थीं। कल दो मरीज़ों के ऐसे दांत दिख गये कि एक बार फिर से पुराना पाठ दोहराए जाने की ज़रूरत महसूस हो गई।

पहले से लिखे लेखों के लिंक यह रहें …इन्हें पढ़ने के लिए इन पर क्लिक करिए …..
दांतों में स्पेस बन सकता है परेशानी का सबब
बिना किसी बीमारी के भी होता है दांतों में गैप

ऊपर वाले दांतों में गैप

यह जो तस्वीर है यह एक 35-40 वर्षीय महिला के दांतों की तस्वीर है। वह तो मसूड़ों के इलाज के लिये आई थी। उसे अपने अगले दांतों के बीच इतने ज़्यादा स्पेस से कोई प्राब्लम नहीं है। मेरी ही पूछने पर उस ने बताया कि उस के दांतों में यह स्पेस शुरू से ही है। ज़ाहिर है जब वह यह शुरू से ही स्पेस होने की बात कर रही थी तो वह सात-आठ वर्ष की आयु की बात कर रही थी जब ये अगले दांत (incisors) मुंह में आते हैं।

लेकिन इस के दांतों के निरीक्षण से पता चला कि इसका एक दांत (जिसे लेटरल इंसाइजर – upper lateral incisor on her left side) तो निकला ही नहीं है। हो सकता है कि बचपन में किसी कारण निकलवाना पड़ा हो, लेकिन उस ने स्पष्ट कर दिया कि उस ने कभी कोई दांत नहीं निकलवाया। तो स्पष्ट है कि इस के ऊपर वाले दांतों में जो गैप है वह इसी कारण से है। अब इन अगले दांतों का एस्करे करवा के चैक करेंगे कि जो दांत मुंह में निकल नहीं पाया कहीं यह इधर उधर कहीं अटका तो नहीं पड़ा।

18 वर्षीय युवक के स्वस्थ दांतों में स्पेस

और यह जो दूसरी तसवीर है वह एक 18 वर्षीय नवयुवक की है –वह भी अपने मसूड़ों का इलाज करवा रहा है, उसे भी आगे के इन दांतों में स्पेस ज़्यादा होने की कोई परेशानी नहीं है। वह तो मेरे पूछने पर ही उसने बताया कि यह गैप तो शुरू ही से है….मतलब जब से यह पक्के दांत (permanent teeth) मुंह में आये हैं तभी से ऐसे ही हैं।

अब थोड़ी सी बात करते हैं इस तरह के स्पेस को समाप्त करने के बारे में। आज हमारे पास समुचित इलाज हैं, समुचिक मैटिरियल्ज़ हैं, और भी कईं तरह के महंगे साधन हैं जैसे कि Porcelain laminates जिन के द्वारा इस तरह के गैप को बंद किया जाता है।

इस पोस्ट का शीर्षक है ..दांतों के स्पेस का मतलब संपन्नता कैसे हुआ? …. बाकी देश का तो मुझे इतना पता नहीं लेकिन उत्तर भारत में तो यह एक बहुत बड़ी भ्रांति है कि जिन के दांतों में जितना गैप ज़्यादा होता है वे उतने ही संपन्न होते हैं। अब क्या इसे भी मुझे ही नकारना पड़ेगा………..कुछ भ्रांतियां, मिथक चल पड़ते हैं, सदियों तक चलते रहते हैं, बिना किसी सोच-विचार के ……….लेकिन अब वे हैं तो हैं, क्या करें, जितना हो सके इन्हें फोड़ते रहते हैं।

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हिलते दांतों को भी झोलाछाप कर देते हैं तुरंत जाम

