बेटी को बेटा बनाने का गोरखधंधा इंदौर में

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एम्स ने खरीदा 28 करोड़ का चाकू

इस चाकू का नाम का …गामा चाकू (Gamma Knife)… कहने को तो चाकू है लेकिन न ही तो इस में कोई ब्लेड है और न ही इस से कुछ कट लगाया जाता है। एम्स में यह चाकू 14 वर्षों के बाद आया है ..वहां पर पहले एक गामा नाईफ़ 1997 में खरीदा गया था। आखिर इस चाकू से होता क्या है….इस चाकू का इस्तेमाल मस्तिष्क के आप्रेशन करने के लिये किया जाता है लेकिन कोई कट नहीं, कोई चीरा नहीं …कैसे हो पाता है फिर यह आप्रेशन।

दरअसल इस गामा नाईफ से एक ही बार में, हाई-डोज़ विकिरणें (high-dose radiation) मस्तिष्क के बीमार भाग पर डाली जाती हैं ताकि उस का सफाया किया जा सके—यह बिल्कुल एक आटोमैटिक प्रक्रिया होती है और बस एक बटन दबाने से ही सारा काम हो जाता है। समय की बचत तो होती ही है और इस से बहुत से मरीज़ों का इलाज किया जा सकता है।

सर्जरी से संबंधित सभी कंप्लीकेशन से तो मरीज़ बच ही जाता है, साथ ही जल्द ही अस्पताल से उसे छुट्टी भी मिल जाती है और शीघ्र ही अपने काम पर भी लौट जाता है। एक मरीज़ के लिये एम्स में इस का खर्च 75000 हज़ार रूपये आता है .. यह उस खर्च का एक तिहाई है जो किसी मरीज़ को इस इलाज के लिये प्राइव्हेट अस्पताल में खर्च करना पड़ता है।
Source : AIIMS gets new gamma knife after 14 years

डैंटिस्ट के पास जाते हैं, फ़िज़िशियन के पास नहीं…

बात कुछ अजीब सी लगती है ना, मुझे भी पहले तो इस का शीर्षक ही अजीब सा लगा लेकिन है यह सच कि अमेरिका में लाखों बच्चे एवं व्यस्क लोग ऐसे हैं जो डैंटिस्ट के पास तो हर वर्ष जाते हैं लेकिन सामान्य सेहत के लिये किसी सामान्य चिकित्सक (general doctor) के पास नहीं जाते। इस तरह की एक से संबंधित एक स्टडी अमेरिकन जर्नल ऑफ पब्लिक हैल्थ में छपी है।

चिंता की बात यह है कि जो लोग सामान्य चिकित्सक के पास नहीं जाते ऐसा नहीं है कि उन के पास हैल्थ इंश्योरैंस नहीं होता…,सब कुछ है, जिन लोगों पर यह स्टडी की गई उन में से 93 प्रतिशत लोगों के पास हैल्थ-बीमा भी था, लेकिन नहीं, वे नहीं जाते सामान्य चिकित्सक के पास जब कि डैंटिस्ट के पास उन का नियमित जाना होता है।

इसी कारण से अब यह बात तूल पकड़ रही है कि डैंटिस्टों को ऐसे मरीज़ों की अन्य शारीरिक बीमारियों पर भी नज़र रखनी होगी …जैसे कि डायबीटीज़, हाई ब्लड-प्रेशर, हृदय-रोग आदि। वैसे तो एक क्वालीफाइड डैंटिस्ट पहले ही से इन सब के बारे में मरीज़ से पूछता भी है और ज़रूरत पड़ने पर फ़िज़िशियन को रैफर भी किया जाता है।

लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अगर अमेरिका जैसे देश में जहां हैल्थ-इंश्योरैंस लोगों के पास है, फिर भी जर्नव डाक्टर के पास वे नियमित नहीं जाते तो स्थिति भारत जैसे देश में कितनी भयावह हो सकती है जहां पर लोग डैंटिस्ट के पास भी नियमित तौर पर चैक-अप आदि के नहीं जाते। अभी भी दांत के इलाज का अधिकतर लोगों के लिए मतलब यही है कि जब दांत में दर्द हो तभी जाएंगे और उखाड़ लेंगे, जब तक चलता है चलता रहे। दो दिन पहले एक 55 वर्ष के करीब का व्यक्ति मेरे पास आया …एडवांस्ड पायरिया से ग्रस्त था…मैंने अभी इतना ही पूछा था कि आप ब्रुश करते हैं, तो तपाक से उसने उत्तर दिया –यह सब ब्रुश का ही तो किया धरा है—बस कुछ अरसे के लिये किया था, मसूड़े खराब कर हो गये। बड़ा मुश्किल है लोगों के व्याप्त, उन की मानसिकता में रच-बस चुकी भ्रांतियां को उखाड़ फैंकना —–शायद दांत उखाड़ने से भी ज़्यादा ज़रूरी।

