एक ईमानदार बीड़ी पीने वाले की आप बीती

आज एक ईमानदारी बीड़ी पीने वाले से मुलाकात हो गई। वह आया तो था मेरे पास एक हिलते हुए दांत के लिए था लेकिन उस के मुंह में झांकने पर यह दिखा कि तंबाकू की वजह से उस के मुंह में गड़बड हो रही है।

गाल के अंदरूनी हिस्से में इरैथ्रोप्लेकिया (मुंह के कैंसर की पूर्व-अवस्था)

यह उस 56 वर्षीय बंदे के गाल के अंदरूनी हिस्से की तस्वीर है और यह जो बदलाव आप उस के मुंह के अंदर देख रहे हैं इसे चिकित्सा भाषा में एरिथ्रोप्लेकिया (erythroplakia) कहते हैं.. यह मुंह के कैंसर की पूर्व-अवस्था है (Oral pre-cancerous condition). क्या यह बदलाव इस बंदे में आगे चलकर कैंसर में तबदील होगा, अगर ऐसा होना है तो यह कितने समय में हो जायेगा –इस का जवाब देना मुश्किल है।

लेकिन एक बात तय है कि अगर यह बंदा बीड़ी मारना छोड़ दे और इस बदले हुये गाल के अंदरूनी हिस्से का उपचार करवा ले तो बचाव ही बचाव है। लेकिन यह क्या यह तो बीड़ी छोड़ने की बात सुनने को तैयार ही नहीं है।

उस ने बताया कि वह स्कूल के दिनों से ही बीड़ी पी रहा है — एक बात ज़रूर है कि उन दिनों में यह काम चुपके चुपके होता था लेकिन बड़े होने पर नौकरी-वोकरी मिलने पर यह काम धड़ल्ले से होने लगा …दो एक बंडल पी जाना तो कोई बात ही नहीं है।

मैं बहुत बार तंबाकू के मुंह के अदंरूनी हिस्सों पर होने वाले प्रभाव के बारे में, तंबाकू की मुंह के कैंसर में भूमिका के बारे में लिखता रहता हूं … कहीं पढ़ने वाले ये तो नहीं समझते कि तंबाकू के दुष्प्रभाव मुंह ही में होते हैं…नहीं नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, वह क्या है कि मेरा काम ही सारा दिन लोगों के मुंह में तांक-झांक करने का है, इसलिए मुंह में होने वाले दुष्प्रभाव तुरंत मेरी नज़र में आ जाते हैं। और कईं बार मरीज़ों की भीड़ के वजह से ऐसे बंदों के दूसरे अंगों के बारे में बात करने का अवसर ही कहां मिलता है।

लेकिन यह बंदा कुछ अलग था. मुझे भी बड़ा अजीब सा लगा कि यह तो सीधा ही कह रहा है कि बीड़ी तो मैं छोड़ ही नहीं सकता। हां, उस ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए आगे कहा कि डाक्टर साहब मेरे दो आप्रेशन हो चुके हैं, हार्ट अटैक भी हो चुका है। उस ने अपने पेट में आप्रेशन के निशान भी तुरंत दिखा दिए।

वह बता रहा था कि पेट के अल्सर के आप्रेशन के लिए वह पीजीआई चंडीगढ़ में तेईस दिन दाखिल भी रहा …. लेटे लेटे कैसे पीता बीड़ी? –इसलिए उसे उन दिनों के दौरान ऐसे लगा जैसे कि अब तो जैसे बीडी की आदत छूट गई …लेकिन नहीं ऐसा कैसे हो पाता, जैसे ही वह अपनी पुरानी दोस्ती की मंडली में वापिस आया तो बस झट से वापिस शुरू हो गया बीड़ी पीने-पिलाने का दौर।

बता रहा था कि पहले तो बच्चे कभी खास मना नहीं करते थे लेकिन जब से हार्ट-अटैक हुआ तब ही से उस के बच्चे जो अब बड़े बडे हो चुके हैं, उस के पीछे पड़े रहते हैं। यह बात बताते हुये वह हंस भी पड़ा कि नौबत यहां तक आ गई कि इसी चक्कर में होने वाली खींचा-तानी के दौरान बनियान पर फट चुकी है—यह पूछना मैंने कतई मुनासिब इसलिए नहीं समझा कि उस की या बेटों की !!

