एक्स्ट्रा दांत दिखने पर क्या करें?

यह एक 10-11 वर्ष के लड़के के ऊपर वाले दांतों की तस्वीर है…वह पहली बार किसी डैंटिस्ट के पास आया है क्योंकि उस के आगे वाला दांत बाहर की तरफ़ निकला हुआ है जो उसे अच्छा नहीं लगता और उस की क्लास के दूसरे छात्र अब उस का मज़ाक उड़ाने लगे हैं।

तालू पर उग चुका एक्स्ट्रा दांत

यह तस्वीर मैंने यहां पर इस लिये लगाई ताकि वही पुरानी बात को एक बार फिर से याद दिलाया जा सके कि बच्चों के दांतों का भी नियमित चैक-अप बहुत ज़रूरी है।

इस बच्चे के दांतों में कोई खास बात नहीं थी ..बस उस के तालू की तरफ़ एक एक्स्ट्रा दांत निकल आया जिस की वजह से उस के अगले दांत ने बाहर की तरफ़ खिसकना शुरू कर दिया। यह एक्स्ट्रा दांत उस के मुंह में सात-आठ वर्ष की उम्र से ही निकलना शुरू हो गया था –अगर किसी डैंटिस्ट के पास इसे लेकर जाया जाता तो वह इसे तुरंत निकाल देता और ऊपर वाला आगे वाला दांत अपनी जगह पर ही आ जाता।

इस तरह के एक्स्ट्रा दांत बिल्कुल छोटे साइज़ के होते हैं और  इन्हें उखड़वाने में बिल्कुल भी दिक्कत नहीं आती — इस तस्वीर में आप देख सकते हैं कि यह कितने छोटे साइज का दांत है … इसे हम लोग डैंटल भाषा में Mesio-dens  भी कहते हैं।

अब इस एक्सट्रा दांत के उखड़ने के बाद कुछ तो उस आगे सरके हुए दांत की पोजीशन में फर्क पड़ेगा लेकिन इस केस में यह लग रहा है कि पूरी तरह से वह सही जगह नहीं ले पाएगा, क्योंकि उस के वापिस मुड़ने के लिए न तो जगह ही है और न ही अनुकूल वातावरण है, इसलिये इस आगे सरके हुये दांत को अपनी जगह पर लाने के लिये आरथोडोंटिक इलाज (जिस में ब्रेसेज़ आदि लगाये जाते हैं) भी करवाना पड़ सकता है, मेरा अनुभव यही कहता है कि विभिन्न कारणों की वजह से इस तरह का इलाज अधिकतर लोगों की पहुंच से बाहर ही होता है, इसलिये बेहतरी इसी में है कि सभी लोग नियमित अपने दांतों का निरीक्षण छःमहीने में एक बार करवाते रहें।

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ऐसा क्या है किवि-फ्रूट में !!

पिछले सप्ताह मैं एक कैमिस्ट से किसी के लिये कोई दवा खरीद रहा था ..मैंने सुना वह किसी व्यक्ति को आपबीती सुना रहा था कि बुखार के बाद उसे टांगों में कितना ज़्यादा दर्द था और किस तरह से किवि-फ्रूट खाने से जैसे जादू सा हो गया। और फिर उस ने उसे भी रिलायंस स्टोर पर जाकर किवि-फ्रूट खरीदने की सलाह दे डाली। साथ में यह भी कह दिया कि यह और किसी जगह नहीं मिलेगा।

दो दिन पहले ही मेरा भी रिलायंस के एक स्टोर में जाना हुआ….अचानक मुझे किवि-फ्रूट का ध्यान आ गया…खाया तो मैंने उसे कभी नहीं लेकिन ध्यान आया कि थोड़ा देख तो लें। मेरे पूछने पर सेल्समेन ने बताया कि क्या आप को यह सैल्स (cells) की कमी के इलाज के लिये चाहिए….मैंने ऐसे ही उस की हां में हां मिला दी। फिर उस ने बताया कि यह किवि-फ्रूट वो नहीं मंगवाते क्योंकि इस एरिया के लोग महंगा होने की वजह से इसे खरीदते नहीं है… उस ने बताया कि यह तीन सौ रूपये किलो है और इसे किसी दूसरी जगह पर स्थित रिलांयस स्टोर से खरीदा जा सकता है।

इसे खाया नहीं भी तो क्या, देख तो सकते हैं!