हां, तो बात हो रही थी डैंटिस्ट की सामान्य सेहत में भागीदारी के बारे में — बिल्कुल दुरूस्त है कि अगर सही समय पर डैंटिस्ट किसी सामान्य बीमारी के लिये मरीज़ को सामान्य चिकित्सक को रैफ़र भी कर देता है, तो भी यह एक अच्छी सर्विस है।

लाखों मरीज़ों के मुंह में झांकने के बाद विश्वास और भी पक्का हो गया है कि मुंह के अंदर देख लेने मात्र से ही मरीज़ की सामान्य सेहत के बहुत से पहलुओं का अच्छा खासा अनुमान लग जाता है जिसे फिर विभिन्न टैस्टों द्वारा कंफर्म किया जा सकता है, फ़िज़िशियन को रैफ़र किया जा सकता है, मैंने केवल मरीज़ों की बात ध्यान से सुन कर, उन के चेहरे से, मुंह के अंदर झांकने से ही बहुत बार ऐसा कुछ ढूंढा है जिस का उसे पहले से पता नहीं था।

इसलिये मैं अमेरिकी स्टडी से पूर्णतयः सहमत हूं कि डैंटिस्ट ऐसे मरीज़ों की सेहत में बडा योगदान दे सकते हैं जो उन के पास तो नियमित तौर पर पहुंच जाते हैं लेकिन सामान्य चिकित्सक से कन्नी कतराते रहते हैं। इस बारे में मेरा स्वयं का अनुभव बहुत ही सकारात्मक है…. अकसर लोगों को डैंटिस्ट के पास इलाज के लिये कईं बार आना होता है, इसलिये भी वे उस की बात को सुनते हैं, उस पर गौर करते हैं…………और तो और, डैंटिस्ट तंबाकू की आदत छुड़वाने के लिये बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं…… मैंने अनगिनत लोगों को सभी तरह के तंबाकू के सेवन से दूर रहने के लिये प्रेरित किया है।

Source :

Dentists could gap in health care, study says (Medline Plus)

बच्चों में पैनेसिलिन की डोज़ का फिर से जायजा लेने की बात

बच्चों को किसी भी दवा की डोज़ (खुराक) उस की उम्र के अनुसार ही दी जाती है। अब अब यह चर्चा गर्म है कि आज के बच्चे 50 साल पहले वाले बच्चों से मोटे हैं, इसलिए आज के बच्चों में पैनेसिलिन जैसे कि अमोकीसिलिन जैसी एंटीबायोटिक दवाईयों की डोज़ का फिर से जायजा लिया जाना चाहिए।

उम्र के आधार पर बच्चों को दी जाने वाली दवाईयों की खुराक पचास वर्ष पहले तय की गई थी …लेकिन आज बच्चों के बढ़ते वज़न को देखते हुए इन पर फिर से नज़र डालने की बहुत ज़रूरत है।

Child Penicillin Doses Should be Reviewed, say experts —- बीबीसी साइट पर यह न्यूज़-स्टोरी देख कर मुझे यह भी पता चला कि वहां पर बच्चों में बैक्टीरिया से होने वाली इंफैक्शन (संक्रमण) के इलाज के लिये हर वर्ष लगभग 60 लाख प्रेसक्रिप्शन (नुस्खे) डाक्टरों द्वारा जो लिखे जाते हैं उन में से लगभग 45 लाख नुस्खों में मुंह के रास्ते से दी जाने वाली पैनेसिलिन दवाई जैसे कि अमोक्सीसिलिन ही होती है।

डोज़ वाली बात में तो दम है ही कि इस का फिर से जायज़ा लेना ज़रूरी तो है ही …..वरना ज़्यादा उग्र इंफैक्शन में अगर बच्चों को पूरी डोज़ न दी जाए तो उन के ठीक होने में तो यह रूकावट है ही …साथ ही साथ ऐंटीबॉयोटिक ड्रग रिसिस्टैंस (जब बैक्टीरिया पर कोई ऐंटीबायोटिक दवाई असर करना बंद कर दे) की सिरदर्दी तो है ही।