जितना खिलवाड़ इस देश में झोलाछाप डाक्टर एवं डैंटिस्ट (वैसे झोलाछाप के साथ डाक्टर एवं डैंटिस्ट लिखता ही बहुत अजीब सा लगता है) …क्यों न इन्हें झोलाछाप किस्म के नमूने ही कह दिया जाए ….कोई क्वालीफिकेशन नहीं, सिवाए इस के कि सीधी सादी जनता का उल्लू बनाने में यह बहुत एक्सपर्ट होते हैं।
रोजाना इस तरह के झोलाछाप नमूनों के काम देख देख कर बहुत गुस्सा आता है ….केवल इसलिये कि इस ने मरीज़ का इलाज करने की बजाए उसे नई मुसीबत में डाल दिया है।

हिलते दांतों को और खराब करने की जुगाड़बाजी (see text)

अब ज़रा यह तस्वीर देखिये …यह 50वर्षीय एक महिला के दांतों की फोटो है। कुछ दिनों से मेरे से अपने पायरिया का इलाज करवा रही थी। अच्छा भला इलाज चल रहा था। लेकिन पायरिया बहुत एडवांस होने की वजह से इस के नीचे वाले अगले चार दांत हिल रहे थे …. मैंने समझा दिया था कि इन के हिलने में भी धीरे धीरे फ़र्क पड़ जाएगा…लेकिन पूरी तरह से ये पहले जैसे जाम नहीं हो पाएंगे….बस सब कुछ मुंह की होम-केयर के बारे में यह अच्छी तरह से समझ गई थीं।

दो दिन पहले यह जब मेरे पास आईं तो इस के दांतों की यह हालत देख कर मुझे बहुत कष्ट हुआ। क्यों? –क्योंकि इस ने किसी झोलाछाप नमूने को 500 रूपये दे कर अपने दांतों को खराब करवा लिया है। वह बहुत खुश है, कह रही है कि आप तो कहते थे जमेंगे नहीं, लेकिन फलां फलां जगह से तो मैंने इन्हें जाम करवा लिया है।

मुझे पता है कि उस के दांत किसी ने बुरी तरह से खराब कर दिये हैं। इस का कारण यह है कि ऐसा काम फुटपाथ पर बैठने वाले दांतों के इलाज के जां-बाज खिलाड़ी या झोलाछाप ही  कर सकते हैं।

नीचे के दांतों के अंदर की तरफ़ भी की गई जुगाड़बाजी

आप तस्वीर में देख सकते हैं कि किस तरह से जो गुलाबी सा मसाला (pink acrylic) उस ने हिलते हुये दांतों पर एवं साथ के दो तीन दांतों पर टिका दिया है, उस के केवल नुकसान ही नुकसान हैं। पहले, तो यह मैटिरियल मुंह में इस तरह के काम के लिये उपर्युक्त ही नहीं है। इसे इस्तेमाल करने का यह ढंग बिल्कुल गलत है। और दूसरा कारण यह है कि इस तरह की जुगाड़बाजी से वह कुछ दिन तो खुश रहेगी लेकिन उस के बाद इस के मसूड़े बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाएंगे … सूजन, पस एवं खून निकलना ….और तो और साथ वाले दांत जो थोडे बहुत ठीक हालत में थे, वे भी बिल्कुल खराब हो जाएंगे।इस के नीचे के दांतों के पिछली तरफ़ भी इस तस्वीर में देखें कि किस तरह से अजीबोगरीब जुगाड़बाजी कर दी गई है।

मैंने एक दो बार कहा कि यह इलाज गलत है, इसे उतरवा लो…लेकिन उस ने मेरी बात सुनी-अनसुनी कर दी… उसे अभी सब ठीक लग रहा है …किसी विवाह शादी में जा रहे हैं वे लोग..मैंने भी उस का मूड खराब नहीं करना चाहा …. दस-पंद्रह दिन बाद जब चैकअप के लिये आयेगी तो देखेंगे आगे क्या करना है।

लेकिन इस तरह का इलाज केवल परेशानी ही देता है। परेशानी हम लोगों की हो जाती है …मसूड़ों की इतनी बुरी हालत देख कर हमारे से रहा नहीं जाता …. जो लोग इस तरह का जुगाड़ उतरवाने के लिये जल्दी मान जाते हैं, उन का तो थोड़ा बहुत बचाव हो जाता है लेकिन जो लोग पांच-छः महीनों बाद भी आते हैं, उन के मुंह से यह जुगाड़ उतारते उतारते पहले से हिल रहे दांत अकसर इतने क्षतिग्रस्त हो चुके होते हैं कि उन्हें निकालने की नौबत आ जाती है।