जब मैंने उसे यह ऊपर वाली तस्वीर दिखाई और साथ में यह समझाने की कोशिश की कि यह तो मुंह के अंदर जो तंबाकू ने कहर बरपाया हम ने देख लिया लेकिन शरीर के अंदर क्या क्या प्रभाव हो रहे हैं, वे तो हार्ट अटैक, पेट के अल्सर जैसे रोगों के द्वारा ही पता चलता है ….. मेरे इतना कहने पर उस ने बताया कि उस को पक्षाघात का अटैक (paralysis) भी कुछ महीने पहले हो चुका है, मुहं टेढ़ा हो गया था, शरीर के एक तरफ़ का हिस्सा बिल्कुल चल नहीं रहा था लेकिन फिर जैसे तैसे ठीक हो गया हूं। इस अटैक की वजह से वह कुछ दिन बोल भी नहीं पाया था।

लेकिन फिर भी वह अपनी बीड़ी न छोड़ने वाली बात पर अडिग है …कह रहा था कि मैंने जब भी इसे छोड़ने की कोशिश की है तो मैं पागल जैसा हो जाता हूं …. काम ही नहीं कर पाता हूं …बीड़ी पीते ही चैन की सांस आती है।

मेरे इतना कहने पर कि बीड़ी छुड़वाने के लिए तो एक च्यूंईंग गम (nicotine chewing gum) भी आ गई है …उस ने बताया कि उस ने बीड़ी छुड़वाने के लिये कुछ देसी दवा भी लेनी शुरू कर दी … लेकिन उस दवाई से तो बीड़ी से नफ़रत क्या होनी थी, बल्कि यह लत दौगुनी हो गई। फिर बताने लगा कि उस ने सभी पापड़ बेल कर देख लिये हैं …तलब होने पर सूखा आंवला मुंह में रखने से लेकर, छोटी इलायची, दालचीनी ….सब कुछ अजमा लिया है लेकिन अब उसने जान लिया है कि यह बीड़ी इस जीवन में तो उस का दामन नहीं छोड़ेगी।

पता नहीं जाते जाते उस के मुंह मे यह कैसे निकल गया कि मैं इस आदत से निजात पाना चाहता हूं और कोई ऐसा मिले जो मुझे इस आदत से छुटकारा दिला दे तो मैं उसे एक हज़ार का ईनाम तक देने को तैयार हूं …जब वह यह बात कर रहा था उस समय मेरे अस्पताल का एक अन्य कर्मी अंदर दाखिल हुआ था, मैंने उसे संबोधित करते हुये कहा कि देखो, यह यह चैलेंज है इस बंदे का … इन की बीड़ी छुड़वाओ और एक हज़ार का ईनाम पाओ … और इस का फायदा यह होगा कि तुम्हारी बीड़ी की आदत भी छूट जायेगी। लेकिन उस ने तो यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि मुझे तो कुछ दवाईयां लिख दो, बहुत से मरीज़ उस का इंतजार कर रहे हैं।

यह बंदा यह भी कह गया कि मैंने तो अपने घर वालों को यहां तक कह दिया है कि देखो, मैं बीड़ी तो किसी कीमत पर नहीं छोडूंगा —अगर मुझ पर ज़्यादा दबाव डालोगे तो मैं घरबार सब कुछ छोड़ कर कहीं चला जाऊंगा, फिर मुझे ढूंढते रहना।

अब उस की यह बात सुन कर तो मैं भी चौंक गया … लेकिन एक बात का विचार ज़रूर आया कि एक हज़ार के ईनाम को जो घोषणा उस ने की वह अरबों-खरबों की सेहत की तुलना कितनी कम है!!

आज बीड़ी के बारे में लिखने का ध्यान इसलिए आ गया कि सुबह ही दा हिंदु में एक अच्छी खबर पढ़ने को मिली की अखिलेश यादव ने यू पी में तंबाकू पर नियंत्रण करने के लिये कमर कस ली है … आप भी यह जान कर चौंक जाएंगे कि बंबई के टाटा मैमोरियल अस्पताल में मुंह के कैंसर के जितने रोगी इलाज करवाने आते हैं उन में से हर तीसरा बंदा उत्तर प्रदेश से संबंध रखने वाला होता है। बहुत चिंताजनक बात है … और मैं इस कदम के लिए अखिलेश यादव को बधाई देता हूं…………….जहां भी, जिस भी रूप में इस तंबाकू की ऐसी की तैसी करने की बात होती है तो मैं वाहवाई किये बिना नहीं रह सकता। और जहां तक मुंह के कैंसर की बात है …. ये मरीज़ भी अकसर गंभीर अवस्था में ही टाटा अस्पताल जैसी जगह तक पहुंचते हैं … यह भी एक हारी हुई लड़ाई लड़ने जैसी ही बात होती है …. जब 23-24 साल से युवा इस मुंह के कैंसर का निवाला बनने लगें तो मामला सच में बिल्कुल गड़बड़ है।
Action Plan soon to make UP Tobacco-free

कईं बार सोचता हूं कि इस धूम्रपान को इस तरह के गानों ने भी तो कहीं न कहीं बढ़ावा दिया ही होगा ….