लेकिन सुखद बात मुझे यह लगी कि वहां पर डाक्टर अभी भी अमोक्सीसिलिन पर इतना भरोसा करते हैं…. बहुत ही अच्छा लगा यह देख कर ….यहां सब से बड़ी सिरदर्दी है कि हायर ऐंटीबॉयोटिक (जो नये नये महंगे ऐंटीबॉयोटिक आ रहे हैं) भी धड़ाधड़ नीम-हकीमों द्वारा भी लिखे जाते हैं, कैमिस्टों के द्वारा बिना किसी डाक्टर के पर्चे के धड़ाधड़ बेचे जा रहे हैं, और सेहत खराब हो रही है बच्चों की। कुछ संक्रमण तो वैसे ही बिना ऐंटीबॉयोटिक दवाईयों के ही ठीक होने वाले होते हैं …लेकिन अगर संयोग कुछ ऐसा हो गया कि दो-एक दिन कोई हायर ऐंटीबॉयोटिक लिया गया था, तो समझिए कि उस ने तो कंज्यूमर को हमेशा के लिए खरीद लिया। यह आज भारत जैसे देशों में एक बहुत बड़ा मुद्दा है।

जितना मिस-यूज़ आज ऐंटीबॉयोटिक का हो रहा है, शायद ही किसी दूसरी दवाई का हो रहा होगा— बिना किसी क्वालीफाइड चिकित्सक की सलाह के ऐंटीबॉयोटिक लेना, एक दो दिन लेकर बंद कर देना, सही मात्रा में डोज़ न लेना, कुछ चालू घटिया किस्म की दवाईयां….. एक दिन एक, अगले दिन कोई और ऐंटीबॉयोटिक लेना, वॉयरल इंफैक्शन के लिये भी ऐंटीबॉयोटिक लेते रहना ……ये सब मुद्दे हैं जिन पर पिछले बीस वर्षों से चर्चा होती देख रहा हूं……. बड़े उत्साह के साथ अस्पतालों के द्वारा ऐंटीबॉयोटिक पालसी तैयार भी की जाती हैं लेकिन फिर…….बस टांय—टांय….फिस्स!!

मुझे सब से ज़्यादा डर तब लगता है जब मुझे यह पता चलता है कि लोग अपने आप ही बच्चों को छोटी-मोटी खांसी जुकाम के लिए कोई बहुत ही महंगा सा बाज़ार में हाल ही आया ऐंटीबॉयोटिक पिला रहे होते हैं, मैं यह देख कर कांप जाता हूं………….कहीं नये नये हायर-ऐंटीबॉयोटिक खिलाना, पिलाना आज का एक आधुनिक स्टेट्स सिंबल ही न बन जाए।

आगे की पढ़ाई के कुछ संकेत —

कहीं आप की सेहत न बिगाड़ दें ऐंटीबॉयोटिक्स

बच्चों में खांसी –जब कुछ न करना ही होता है गोल्डन

नई दवाईयों से इंप्रैस होने का लफड़ा

 

पुराने पेसमेकर बचा रहे हैं भारतीयों की जानें

आज मेरी खबर पर नज़र टिकी रह गई जिस में बताया गया था कि अमेरिका में रहने वाले कुछ लोगों की मृत्यु के बाद उन के शरीर में लगे पेस-मेकर को उतार पर मुंबई के 53 मरीज़ों में लगा दिया गया।

   नहीं, नहीं, यह कोई लफड़ेबाजी नहीं…अमेरिकी लोगों ने तो मानवता के नाते इस तरह का पेसमेकर दान दिया…और फिर इन पेसमेकरों को जिन 53 मरीज़ों पर लगाया गया, उन में से 51 की हालत में बहुत अच्छा सुधार हो गया।

पता चला है कि इन में कुछ की तो हालत इतनी खराब था, हृदय के रिधम (heart rhytm) में इतनी गड़बड़ी थी, पूर्ण हार्ट-ब्लॉक था जैसी तकलीफ़ें थीं कि मरीज़ पेसमेकरों के लगने से पहले अपने व्यक्तिगत एवं घरेलू काम करते हुए ही थक जाया करते थे….लेकिन पेसमेकर लगने के बाद वे अपने काम पर लौट चुके हैं, और सामान्य जीवन जी रहे हैं।

इन पुराने पेसमेकरों को नये मरीज़ों पर लगाने से पहले अच्छे से स्टैरीलाईज़ कर लिया जाता है, ऐसा भी मैडलाइन प्लस की इस स्टोरी में लिखा है…Donated Pacemakers From U.S Safely Reused in India : Study. और यह भी लिखा गया है कि इन्हें लगाने के दो वर्ष बाद तक न तो किसी तरह की कोई विशेष कंप्लीकेशन ही हुई और ना ही इन की वजह से कोई इंफैक्शऩ ही हुई।