लेकिन सुनता कौन है? ………..क्या लोकपाल बिल में झोलाछाप डाक्टरों पर शिकंजा कसने वाली व्यवस्था को भी इस के अंतर्गत लेने का प्रावधान है……..काश, ऐसा हो जाए ताकि लोगों को बीमारीयां परोसने वालों के मन में भी कुछ भय तो पैदा हो।

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दूध के दांत भी पक्के दांतों के निकलने में रूकावट डाल सकते हैं

वैसे तो डैंटल चैकअप करवाने जैसा कोई कंसैप्ट इस देश में है ही नहीं…. बिल्कुल भी नहीं है, अपने 26-27 वर्षों के अनुभव के आधार पर यह बड़े विश्वास के साथ कह रहा हूं। जो ज़्यादातर इलाज है वह दांत की दर्द से ही शुरू होता है।

जब बड़ों के दांतों की रूटीन केयर का यहां कोई फंडा नहीं है तो बच्चों का क्या हाल होगा। नियमित निरीक्षण का अभाव और ऊपर से बच्चों में स्वीट्स एवं जंक फूड का क्रेज़ दांतों के स्वास्थ्य की ऐसी तैसी किये जा रहा है।

दूध के दांत के टुकड़े पक्के दांत के उगने में रूकावट पैदा कर रहे हैं

यह जो तस्वीर आप देख रहे हैं यह आठ साल के लड़के की तस्वीर है। देख सकते हैं कि इस की ऊपर वाले जबड़े की ऊपर वाली जाड़ (दाड़- milk molar) गल सड़ गया लेकिन पूरी तरह से टूटा नहीं, कोई नियमित चैक-अप नहीं, आज इसे दर्द की वजह से लेकर आया गया था। और साथ में उस का बापू यह जानना चाहता था कि कोई नया दांत गलत जगह पर क्यों आ रहा है?

इस बच्चे की दूध की जाड़ पूरी तरह से ना गिरने की वजह से उस की जगह लेने वाला पक्ता दांत अपनी सामान्य स्थिति से बाहर की तरफ़ आ रहा है, अब तो जितना निकलना था निकल चुका है …आगे दूध वाले दांत के टुकड़े पड़े होने की वजह से निकल नहीं पा रहा है। और साथ में सूजन आ गई है।

सूजन-दर्द की तो कोई बात ही नहीं …दो-तीन दवा-ववा से ठीक हो ही जाएगी लेकिन इस के पक्के इलाज के लिये इस के दूध के दांत के ऊपरी जबड़े में फंसे हुये टुकड़े निकालने होंगे और फिर कुछ ही दिनों में —ज़्यादा से ज़्यादा कुछ ही हफ्तों में पक्का दांत (इस केस में permanent first premolar) अपनी नार्मल जगह पर सरकना शुरू कर देता है….यह लगभग तय ही है।

इस केस से भी यही पाठ दोहराया जा सकता है कि अपने दांतों की नियमित जांच कितनी ज़रूरी है … बच्चा तो यह आया था दांतों की एक तकलीफ़ के लिये –लेकिन आप देख सकते हैं इस के अन्य दांतों में भी दंत केरीज़ — Dental Caries—दंत क्षय लगा हुआ है और इस अवस्था में इन का उचित इलाज किया जा सकता है।

वैसे आपने अपना रेगुलर डैंटल चैकअप कब करवाया था?