 

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नकली, घटिया दवाईयों की सार्वजनिक सूचना

जिस जगह भी ट्रांसपेरेंसी दिखती है अच्छा लगता है …. विकसित देशों की बहुत ही बातों से हम काफ़ी कुछ सीख सकते हैं।

मैं अकसर अमेरिकी साइट फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की साइट की बहुत प्रशंसा करता हूं … इस में बहुत ही बढ़िया जानकारी हर वर्ग के लिये दी जाती है …मरीज़ों के लिए, चिकित्सकों के लिए, इंडस्ट्री के लिए – हरेक को अपने मतलब की जानकारी मिल ही जाती है।

इतनी पारदर्शिता है कि अगर कोई नकली बिक रही दवाई का पता चलता है तो जनता को सावधान करने हेतु वे उस के बारे में बिंदास ढंग से अपनी साइट पर डाल देते हैं। यहां तक कि अगर इस एजेंसी को यह भी पता चलता है कि कहीं पर इंटरनेट पर भी अगर नकली किस्म की दवाईयां बेच कर पब्लिक को चूतिया बनाया जा रहा है तो वे इस तरह की दवाईयों का पूरा विवरण भी अपनी साइट पर डाल देते हैं। हो सके तो कभी कभी इस साइट को देखा करें, कुछ न कुछ हमेशा सीखने को मिलेगा —एनर्जी ड्रिंक की पोल अकसर खुलती दिखती है, फूड-सप्लीमैंट्स का गड़बड़ घोटाला भी यहीं दिखेगा — कम से कम हम लोग इन चीज़ों के बारे में सचेत तो हो सकते हैं।

आज मैं जिस दवाई के नकली होने की बात कर रहा हूं …वह Amphetamines श्रेणी में आती है …. अभी कल रात ही जब मैं अमेरिकी बच्चों में अपना ग्रेड सुधारने के लिए जिस दवाई को लिये जाने के क्रेज़ की बात कर रहा था, वह यही है… और आज पता चला कि इंटरनेट पर बिकने वाली यह दवाई नकली है, इस के लेबल के ऊपर लिखा कुछ है और है इस में कुछ और।

काफ़ी बार ऐसे किस्सों के बारे में रिपोर्ट कर चुका हूं …इंटरनेट पर जो लोग दवाई खरीदते हैं वे अकसर अपनी शारीरिक अवस्था के बारे में गोपनीयता बनाये रखना चाहते हैं …आखिर इस में बुराई भी क्या है…. लेकिन ये इंटरनेट पर दवाईयां बेचने वाले शातिर लोग इस बात को भली-भांति जानते हैं कि वे अपने ग्राहकों को घटिया किस्म की दवाईयां भी पेल देंगें तो कुछ होने वाला नहीं …कारण, जो लोग अपनी प्राईव्हेसी की वजह से ये दवाईयां नेट से खरीद रहे हैं वे कभी दवाईयों से होने वाले दुष्परिणामों के बारे में अपनी आवाज़ नहीं उठायेंगे।

लेकिन जो भी हो, मैं तो फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के काम को पूरा अकं देता हूं …यह एजेंसी प्रशंसनीय काम कर रही है …. इस की तुलना में देखिये अपने यहां सब काम राम भरोसे ही चलता है …. जानें इतनी सस्ती हैं कि इन नकली, घटिया किस्म की दवाईयों से बहुत कुछ होता रहता है..लेकिन आवाज़ कौन उठाए, हर कोई यही सोचता है कि इस से मुझे क्या लेना देना, मेरे साथ थोड़े ही ऐसा हुआ है, यह तो दूसरों का मुद्दा है…और न्याय-प्रणाली में इतना ज्यादा समय लग जाता है ….

कुछ अस्पतालों में दवाईयों के सैंपल कभी कभी टैस्टिंग के लिए भेजे भी जाते हैं लेकिन जब तक उन कि रिपोर्ट आती है कि वे सैंपल असंतोषजनक पाये गये हैं तब तक उन दवाईयों का स्टॉक अकसर खत्म हो चुका होता है …..अब दोष का ठीकरा कौन किस के सिर पर फोड़े, लेकिन जब ये ठीकरे उत्तर प्रदेश के नेशनल रूरल हैल्थ मिशन के हज़ारों करोड़ के घोटाले की तरह फूटने शुरू होते हैं तो फिर देर-सवेर सभी दोषियों की शामत आ जाती है। पहले ही क्यों नहीं सुधर जाते भाई, सरकार अच्छी खासी तनख्वाह देती है गुज़ारे के लिये…..क्यों ऐसे चक्करों में पड़ते हो जिस में निर्दोष भोली भाली जनता जो आप को भगवान समझ कर पूजती है, उस की जान के  साथ साथ अपनी जान तक जाने का जोखिम बना रहे।
नकली दवाईयों की फेक्टरी

गुप्त रोगों के लिए नेट पर बिकने वाली दवाईयां

कच्चे दूध का मुद्दा तो पीछे छूट गया लगता है..