बात खोपड़ी में यह आई कि अगर यह जुगाड़ इतना बढ़िया है तो फिर वहां पर ही इसे दूसरे अमेरिकी मरीज़ों को ही दान क्यों नहीं दे दिया जाता….. इस का जवाब भी साथ ही लिखा हुआ है कि अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन इस तरह के उपकरण को  एक से उतार कर दूसरे पर लगाने की अनुमति नहीं देती …. और यहां भारत में तो कोई ऐसी रोक टोक है नहीं…… इन मुल्कों के उतरे हुए स्वैटर, कोट,पतलूनें भारतवासी हंसी हंसी (यह बतला बतला कर पहन रहे हैं कि टोरांटों वाली मौसी ने भेजी हैं)..पहने जा रहे हैं…. लेकिन इस संबंध में कोई मज़ाक नहीं —क्या करे जिसे ऐसी ज़रूरत है, तन ढांपने के लिये कोई जो भी पहन रहा है, ठीक है….सब ठीक ही ठीक है। अब वहां के लोगों की मौत के बाद उन के शरीर से उतारे गये पेसमेकर भी हिंदोस्तानियों के दिल की धड़कन कंट्रोल किया करेंगे। भारत में एक पेसमेकर की कीमत एक से तीन लाख रूपये  इस आर्टिकल में बताई गई है।

वैसे मुझे तो यह स्टोरी पढ़ कर यह भी लगा कि शायद यह भी एक एक्सपैरीमैंट ही भारत में हुआ होगा…क्योंकि वहां की सरकार इस तरह के काम की वहां करने की इज़ाजत नहीं देती…..मुझे यह क्यों लगता है कि एक बार स्टडी पूरी होने पर जब वैज्ञानिक पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएंगे कि इस तरह से पेसमेकरों का रीयूज़ बिल्कुल सेफ़ है, कोई इंफैक्शन का खतरा नहीं और इस की कार्य-प्रणाली भी भली-भांति काम करती रहती है, तो फिर शायद इन का रियूज़ वहीं पर उन के अपने मरीज़ों पर ही शुरू हो जाएगा…………वहां भी रिशेसन के प्रभाव के कारण लोगों की सेहत से जुड़ी ज़रूरतों को पूरा करना दिन प्रतिदिन मुश्किल होता जा रहा है।

जो भी हो, पूरे 53 मरीज़ों का भला हो गया…..चलने फिरने लगे, नौकरी पर लौट आए….परमात्मा इन की दीर्घायु करे..लेकिन मेरा ध्यान बार बार पता नहीं क्यों गिनी-पिग्ज़ (guinea-pigs) की तरफ़ जा रहा है।

बात सोचने वाली यह है कि इस तरह के ह्यूमन-ट्रायल (क्या इसे हम human trial कह सकते हैं, मुझे पता नहीं! )….से पहले भारत में डाक्टरों ने किस बॉडी/अथारिटि (medical authority) की अनुमति ली होगी या फिर यूं ही…..। इस मुद्दे के बारे में मेरे ज़हन में प्रश्न तो बहुत से उठ रहे हैं….लेकिन सोच रहा हूं अमेरिकी जर्नल ऑफ कार्डियोलॉजी का अग्रिम अंक पहले देख लूं जिस में इस की पूरी स्टडी छप रही है। बाकी बातें फिर कभी करेंगे। एक बात और भी है कि आने वाले दिनों में देखते है विशेषज्ञ इस तरह के इलाज के बारे में यहां भारतीय मीडिया में क्या कहते हैं, मेरे आंकलन की तुलना में  उन की बातें निःसंदेह बहुत ज़्यादा विश्वसनीय होंगी।

भारत में विषैली देसी दारू से इतने लोग क्यों मरते हैं?

अभी हाल ही में हुई पश्चिमी बंगाल के देसी दारू कांड ने देश को हिला के रख दिया….इतनी सारी मौतें एक साथ, बेहद खौफ़नाक एवं निंदनीय घटना।
कईं बार आप के भी मन में सवाल तो उठता होगा कि आखिर देसी दारू या यूं कहें कि विषैली दारू पीने से भारत मे आए दिन इतने लोग मरते क्यों हैं। लेकिन हम इस के बारे में इतना ही जानते हैं कि इस तरह की दारू में मिथाईल एल्कोहल (methyl alcohol) होता है जिस की वजह से इसे पीने वाले मर जाते हैं। लेकिन ज़्यादातर लोग यह भी नहीं जानते कि  इस में एक दूसरा कैमिकल भी होता है जिसे अमोनियम नाईट्रेट कहते हैं जो मिथाईल एल्कोहल की तरह ही विषैला होता है।

लेकिन आज बीबीसी की साइट पर छपी एक न्यूज़-रिपोर्ट देखने से मैं इस समस्या से जुड़े कुछ नये पहलुओं से रू-ब-रू हो पाया जिसे मैं आप सब से शेयर करना चाहता हूं।

इस रिपोर्ट में इस बात पर भी चर्चा की गई है कि पश्चिमी बंगाल जैसे राज्यों में ही इस तरह के ज़्यादातर हादसे क्यों दिखते हैं। सारा माजरा यह बात जानकर समझ में आ गया …