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बस हुक्का पार्लरों के खुलने की ही कसर थी

आज अचानक मुझे चार महीने पहले लिखे एक लेख का ध्यान आ गया … दम मारो दम (लिंक पर क्लिक करिए)  ….इस में आज कल हमारे देश में छोटे बड़े शहरों में हुक्का पार्लरों की खबरों का खुलासा किया गया था।

विदेशों में तो ये पहले से हैं ही …. लेकिन आज एक बार फिर उस खबर पर ध्यान अटक गया जिसमें लिखा था कि कैलिफोर्निया जैसी जगह में भी युवाओं को भी इस हुक्का का इतना चस्का लग चुका है कि लगभग 25 प्रतिशत युवक इस नशे की गिरफ्त में हैं…………..इस खबर का लिंक यह रहा…Hookah use up among Calif. Young adults.

कैलिफोर्निया में समस्या यह है कि वहां पर इंडोर(बंद) पब्लिक जगहों पर धूम्रपान की मनाही है ….और वहां मनाही किस तरह की होती है, कोई कंशैशन नहीं ……….यह नहीं कि यहां कि तरह धूम्रपान निषेध की तख्ती के नीचे बैठ कर बिलकुल देवानंद के स्टाइल में धुएं के छ्ल्ले आप की तरफ़ फैंकता चला जाता है …………(हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया)। और फिर कैलीफोर्निया में कुछ हुक्का पार्लरों के खुलने से लोगों में कहीं न कहीं यह भ्रांति (2008 में प्रकाशित मेरा एक लेख, क्लिक करें)  तो है कि शायद तंबाकू का यह रूप नुकसान न करता होगा।

लेकिन ज़हर तो ज़हर है ही ….किसी भी रूप में इस्तेमाल किया जाए ….यह तो आग का खेल ही है। कईं बार सोचता हूं कि यह बड़ी बड़ी तंबाकू कंपनियों की कोई साज़िश ही होगी कि एक सुनियोजित ढंग से युवा वर्ग को इस तंबाकू रूपी इस गहरी खाई में धकेला जाए। एक बार इस हुक्के-वुक्के का आदि हो जाने पर फिर इस से अगली अवस्था यह गीत ब्यां कर रहा है …………..आप का क्या ख्याल है?

महिलाओं में पैप-स्मियर टैस्ट की उपलब्धता बढ़नी चाहिए

जब कभी मुझे कोई ऐसी विदेशी न्यूज़-रिपोर्ट दिख जाती है जिस में कहा गया होता है कि वहां पर महिलाओं में गर्भाशय के कैंसर के लिये स्क्रीनिंग टैस्ट- पैप-स्मियर एवं एचआईव्ही टैस्ट ज़रूरत से ज़्यादा हो रहे हैं, तो मेरा ध्यान तुरंत भारत जैसे देशों की महिलाओं की तरफ़ चला जाता है।

Doctors screen for cervical cancer too often (Reuters)

अभी पिछले महीने भी एक ऐसी रिपोर्ट देखी जिस में यही मुद्दा उठाया गया था –और आज भी रिटर्ज़ की साइट पर यह दिख गया कि अमेरिका में डाक्टर हर वर्ष महिलाओं को पैप-स्मियर / एचपीव्ही टैस्ट के लिये बुला लेते हैं .. जब कि बहुत सी संस्थाओं द्वारा एक बार टैस्ट की सामान्य रिपोर्ट आने पर तीन वर्ष के बाद ही इसे फिर से करवाने की सिफ़ारिश की जाती है।

एक तरफ़ तो ज़रूरत से ज्यादा टैस्ट और दूसरी तरफ़ हमारी व्यवस्था ऐसी है जहां पर हम महिलाओं को इस तरह के टैस्टों के लिये जागरूक कर ही नहीं पाए हैं। यह कहना बहुत अटपटा लगता है कि उन्हें इस तरह के टैस्ट का महत्व पता नहीं है, यह तो कोई बात न हुई, उन्हें बतायेगा कौन, यह किस का उत्तरदायित्व है?  हरेक बात को हम लोग अनपढ़ता की चादर में नहीं छुपा सकते।