जब हम लोग 25 वर्ष पहले माइक्रोबॉयोलॉजी पढ़ते थे तो दूध की पैश्चूराईज़ेशन के बारे में पढ़ा—वह यह कि गाय, भैंस, बकरी ..इन से मिलने वाले दूध को पैश्चूराईज़ेशन करने के बाद ही सेवन किया जाना चाहिए।

बचपन में देखते थे कि हमारे पड़ोस में एक सरकारी प्राइमरी स्कूल था जिस में दोपहर को सैंकड़ों दूध के पाउच आ जाते थे जिन्हें वे बच्चे मिड-डे मील के तौर पर पीते थे। अब सोचता हूं तो लगता नहीं कि वह दूध पैश्चूराईज़्ड होगा। पैश्चूराईज़ेशन का मतलब है कि कच्चे दूध को एक विशेष समय तक विशेष डिग्री तापमान तक उबलने देना ताकि उस में हानिकारक जीवाणु जैसे कि ई-कोलाई, सालमोनैला, लिस्टिरिया आदि नष्ट हो जाएं और दूध पीने लायक बन जाए।

लेकिन मुझे याद है कि हमें यह भी पढ़ाया जाता था कि बिना पैश्चूराईज़ेशन के दूध लेने से एक तरह की टी बी –जिसे बोवाईन ट्यूबरक्लोसिस – Bovine Tuberculosis –भी कहते हैं… हो सकती है जिस में हमारी आंते टीबी से ग्रस्त हो सकती हैं।

आज जब सुबह यह न्यूज़-रिपोर्ट पढ़ रहा था तो यही सोचा कि शायद विकसित देशों में पशुओं की टी बी पर पूरा काबू पा लिया होगा जो इस बीमारी का ज़िक्र तक ही नहीं है।

जब बिल्कुल छोटे थे तो देखते थे कि अकसर लोग गाय-भैंस के नीचे बैठ कर “डोके” लिया करते थे —यह पंजाबी का शब्द है जिस का मतलब है गाय, भैंस के थनों के सामने बैठ कर दूध की धारें सीधा मुंह में लेना…. इस तरह से दूध के पीने को बहुत पौष्टिक माना जाता था ..बस, सिर्फ़ एक भ्रांति और क्या!!

आज जब मैं फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा प्रकाशित यह रिपोर्ट देख रहा था जिस का लिंक मैं यहां दे रहा हूं तो यही सोच रहा था कि अब भारत में तो कच्चे दूध की बात ही शायद कभी सुनी नहीं। यहां पर दूध इतना ज़्यादा मिलावटी बिकने लगा है कि अब यह फोकस कहां रहा है कि दूध उबला भी हुआ है या नहीं!! FDA link –> Raw Milk And Food Safety … इस लिंक पर क्लिक करते ही आप जिस वेबपेज पर पहुंचेंगे, वहां पर जो वीडियो लगा हुआ है वह भी ज़रूर देखिए।

नकली, घटिया किस्म के पावडर से तैयार किया गया दूध धड़ल्ले से बिक रहा है — मीडिया कुछ दिन चीखता-चिल्लाता है, लेकिन वह भी क्या करे, केवल दूध पर ही तो अटका नहीं रह सकता। लेकिन इतनी बात तो अब मैं भी समझ गया हूं कि यह बाज़ार में बिकने वाले पनीर, मिठाईयां, मावा सब के सब (सब के सब की बजाए अधिकतर लिखना मुझे अपनी सेफ्टी के लिए ठीक लगता है!!) ..पावडर दूध से तैयार किये जा रहे हैं….वरना इतना दूध कैसे गर्मी के दिनों में भी इतनी आसानी से मिल जाता है।

अब तो लगता है कि दूध की क्वालिटी के बारे में बात ही न की जाए— यहां यह ही नहीं पता कि किस मिलावटी दूध का सेवन किया जा रहा है, ऐसे में पैश्चूराईज़ेशन की बात को क्या छेड़ें !!

दूध के ऊपर कुछ भी लिखना अब बड़ा फुद्दू सा काम लगता है …कारण यह कि हर तरफ़ धड़ल्ले से मिलावटी दूध, कैमीकल दूध बिक रहा है …पब्लिक इसे पी-पी कर अपनी सेहत तबाह किये जा रही है।

बस, यह लिख कर अपनी बात खत्म करता हूं कि सावधानी बरतने में ही समझदारी है। मैं अपनी बात ही कहता हूं —मैं बाज़ार की चाय बहुत ही ज़्यादा मज़बूरी में पीता हूं —साल छः महीने में एक बार …जैसे कि कोई दूध से बनी मिठाई को शिष्टचार के लिए कभी छःमहीने-साल में एक बार खा लेता हूं —इसी पूरी अवेयरनैस के साथ खाता हूं यह मिलावटी घटिया दूध से तैयार की गई है…..बर्फी-वर्फी का तो मतलब ही नहीं, शायद पांच छः वर्ष हो गये हैं।

