पी जी आई की हरियाली ने ही कर दिया उद्वेलित ….

कुछ दिन पहले मैं पी जी आई चंडीगढ़ गया हुआ था, बड़ा अच्छा सिस्टम लगा हर काम का वहां पर। मुझे याद है उस दिन बाद दोपहर को मैं जैसे ही ग्राउंड फ्लोर पर आया तो देखा सामने बहुत ही हरियाली दिखी …मुझे लगा जैसे कि सैंकड़ों पेड़ होंगे …अचानक ही बहुत ही सुखद सी ठंडक महसूस हुई।
मुझे थोड़ी दूर जाकर पता चला कि उस जगह पर कोई सैंकड़ों पेड़-पौधे नहीं थे, बल्कि कुल छः घने पेड़ थे जिन की वजह से यह घनी सुखद छाया रूपी वरदान मिल रहा था। लेकिन जैसे ही मैं थोड़ा आगे गया मेरा सारा उत्साह, मेरी खुशी गायब हो गई। उस का कारण यह था कि इतने सुंदर एरिया को पार्किंग के लिये इस्तेमाल किया जा रहा था। सैंकड़ों मोटर-कारें देख कर मन उद्वेलित इस लिये हुआ कि पी जी आई जगह में जिस जगह को मरीज़ों को, उन के परिवारजनों को सुखद अनुभूति उपलब्ध करवानी चाहिए….उसे इन लोहों के शरीरों (कारों) के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह देख कर बहुत ही बुरा लगा… हरेक का नज़रिया अपना है, मुझे बुरा इसलिए लगा क्योंकि मैंने एमरजैंसी वार्ड के बाहर देखा कि कुछ लोग चादरें, कंबल डाल कर लेटे हुये थे। हम स्वयं अनुमान लगा सकते हैं कि अगर किसी का कोई रोगी अंदर दाखिल है और वह अगर इस तरह के सुखद वातावरण में चंद मिनट सुस्ता लेगा तो उसे कितनी स्फूर्ति मिलेगी। और अगर मरीज़ को भी थोड़ी इंतज़ार करनी हो तो उसे इतनी हरियाली वाला ठंडक भरा वातावरण मिलेगा तो शायद उस का मन इतना खुश हो जाए कि …….।
मुझे पता है मेरे यहां लिखने से ना ही तो कार पार्किंग इतनी सुंदर जगह से हटने वाली है, लेकिन अपनी बात रखने की स्वतंत्रता तो हरेक नागरिक को है , बस इसीलिए यह लिख दिया।
दुःख यह होता है कि हमारे पास संसाधनों की कमी नहीं है, लेकिन शायद विभिन्न कारणों के कारण हम लोग अपनी संवेदनशीलता को उतना प्रखर कर नहीं पाए जितनी कि चिकित्सा क्षेत्र में जुड़े होने के कारण हरेक चिकित्सा-कर्मी से अपेक्षा की जाती है।
मेरा एक मित्र है किसी सरकारी अस्पताल में सर्विस करता है …बता रहा था कि उस ने जहां जहां भी सर्विस की वहां पर अस्पताल के बगीचे के रखरखाव पर भी वह विशेष ध्यान दिया करता था। और उस ने कईं बार प्रशासन को कहा कि गार्डन में कुछ बैंच लगवा दिये जाएं ……लेकिन हर बार वही घिसा-पिटा जवाब पा कर वह खिसिया जाता था … नहीं, नहीं, यह कैसे हो सकता है, लोग ऐसे भीड़ करने लगते हैं, बाहर से नशेड़ी आने लगते हैं।
बता रहा था कि वह इन घिसे-पिटे तर्कों से बिल्कुल सहमत नहीं है, लेकिन क्या करे, अब उसने किसी को इस बारे में कहना ही बंद कर दिया है। अब अगर बाहर के लोग आकर नशे करेंगे तो यह किस का फेल्योर है, प्रशासन का और किस का !! लेकिन इस के लिये ..इसे “बहाना” बना कर एक आम आदमी का सुकून क्यों छीन लिया जाए …क्या हो जाएगा अगर मरीज या उस का परिवार वाला कोई दो घड़ी सम्मान के साथ सुस्ता लेगा…इत्मीनान से दो निवाले खा लेगा, दो बातें कर लेगा। लेकिन नहीं, हर जगह बस वही … I am right ….you don’t know anything वाला लफड़ा।
मुझे याद है जब मैं नया नया बंबई गया …पहली पोस्टिंग थी मुंबई सैंट्रल के जगजीवन राम अस्पताल में ….आस पास इतने घने पेड़ पौधे कि बिल्कुल पास आने पर ही पता चलता था कि यह अस्पताल है। मुझे याद है वहां मैंने किसी सीनियर डाक्टर से सुना था कि रेल के स्वास्थ्य महानिदेशक हुआ करते थे जो अकसर कहा करते थे कि अस्पताल और इस के आसपास तो इतनी वनस्पति (पेड़, पौधे, फूल, बूटे आदि) होने चाहिए कि मरीज़ का मन इन्हें देखते ही झूम उठे। अच्छा लगा था यह सब सुन कर।
मैं भी आज कौन सा टापिक लेकर बैठ गया ………शायद पढ़ने वाले को लगे कि यार यह भी कोई लिखने की बात है, लेकिन है …. हम लोग अकसर यह भूल कर बैठते हैं कि अगर डाक्टर बडे पढ़े-लिखे हैं, आप्रेशन थियेटर अत्यंत आधुनिक हैं, साफ सफाई है, चमकीले फर्श हैं, तो सब ठीक है……..लेकिन नहीं , यही तो बात है कि हम मानवीय दृष्टिकोण को — मरीज एवं उस के परिवारजन की चप्पलों में जब तक अपने या अपने परिवारजनों को नहीं डालने की कल्पना करेंगे, हम ऐसे ही घने, छायादार जगहों पर कारें ही खड़ी करेंगे, बागीचों में बैंच नहीं लगने देंगे, घास इतनी बड़ी होने देंगे कि बंदा उस में किसी जानवर के डर से बैठे नहीं, हम अस्पताल के बागीचों को हमेशा ताला जड़ कर रखेंगे, अस्पतालों के मालियों का अस्पताल के बगीचों में ही काम करना कहीं ज़्यादा ज़रूरी है बजाए कि ….( लिखते लिखते रूक गया …समझने वाले समझ गये होंगे)।
कभी कभी कोई सुखद अनुभव हमेशा याद रह जाता है … एक बार जगजीवन राम अस्पताल के एक मैडीकल डायरैक्टर अस्पताल के कंपाउंड का राउंड कर रहे थे …उन्होंने देखा कि कुछ महिलाएं (मरीजों की रिश्तेदार) बाहर खुले में ईंटों का चुल्हा बना कर कुछ दाल-रोटी तैयार कर रही हैं ….उन्होंने तुरंत कंपाउंड में इन रिश्तेदारों के प्रयोग के लिये एक कमरे की व्यवस्था कर दी … जिसे वे किचन की तरह इस्तेमाल कर सकती थीं। मेरे लिये यह देखना बहुत सुखद अनुभव था, अब यह बता कर क्या करूंगा कि वह महान बंदा कौन था !!