न तो मुझे कैमिस्ट की बात हज़म हुई थी और न ही इस सेल्समेन की बात पर ही विश्वास हुआ। अभी अचानक इस का ध्यान आया तो जो जानकारी नेट पर इस से संबंधित मिली वह यहां रख रहा हूं। इसे चीनी आंवला (Chinese gooseberry) भी कहते हैं…… पता नहीं चीनी शब्द लगने से लोगों का इतना क्रेज़ क्यों बन जाता है….जो बात मेरी समझ में आई वह यह है कि यह विटामिन सी का अच्छा स्रोत है….विस्तृत जानकारी इस लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं।

वैसे यहां पर एक महाशय इसे छीलने का बहुत बढ़िया तरीका बता रहे हैं… क्या पता कभी काम ही आ जाए।

इस किवि-फ्रूट की तारीफ़ सुन कर मेरा ध्यान बचपन के दिनों की तरफ़ चला गया …वैसे आज भी स्थिति कुछ ज़्यादा कहां बदली है। अकसर हम उन दिनों यही सोचते थे कि दूध में जो लोग बोर्नविटा, माल्टोवा, कंप्लान डाल कर पीते हैं वही बढ़ते-फूलते हैं….इसलिये अगर यह सब नहीं होता था तो हमें दूध से बदबू आती थी।

300 रूपये किलो में किवि-फ्रूट बिक रहा है, कोई बुराई नहीं है। जो लोग खरीदने की शक्ति रखते हैं, खरीदना चाहते हैं, ज़रूर खाएं। लेकिन समस्या तब हो जाती है जब कोई बीमार व्यक्ति झूठे दावों के झांसे में आकर अपने सामर्थ्य से बाहर हो कर इतना महंगा फ्रूट खरीदता है जब कि शायद उस से मिलने वाला फायदा तो उसे आंवले के सेवन से भी मिल सकता है।

हां तो वो जो सेलसमेन सेल कम होने की बात कर रहा था शायद वह डेंगू बुखार में प्लेटलेट्स कम होने की बात कर रहा होगा। लेकिन यह दावा कि किवि-फ्रूट खाने से ये बढ़ जाते हैं, यह न तो मैंने किसी विश्वसनीय मीडिया रिपोर्ट में देखा न ही किसी मैडीकल संगोष्ठी में इस के बारे में अभी तक सुना। लेकिन अगर इस में कोई सच्चाई है तो मैं अपनी भूल सुधार करने के लिये सदैव तत्पर हूं।

सैलों के बढ़ाने से बात याद आई … कल सुबह जल्दी उठ गया था…सुबह सुबह टीवी पर बाबा लोगों का बाज़ार सजा होता है। बेचारा एक श्रद्धालु बता रहा था कि किस तरह से एक बाबा के मंत्र मात्र से कुछ ही घंटों में उस के उस के सैल हज़ारों से लाखों तक पहुंच गए …..यह आस्था का मामला है, इसलिये मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा।

एक तरफ तो किवि-फ्रूट बिक रहा है तीन सौ रूपये किलो और दूसरी तरफ़ मुझे अभी अभी खबर दिखी है आज की अमर उजाला में (अमर उजाला 30 नवंबर 2011 – चंडीगढ़) कि बीपीएल परिवारों को रोहतक में सड़ा और खराब गेहूं मिलने पर महिलाओं ने जमकर हंगामा मचाया  और डिपो संचालक को खरी-खोटी सुनाई। कुछ दिन पहले की बात है कि ट्रेन में बैठा मैं एक अखबार पढ़ रहा था …अचानक एक विज्ञापन पर सूईं अटक गई। वह एक सरकारी विभाग का विज्ञापन था जिस में उस ने खराब गेहूं बेचने के लिये इश्तिहार दे ऱखा था …बहुत ज़्यादा मात्रा में उसे यह खराब गेहूं बेचना था, साथ में स्पष्ट लिखा था कि यह गेहूं मानव के उपयोग के फिट नहीं है, अगर किसी ने इसे इस काम के लिये इस्तेमाल किया तो उस पर कानूनी कार्यवाई की जाएगी।