किसी भी समारोह में जाता हूं तो दूध और दूध से बने पदार्थों को छूना भी पाप समझता हूं –जैसे कि मिल्क-शेक, दही भल्ले, रायता, पनीर वाली कोई भी सब्जी, लस्सी-छाछ, रबड़ी, आइसक्रीम……लिस्ट इतनी लंबी है कि आप यही सोच रहे होंगे कि यार तू फिर जाता ही क्यों है इन समारोहों में …..उस का जवाब है दाल-चावल खाने। अगर हो सके तो आप भी सार्वजनिक जगहों पर इन चीज़ों का त्याग कर के देखिए —अच्छा लगेगा। मुझे देख कर अब बच्चे भी शादी-ब्याहों में इन चीज़ों से दूध रहने लगे हैं।

आजकल यह बाज़ार में जगह जगह मिल्क-शेक बहुत बिकने लग गया है ….समझ नहीं आती कि लिखूं कि नहीं कि क्या आप यह सुनिश्चित करते हैं कि यह दूध पैश्चूराईज़ड है कि नहीं, लेकिन फिर लगता है कि क्या फर्क पड़ता है —जिस दूध का ही पता नहीं कि वह किस मिलावटी स्रोत से आया है ….किसी घटिसा किस्म के पावडर से बना है या और कोई कैमीकल लफड़ा है —कुछ भी तो पता नहीं… ऐसे में पैश्चूराईज़ड है या नहीं, अब किसे इन सब बातों में पड़ने की फ़ुर्सत है।

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि दूध के बारे में बहुत ही ज़्यादा सचेत रहने की ज़रूरत है, आखिर यह हमारी सेहत का मामला है।

अच्छे ग्रेड पाने के लिए इस्तेमाल हो रही दवाईयां

आज की दा हिंदु में एक अच्छा सा ऐडिटोरियल सुबह देख रहा था –सर्व शिक्षा अभियान के बारे में लिखा गया था कि यह जो एक नियम बन गया है कि किसी को पांचवी कक्षा तक फेल ही नहीं करना …ऐसे में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का स्तर बहुत नीचे गिर गया है। अगर आप भी इस संपादकीय लेख को देखेंगे तो आपको भी लगेगा कि उस में बातें ठीक ही कही गई हैं।

चलिए बच्चों के स्कूल के ग्रेड की बात चली है तो मैं आपसे एक खबर ही शेयर कर लूं—बड़ा अजीब सा लगा यह न्यूज़ देख कर। न्यू-यार्क टाइम्स पर खबर छपी है…Risky Rise of Good-Grade Pill.

खबर अच्छी खासी लंबी है..मैं तो पहला पन्ना पढ़ कर ही ऊब सा गया ….इसलिये यह पोस्ट लिखने लग गया।

जब भी यह बच्चों के स्कूल के ग्रेड-व्रेड सुधारने की बात चलती है तो मुझे यहां की अखबारों में दिखने वाले वे विज्ञापन ध्यान में आ जाते हैं जिन में ये दावा किया गया होता है कि इन्हें पढ़ने से स्मरण-शक्ति बढ़ जाती है, एकाग्रता भी बहुत बढ़ जाती है …और भी कईं तरह के वायदे………..लेकिन सब के सब बोगस, पब्लिक को बेवकूफ़ बनाने की बातें।

हां तो जिस खबर की मैं बात कर रहा था वह यह है कि अमेरिका के स्कूली बच्चे अपने ग्रेड को बेहतर करने के लिये कुछ दवाईयों का इस्तेमाल करते हैं.. इन्हें खाने से ये बच्चे रात में जागे रहते हैं और पढ़ाई में उन की एकाग्रता बढ़ जाती है। लेकिन लफड़ा इन दवाईयों का यह है कि ये इस काम के लिये नहीं बनीं हैं —इन का इस्तेमाल डाक्टरों द्वारा –ADHD(Attention deficit hyperactivity disorder) जैसे मरीज़ों का इलाज करने के लिये किया जाता है।

इन दवाईयों का नाम है – amphetamines and methylphenidate. वहां पर ऐसा तो है नहीं कि कोई किसी भी कैमिस्ट से कोई भी दवाई खरीद कर लेनी शुरू कर दे। इस न्यूज़ में बताया गया है कि इन दवाईयों को हासिल करने के लिये अमेरिकी स्टूडेंट्स मानसिक तौर पर बीमार होने का नाटक करते हैं और ऐसा ड्रामा करते हैं जैसे कि उस बीमारी के लक्षण इन में मौजूद हैं ….और फिर डाक्टर इन्हें वे दवाईयां लेने की सलाह दे देता है।

और कुछ सीनीयर छात्र भी ये दवाईयां अपने जूनियर छात्रों को बेचते हैं।

लफड़ा इन दवाईयों का सब से बड़ा यह भी है कि इन्हें लेने वाले छात्र देर-सवेर अन्य प्रकार के नशों के चक्कर में पड़ जाते हैं और तरह तरह के मादक-पदार्थों का व्यसन इन्हें लग जाता है।