“The state controls the alcohol business in India, almost completely. In many states, the alcohol is produced by state-appointed groups of people who are friends of the political parties that rule various states. West Bengal is one of the few states where this doesn’t happen but in Delhi, for example, all alcohol is sold in government shops,” says Aniruddha Mukherjee.C

Courtesy: BBC news

“भारत में शराब के धंधे पर लगभग पूरा सरकारी नियंत्रण है। बहुत से राज्यों में, इन राज्यों द्वारा चुने गये लोगों द्वारा ही शराब पैदा की जाती है जिनके इन राज्यों में शासन करने वाली राजनैतिक पार्टीयों से दोस्ताना ताल्लुकात होते हैं। पश्चिमी बंगाल एक ऐसा राज्य है जिस में यह सब नहीं होता लेकिन अगर दिल्ली की ही उदाहरण लें तो वहां पर सारी शराब सरकारी दुकानों पर ही बिकती है” – अनिरूद्द मुकर्जी

भारत मे तैयार होने वाली अंगेज़ी शराब (Indian made Foreign Liquor – IMFL) जो कानूनी तौर पर चीनी उद्योग के बाई-प्रोडक्ट मोलैसिस (bye-product molasses) से पैदा की जाती है, इस पर बहुत ज़्यादा ड्यूटी लगने की वजह से यह अस्सी प्रतिशत देशवासियों की पहुंच से बाहर होती है … 700मिलीलिटर की एक बाटली 400 रूपये में बिकती है जिसे आम आदमी खरीदने पाने में असमर्थ होता है।

इसलिये आम आदमी बेचारा रूख करता है सस्ते विकल्पों का …. जिसे सस्ती देसी दारू कहते हैं उसे जिसे गन्ने से तैयार किया जाता है। इसे दारू का एक पाउच या फिर एक गिलास 25-30 रूपये में मिल जाता है जिसे बिना किसी सोशल-ड्रिंकिंग के अंकुश के कहीं भी चढ़ा लिया जाता है, और इस तरह की नकली दारू का धंधा भी अंदर खाते जगह जगह पनपता रहता है।

लेकिन इस तरह की देसी दारू तैयार करने समय तापमान पर नियंत्रण अति आवश्यक है क्योंकि तापमान बढ़ जाने पर मिथाईल अल्कोहल (methyl alcohol) बन जाता है….और वैसे भी इसे तैयार करने वाले लोग इस में तरह तरह के कैमीकल (रासायन) एवं हर्ब (जड़ी-बूटियां) डालने की भूल कर के इसे किस कैमीकल-रिएक्शन से ज़हरीला बना दें, यह पता नहीं चल पाता।

बात नोट करने वाली यह है कि इस देसी दारू को कोई गल्ती से ज़हरीली नहीं बनाता क्योंकि इस से इन का धंधा चौपट हो जाता है –अधिकांश केसों में यह भूल का ही परिणाम होता है (लेकिन भूल भी ऐसी कि जिस से सैंकड़ों जानें चली जाती हैं) ….या फिर कोई विरोधी खेमे वाले ही इस में कुछ मिला कर अपना हिसाब किताब चुकता कर लेते हैं।

ज़रा यह तो देखें कि इस तरह की विषैली दारू में मौजूद रासायनों का शरीर पर क्या प्रभाव होता है….
ज़्यादा मात्रा में इस्तेमाल कर लेने से, अमोनियम नाईट्रेट से सिरदर्द, सिर चकराना, पेट में दर्द, उल्टीयां, हृदय की धड़कन की अनियमितताएं, दौरे पड़ सकते हैं, मरीज़ कोलैप्स हो कर मर सकता है। मिथाईल अल्कोहल अर्थात् मिथैनोल जिसे आम तौर पर एक एंटीफ्रीज़ की तरह इस्तेमाल किया जाता है, इसे देसी दारू का अल्कोहल कंटैंट बढ़ाने के लिये डाल दिया जाता है। मिथैनोल हमारे शरीर के लिये अत्यंत घातक है —- केवल 10 मिली लिटर (अर्थात् केवल दो चम्मच!!) लेने से कोई अंधा हो सकता है और अगर यह मात्रा 30 मिलीलिटर तक जा पहुंचे तो यह जानलेवा हो सकती है।

बेशक शराब ज़हर ही तो है और इस के ज़्यादा ले लेने से जान तो जा ही सकती है लेकिन अवैध तरीके से तैयार की गई दारू के साथ लफड़ा यह है कि इसे पीने वाले को यह भी पता नहीं होता कि आखिर इसे तैयार करते समय इस में क्या क्या डाला गया है, और इस में मौज़ूद अल्कोहल की मात्रा है क्या!!