हमारी चिकित्सा व्यवस्था में आखिर किस बात की कमी है? –सब कुछ तो है ..स्त्रीरोग विशेषज्ञ हैं, पैथोलॉजिस्ट हैं…आधुनिक लैबोरेट्री हैं…..लेकिन फिर भी महिलाओं इस तरह के टैस्ट करवाने के लिये आगे क्यों नहीं आ पातीं।

टीकाकरण जैसी मुहिम – अभी मुझे ध्यान आ रहा था कि ठीक है मैडीकल कालेजों में, बड़े बडे अस्पतालों में एवं कारपोरेट अस्पतालों में इस तरह के टैस्ट होते हैं…..लेकिन आज समय की मांग है कि इन टैस्टों का दायरा बढ़ाया जाए ….कम्यूनिटी हैल्थ सैंटर तक में इस तरह की टैस्टों की उपलब्धता करवाई जानी नितांत आवश्यक है। अगर वहां पर स्त्रीरोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं भी हैं तो भी किसी पास के अस्पताल से सप्ताह में एक-दो दिन महिलाओं की जांच के लिये निश्चित किये जाने चाहिये …और एक सुझाव यह कि कैंसर बचाव क्लिनिक जैसा नाम इस का नाम नहीं रखा जाना चाहिये …लोग भागने लगते है ये शब्द सुन कर…कुछ भी कह लें…स्वस्थ महिला जांच क्लिनिक या कुछ भी और।

पैप-स्मियर टैस्ट के बारे में जानिए (इस लिंक पर क्लिक करिए)

विचार मेरे को यह भी आ रहा है कि बिल्कुल टीकाकरण जैसी मुहिम छिड़ जानी चाहिये ..पैप-स्मियर के लिये —संबंधित आयुवर्ग की सभी महिलाओं का एक कार्ड बन जाना चाहिये जिस में उन की सेहत से संबंधित विशेष बिंदुओं –गर्भाशय का स्वास्थ्य, वक्ष-स्थल का स्वास्थ्य…..पैप-स्मियर टैस्ट, मैमोग्राफी किये जाने की तारीखें दर्ज होनी चाहिएं ताकि उन में इस के बारे में जागरूकता पैदा तो हो और उस कार्ड पर इस तरह के टैस्ट करवाने का शैड्यूल लिखा होना चाहिए और साथ में संक्षेप में यह जानकारी कि इन टैस्टों के क्या लाभ हैं। जिस तरह से हैपेटाइटिस बी के टीकाकरण की मुहिम चली थी, वैसी इस संबंध में क्यों नहीं चल सकती!

मैमोग्राफी

मैमोग्राफी के बारे में (इस लिंक पर क्लिक करिए)

इस पैप-स्मियर टैस्ट के द्वारा भारतीय महिलाओं की नियमित जांच होना इसलिये भी ज़रूरी है कि अभी तक यहां पर गर्भाशय़ से बचाव के लिये लगाया जाने वाला टीका (HPV vaccination) कुछ खास प्रचलित हुआ नहीं है… इससे संबंधित कुछ मुद्दे हैं जिन्हें विशेषज्ञ देख रहे हैं, अध्ययन कर रहे हैं ….जो इस क्षेत्र के अनुभवी वैज्ञानिक हैं उन की जो भी सिफारिशें होंगी, वह तो बाद में होता रहेगा लेकिन महिलाओं को गर्भाशय़ से कैंसर से बचाने का जो हथियार हमारे पास वर्षों से है –पैप-स्मियर टैस्ट —उसे तो ढंग से इस्तेमाल किया जाए।

किसी भी सरकारी अस्पताल की सेवाओं की गुणवत्ता का आंकलन करते समय मेरे विचार में एक बिंदु यह भी ज़रूर होना चाहिए कि वहां पर स्त्रीरोग विभाग में कितने पैप-स्मियर टैस्ट किये गये, कितने पहली बार किये गये …कितने रिपीट हुये। और साथ में यह जानकारी भी होनी चाहिए कि कितने टैस्टों के रिज़ल्ट पॉज़िटिव पाए गये।