खबर का लिंक मैंने ऊपर दे दिया है, अगर चाहें तो पढ़ सकते हैं …वैसे पहला पन्ना ही पढ़ लेंगे तो भी चलेगा। लेकिन चिंता की बात यह है कि हम हर काम में अमेरिका जैसे देशों को नकल करने का बहाना ढूंढते हैं ….अगर हमारे युवा छात्रों ने भी रात रात भर जागने के लिए इन दवाईयों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया तो बड़ा अनर्थ हो जायेगा। यहां तो वैसे ही युवावर्ग तरह तरह के नशे की चपेट में आता जा रहा है।

इसलिए हमें चाहिए कि इस तरह की खबरों के बारे में बच्चों को सचेत करें और ऐसी दवाईयों के दुष्परिणामों के बारे में भी अकसर चर्चा करते रहा करें। आप का क्या ख्याल है? — मुझे पता इसलिये नहीं लगेगा कि आपने फीडबैक न देने की कसम खाई है ….बिल्कुल वैसे …. जैसे कि मैंने गूगल सर्च-ईंजन के लिये लिखने की  की ठान रखी है।

गोरा बनने के जुनून की इंतहा …स्वयं देखिए

इस देश में गोरा रंग पसंद किया जाता है …इस को हम सब जानते हैं। किस तरह से रंग गोरे करने वाली क्रीमें बिकती हैं…झूठे वायदे, झूठे झांसे… विज्ञापनों द्वारा हर तरह का भावनात्मक शोषण किया जाता है कि किसी तरह से बस कंपनी की रंग गोरा करने वाली क्रीमें बिक जाएं। और तो और अब तो पुरूषों के लिये भी रंग गोरा करने वाली क्रीमें आ गई हैं।

बस हम इन गोरा करने वाली क्रीमों के बारे में इतना ही जानते हैं ना……….तो फिर एक बात मेरी भी सुनिये। कभी कभी बीबीसी न्यूज़ भी देखा कीजिए—यह हमें ऐसी ऐसी बातें बताती हैं जो हमारे लिये वास्तव में न्यूज़ होती हैं।

आज सुबह जब मैंने हिंदोस्तानीयों के गोरेपन के प्रेम के ऊपर बीबीसी पर एक लेख देखा तो यही सोचा कि होगा इसी के बारे में कि हम लोग किस कद्र गोरी त्वचा को पाने के लिये आतुर हो जाते हैं ओर इस के लिये कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। सुबह जल्दी थी ड्यूटी पर जाने की …ज़्यादा ध्यान से पढ़ नहीं पाया, शाम को ध्यान आया कि थोड़ा देखूं तो सही हमारे गोरेपन की बातें बीबीसी न्यूज़ पर आखिर क्यों डिस्कस की जा रही हैं।

बात समझ में आते देर न लगी …क्योंकि बात वही भारतीयों के गोरे होने के जुनून की। और साथ में लेखक ने एक वीडियो बारे में भी बता दिया कि उस की मित्र ने उसे लिंक भेजा था कि किस तरह यह गोरेपन का क्रेज़ भारतीय महिलाओं के प्राईव्हेट पार्ट्स को गोरा करने तक पहुंच गया है।

ज़ाहिर सी बात है बड़ा अजीब सा लगा …वैसे मैंने तो इस तरह का विज्ञापन कभी देखा नहीं। न ही उस बीबीसी न्यूज़-स्टोरी में उस का कोई लिंक ही दिया गया था। यू-ट्यूब पर जब जाकर सर्च किया तो यह विज्ञापन दिख ही गया, इसे यहां दे रहा हूं….इस यू-ट्यूब वीडियो के साथ जो विवरण लिखा गया है, उसे भी पढ़ने पर बात पूरी स्पष्ट हो जाएगी।

अब जब एक बार आप इस विज्ञापन को देख लेंगे तो उस के बाद भी क्या मेरे कहने लायक कुछ रह जायेगा। यह विज्ञापन ही बहुत कुछ कह देगा और फिर भी कुछ ज़्यादा विस्तार से पढ़ना चाहें तो इस लिंक पर क्लिक कर के अंग्रेज़ी में देख लिजियेगा … Has skin Whitening in India gone too far?

भांग पीने से होता है कहीं ज़्यादा नुकसान

भांग के बारे में मेरा ज्ञान बहुत सीमित है —बस, भांग का नाम आते ही मुझे याद आ जाता है वह सुपर-डुपर गीत—जय जय शिव शंकर…कांटा लगे न कंकर और दम मारो दम…मिट जाये गम। इस के साथ ही ध्यान में आ जाता है भारत का एक धार्मिक त्योहार जिस में भांग को घोट कर पीने की एक परंपरा सी बना रखी है… कुछ लोग होली के दिन भांग के पकौड़े भी खाते-खिलाते हैं —ऐसे ही एक बार किसी ने हमारे होस्टल में भी शरारत की थी – और बहुत से छात्रों की हालत इतनी खराब हो गई थी कि उन्हें अस्पताल में दाखिल करना पड़ा था।

