कच्चे दूध का मुद्दा तो पीछे छूट गया लगता है..

जब हम लोग 25 वर्ष पहले माइक्रोबॉयोलॉजी पढ़ते थे तो दूध की पैश्चूराईज़ेशन के बारे में पढ़ा—वह यह कि गाय, भैंस, बकरी ..इन से मिलने वाले दूध को पैश्चूराईज़ेशन करने के बाद ही सेवन किया जाना चाहिए।

बचपन में देखते थे कि हमारे पड़ोस में एक सरकारी प्राइमरी स्कूल था जिस में दोपहर को सैंकड़ों दूध के पाउच आ जाते थे जिन्हें वे बच्चे मिड-डे मील के तौर पर पीते थे। अब सोचता हूं तो लगता नहीं कि वह दूध पैश्चूराईज़्ड होगा। पैश्चूराईज़ेशन का मतलब है कि कच्चे दूध को एक विशेष समय तक विशेष डिग्री तापमान तक उबलने देना ताकि उस में हानिकारक जीवाणु जैसे कि ई-कोलाई, सालमोनैला, लिस्टिरिया आदि नष्ट हो जाएं और दूध पीने लायक बन जाए।

लेकिन मुझे याद है कि हमें यह भी पढ़ाया जाता था कि बिना पैश्चूराईज़ेशन के दूध लेने से एक तरह की टी बी –जिसे बोवाईन ट्यूबरक्लोसिस – Bovine Tuberculosis –भी कहते हैं… हो सकती है जिस में हमारी आंते टीबी से ग्रस्त हो सकती हैं।

आज जब सुबह यह न्यूज़-रिपोर्ट पढ़ रहा था तो यही सोचा कि शायद विकसित देशों में पशुओं की टी बी पर पूरा काबू पा लिया होगा जो इस बीमारी का ज़िक्र तक ही नहीं है।

जब बिल्कुल छोटे थे तो देखते थे कि अकसर लोग गाय-भैंस के नीचे बैठ कर “डोके” लिया करते थे —यह पंजाबी का शब्द है जिस का मतलब है गाय, भैंस के थनों के सामने बैठ कर दूध की धारें सीधा मुंह में लेना…. इस तरह से दूध के पीने को बहुत पौष्टिक माना जाता था ..बस, सिर्फ़ एक भ्रांति और क्या!!

आज जब मैं फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा प्रकाशित यह रिपोर्ट देख रहा था जिस का लिंक मैं यहां दे रहा हूं तो यही सोच रहा था कि अब भारत में तो कच्चे दूध की बात ही शायद कभी सुनी नहीं। यहां पर दूध इतना ज़्यादा मिलावटी बिकने लगा है कि अब यह फोकस कहां रहा है कि दूध उबला भी हुआ है या नहीं!! FDA link –> Raw Milk And Food Safety … इस लिंक पर क्लिक करते ही आप जिस वेबपेज पर पहुंचेंगे, वहां पर जो वीडियो लगा हुआ है वह भी ज़रूर देखिए।

नकली, घटिया किस्म के पावडर से तैयार किया गया दूध धड़ल्ले से बिक रहा है — मीडिया कुछ दिन चीखता-चिल्लाता है, लेकिन वह भी क्या करे, केवल दूध पर ही तो अटका नहीं रह सकता। लेकिन इतनी बात तो अब मैं भी समझ गया हूं कि यह बाज़ार में बिकने वाले पनीर, मिठाईयां, मावा सब के सब (सब के सब की बजाए अधिकतर लिखना मुझे अपनी सेफ्टी के लिए ठीक लगता है!!) ..पावडर दूध से तैयार किये जा रहे हैं….वरना इतना दूध कैसे गर्मी के दिनों में भी इतनी आसानी से मिल जाता है।

अब तो लगता है कि दूध की क्वालिटी के बारे में बात ही न की जाए— यहां यह ही नहीं पता कि किस मिलावटी दूध का सेवन किया जा रहा है, ऐसे में पैश्चूराईज़ेशन की बात को क्या छेड़ें !!

दूध के ऊपर कुछ भी लिखना अब बड़ा फुद्दू सा काम लगता है …कारण यह कि हर तरफ़ धड़ल्ले से मिलावटी दूध, कैमीकल दूध बिक रहा है …पब्लिक इसे पी-पी कर अपनी सेहत तबाह किये जा रही है।

बस, यह लिख कर अपनी बात खत्म करता हूं कि सावधानी बरतने में ही समझदारी है। मैं अपनी बात ही कहता हूं —मैं बाज़ार की चाय बहुत ही ज़्यादा मज़बूरी में पीता हूं —साल छः महीने में एक बार …जैसे कि कोई दूध से बनी मिठाई को शिष्टचार के लिए कभी छःमहीने-साल में एक बार खा लेता हूं —इसी पूरी अवेयरनैस के साथ खाता हूं यह मिलावटी घटिया दूध से तैयार की गई है…..बर्फी-वर्फी का तो मतलब ही नहीं, शायद पांच छः वर्ष हो गये हैं।

किसी भी समारोह में जाता हूं तो दूध और दूध से बने पदार्थों को छूना भी पाप समझता हूं –जैसे कि मिल्क-शेक, दही भल्ले, रायता, पनीर वाली कोई भी सब्जी, लस्सी-छाछ, रबड़ी, आइसक्रीम……लिस्ट इतनी लंबी है कि आप यही सोच रहे होंगे कि यार तू फिर जाता ही क्यों है इन समारोहों में …..उस का जवाब है दाल-चावल खाने। अगर हो सके तो आप भी सार्वजनिक जगहों पर इन चीज़ों का त्याग कर के देखिए —अच्छा लगेगा। मुझे देख कर अब बच्चे भी शादी-ब्याहों में इन चीज़ों से दूध रहने लगे हैं।

आजकल यह बाज़ार में जगह जगह मिल्क-शेक बहुत बिकने लग गया है ….समझ नहीं आती कि लिखूं कि नहीं कि क्या आप यह सुनिश्चित करते हैं कि यह दूध पैश्चूराईज़ड है कि नहीं, लेकिन फिर लगता है कि क्या फर्क पड़ता है —जिस दूध का ही पता नहीं कि वह किस मिलावटी स्रोत से आया है ….किसी घटिसा किस्म के पावडर से बना है या और कोई कैमीकल लफड़ा है —कुछ भी तो पता नहीं… ऐसे में पैश्चूराईज़ड है या नहीं, अब किसे इन सब बातों में पड़ने की फ़ुर्सत है।

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि दूध के बारे में बहुत ही ज़्यादा सचेत रहने की ज़रूरत है, आखिर यह हमारी सेहत का मामला है।

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