यह टैस्ट बहुत आसान है, सरकारी अस्पताल में करवाया जाए तो फ्री है ही, वैसे भी दो-तीन सौ रूपये में हो जाता है लेकिन एच-पी-व्ही टैस्ट में लगभग तेरह-चौदह सौ रूपये का खर्च आ जाता है। लेकिन इसे स्त्रीरोग के परामर्श के अनुसार ही करवाना उचित होता है.. अपनी ही डिमांड पर इस तरह के टैस्ट करवाये जाना ठीक नहीं है। इस के वही नुकसान हैं जो रिटर्ज़ न्यूज़-रिपोर्ट (जिस का लिंक ऊपर दिया गया है) में बताये गये हैं।

लगता है बस करूं और लिखना —बहुत हो गया, समझदार को तो वैसे ही इशारा ही काफ़ी होता है। पोस्ट को समाप्त करते करते इतना तो कहना ही चाहता हूं कि इन टैस्टों के बारे में जितनी जागरूकता बढ़ाई जा सके उतना ही हम महिलाओं की सेहत की रक्षा कर पाएंगे।

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एच पी व्ही (HPV Test)

भटिंडा से बीकानेर पेसैंजर पुकारी जाती है कैंसर स्पेशल

अगली बार जब आप किसी भी रेहड़ी पर पानी-पूरी खाएं, चने-भटूरे खरीदें, किसी ढाबे में खाना खाएं या किसी रोडसाइड स्टाल पर चाय-भजिया खाएं तो इस बात की तरफ़ ध्यान दीजियेगा कि वहां पर पानी किस बड़े बड़े नीले, हरे प्लास्टिक के कंटेनरों में स्टोर किया जा रहा है। यहां उत्तर भारत में मैं देखता हूं कि लोगों को ऐसे खाली कंटेनर खरीदने का एक क्रेज सा हो गया है। अकसर मीडिया में आता रहता है कि इस तरह के डिब्बों में पानी को स्टोर किया जाना सुरक्षित नहीं है, लेकिन कौन सुनता है!!

आज इस बात का ध्यान ऐसे आ गया कि एक कैंसर विशेषज्ञ ने यह कहा है कि पंजाब के मालवा क्षेत्र में इतने ज़्यादा कैंसर के रोगी होने का एक कारण यह भी है कि किसान कीटनाशकों के खाली डिब्बों (empty pesticide cans) को जल एवं खाने-पीने वाली वस्तुएं को स्टोर करने के लिये करते हैं। लिखते लिखते कईं बातों का ध्यान आ जाता है …शायद आपने भी बहुत बार नोटिस किया होगा कि दूध की डेयरियों में भी जो भी काम- पनीर बनाना, क्रीम निकालना आदि चल रहा होता है वह भी इन्हीं कीटनाशकों के खाली डिब्बों में ही चल रहा होता है। अनुमान लगाया जा सकता है कि स्थिति कितनी भयावह हो चुकी है।

पंजाब के मालवा क्षेत्र की बात तो पीछे ही छूट गई … कल की टाइम्स ऑफ इंडिया में एक बेहद चिंताजनक रिपोर्ट थी कि किस तरह से पंजाब का मालवा क्षेत्र कैंसर की चपेट में है। सतलुज नदी के दक्षिण की तरफ़ पंजाब के मालवा क्षेत्र में 10 ज़िले आते हैं… इन में से भटिंडा, फरीदकोट, मोगा, मुक्तसर, फिरोज़पुर, संगरूर एवं मानसा बुरी तरह से कैंसर की गिरफ्त में है — A Train Ride to Cancer Care.