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मच्छर मार अभियान की चंद बातें …

हां, तो कल की दोपहर मैंने मच्छर चालीसा लिखने में गर्क कर दी, ….लेकिन इस से क्या मच्छर थोड़ा ही गायब होने वाले थे…रात हुई ..मेरा बेटा मेरे साथ लेटा हुआ था, वही मच्छरों से परेशान….कह रहा था, पापा इतने मच्छर, ओ हो ,वो हो…..मैंने भी आखिर कह ही दिया कि यार, मच्छर चालीसा पढ़ कर सोया कर। बस, मेरे इन कहने ने तो जैसे आग में घी डालने का काम कर दिया ….जैसे तैसे मुझे कोसता रहा और पता नहीं कब हम सो गये।

लेकिन सोने से पहले कुछ ध्यान आ रहे थे कि यार, हनुमान चालीसा तो अभी अधूरी सी दिख रही है क्योंकि कुछ बढ़िया बढ़िया यादें तो उस में छूट ही गईं। कोई बात नहीं, अभी शेयर कर लेते हैं, विश्व मलेरिया दिवस ही गुज़रा है, मच्छर थोड़े ही कहीं भाग गये हैं।

 

 

हां, तो जब मैं अपनी जीवन में मच्छरों की यादों को लिख रहा था तो वह गुड्नाईट तो मेरे मन से निकल ही गई जिसे बिजली के प्लग से लगाया जाता था, एक गोल सी तश्तरी सी हुआ करती थी, जिस में एक टीकिया रख दी जाती थी …और इस के धीरे धीरे जलने से मच्छर दूर से रहते थे … और अगले दिन फिर हम लोग इस टिकिया तो उल्टा कर के लगा देते थे … और रात में अगर मच्छर परेशान करते थे तो सुबह का पहला टॉपिक ही यही हुआ करता था कि टिकिया को उल्टा रख दिया होगा, कैसे आयेगा इफैक्ट।

 

फ्लिट पंप महाराज

इस से भी पहले का दौर …यूं कह लें कि सत्तर-अस्सी का दौर था …जिस में काफ़ी घरों में फ्लिट पंप हुआ करता था…जिस में फ्लिट नाम का लिक्विड उंडेल कर कमरों में सांझ के स्प्रे किया जाता था ..और फिर कमरे कुछ समय के लिये बंद कर दिये जाते थे। इन के बारे में मेरा अच्छा खुशनुमा अनुभव है। लेकिन कुछ ही अरसे तक यह टिक पाया …. क्योंकि यह फ्लिट पंप भी एक लफड़ा ही था, कमबख्त झट से खराब हो जाया करता था, स्प्रे तो कम किया करता था और लिक्विड नीचे ज़्यादा गिर जाया करता था, इसलिये इतने महंगे लिक्विड के नीचे गिरने से मन में कुछ कुछ होता था …..(यश चोपड़ा की फिल्म वाला नहीं…..नुकसान होने पर जो होता है) ….बहरहाल, कुछ समय बाद प्लास्टिक  के फ्लिट पंप आ गये , लेकिन ये भी कुछ ज़्यादा कामयाब नहीं हो पाये …..और हां, इन फ्लिट-पंपों को पड़ोसियों द्वारा मांगे जाने का बड़ा रिवाज था।

