ज़ोर का झटका हाय ज़ोरों से लगा ….

बहुत पुरानी बात है, बीस-पच्चीस वर्ष पहले की …उन दिनों मैं मैडीकल कॉलेज रोहतक में सर्विस करता था। एक बार गर्दन में ऐसा बल पड़ा कि वह ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा था, दवाईयां ली, सेक करवाया, फ़िज़ियोथैरिपि में भी इलाज करवाया लेकिन नहीं …. गर्दन घुमाने पर गर्दन सहन नहीं हो रहा था।

बस, जैसा अकसर होता है भारत में …किसी की तकलीफ़ हम से देखी नहीं जाती। बहुत से शुभचिंतकों ने अपने अपने जुगाड़ बतलाने शुरु किये। उन में से एक यह था कि फलां फलां मोहल्ले में एक बंदा रहता है उसे यह वरदान है वह इस तरह के बल-वल तुरंत निकाल देता है। मरता क्या न करता, पहुंच गया जी उस के पास।

उस बंदे की शरण में पहुंच तो गया लेकिन डर बहुत लग रहा था, इसी बात को खौफ़ कि कहीं इस का झटका इधर-उधर लग गया तो गर्दन के मनके ही कहीं हिल न जाएं। वह बंदा अनाज मंड़ी में अनाज की बोरियां ढोने का काम करता था और शाम के समय अपने इस ‘मिशन’ में लगा रहता था।

तो लो जी वह बाबा जी बैठ गये पलंग पर और मुझे उन्होंने बैठा दिया अपने पलंग के किनारे पर … अब जब तक उन्होंने अपना आप्रेशन शुरू नहीं किया था, उस समय मुझे दर्द से इतना दुःख नहीं था जितना इस बात से था कि यार, कहीं इस ने कोई लफड़ा कर दिया तो मैं लोगों को कुछ बता भी नहीं पाऊंगा — इसी डर से कि लोग कहेंगे कि भाई तू तो पढ़ा लिखा हो कर किन चक्करों में पड़ गया।

खैर, मैं एक बार जमीन पर बिछे टाट पर बैठ कर उठने की हिमाकत नहीं कर सकता था, सोचने लगा कि ओखली में दिया सर तो मूसलों से डर कैसा — उस शख्स ने मेरी गर्दन पर थोड़ा सा तेल लगाया, और अगले ही पल एक हल्का सा झटका दिया – और मेरी दर्द छू-मंतर।
मैं अकसर बहुत से मरीज़ों को यह किस्सा सुनाता हूं … आज भी इस का ध्यान इसलिये आ गया कि बीबीसी न्यूज़ पर अभी अभी यह खबर देखी कि यह गर्दन को घुमाने-फिराने वाले इलाज से परेशानी बढ़ सकती है। इस खबर का शीर्षक और लिंक यह रहा …Spine manipulation for neck pain ‘inadvisable’.

मुझे इस खबर को पढ़ कर व्यक्तिगत रूप से यही लग रहा है कि इन पारंपरिक इलाज करने वालों और चिकित्सा वैज्ञानिकों में भी हमेशा छत्तीस का आंकड़ा ही बना हुआ है। आम तौर पर इस भावना में डूबे रहने की वजह से कि मैं सब कुछ जानता हूं ….तुम्हें कुछ नहीं पता … कभी भी इन दोनों लोगों का आपस में सामंजस्य बन नहीं पाया….. इन पारंपरिक इलाज करने वालों के पास सदियों का तज़ुर्बा है …लेकिन वैज्ञानिक अपनी जगह सच कह रहे हैं …जैसे कि इसी खबर को ही ले लीजिए …अगर वे कह रहे हैं कि गर्दन को ज़ोर से झटका लगने से कुछ पेचीदगीयां पैदा हो सकती हैं….गले की नसें में जटिलता उत्पन्न हो सकती है, क्या हम इन की बातों को झुठला सकते हैं, नहीं…नहीं..बिलकुल नहीं।

तो फिर आम आदमी आखिर करे क्या, फ़िलहाल तो ईश्वर से यही प्रार्थना करे कि इन दोनों समुदायों में एक दूसरे से सीखने का ज़ज्बा पैदा हो ताकि हम लोग इन दोनों के अनुभव से लाभांवित हो सकें…. तब तक इस गीत को ही सुन लें ….ज़ोर का झटका, हाय ज़ोरों से लगा…… संगीत-वीत अच्छा है इस का … शायद इसे सुनने से आप के गर्दन का दर्द कुछ समय के लिये अपने आप ही ठीक हो जाए…..

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