और एक ध्यान और भी आता है भांग का नाम लेने से —कुछ नशा करने वाले लोग कुछ सुनसान जगहों पर अपने आप उग आए भांग के पौधों से पत्ते उतार के उन्हें हाथों से मसल मसल कर फिर उन्हें कागज में लपेट कर एक सिगरेट-नुमा डंडी सी तैयार कर उसे पीते हैं। और तो और धार्मिक स्थानों पर कुछ तथाकथित साधू का वेश धारण किये हुये लोग भी भांग का खूब प्रयोग करते हैं।

हम तो हैं हिंदोस्तानी –हमारी बात कुछ और है …और अमीर देशों में रहने वाले गोरे लोगों की बात कुछ और ..वे साधन-सम्पन्न लोग हैं, कोई भी शौक पाल सकते हैं। लेकिन मुझे कल ही पता चला कि वहां पर भी भांग के सिगरेट पीने का जबरदस्त क्रेज़ है…. बहुत ही ज्यादा हैरानगी हुई यह जान कऱ।

ब्रिटेन के चिकित्सा वैज्ञानिकों ने यह रिसर्च की है कि यू के में भांग पीने वाले यही समझते हैं कि यह सिगरेट के मुकाबले में बिलकुल भी नुकसान दायक नहीं है।

लेकिन सच यह है कि भांग पीना भी सिगरेट पीने की तरह बहुत ही ज्यादा नुकसान दायक है। यह इसलिये है कि इसे पीने वाले इस का कश बहुत गहरा खींचते हैं जिस की वजह से सिगरेट के मुकाबले में कहीं ज्यादा टॉर और कार्बनमोनोआक्साईड गैस वे फेफड़े के अंदर खींच लेते हैं। इसलिये फेफड़े का कैंसर, ब्रोंकाइटिस और टी बी जैसे रोग पैदा होने का डर तो बना ही रहता है।

भांग का पौधा

रिसर्च से यह भी पता चला है कि एक वर्ष तक रोज़ाना भांग का एक सिगरेट पीने से फेफड़े का कैंसर होने का जो रिस्क होता है वह उतना ही है जितना एक वर्ष तक रोज़ाना बीस सिगरेट पीने से होता है।

आज जब मैं बी बी सी न्यूज़ पर यह खबर पढ़ रहा था तो यही सोच रहा था कि आखिर क्यों लोग विदेशों में जाकर पढ़ाई करने के लिये आतुर होते हैं….. ठीक है वहां कुछ आधुनिक ज्ञान सीख लेते होंगे, लेकिन बहुत ही और चीज़ें भी तो सीख ही लेते होंगे ….अब यह भांग पीने की ही बात देखिये, मैं रिपोर्ट में यह पढ़ कर दंग रह गया कि वहां पर लगभग 40 प्रतिशत लोग इस का इस्तेमाल अपने जीवनकाल के दौरान कर चुके हैं।

अगर पर इस प्रामाणिक शोध के बारे में विस्तार से पढ़ना चाहें तो इस लिंक पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं….Health Risks of Cannabis ‘underestimated’ , experts warn.. जो भी हो, मेरे लिये तो यह एक बहुत बड़ी खबर थी। मुझे लगता था कि यह केवल हिंदोस्तान की ही समस्या है …. लेकिन यहां तो हमाम में सारे …..!!

 

बार बार सी.टी स्केन बढ़ा देता है कैंसर रिस्क

अकसर ऐसे मरीज़ दिख जाते हैं जो डाक्टर को आकर स्वयं कहते हैं कि उन्हें फलां फलां तकलीफ़ है, इसलिये उन का सी.टी स्केन करवा कर देखें कि क्या बात है, या अकसर ऐसे लोग भी दिखते हैं जो डाक्टर के पास जाकर कहते ही यही हैं कि उन का सिरदर्द लंबे समय से ठीक नहीं हो रहा, वे सी.टी स्केन करवाना चाहते हैं।

पहली तो बात यह है कि किसी भी क्वालीफाईड चिकित्सक को यह पता है कि उस ने मरीज़ की किस शारीरिक तकलीफ़ के लिये कौन सा टेस्ट करवाना है। इसलिए स्वयं जाकर डाक्टर को कहना कि उस का सी.टी स्केन करवा कर देख लें, एम.आर.आई करवा के देख लें, यह बड़ा अटपटा सा लगता है।

अटपटा तो है ही, यह सेहत के लिए भी बहुत खतरनाक है क्योंकि पिछले कईं वर्षों से हमें चिकित्सा वैज्ञानिक सचेत कर रहे हैं कि बार बार सी.टी स्केन करवाने की वजह से बच्चों एवं युवाओं में कैंसर होने का रिस्क बढ़ जाता है। आज भी बीबीसी न्यूज़ की साइट पर भी ऐसी ही एक खबर पढ़ी जिस का शीर्षक और लिंक यहां दे रहा हूं — CT scans on children could ‘triple brain cancer risk.’