चलिये आगे चलते हैं…..मच्छरों की दवाई का छिड़काव कभी कभार हुआ करता था, लेकिन उस का भी कोई खास असर दिखता ही नहीं था, इस का कारण वही कि पब्लिक को लगता था यह तो जैसे पानी के घोल का ही छिड़काव किया जा रहा होता था।

फिर कुछ वर्ष पहले हम शहर के कुछ इलाकों में फॉगिंग-मशीनों से मच्छर मार स्प्रे होता देखते थे …और कुछ जगहों पर ऐसा सुनने में भी मिला (यह नहीं बताऊंगा कि कहां!) …..कि मच्छरों के लिये कुछ कर रहो हो, तो दिखना भी तो चाहिए …. ये जो फागिंग मशीन थी ये सारे इलाके में चंद-क्षणों के लिए बस एक बार धुंध जैसा वातावरण बना दिया करती थी …..और पब्लिक का क्या है, वह खुश …कि हो गया मच्छरों का खात्मा लेकिन उन के रात के मच्छरों के किस्से न किसे ने सुने, ना ही सुनने की कोशिश की।

पुरानी बातें बहुत हो गईं….अब लेटेस्ट पर आते हैं …..मुझे नहीं पता था …काकरोचों को खत्म करने जैसा कुछ स्प्रे मच्छरों के लिये भी आ गया है। मेरी मां भी उनके कमरे में मच्छरों से बहुत परेशान थीं, और अकसर टीवी पर उन्होंने मच्छर मार स्प्रे का विज्ञापन देखा होगा। इसलिये एक दिन उन्होंने उसे लाने को कहा …. जब मैं लेने गया तो वहां एक ही नाम के दो स्प्रे पड़े हुये थे …मेरे छोटे बेटे ने मुझे पहले ही से सावधान किया हुआ था कि मच्छरों वाला लाना पापा, इसलिए ध्यान से देखा तो पाया कि काकरोचों के लिये अलग है और मक्खियों-मच्छरों के लिये अलग …सो, वह दो सो रूपये वाला स्प्रे भी घर में आ चुका है।

हां तो काकरोचों के लिये ध्यान आ रहा है … पहले एक लक्ष्मणरेखा नामक की दवाई हुआ करती थी जिस के साथ किचन में एक लक्ष्मणरेखा रूपी लाइन खींच दी जाती थी, और यह षड़यंत्र रात को सोने से पहले रचा जाता था, और रात में जैसे ही काकरोच उस तरफ आया, उस का खात्मा…. सुबह किचन में दस-बीस काकरोच देखने को मिलते थे….यह सब बंबई में हम देखा करते थे। पता नहीं अब शायद वहां यह लक्ष्मणरेखा भी काम न करती होगी जो काकरोचों के लिये अलग से स्प्रे आ गया।

हां, तो अपने घर में जब से यह मच्छर मार स्प्रे वाली शीशी आई है, थोड़ी सी परेशानी बढ़ गई दिखती है। मां अपने कमरे में करती हैं लेकिन छोटे बेटे को बिल्कुल गवारा नहीं, उन्हें बार बार टोकता है बीजी, आप को पता नहीं इस का कितना नुकसान है इस तरह से इस्तेमाल करने का, न तो आप इसे करते समय नाक को कवर करती हो, और न ही बाद में कमरा बंद करती हो, बीजी, बस आप यह मत किया करो, मैं किया करूंगा …और कईं बार अपनी नाराज़गी मेरे कानों में भी डाल चुका है कि पापा, बीजी को थोड़ा कहो कि इसे स्वयं न इस्तेमाल किया करें, यह ज़हरीली चीज है……………बहरहाल, इस के बावजूद भी मच्छर वैसे का वैसा ही है।

क्या करें, समझ नहीं आ रहा ………….लेकिन अकसर ध्यान उन झोंपडीयों की तरफ़ चला ही जाता है जहां न तो इस तरह के कोई मच्छरमार इंतजाम होते हैं ….. पता नहीं कैसे मच्छरों से मुकाबला कर पाते होंगे!!

एक पंजाबी सुपर हिट गीत सुनिए जिसमें एक मुटियार अपने माही से कह रही कि उसे तो मच्छरों ने तोड़ कर खा लिया है, एक मच्छरदानी खरीद दे … यह जो आवाज है यह पंजाबी गीतों की महारानी है . .सुरिंदर कौरऔर पुरूष आवाज में भी रंगीला जट्ट पंजाब का बेहद पापुलर लोकगायक  है….