  खबरें तो हम लोग पिछले लगभग दस साल से ऐसी सुन रहे हैं…..कीटनाशकों एवं खादों (उर्वरकों) के अंधाधुंध इस्तेमाल की वजह से अंडरग्राउंड पानी में भी इन के अंश भारी मात्रा में होने की वजह से कैंसर के रोगियों की संख्या बहुत ज़्यादा हो चुकी है। कीटनाशकों (pesticides) के बारे में कहें तो इस राष्ट्र में एक हैक्टेयर ज़मीन के लिये औसतन 570 ग्राम पैस्टीसाइड इस्तेमाल होते हैं जब कि पंजाब में प्रति एकड़ इस की मात्रा 923 ग्राम है। और जहां तक फर्टीलाइज़र (खाद) की बात है उस के इस्तेमाल के आंकड़े देश के लिये हैं 131 किलो प्रति हैक्टेयर लेकिन पंजाब में इन का इतना अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है कि एक हैक्टेयर में 380 किलोग्राम फर्टीलाइज़र का इस्तेमाल हो रहा है।

एक और भी बात है कि मालवा क्षेत्र कपास के उत्पादन के लिये भी जाना जाता है – Cotton belt of Punjab—और चूंकि कपास में कीड़ा लगने का अंदेशा ज़्यादा रहता है, इसलिये लगभग 15 अलग अलग तरह के कीटनाशक स्प्रे इस फसल पर किये जाते हैं जिन में से सात तो ऐसे हैं जिन्हें अमेरिकी एजेंसियों द्वारा कैंसर का कारण बताया गया है।

रिपोर्ट पढ़ रहा था तो पता चला कि फरीदकोट सरकारी मैडीकल कालेज के कैंसर रोग विशेषज्ञ बता रहे थे कि वे रोज़ाना 30से 35 कैंसर के नये केस देखते हैं।
और कैंसर के रोगी मुफ्त इलाज के लिये और सस्ती दवाईयों के लिये बीकानेर जाकर अपना इलाज करवाते हैं … भटिंडा से कैंसर के रोगी जिस पैसेंजर गाड़ी को लेते हैं बीकानेर जाने के लिये उस में प्रतिदिन लगभग 70 से 100 कैंसर के मरीज़ यात्रा करते हैं…और कुछ लोगों ने तो इसे कैंसर ट्रेन के नाम से संबोधन करना शुरू कर दिया है।

एक बात लगता है रिपोर्ट में छूट गई …. अप्रवासी मजदूर वर्ग…..यह वह वर्ग है जो अपने गांव से पंजाब की हरियाली-खुशहाली की रूख तो कर लेता है, लेकिन मजबूरी कह लें, या अज्ञानता वश कहें, वह वहां पर कीटनाशकों- फर्टीलाइज़रों से जुड़े सब जोखिम भरे काम करता है ….मैंने ट्रेन में आते जाते देखा है वही ये सब स्प्रे कर रहा होता है, और व्यक्तिगत तौर पर भी फिरोज़पुर के गांवों में देखा कि ये मजदूर बिना अपनी सेहत की परवाह किये बिना जोखिम-भरे कामों में लगे रहते हैं …..कोई सामाजित सुरक्षा नहीं, कोई इएसआई कवरेज नहीं…..बस, आठ-दस हज़ार इक्ट्ठा कर के जब अपने गांव का रूख करते हैं तो वह कीटनाशकों वाले खाली कैन भी बहुत बार उन के साथ ही होते हैं ……………..फिर पता नहीं कितने वर्षों तक उन कैनों में पानी स्टोर किये जाने की वजह से उन के कितने परिवार जन तरह तरह की बीमारियों की चपेट में आते होंगे।

रिपोर्ट में बिल्कुल सही लिखा है … Declare Malwa an ecological and environmental health emergency.

महिलाओं के ब्लैडर कैंसर में तंबाकू विलेन

अभी मैं यह समाचार पढ़ रहा था कि महिलायों में जो ब्लैडर(पेशाब की थैली) के कैंसर के केस होते हैं उन में से पचास प्रतिशत केसों में धूम्रपान की भूमिका रहती है– Cigarette smoking implicated in half of bladder cancers in women.  इसे पढ़ते पढ़ते मेरा ध्यान अपनी नानी की तरफ़ चला गया ….एकदम सेहतमंद, हिम्मती, परिश्रमी, हर हालत में खुश रहने वाली…..अब नानी थी तो उस की कितनी तारीफ़ करूं…. शायद उस जैसी महान् महिला कभी कोई और नहीं दिखी …. विपरित परिस्थितियों से किस तरह से जूझना है…. कभी दिमाग भारी होता है तो उन का ध्यान आ जाता है।