ऐसा कहा गया है कि यू के एक हफ़्ते में लगभग 500 लोग अल्कोहल से होने वाली प्वाईज़निंग की वजह से अस्पतालों की एमरजैंसी में भर्ती किये जाते हैं ….. नहीं, नहीं, ये वैसे केस नहीं है जैसे पश्चिमी बंगाल में दुःखद घटना में मरने वाले थे ………….मेरे विचार में यूके के 500 लोगों की तो यह वह गिनती है जो अपने यहां हर गली-मोहल्ले-नुक्कड़ पर रोज़ाना दिखते हैं जिन् पट्ठों को कुछ ही समय में आवारा पशु ही चूम-चाट कर एकदम दुरूस्त कर देते हैं।

Further Reading

Who, what, why….why Indians are dying of Alcohol Poisoning?

थोड़ी थोड़ी पिया करो

लोकसभा चैनल पर आने वाला हैल्दी-शो

मुझे अकसर लगे रहो मुन्नाभाई का वह सुंदर सा  डॉयलाग याद आता रहता है…..एक तो आठ हैं चैनल, फिर भी दिल बहलते क्यों नहीं!! बात बिल्कुल ऐसी ही है, मेरे साथ तो ऐसा ही है, मुझे आप का पता नहीं। लेकिन एक बात और तय है कि मैं अकसर सरकारी चैनलों पर लंबे समय तक खुशी खुशी अटका रहता हूं।

कालेज के दिनों की अलग बात थी…जब केवल जालंधर दूरदर्शन और पाकिस्तानी टीवी के बीच च्वाईस करनी होती थी, लेकिन वह कोई मुश्किल काम न था, लगभग साढ़े आठ बजे रात तक जालंधर दूरदर्शन और फिर अगल दो-अढ़ाई घंटे हम तक पाकिस्तानी सीरियल देखा करते थे ….आज तक वैसे उम्दा सीरियल नहीं दिखे। जालंधर दूरदर्शन अथवा राष्ट्रीय कार्यक्रम देखने की समय सीमा केवल हिंदी फीचर फिल्म या फिर चित्रहार वाले दिनों में आगे बढ़ जाती थी। दूरदर्शन देखने की शुरूआत अकसर रात के खाने की इंतज़ार में शाम छः बजे से ही खेती-बाड़ी प्रोग्राम देखने से या फिर मंड़ियो के भाव सुनने से ही हो जाया करती थी।

मैं क्यों यह स्टोरी लेकर बैठ गया ? —केवल यह बताने के लिये कि अपना सरकारी चैनलों से इश्क बहुत पुराना है। मैंने नोटिस किया है कि जब भी रिमोट हाथ में होता है तो मैं अकसर किसी न किसी सरकारी चैनल पर लंबे समय तक सहर्ष अटका रहता हूं। यह किसी मजबूरी-वश नहीं होता, लेकिन इन के बहुत से कार्यक्रमों की रैलेवेंस ही इतनी बढ़ती होती है कि देखते ही लगता है कि यह अपना ही कार्यक्रम है। इन में सब से बढ़िया बात यही होती है कि इन में व्यवसायीकरण नहीं झलकता —या फिर यह कह लूं कि व्यवसायीकरण की बास नहीं आती, वरना दूसरे कमर्शियल चैनलों पर तो छोटी-सी ब्रेकें देख देख कर सिर चकराने-सा लगता है।

जो गीत, जो फ़िल्में इन सरकारी चैनलों पर दिखती हैं, वे किसी वर्ग को ध्यान में रख कर प्रसारित नहीं की जातीं लेकिन वे सारे देश की पसंद होती हैं। कल रात को मैं लोकसभा टीवी पर देव आनंद की काला-पानी देख रहा था, अब ऐसी फिल्मों का अन्य कमर्शियल चैनलों पर दिखना मुश्किल सा हो गया है, है कि नहीं?
ऐसे ही दूरदर्शन पर एक प्रोग्राम देखा करता था ब्रेक-फास्ट शो के नाम से —उस की भी श्रेष्टता ब्यां कर पाना मुश्किल है। अपने अपने फील्ड से नामचीन हस्तियों से आप को रू-ब-रू करवाया जाता है, सब बातें लगता हैं अपनी ही हो रही है, अपने समाज की ही हो रही हैं, अपने आसपास के लोगों की ही बातें हैं। एक अन्य प्रोग्राम मुझे अकसर साहित्यिक विषयों पर बहुत भाता है जिस में ख्यातिप्राप्त लेखकों को अपने जीवन के अनुभव बांटते देख कर बहुत प्रेरणा मिलती है।

भूमिका कुछ ज़्यादा ही लंबी हो गई दिखती है …हां, तो बात तो मैं करना चाह रहा था लोक सभा चैनल पर दिखाए जाने वाले हैल्दी-शो की जो हर शनिवार शाम को 6 से 7 बजे तक दिखाया जाता है। इतना बढ़िया कार्यक्रम कि इसे एक बार लगा लें तो फिर आप अगले एक घंटे तक किसी दूसरे चैनल पर जा ही नहीं पाएंगे।