मैं सारे सफ़र के दौरान यही सोचता रहा कि एक बार किसी ने इस तरह का गला, सड़ा, खराब गेहूं खरीद लिया उस का वह क्या करेगा, क्या नहीं करेगा, यह कौन जाने। जहां तक मुझे लगता है कि जो अनाज आदमी के खाने के काबिल नहीं है, वह जानवर को भी कैसे खिलाया जा सकता है, नहीं ना, तो फिर खराब अनाज के इतने बढ़े ज़खीरे को खरीद कर कोई करेगा क्या, कहीं रेत-बजरी की तरह से ही इस्तेमाल न होता हो, नहीं नहीं, ऐसा नहीं होता होगा, यह आप सब भी जानते हैं।

कहां यार हम लोग भी सड़े गले गेहूं में अटक कर रह गये, कितनी सुंदर बातें चल रही थीं चीनी आंवले की ……. अपने देशी आंवले से बीस गुणा कीमत पर बिकने वाले किवि-फ्रूट के बारे में क्या हम यह आशा कर सकते हैं कि विदेशी किराना स्टोर  खुलने के बाद क्या यह किवि-फ्रूट भी हम लोगो को आंवले के रेट पर ही मिल जाया करेगा, ऐसा हो तो बात बने।

लैपटाप, एयर-फोन, एम-पी थ्री भी नुकसान पहुंचा सकते हैं ?

अगर आधुनिकता की अंधी दौड़ में कोई यही ठान ले कि उस ने किसी की भी सुननी नहीं है तो कोई क्या कहे। अभी दो तीन दिन पहले की बात है कि दिल्ली की एक युवती जिस ने कान में एयर-फोन लगा रखे थे, सड़क दुर्घटना का शिकार हो कर चल बसी। समाचार में यह भी बताया गया था कि इस तरह का एक हादसा पहले भी हो चुका है।

अकसर यह देखा जा सकता है कि आजकल हर तरफ़ युवा-वर्ग कानों में एयर-फोन ठूंस के चल रहा होता है, ऐसा करना सड़क दुर्घटनाओं को निमंत्रण देने वाले बात ही तो है। न तो उसे हार्न आदि सुनता है और न ही किसी के कुछ कहने की बात, ऐसी परिस्थितियों में हादसा को कैसे टाला जा सकता है। ड्राइव करने वालों के अलावा अगर कोई सड़क पर पैदल भी चल रहा है तो उस का भी यह कान में एयर-फोन घुसा कर रखने का क्रेज़ उस की जान ले सकता है।

लगभग एक वर्ष पहले विश्वसनीय रिपोर्टें आई थीं कि किस तरह से पोर्टेबल एम-पी थ्री (Portable mp3 player) आदि का क्रेज़ जिन्हें युवा वर्ग अकसर घूमते फिरते सुनते रहते हैं…उन की श्रवण-शक्ति (hearing capacity) को खराब किये जा रहा है। जो इन यंत्रों के बढ़िया फीचर माने जाते हैं वही नुकसान पहुंचाते हैं ….कईं कईं घंटों तक चलने वाली बैटरियां और ऊपर से सड़क पर शोर-शराबे की वजह से बढ़ाई गई ध्वनि (high volume) —अब फिर कान खराब होने से बचें तो आखिर कैसे?

अभी अभी बीबीसी की वेबसाइट पर यह खबर दिखी कि जो लोग घंटों अपनी लैप पर रख कर लैपटाप में मस्त रहते हैं उन के शुक्राणुओं (sperms) पर इस का बहुत गलत असर पड़ता है। कहने को कहा तो गया है कि इस के प्रभाव पर स्टडी ही चल रही है, लेकिन वैज्ञानिकों की बातों में अकसर यह सब तो होता ही है। कहने का मतलब है कि अगर धुएं का ज़िक्र हुआ है तो आग भी तो ज़रूर होगी। इस तरह की बातें पिछले वर्ष भी कुछ स्टडीज़ में हो रही थीं।

Scientists question if wi-fi laptops can damage sperm ( BBC News)

हर दिन हम लोग कुछ निर्णय लेते हैं …लेने पड़ते हैं ….जैसे कि यह लैपटाप वाली बात सुन कर भी जो लोग लैपटाप से अपनी लैप को सेंकते रहेंगे तो कोई कुछ नहीं कर पाएगा, यह उन का व्यक्तिगत निर्णय होगा। लेकिन समझदारी इसी में है कि हम लोग वैज्ञानिकों का इशारा समझने की कोशिश किया करें, और जहां भी हो सके लैपटाप को टेबल पर रख कर ही इस्तेमाल किया करें। आप ने क्या फैसला किया है?