हां, तो बात ऐसी हुई कि 20 वर्ष पहले उन्हें अचानक पेशाब में रक्त आना शुरू हो गया…..सारा चैकअप हुआ ..वही हुआ जिस का डर था …उन्हें ब्लैडर कैंसर डॉयग्नोज़ हुआ। आप्रेशन भी हुआ, रेडियोथेरेपी भी हुई ..लेकिन लगभग एक वर्ष से ज़्यादा वह काट न पाई।

इतनी बढ़िया सेहत, इतना परिश्रम करने वालीं, हर हाल में खुश रहने वाली, सामाजिक तौर पर अति सक्रिय…धार्मिक स्वभाव वाली ……अब क्या क्या बताएं अपनी नानी के बारे में……..लेकिन एक बात तो बतानी ज़रूरी है ही…अगर किसी ने इस से सीख ले ली तो मेरी नानी मुझे उस का राज़ खोलने के लिये माफ़ कर देगी।

  मेरी नानी को नसवार का इस्तेमाल करने की आदत थी … नसवार – snuff—अर्थात् स्मोकलैस तंबाकू का एक रूप। वह दिन में कईं बार चुटकी भर के गालों के अंदर दबा लिया करती थीं। उन्हें भी इस आदत से बड़ी झुंझलाहट सी हुआ करती थी।

हम छोटे छोटे थे—उस के साथ लेटे लेटे मस्ती करते हुये कईं बार पूछा करते थे कि नानी, यह क्यों इस्तेमाल करती हो, वह हमें सारी बात बताया करतीं कि पाकिस्तान में अपने प्रवास के दौरान उन्हें दांतों में दर्द होना शुरू हुआ…. डाक्टर वाक्टर इतने होते नहीं थे, किसी ने सलाह दी कि मसूड़ों पर नसवार मल ले…..बस लगाते ही आराम क्या आया कि कुछ ही दिनों में उस की लत छूट न पाई।

जब भी हम उस से मिलने जाते वह हमें चुपके से कह देती कि बाज़ार से एक डिब्बी लेकर आओ…. और वह उस नसवार की डिब्बी को कहीं किसी फोटो-फ्रेम के पीछे छुपा कर रखा करतीं और परदे में ही इसे लगातीं …… लेकिन हम से कैसे परदा!! और हमारा अनाड़ीपन देखिये कि हमें बहुत वर्षों तक पता ही न था कि तंबाकू का यह रूप भी नुकसान ही करता था। हमें तो बस यही अच्छा लगता था कि नानी के मुंह से अच्छी सी महक आया करती थी।

नानी की बातें क्यों आप के सामने रखीं….क्योंकि अभी भी देश में यह नसवार – snuff – का चलन बहुत ज़्यादा है। और बहुत बार मेरी नानी की तरह दांतों के दर्द के इलाज के लिये ही इसे पहली बार उपयोग किया जाता है और देखते ही देखते लत पड़ जाती है। देश के कुछ क्षेत्रों में तो लोग इस नसवार को दांतों पर घिस कर दांत साफ़ करने की भूल भी करते हैं …. मुंह के कैंसर को खुला निमंत्रण…इस तरह के मंजन बनाने वाली कंपनियों पर बहुत से केस भी हुए…..लेकिन रिजल्ट क्या निकलता है आप सब जानते ही हैं!!

और तो और नसवार के अलावा देश में महिलाओं द्वारा धूम्रपान की आदत —बीड़ीयां, हुक्का, तंबाकू-चूना भी इस तरह की तबाही मचाने में किसी से कम नही है।

क्या आप यह सब पढ़ कर अपने आसपास किसी एक महिला को इन बातों के बारे में जागरूक करेंगे?…..वह भी किसी की नानी तो होगी ..नहीं होगी तो भी कल तो बनेगी !!

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