पिछले दो-तीन हफ्ते से मैं इसे नियमित देख रहा हूं ….. विभिन्न विषयों से जुडे अलग अलग विशेषज्ञों को ये स्टूडिय़ो में आमंत्रित करते हैं ..लाइव प्रोग्राम है…..दो-तीन हफ्ते पहले सड़क पर होने वाली सड़क दुर्घटनाओं के बारे में बातें हो रही थीं….. किस तरह से इस कार्यक्रम के अनुभवी विशेषज्ञ लोगों का बिहेवियर बदलने के लिये प्रेरित करते हैं, यह देखते ही बनता है, इस का सब से बड़ा कारण मुझे यही लगता है कि ये सब के सब अपने दिल से बोल रहे होते हैं और जब दिल कोई भी दिल से बोलता है तो फिर समझ लीजिए कि भगवान ही बोल रहा होता है। क्योंकि उस में इन की कोई कमर्शियल मजबूरी नहीं होती कि फलां फलां टैस्ट या दवाई को ही इन विशेषज्ञों ने प्रोमोट करना होता है, बिल्कुल ऐसी कोई बात मैंने कभी नोटिस नहीं की सरकारी चैनलों के सेहत प्रोग्रामों में।

हां, तो जब से मैं यह लोक सभा  टीवी पर हैल्दी-शो देख रहा हूं –मुझे एक बात बहुत बुरी तरह से कचोटती है कि यह सारे का सारा कार्यक्रम इंगलिश में होता है। मैं किसी भी बात के लिये इन की आलोचना नहीं कर रहा हूं लेकिन सकारात्मत आलोचना की जाए तो सब के लिये ही बेहतर होती है —ठीक है कि नहीं?  हां, तो मैंने इन्हें लिखा कि आप का इतना उम्दा प्रोग्राम है ..प्रिज़ेन्टेशन इतना बढ़िया, विशेषज्ञ इतने अनुभवी, ज़मीन से जुड़ी बातें करते हैं, कोई हाई-फाई बाते करके डराते नहीं…..सब कुछ अच्छा ही अचछा लेकिन फिर भी मैंने लिखा कि इस तरह के कार्यक्रम का फायदा देश के करोड़ों हिंदी-भाषा तक न पहुंचे तो कुछ अजीब सा लगता है।

जवाब तो मुझे कोई नहीं आया लेकिन अगली बार जब एच आई व्ही पर प्रोग्राम देखा तो उस में हिंदी भाषा में बातें देख-सुन पर आस बंधी, अच्छा लगा कि जनमानस तक इतनी बढ़िया बढ़िया बातें पहुंच पाएंगी। कल फिर एक कार्यक्रम था — हार्ट फेल्यर के ऊपर। लेकिन अधिकतर प्रोग्राम केवल इंगलिश में ही था, केवल एक दर्शक ने प्रश्न हिंदी में पूछा जिसे एक विशेषज्ञ ने बेहद सुदंर तरीके से हैंडल किया। प्रश्न बता देता हूं… लाइव प्रोग्राम था ..दर्शक ने पूछा कि भारत गांवों में बसता है, और एक औसत ग्रामीण आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं से दूर रहते हुए किस तरह से अपने दिल के बारे में सचेत रह सकता है। जवाब देने वाले विशेषज्ञ ने बहुत ही सटीक जवाब दिया कि सीने में भारीपन या दर्द को पेट की तकलीफ़ से न जोड़ कर देख जाए, ऐसे काम या एक्सरसाईज़ जो आप पहले सहज ही कर लिया करते थे, अगर इन्हें करने में सांस फूलने लगे या फिर पांवों में सूजन दिखने लगे तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श करें।

लेकिन मुझे चुभन इस बात की है कि ऐसे प्रोग्रामों में जो इतने इतने अनुभवी चिकित्सक चैनल वाले ढूंढ कर ले आते हैं, उन का फायदा देश के हर ऐसे नागरिक को मिलना चाहिए जो हिंदी समझ लेता है —चाहें वह अंगूठाछाप भी हो इस से क्या फ़र्क पड़ता है। ये विशेषज्ञ हमारी भ्रांतियों को दूर कर रहे होते हैं, हमारे डर को छू-मंतर कर रहे होते हैं, हमें उपचार के विभिन्न विकल्पों के बारे में समझा रहे होते हैं…..लेकिन इंगलिश में ….ठीक है, कुछ चिकित्सक हिंदी में अपनी बात रखने में इतने सहज नहीं होते तो भी क्या बात है, आज का दर्शक हर तरह की हिंदी को समझ लेता है जिस के लिये हमें हिदीं-मसाला फिल्मों का शुक्रिया अदा करना चाहिए जिन की कृपा से हम बम्बईया चालू हिंदी के आदि हो चुके हैं। वैसे तो अब गृह-मंत्रालय के राजभाषा विभाग ने भी आदेश जारी कर दिये हैं कि सरकारी काम काज में साहित्यिक हिंदी की जगह बोलचाल की भाषा को बढ़ावा दें।