जिस समाचार में उस युवती के सड़क हादसे में खत्म होने की बात आई थी वहां यह भी लिखा था कि फलां फलां देश में तो इस तरह के कानून हैं कि सड़क में आप एयर-फोन कान में डाल कर नहीं रख सकते — लेकिन वही बात कि हर बात के लिए सरकार की तरफ़ ही देखा जाए…. बहुत अजीब सा लगता है, कुछ तो बातें हम लोग अपने आप भी करने की आदत डालें –खास कर जब मामला अपनी जान का ही हो तो !!

ज़रूरी दवाईयों के बढ़ते दामों पर लगेगी लगाम

1992-93 के दौरान जब मैं टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साईंसिस, मुंबई में हास्पीटल एडमिनिस्ट्रेशन कोर्स कर रहा था तो ड्रग-पालिसी एडमिनिस्ट्रेशन (Drug Policy Administration) एक विषय हुआ करता था… बहुत अच्छे से उसे वहां की फैक्लटी कवर भी करती थी। उस दौरान ही यह DPCO (Drug Price Control Order) का माजरा समझ में आने लगा था।

कुछ वर्ष पहले भी यह यह DPCO बहुत खबरों में छाया रहा था… कभी कुछ दिख जाता था फिर कहां गुम हो जाता था पता ही नहीं चलता था लेकिन आज बहुत अरसे बाद टाइम्स ऑफ इंडिया के फ्रंट पेज पर यह खबर देख कर एक बार फिर से आस बंधती दिखी … Prices of 348 essential drugs to be controlled ( Times of India, Nov 19’ 2011).

खबर में यही बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने दवाईयों के लगातार बढ़ते मूल्यों पर जो चिंता व्यक्त की थी उस की प्रतिक्रिया के स्वरूप केंद्र सरकार ने यह निश्चय किया है कि वह सभी 348 दवाईयों जिन्हें नेशनल लिस्ट ऑफ ईशैंशियल मैडीसन(National List of Essential Medicines –NLEM 2011)में रखा गया है, उन को कड़े प्राइस-कंट्रोल के अंतर्गत लेने के लिये पूरे उपाय करेगी।

दरअसल Drug Price Control Order (DPCO) के अंतर्गत आने वाली दवाईयों की गिनती में लगातार कमी आने की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त की थी… 1980 के दशक के शुरूआती वर्षों में 300 दवाईयां DPCO के अधीन थीं, 1987 आते आते यह गिनती 140 तक रह गई थी और आज केवल 74 दवाईयां ही इस कंट्रोल आर्डर के अधीन हैं…..at present, prices of only 74 bulk drugs and formulations containing any of these scheduled drugs are under price control regime.

DPCO के अधीन आने का सीधा सीधा मतलब यह होता है कि एक बार प्राईस-कंट्रोल के अधीन आने के बाद फिर इसे सरकार द्वारा नियत किये गये मूल्य से ज्यादा दाम पर नहीं बेचा जा सकता।

National List of Essential Medicines (NLEM) has 348 medicines which cover 489 formulations, including 16 fixed dose combinations, which are considered to be adequate to meet the common health needs of the general population of the country.

यह जो 348 ज़रूरी दवाईयों की नेशनल लिस्ट 2011 के लिये तैयार है, इसे लोगों की सेहत से जुड़ी आम ज़रूरतों के लिये पर्याप्त माना जाता है।
बहुत अच्छा है अगर सभी ज़रूरी दवाईयां ड्रग-प्राईस कंट्रोल आर्डर के अधीन आ जाती हैं तो फिर लोग तो राहत की सांस लेंगे क्योंकि यह देखा गया है कि इलाज पर होने वाले खर्च का 60प्रतिशत खर्च तो दवाईयों पर ही होता है।