आज विश्व मलेरिया दिवस है –मलेरिया चालीसा (भाग.2)

देखिये हम लोग मच्छर से टक्कर लेने के लिये कहां से शुरू हुय़े थे …और आज किस हद तक पहुंच चुके हैं लेकिन फिर भी इस पर काबू नहीं पाया जा सका …काबू की तो बात ही क्या करें, कमबख्त अब ये और भी ढीठ और बेशर्म से हो चुके हैं ..और पहले से हृष्ट-पुष्ट…।
पहले तो गांव में गोबर के उपले जला कर ही इस को दूर रखा जाता था ..लेकिन अब रेस्टरां आदि में बैठ कर मक्खी-मच्छर मारने के लिये मशीनें लगी हैं, बडा हास्यास्पद लगता है कि आदमी कितना बेबस हो गया है।
हैरानगी की बात है कि कुछ घरों में एक भी मक्खी नहीं दिखती, लेकिन अंधेरा छाते ही मच्छरों का मेला लग जाता है, रात को बाहर सोने के दिन तो लद ही गये …अब तो सुबह-सवेरे और सांझ को बगीचे में बैठना भी इन मच्छरों की वजह से दूभर हो जाता है…. अगर बैठना ही है तो एक हाथ में अखबार में दूसरे को पैरों, टांगों और बाजुओं को खुजाने के लिए फ्री रखना पड़ता है।
एक अहम् बात का ध्यान आ रहा है …बहुत वर्षों तक तो मलेरिया बस शरीर तोड़ दिया करता था, लेकिन लगभग बीस वर्ष पहले जब मलेरिया रोग से मौतें होने लगीं तो पता चला कि मलेरिया फ़ैलाने वाले एक मच्छर की किस्म (Plasmodium falciparum) से खतरनाक मलेरिया हो जाता है, जो दिमाग को चढ़ जाता है और कईं बार इस से मौत भी हो जाती है।
इलाज के बारे में बात करें तो आज से चालीस वर्ष पहले तो इस के लिये इतनी गोलियां खानी पड़ती थीं कि सोच कर ही मतली होने लगी है। बिल्कुल कड़वी …क्यूनिन की गोलियां … लेकिन मजबूर होकर खानी ही पड़ती थीं।
एक दौर ऐसा भी आया नब्बे के दशक में जब लोगों ने मलेरिया से बचने के लिये हर सप्ताह क्लोरोक्यूनिन की एक गोली लेनी शुरू कर दी …चाहे यह बचाव हमेशा ही से बड़ा कंट्रोवर्शियल सा ही रहा लेकिन बाप रे बाप ज़रूरत से ज़्यादा पढ़े लिखे लोगों को समझाने का पंगा कौन ले …. ज़ाहिर है यह समस्या ज़्यादा ज़रूरत से ज्यादा ऐजुकेटेड लोगों की ही थी…. आम आदमी का क्या है, बेचारा आंखें मूंद कर डाक्टर की बात मान लेता है… और फ़ायदे में भी रहता है।
अब मलेरिया के टैस्ट के लिये भी एक कार्ड-टैस्ट आ गया …जिस से तुरंत पता चल जाता है कि मलेरिया है कि नहीं ….यह भी पता लगाना ज़रूरी है …कुछ दशक पहले तो जब भी कंपकंपी से बुखार आता था तो इस का मतलब यही होता था कि यह हुआ मलेरिया .. और फिर दवा-दारू शुरू हो जाता है…अब कईं अन्य तरह के बुखार जैसे डेंगू (यह भी मलेरिया से ही फैलता है), चिकनगुनिया (हड्डी तोड़ बुखार) भी कंपकंपी के साथ ही होते हैं।
इस पोस्ट को बंद करते करते बस यही लिखना चाहता हूं कि आंकड़ों का तो मैंने आंकलन किया नहीं, लेकिन इतना तय है कि अभी तक तो इन मच्छरों से हार से चुके हैं… मच्छरदानियों को कीटनाशकों से ट्रीट भी किया गया है, सफलता मिली है खास कर के अफ्रीकी देशों में ……लेकिन अभी हमारे लिए बहुत काम करने बाकी हैं, बहुत कुछ करना बाकी है ……
अभी हारने की बात चली तो मेरे बेटे का एक फेवरिट पंजाबी गीत का ध्यान आ गया …अकसर सुन सुन कर मस्त होता रहता है …. असीं हारे हंबे आं ..लोक बीमार जहे …..

आज विश्व मलेरिया दिवस है…मच्छर चालीसा (भाग 1)

आज विश्व मलेरिया दिवस है …स्वभाविक रूप से मेरे मन में बचपन से लेकर अब तक के मच्छरों के अनुभव घूम रहे हैं। जहां तक मुझे होश है..साठ के दशक के अंत में या सत्तर के दशक के शुरू में हमें मलेरिया दिखने लगा था। मुझे याद है सत्तर के दशक के शुरू में मेरी मां को जब मलेरिया एक बार हुआ….पहले तो मलेरिया का पता ही तब चलता था जब दो-तीन बार कंपन के साथ तेज़ बुखार चढ़ता तो पड़ोसनों के सामूहिक विचार विमर्श से जब यह प्रमाणित हो जाता था कि हो न हो, यह तो मलेरिया ही है, तब कहीं जाकर मलेरिये की दवाई लाने का कष्ट किया जाता है, तब तक मरीज़ वैसे ही बुरी तरह से टूट चुका होता था।

शायद मलेरिया तो मुझे भी एक-दो बार हुआ है …लेकिन एक बात शेयर करता हूं कि मुझे गर्मी में वह कंपन वाली ठंडक का अहसास भा जाता था, अमृतसर की कमबख्त चिलचिलाती गर्मी में किसी पहाड़ की सैर का नज़ारा मिल जाता था ..लेकिन उस कंपन के बाद का हाल मत पूछिए।