हां, तो मैं सरकारी चैनलों की लोकप्रियता की बात कर रहा था… कल बाद दोपहल भी जब मैंने रिमोट पकड़ा तो दूरदर्शन के नेशनल चैनल पर एक बहुत बढ़िया कार्यक्रम चल रहा था। जिस में चित्रा मुदगिल जी, अशोक चक्रधर जी, एक डाक्टर और गोहर जी बैठे हुए थे ……प्रोग्राम का नाम था, मेरी बात .…कुछ यौन-संबंधों में उन्मुकता के बारे में बातें चल रही थीं……कालजीएट लड़के-लड़कियां थे, कुछ मां-बाप थे, अध्यापक थे और विशेषज्ञ तो थे ही….शीर्षक तो मुझे कार्यक्रम का पता नहीं चला क्योंकि मैंने बीच मे ही देखना शुरू किया था। लेकिन कार्यक्रम अति सुंदर था…. जब लिव-इन रिलेशनशिप की बात हो रही थी ……अशोक चक्रधर की बात का ध्यान आ रहा है….. वेस्ट का बेस्ट लो वेस्ट मत उठाओ—-(Take best from the west, not their waste!) …. चित्रा जी ने सुंदर शब्दों में कहा कि आज की युवा पीढ़ी शायद आसमान तो पा लेती है लेकिन उस के पांवों के तले से ज़मीन छूट जाती है…..(ऐसे ही कुछ भाव आप को नीचे एम्बैड किये गये यू-ट्यूब वीडियो में भी मिलेंगे)…..फिर एक बात, सब के सब विशेषज्ञ अपनी बात इतनी सहजता, ईमानदारी, प्रेम-वातसल्य, सौह्र्दर्यता से रखने वाले कि कैसे कोई चैनल बदले!! मैं चित्रा जी की इस बात से बहुत प्रभावित हुआ कि जब किसी चीज़ को पश्चिम द्वारा नकार दिया जाता है तो वह हमारे पल्ले पड़ जाती है — जब कोई ड्रग वहां पर बैन हो जाती है तो यहां बिकने लगती है।

इसी तरह के ही कार्यक्रम में एक बार डा त्रेहन (हृदय रोग विशेषज्ञ) को भी सुना था, उन्होंने भी कहा था कि अपने मन को खोल लिया करो…..उन्होंने यह भी कहा ….दिल खोल लै यारां नाल, नहीं तां डाक्टर खोलनगे औज़ारां नाल। मैंने भी तो वही किया, आप के साथ दिल खोल लिया……हल्का लग रहा है। लेकिन एक निर्णय कर रहा हूं कि लोकसभा चैनल पर जो भी बातें हैल्दी-शो में बड़े बड़े विशेषज्ञों द्वारा इंगलिश में कही जाएंगी उन बातों को आप तक अपने हिंदी में लिखे लेखों द्वारा  पहुंचाता रहा करूंगा।

वैसे मैंने यह डोमेन एवं इस की होस्टिंग अपने इंगलिश ब्लॉग के लिये खरीदी थी लेकिन पता नहीं क्यों इंगलिश में लिखने की इच्छा ही नहीं होती, यही लगता है कि मैं किस से बात कर रहा हूं………..वैसे भी इंगलिश में तो पहले ही से सब तक के कंटैंट की भरमार है, तो फिर हम सब का सामूहिक कर्तव्य बनता है कि हम हिंदी को सहेजें, उसे आगे लाएं, उस से प्यार करें, उसे बढ़ावा दें………..और यह इश्क इस स्तर तक परवान चढ़ जाए कि देश में केवल हिंदी समझने वाले को कभी भी यह न लगे कि केवल हिंदी जानने की वजह से वह पीछे छूट गया, या फिर उस का कोई नुकसान हो गया। वो अलग बात है कि इंगलिश पर भी अच्छी पकड़ होनी बहुत लाज़मी है, बढ़िया नौकरियां मिल पाती है, लेकिन यहां पर हम कहां नौकरियां पाने की बात कर रहे हैं, हम तो एक सीधे सादे देहाती हिंदोस्तानी तक अपनी दिल की गहराईयों से निकली अपनी बातें पहुंचाने की बात ही तो कर रहे हैं, आप का क्या ख्याल है?