चलिए, इसी खबर के बहाने कुछ बिंदुओं पर चर्चा ही कर लेते हैं।
    उदाहरण लें कि मरीज़ ने किसी कार्पोरेट पांच सितारा अस्पताल के किसी विशेषज्ञ से इस तरह का टेस्ट करवाने की ख्वाहिश ज़ाहिर की है, ऐसे में क्या आपको लगता है कि उस की इच्छा पूरी नहीं की जाएगी। कुछ केसों में हो सकता है कि उसे समझा बुझा दिया जाए लेकिन अगर मरीज़ का दबाव ज़्यादा होगा तो उसे इंकार कर के कौन बिना वजह पंगा लेना चाहेगा? —- आप को क्या लगता है कि ऐसा होता होगा कि नहीं, इस का जवाब मैं आप के ऊपर छोड़ता हूं।

    बहुत बार सरकारी अस्पतालों में भी किसी तरह की जान-पहचान का कोई जुगाड़ ढूंढ कर इस तरह का टेस्ट करवाने की इच्छा प्रकट की जाती है…. हम सब सामाजिक प्राणी हैं, कितनी बार ऐसे मिलने वालों को मना किया जाता होगा, यह भी सोचने की बात है!!
    कुछ सरकारी अस्पतालों में तो विभिन्न तरह के दबावों के प्रभाव में आकर चिकित्सकों को कईं बार ये टेस्ट लिखने पड़ते हैं, यह एक बिल्कुल सच्चाई है।

टेस्ट महंगें है, सरकारी इस का खर्च भर रही है या इस पर होने वाले खर्च की प्रतिपूर्ति (रिएम्बर्समैंट) कर रही है, इस का यह मतलब तो नहीं कि बिना वजह होने वाले टेस्ट के नुकसान नहीं होंगे ….बिल्कुल बारातियों वाली बात की माल पराया है, पेट तो अपना है!! ….. यहां तो माल भी अपना ही है, अपने ही टैक्स के पैसे ही से तो ये अस्पताल चल रहे हैं।

    अब एक मुद्दा यह है कि कुछ अस्पताल केवल अपने द्वारा बताए गए सेंटरों द्वारा किये गये सी.टी स्केन आदि ही “ठीक” मानते हैं, इसलिये मरीज़ों को बार बार इन टेस्टों के चक्कर में पड़ना पड़ता है। पैसे के साथ साथ सेहत की भी बरबादी। इस मुद्दे पर भी विचार करने की ज़रूरत है।

अगर ऐसा कहीं हो रहा है तो मेरे विचार में किसी के कहने पर दोबारा सी.टी स्केन आदि करवाने की बजाए अपने चिकित्सक को ही बदलने की कोशिश की जानी  चाहिए।

तो क्या सच में सी.टी इतना बड़ा विलेन है? — यह किसने कहा ……बल्कि यह तो बीमार लोगों के लिये एक वरदान है, पहले अंदरूनी बीमारियां बहुत ज़्यादा फैलने पर ही पकड़ में आया करती थीं, अब इस की वजह से जल्दी ही इन का पता चल जाता है, एमरजैंसी परिस्थितियों में भी इस टेस्ट की विशेष भूमिका है।

लेकिन वही बात है जैसे चाकू से चाहें तो हम आम के टुकड़े काट कर लाभ प्राप्त कर लें और चाहें तो हाथ में चोट लगवा लें। बनी तो ये चीज़ें हमारी भलाई के लिये हैं, लेकिन जब इन पर लालच, कपट रूपी कलई चढ़ जाती है तो फिर सारी गड़बड़ हो जाती है। और ऊपर से पब्लिक के मन में तरह तरह की भ्रांतियां कि जैसे यह टेस्ट करवाने से ही बीमारी पकड़ी जाएगी, वरना डाक्टर को कुछ पता नहीं चलेगा।

लेकिन ऐसा नहीं है…. डाक्टर आखिर डाक्टर है, उसे हमारे अंदर-बाहर दोनों की खबर है, गुज़रे ज़माने में हमारे मुंह के अंदर झांक कर, केवल नब्ज टटोलने पर अगर वह बहुत कुछ जान सकता था तो आज भी उस में वह हुनर कायम है, केवल बात यह है कि हम उसे इसका इस्तेमाल करने का अवसर तो दें और फिर भी अगर उसे किसी तरह के टेस्ट सी टी स्केन आदि करवाने की ज़रूरत महसूस होगी तो वह स्वयं ही कह देगा।

तो इस स्टोरी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि डाक्टर के पास जाकर स्वयं ही किसी तरह के टेस्ट आदि की मांग भूल कर भी न कर बैठे, इस में हमारा ही नुकसान है। उसे अपना काम करने दें…..इंशा-अल्ला आप भले-चंगे हो जाएंगे। आम आदमी को हर कदम पर भ्रम की दलदल में फंसाने वाली इन मार्कीट शक्तियों की ऐसी की तैसी …….. आप की सेहत के लिये ढ़ेरों शुभकामनाएं, यूं ही मुस्कुराते रहिए।

मुस्कुराने की बात पर यह गीत याद आ गया …