बार बार सी.टी स्केन बढ़ा देता है कैंसर रिस्क

अकसर ऐसे मरीज़ दिख जाते हैं जो डाक्टर को आकर स्वयं कहते हैं कि उन्हें फलां फलां तकलीफ़ है, इसलिये उन का सी.टी स्केन करवा कर देखें कि क्या बात है, या अकसर ऐसे लोग भी दिखते हैं जो डाक्टर के पास जाकर कहते ही यही हैं कि उन का सिरदर्द लंबे समय से ठीक नहीं हो रहा, वे सी.टी स्केन करवाना चाहते हैं।

पहली तो बात यह है कि किसी भी क्वालीफाईड चिकित्सक को यह पता है कि उस ने मरीज़ की किस शारीरिक तकलीफ़ के लिये कौन सा टेस्ट करवाना है। इसलिए स्वयं जाकर डाक्टर को कहना कि उस का सी.टी स्केन करवा कर देख लें, एम.आर.आई करवा के देख लें, यह बड़ा अटपटा सा लगता है।

अटपटा तो है ही, यह सेहत के लिए भी बहुत खतरनाक है क्योंकि पिछले कईं वर्षों से हमें चिकित्सा वैज्ञानिक सचेत कर रहे हैं कि बार बार सी.टी स्केन करवाने की वजह से बच्चों एवं युवाओं में कैंसर होने का रिस्क बढ़ जाता है। आज भी बीबीसी न्यूज़ की साइट पर भी ऐसी ही एक खबर पढ़ी जिस का शीर्षक और लिंक यहां दे रहा हूं — CT scans on children could ‘triple brain cancer risk.’

चलिए, इसी खबर के बहाने कुछ बिंदुओं पर चर्चा ही कर लेते हैं।
    उदाहरण लें कि मरीज़ ने किसी कार्पोरेट पांच सितारा अस्पताल के किसी विशेषज्ञ से इस तरह का टेस्ट करवाने की ख्वाहिश ज़ाहिर की है, ऐसे में क्या आपको लगता है कि उस की इच्छा पूरी नहीं की जाएगी। कुछ केसों में हो सकता है कि उसे समझा बुझा दिया जाए लेकिन अगर मरीज़ का दबाव ज़्यादा होगा तो उसे इंकार कर के कौन बिना वजह पंगा लेना चाहेगा? —- आप को क्या लगता है कि ऐसा होता होगा कि नहीं, इस का जवाब मैं आप के ऊपर छोड़ता हूं।

    बहुत बार सरकारी अस्पतालों में भी किसी तरह की जान-पहचान का कोई जुगाड़ ढूंढ कर इस तरह का टेस्ट करवाने की इच्छा प्रकट की जाती है…. हम सब सामाजिक प्राणी हैं, कितनी बार ऐसे मिलने वालों को मना किया जाता होगा, यह भी सोचने की बात है!!
    कुछ सरकारी अस्पतालों में तो विभिन्न तरह के दबावों के प्रभाव में आकर चिकित्सकों को कईं बार ये टेस्ट लिखने पड़ते हैं, यह एक बिल्कुल सच्चाई है।

टेस्ट महंगें है, सरकारी इस का खर्च भर रही है या इस पर होने वाले खर्च की प्रतिपूर्ति (रिएम्बर्समैंट) कर रही है, इस का यह मतलब तो नहीं कि बिना वजह होने वाले टेस्ट के नुकसान नहीं होंगे ….बिल्कुल बारातियों वाली बात की माल पराया है, पेट तो अपना है!! ….. यहां तो माल भी अपना ही है, अपने ही टैक्स के पैसे ही से तो ये अस्पताल चल रहे हैं।

    अब एक मुद्दा यह है कि कुछ अस्पताल केवल अपने द्वारा बताए गए सेंटरों द्वारा किये गये सी.टी स्केन आदि ही “ठीक” मानते हैं, इसलिये मरीज़ों को बार बार इन टेस्टों के चक्कर में पड़ना पड़ता है। पैसे के साथ साथ सेहत की भी बरबादी। इस मुद्दे पर भी विचार करने की ज़रूरत है।

अगर ऐसा कहीं हो रहा है तो मेरे विचार में किसी के कहने पर दोबारा सी.टी स्केन आदि करवाने की बजाए अपने चिकित्सक को ही बदलने की कोशिश की जानी  चाहिए।

तो क्या सच में सी.टी इतना बड़ा विलेन है? — यह किसने कहा ……बल्कि यह तो बीमार लोगों के लिये एक वरदान है, पहले अंदरूनी बीमारियां बहुत ज़्यादा फैलने पर ही पकड़ में आया करती थीं, अब इस की वजह से जल्दी ही इन का पता चल जाता है, एमरजैंसी परिस्थितियों में भी इस टेस्ट की विशेष भूमिका है।

लेकिन वही बात है जैसे चाकू से चाहें तो हम आम के टुकड़े काट कर लाभ प्राप्त कर लें और चाहें तो हाथ में चोट लगवा लें। बनी तो ये चीज़ें हमारी भलाई के लिये हैं, लेकिन जब इन पर लालच, कपट रूपी कलई चढ़ जाती है तो फिर सारी गड़बड़ हो जाती है। और ऊपर से पब्लिक के मन में तरह तरह की भ्रांतियां कि जैसे यह टेस्ट करवाने से ही बीमारी पकड़ी जाएगी, वरना डाक्टर को कुछ पता नहीं चलेगा।

लेकिन ऐसा नहीं है…. डाक्टर आखिर डाक्टर है, उसे हमारे अंदर-बाहर दोनों की खबर है, गुज़रे ज़माने में हमारे मुंह के अंदर झांक कर, केवल नब्ज टटोलने पर अगर वह बहुत कुछ जान सकता था तो आज भी उस में वह हुनर कायम है, केवल बात यह है कि हम उसे इसका इस्तेमाल करने का अवसर तो दें और फिर भी अगर उसे किसी तरह के टेस्ट सी टी स्केन आदि करवाने की ज़रूरत महसूस होगी तो वह स्वयं ही कह देगा।

तो इस स्टोरी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि डाक्टर के पास जाकर स्वयं ही किसी तरह के टेस्ट आदि की मांग भूल कर भी न कर बैठे, इस में हमारा ही नुकसान है। उसे अपना काम करने दें…..इंशा-अल्ला आप भले-चंगे हो जाएंगे। आम आदमी को हर कदम पर भ्रम की दलदल में फंसाने वाली इन मार्कीट शक्तियों की ऐसी की तैसी …….. आप की सेहत के लिये ढ़ेरों शुभकामनाएं, यूं ही मुस्कुराते रहिए।

मुस्कुराने की बात पर यह गीत याद आ गया …

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