बात, मच्छरों की करने लगा था कि पिछले चार दशकों में कैसा रहा मच्छर सफरनामा। हम बिल्कुल छोटे थे तो कभी मच्छर के बारे में सुना ही नहीं था, इसलिए ठाठ से नीली छत के नीचे अपनी खटिया पर लंबी तान कर (अपनी खटिया के नीचे एक छोटी सी पानी की सुराही टिका कर) सो जाया करते थे। और उस में हम लोग एक हाथ से हवा करने वाला पंखा भी अकसर रख लिया करते थे ….क्या पता कब ज़रूरत पड़ जाए!! ….कहने का मतलब कि सोने का भी पूरा सलीका हुआ करता था, पायजामा-वामा पहन कर, दूध (कभी कभी)  वरना पानी वानी पीकर इत्मीनान से सोया जाता था।

फिर थोडे बड़े हुये शायद 10-12 साल के होंगे, कुछ काटने लगा …. पता चला कि ये खटमल नहीं है, ये मच्छर हैं। इसलिये शाम को सोने से पहले अपनी अपनी खटिया पर मच्छरदानी को चार डंडों से टिकाने की जिम्मेदारी भी हमारी सब की सांझी हुआ करती थी। और फिर उस मच्छरदानी में सोना ….मत पूछो …मत याद दिलाओ उन दिनों की… उस के आगे तो रेलगाड़ी का फर्स्ट ए.सी भी फीका लगे।

मुझे याद है जब मच्छरदानी के अंदर से हम लोग इस नीले आकाश में तारों को निहारा करते थे तो कब निंदिया रानी की गोद में चले जाते थे पता ही कहां चलता था, सुबह तभी उठते जब टहलने जाना होता….इस सब का शायद यही प्रताप है कि आज कल कभी भी अलार्म से जागने की ज़रूरत नहीं पड़ी। बॉडी-क्लाक तो शायद बचपन में ही सैट सी हो जाती होगी।

फिर हम लोग और बड़े हो गये … तब देखा कि मच्छरों की गिनती इतनी बढ़ गई कि मच्छरदानी के साथ साथ चारपाईयों की कतार के आगे एक बिजली का पंखा भी चलाया जाने लगा।

लो जी देखते ही देखते हमारे कालजीएट बनने तक अस्सी के दशक में आ गई वह कछुआ छाप कॉयल…. शुरू शुरू में यह एक स्टेट्स सिंबल सा ही जान पड़ता था, लेकिन उस जमाने में यह भी इतना महंगा लगता था कि जब यह जलता था तो साथ में दिल जलता था कि यह क्यों इतनी तेज़ी से जल रहा है। किसी मेहमान को अगर कोई कछुआ छाप की भी सुविधा प्रदान कर दिया करता था तो इस को एक शिष्टाचार का अंग ही माना जाता था। ये वो दिन थे जब कालेज में मच्छर का लाइफ-साइकिल अच्छी तरह से पढ़ा जाता था और रात में उस का प्रैक्टीकल हो जाया करता था…

चलिये आगे चलते हैं … या इस के साथ ही साथ या कछुआ छाप के आगे या पीछे …(कुछ ठीक से याद नहीं आ रहा) एक क्रीम जिसे आडोमास कहते हैं …वह भी चल पड़ी थी, उसे भी घर में रखा जाता। रात को सोने से पहले पैरों, टांगों ओर बाजुओं पर इसे नियमित लगाया जाता था …लेकिन बड़ी कंजूसी से …इतनी महंगी ट्यूब और झट से खत्म हो जाया करती थी।

कोई बात नहीं ….जैसा कि अकसर हुआ करता था, यह ट्यूब अकसर खत्म ही रहा करती थी ..ऐसे में हमारी नानी ने हमें नुस्खा बता दिया था कि चुपचाप सरसों का तेल लगा कर लेट जाओ…..फंडा मुझे आजतक समझ नहीं आया…यार कहां सरसों का तेल और कहां मच्छर का ढंक…. बहरहाल, अनजानेपन का भी अपना ही लुत्फ़ होता है, यह बहुत देर बाद पता चला।

हां जी, फिर वह तरह तरह की मशीनें आ गईं …. ऑल-ऑउट, गुड-नाइट ….. इन्हें लाने लगे …. एक एक महीने तक चलने लगीं….. फिर इन के रिचार्ज आने लगे …..और अब देखते हैं कि इन की मात्रा को नियंत्रण करने वाले यंत्र भी आने लगे हैं ताकि अगर मच्छर ज्यादा हैं तो इन को तेज़ कर दो, आता है यह सब टीवी विज्ञापनों में, आपने भी कईं बार देखा होगा।

हां, एक बात तो भूल ही गया … एक ही क्यों, बहुत सी बातें बतानी अभी बाकी हैं …एक काम करता हूं … लेख लंबा खिंचता चला जा रहा है, बाकी की बातें इस के दूसरे पार्ट में लिखता हूं …. कुछ ही घंटों में वापिस हाजिर होता हूं.