वैसे अगर आप इस नेशनल लिस्ट आफ इशैंशियल मैडीसन 2011 लिस्ट को देखना चाहते हैं तो मिनिस्ट्री ऑफ हैल्थ की वेबसाइट के होमपेज की बाईं तरफ़ बि्लकुल नीचे इस का लिंक आप को मिल जाएगा।

Source : Prices of 348 essential drugs to be controlled

पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनों पर कोर्ट ने लगाया प्रतिबंध

मुझे ध्यान में आ रहा है कि आज से लगभग डेढ़ वर्ष पहले मैंने जब पाकेट साइज़ अल्ट्रासाउंड से संबंधित जानकारी अपने मीडिया डाक्टर ब्लॉग पर उपलब्ध करवाई थी, तो मेरे अंदर बहुत मिश्रित सी भावनाएं आ रही थीं… कारण यही था कि देश में रजिस्टर्ड अल्ट्रासाउंड सेंटरों के बावजूद यह जो गर्भावस्था में शिशु के सैक्स का पता करवाने का जुनून तो थमने का नाम नहीं ले रहा और जब जेब में फिट होने वाली पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीन आ गई हैं तो आगे आगे क्या होगा!!

लेकिन जिस बात का अंदेशा था वही हुआ….. आज के समाचार पत्र में पढ़ा कि बम्बई हाईकोर्ट ने दो दिन पहले ही पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनों पर प्रतिबंध लगा दिया है। अच्छा लगा यह पढ़ कर कि कोर्ट ने कहा है कि एक बच्चा इस परमात्मा का उपहार है और किसी को भी यह पता करने का प्रयास नहीं करना चाहिए कि गर्भ में पल रहा शिशु बेबी है या बाबा!

30 जुलाई 2011 को बृहन्मुंबई म्यूनिसिपल कार्पोरेशन में एक आदेश जारी किया था कि अल्ट्रासाउंड मशीनों को पंजीकृत सेंटर पर ही रखा जाएगा –न ही तो इन्हें शेयर किया जा सकता है और न ही वहां से किसी और जगह लेकर जाया जा सकता है और जो इन आदेशों की उल्लंघना करेगा, उस के ऊपर उचित कार्यवाही की जायेगी।
रेडियोलॉजी एवं इमेजिंग एसोशिएशन ने कार्पोरेशन के इस निर्णय को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी और इस केस का निर्णय करते समय कोर्ट ने इस प्रतिबंध को एकदम दुरूस्त ठहराया है।

याचिकाकर्त्ता के वकील ने यह तर्क दिया कि ऐसा करने से बिस्तर पर पड़े मरीज़ों को इस सुविधा से वंचित रहना पड़ेगा—लेकिन न्यायाधीशों का यह मत था कि सोनोग्राफी तो केवल निदान के लिये ही है, किसी तरह का इलाज देने के लिये तो इसे इस्तेमाल किया नहीं जाता, यह कोई आक्सीजन तो है नहीं जिस के बिना मरीज़ ज़िंदा ही नहीं रह पाएगा….

The judges said trying to know sex of child in advance removes the element of excitement. और कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक समाज लड़के और लड़की में भेदभाव करना बंद नहीं करता तब तक तो इस तरह की व्यव्स्था, नियम, कानून की ज़रूरत तो रहेगी ही।

Rejecting  the petition, the court concluded that the BMC circular is “most reasonable and in public interest” and added that “even if there is only one case in a million, this court will not interfere.”.

यह ख़बर देखने के बाद मुझे यही ध्यान आ रहा है कि क्या यह निर्णय बंबई में ही लागू होगा ….. क्या विभिन्न प्रांतों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को भी इस से संबंधित अलग अलग नियम बनाने होंगे या फिर केंद्र सरकार ही कुछ इस तरह के नियम बनायेगी जिस के द्वारा इन पोर्टेबल मशीनों पर प्रतिबंध लगाया जा सकेगा।

और मैं इस बारे में भी सोच रहा हूं कि नियमों के बावजूद इस तरह की पोर्टेबल मशीनों पर अंकुश कितने प्रभावशाली ढंग से लग पाएगा।

Source : Portable Ultrasound machines barred – Bombay HC upholds Civic body’s Move to Prevent Sex Determination Tests ( Times of India –November 19′ 2011).