वैसे मैंने मच्छरों से परेशान होकर लगभग चार वर्ष पहले भी एक लेख लिखा था, यह आज किसी दूसरी साइट पर दिखा …लिंक भेज रहा हूं …. क्या यही विकास है?  हो सके तो इसे भी ज़रूर देखियेगा।

10 दिन में 20 पावंड वजन कम होने का चमत्कार

वजन कम करने के अजीबो-गरीब तरीके अकसर दिखते रहते हैं… अखबारों में भी दिखते हैं….ये खाओ और इतना वजन घटाओ …बिना किसी तरह की कसरत किए हुए, बिना किसी तरह के खाने में परहेज किये बिना… अकसर मैं अपने मीडिया डाक्टर ब्लाग पर इस तरह के गोरखधंधों की पोल खोलता रहा हूं। इन पावडरों में प्रतिबंधित दवाईयां मौजूद रहती हैं जिन के तरह तरह के दुष्परिणाम अकसर दिखने लग जाते हैं।
आज से बीस साल पहले जब मैं एम डी एस कर रहा था तो हम एक टॉपिक को देख कर हैरान परेशान हो जाया करते थे … कुछ डायटिंग करने वाली लड़कियां वजन कम करने की फ़िराक में एनोरैक्सिया एवं बुलिमिया (Anorexia nervosa and Bulimia) जैसी तकलीफ़ों का शिकार हो जाती हैं …इस में होता यह है कि ये लड़कियां पहले तो जी भर कर तबीयत से सब कुछ खाती हैं, उस के तुरंत बाद उल्टी कर देती हैं ताकि उनका वजन न बढ़ जाए … पश्चिमी देशों में एक तरह का मानसिक रोग देखा गया है।
मैं यह लिख रहा हूं …और मेरी टेबल पर एक हिंदी अखबार के आखिरी पन्ने पर एक युवती अपने हाथ में इंचीटेप रखे हुये अपनी कमर को नापते हुए सारे जमाने को समझा रही है ….फलां फलां कैप्सूल से मैंने अपनी कमर (हिप) 3 इंच तक कम की है। लेकिन जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है इस तरह का इलाज सेहत को बहुत ज़्यादा नुकसान पहुंचा सकता है.. लिखा तो है 100% Ayurvedic Medicine लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता, इन में प्रतिबंधित दवाईयां मिला रखी होती हैं जिन से वजन तो क्या कम होना, बल्कि अन्य शारीरिक बीमारियां घेर लेती हैं।
भूमिका इतनी लंबी हो गई और मेरा ड्यूटी पर जाने का समय हो गया है …सीधा अपनी बात पर आ रहा हूं ….अमेरिका इंगलैंड में वजन कम करने का जुनून किस हद तक ले जा सकता है, यह हमें इस खबर से पता चलता है कि वहां पर एक डाइटिंग प्लॉन है … 10 दिन में बीस पाउंड कम करवाने वाला… डाक्टर इस के लिये लगभग 1500 पाउंड लेता है (हमारे हिसाब से 75000 रूपये ही तो हुए….बस!!) … लड़कियां शादी से पहले वजन घटाने के लिये इस इलाज का इस्तेमाल कर रही हैं ताकि उन का वैडिंग-गाउन सुंदर दिखे … लेकिन आप को भी उत्सुकता हो रही होगी कि आखिर कैसे कर पाता है यह इलाज 10 दिन में बीस पाउंड वजन कम।

credit : blisstree.com

तो सुनिए…..इस इलाज में मरीज द्वारा फीडिंग ट्यूब का इस्तेमाल किया जाता है …यह ट्यूब युवती के नाक के रास्ता से पेट में डाल दी जाती है, फिर उस नली के द्वारा प्रोटीन और वसा का घोल निरंतर उस युवती को अगले दस दिन तक मिलता रहता है …भूख उसे लगती नहीं… कार्बोहाइड्रेट उस डाइट में होते नहीं। और जिस पाउच से यह खाना-पीना उस फीडिंग-ट्यूब से होता हुआ उस के पेट में पहुंचता है उसे वह अपने कंधे पर एक बैग के अंदर लटकाए रहती है। बस, हो गया काम।
आप अगर मेरे द्वारा नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करेंगे तो एक पूरी वीडियो भी देखेंगे किस तरह से डाक्टर साहब फीडिंग ट्यूब को उस के नाक के रास्ते से ट्यूब उस के पेट तक पहुंचा रहे हैं….यह सब देख कर बड़ा अजीब सा लगता है ना, फीडिंग ट्यूब तो बीमार लोगों के लिये होती है … लेकिन यह युवती इस वीडियो में कह रही है कि उसे तो दस दिन तक का भी इंतज़ार नहीं करना पड़ा क्योंकि उस ने आठ ही दिन में 20 पाउंड झटक दिये।
डाक्टर साहब बता रहे हैं कि इस ट्यूब के नुकसान केवल यह हैं कि एक तो मुंह से दुर्गंध आ सकती है और थोड़ी कब्ज की शिकायत रह सकती है (क्यों कि इस तरह से दिये जाने खाध्य पदार्थों में कोई फॉईबर तो होता नहीं….) …….
युवती इस वीडियो में बता रही थी कि जब वह मुंह पर इस ट्यूब को चिपकाए हुये कहीं बाहर जाती थी तो लोग पूछते कि तुम बीमार हो क्या? तुम मर रही हो क्या ? ….. बता रही थी वह हंस कर कहती थी कि मैं बिल्कुल फिट हूं।
आप भी कहीं यह तो नहीं सोच रहे कि यार मैं इस खबर से इतना खुश क्यों हूं …. बेगानी शादी में अबदुल्ला दीवाना … मैंने कब कहां मैं खुश हूं, मुझे यह चिंता सताए जा रही है कि इसे पढ़ कर कहीं आप भी इस तरह के इलाज को न ढूंढने लग जाएं। बेहतर होगा हम अपने खाने पीने पर ध्यान दें, नियमित शारीरिक परिश्रम करें, सुबह रोज़ाना टहलें, आस्थावान बनें…………………और यह सब मैं आप से ज़्यादा अपने आप से कह रहा हूं क्योंकि मुझे मीठा बहुत पसंद है, नियमित टहलता मैं हूं नहीं, लेकिन मेरी आस्था इस ईश्वर में पूरी की पूरी पक्की है, शतप्रतिशत…. ।

इस लिंक पर जाकर इसे अवश्य देखियेगा…

Brides using feeding-tube diet
जाते जाते मुझे यह ध्यान आ गया कि वजन न बढ़ने दिये जाने का एक सुपरहिंट फार्मूला इस नीचे दी गई वीडियो में भी बताया गया है … अगर हम लोग उसे ही आजमा लें तो कैसा रहेगा …..एक दम सुपर हिट फार्मूला …

मेलजोल दांतों का भी परफैक्ट चाहिए….

अकसर लोग यही समझते हैं ना कि मुंह की कोई भी बीमारी हो ..दंत-छिद्र हों या फिर मसूड़ों की सूजन हो … पायरिया हो, कुछ भी हो …इस का मूल कारण है दांतों की और मुंह की ढंग से सफ़ाई न हो पाना …नियमित ब्रुश न करना, और दिन में बार बार टॉफी, चाकलेट, गुड़, रेवड़ी आदि बस खाते ही जाना और कुछ भी खाने के बाद कुल्ला न करना और फिर दांतों के बीच फंसी खाने की चीज़ों को टुथ-पिक या दियासिलाई की तीली से कुरदते रहना।
ये सब बातें बिल्कुल सही हैं, पूरी की पूरी सच्चाई है। लेकिन एक बार और भी है कि ऐसा भी हो सकता है कि कोई बंदा अपने मुंह की ठीक से सफाई रखता हो, और भी सब तरह की सावधानियां बरतता होगा लेकिन फिर भी हो सकता है कोई मुंह में ऐसी तकलीफ़ हो जाए ..इस की एक उदाहरण मैं आप को इस केस द्वारा देना चाहता हूं।

बेतरतीब लगे हुये नीचे के दांत

इस तस्वीर में आप जिस युवक के दांतों की तस्वीर देख रहे हैं …उस के दांत देखने में ठीक ठाक ही लगते हैं, कोई खास टारटर आदि भी नहीं, मसूड़े भी काफी हद तक ठीक से ही लगते हैं, दांतों में कैवीटीज़ (दंत-छिद्र) भी नहीं दिख रहे लेकिन फिर यह दंत चिकित्सक के पास आया तो आया कैसे? ….. रोज़ कईं कईं बार रोज़ाना टीवी पर अपने बेटे के साथ बैठ कर सीआईडी शो देख देख कर मेरी भाषा भी लगता है एसीपी प्रदुमन जैसी हो गई है …आया तो आया कैसे? …आया तो आया, ऐसा क्या है, क्या वह नियमित डैंटल चैक-अप के लिये नहीं आ सकता? बेशक आ सकता है, लेकिन ऐसा कोई रिवाज यहां दिखता नहीं …साल में शायद दो-चार लोग ही ऐसे आते होंगे जो रूटीन चैक-अप के लिये आते होंगे।

दांतों के नीचे पस की वजह से सूजन दिख रही है

हां, तो इस युवक के नीचे वाले दांतों के नीचे एक फोड़ा (abscess) बना हुआ है जिस में पस बनी हुई है … इस के दांत तो ठीक ठाक से ही लग रहे हैं तो फिर यह क्यों पड़ गया इस झमेले में? …इस का कारण है कि इस के दांतों का एरेंजमैंट ठीक नहीं है, ये तरतीब से नहीं लगे हुए ….एक जबाड़े के दांतों का आपस ही में सही तरतीब से जुड़ा होना ही काफी नहीं होता, बल्कि दूसरे जबाड़े के साथ भी उस का संबंध बिल्कुल ठीक होना चाहिए…. आप देखिये इस में न तो एक जबाड़े के दांतों का ही अपने में कोई हिसाब-किताब ठीक बैठ रहा है और न ही दूसरे जबाड़े के साथ ही संबंध इन के ठीक हैं। देखिये किस तरह से दांत इस रगड़ की वजह से घिसे हुये से दिख रहे हैं।

ऊपर-नीचे के बेतरतीब दांतों का आपसी रिश्ता भी चोट पहुंचाने वाला

इस के   कारण जब ऊपर और नीचे वाले दांत आपस में मिलते हैं तो चाहे वे सामान्य फोर्स से ही मिल रहे हों, एक दूसरे को चोटिल करते हैं …इस का असर नीचे जबड़े की हड्डी तक जाता है ….लगातार होने वाले इस प्रहार से दांत डैड हो जाता है और फिर उस के नीचे पस का फोडा तक बन जाता है जैसा कि इस केस में दिख रहा है … मरीज़ अत्यंत पीड़ा में है। एक्सरे करने के बाद इस के डैड दांत की तुरंत रूट-कनॉल-ट्रीटमैंट की जायेगी ….कुछ दवाईयां दी जाएंगी …एंटीबॉयोटिक एवं सूजन एवं दर्द निवारक टेबलेट्स— एक दो दिन में ही ठीक तो  हो जायेगा…..लेकिन आर्थोडॉंटिक्स इलाज के द्वारा इस के दांतों के अरेंजमैंट को दुरूस्त करना भी बहुत ज़रूरी है, वरना कभी एक दांत में लफड़ा, कभी दूसरे में, यह लफड़ा चलता ही रहेगा।
इस पोस्ट से यह सबक लेना होगा कि बाल अवस्था से ही बच्चों के दांतों की नियमित जांच होनी चाहिए …..ताकि दांतों की किसी भी तरह की अनियमितता को तुरंत दुरूस्त किया जा सके …. A stitch in time saves nine!  ……… वैसे इस दांतों का इस तरह का जो अनियमित अरेंजमैंट होता है – (irregular arrangement of teeth…… इसे Trauma from Occlusion नामक बीमारी लिख कर हम अकसर लोगों को “ डराते” हैं।

मधुमेह की एक दवा को हटाने के लिए चली मुहिम

हम लोगों ने अपने यहां किसी उपभोक्ता संगठन को किसी हानिकारक दवा को बाज़ार से वापिस लेने के लिये कोई अंदोलन होते नहीं देखे …कभी न देखे और न ही किसी मीडिया में इस तरह का मुद्दा उठता ही देखा।
इसलिये दो-तीन दिन पहले मुझे यह खबर देख कर बहुत हैरानगी हुई कि वाशिंगटन में पब्लिक सिटिज़न नामक एक कंज्यूमर ग्रुप ने नोवो नॉरडिक्स की एक इंजैक्शन से दी जाने वाली मधुमेह की दवाई पर रोक लगाने की मांग की है क्योंकि इस से थायरॉय़ ग्रंथि का कैंसर, पैनक्रियाज़ की सूजन एवं गुर्दै के फेल होना (thyroid cancer, pancreatitis, kidney failure) का खतरा बना रहता है। दवाई का नाम है …विक्टोज़ा (Victoza).
इस संस्था ने अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन को लिख भेजा है कि इस दवा से होने वाले नुकसानों का पलड़ा इस से डायबीटीज़ की दवा के तौर पर होने वाले फायदे से कहीं ज़्यादा भारी है। और इस तरह की तो पहले ही से एक दर्जन के लगभग दवाईयां उपलब्ध हैं।
अब यह भी आवाज़ उठ रही है कि फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इस दवा को तीन वैज्ञानिकों के विरोध को नज़रअंदाज़ करते हुए इसे क्लियर कर दिया था।
डायबीटीज़ 2 के लिये नईं नईं दवाईयों का इतना ज़्यादा भी टोटा नहीं है कि इस के लिये गंभीर दुष्परिणामों की आकंशा हमेशा बनी रहे।
नोट करने योग्य बात यह है कि जब चूहों को यह दवा दी गई तो उन में थॉयरायड कैंसर हो गया …और तो और फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन को पिछले 17 महीनों में (जब से यह मार्कीट में आई है) पैनक्रियाटाईटिस अर्थात् पैनक्रिया की सूजन की 200 रिपोर्टें मिली हैं….. उपभोक्ता समूह ने यह भी कहा है कि सारे केस तो एफ डीआई को रिपोर्ट ही नहीं किये जाते …केवल 10प्रतिशत केस ही एफडीआई तक पहुंचते हैं …इसलिये अनुमान है कि 2000 केस इस दुष्परिणाम के हो चुके हैं।
उपभोक्ता संगठन ने तुरंत इस दवा को बाज़ार से हटाने की मांग की है लेकिन एफडीआई को इस तरह के केसों में कोई निर्णय लेने में कईं कईं महीने, यहां तक कि कईं बार वर्षों लग जाते हैं ……. यह बात मुझे कुछ जमी नहीं, वाशिंगटन जैसी जगह ..जहां इस तरह का मुद्दा उठा …….और इस का निर्णय होने में लंबा समय लग जायेगा।
बहरहाल, वाशिंगटन वाले अपनी जानें, अब जब जनता ने आवाज़ उठाई है तो इस का समाधान हो जायेगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि वहां से धिक्कारे जाने के बाद बाहर की कंपनीयां  अपना डेरा यहां भारत में जमा लें….. अकसर सुनते रहते हैं पहले भी कईं दवाईयों के साथ ऐसा हो चुका है, वहां नहीं चलीं, या नहीं चलने दी गईं तो फिर हमारी मार्कीट तो है ही , आप का इस के बारे में क्या ख्याल है?

Source: Public Citizen wants withdrawal of diabetes drug

सच में सब गोलमाल ही है …..

Public Citizen wants withdrawal of diabetes drug