प्लास्टिक की वाटर-बोतल फ्रिज में रखते समय सोचें ज़रूर ….

जब हम बिल्कुल छोटे थे और फ्रिज नहीं था घर में तो एक आईसबाक्स में बर्फ रख कर उस पर कांच की बोतलें रख दी जाती थीं.. साथ में फल-फ्रूट भी वहीं रख दिया जाता था।

फिर 10-12 साल के हुए तो फ्रिज आ गया लेकिन बोतलें वहीं कांच वाली पानी पीने के लिए इस्तेमाल की जाती थीं। और अधिकतर ये दारू की खाली बोतलें ही हुआ करती थीं….और उन दिनों अगर वैट-69 की खाली बोतल में पानी ठंडा रखा जाता था तो यह भी एक स्टेट्स-सिंबल से कम नहीं होता था।

और उसी जमाने में हम लोग देखा करते थे कि बच्चों को दूध पिलाने वाली बोतलें भी कांच की ही हुआ करती थीं …और हर रोज़ उन की एक लंबे से ब्रुश से सफ़ाई की जाती थी।

यह जो जब से प्लास्टिक आ गये हैं, बहुत गड़बड़ हो गई है। सब कुछ प्लास्टिक का आने से पर्यावरण का नाश तो हुआ ही है, साथ ही साथ हमारी सेहत पर भी बहुत प्रभाव पड़ा है।

कुछ चीज़ें हम लोग बस बिना सोच विचार के करते चले जाते हैं …जैसे कि पानी को स्टोर करने के लिए प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल किये जाना। अकसर हम लोग अब तक यही सोचते रहे हैं ना कि जो पतली प्लास्टिक की थैलियां (प्लास्टिक की पन्नी) होती हैं वही पर्यावरण खराब करती हैं, अगर उन में हम कुछ खाने-पीने का सामान बाज़ार से लाते हैं तो यह हमारी सेहत के लिए खराब है।

कभी प्लास्टिक की बोतलों की तरफ़ जिन में हम लोग पानी भर कर फ्रिज में रखते हैं उस के बारे में तो कहां सोचते हैं। दरअसल कुछ दिन मैं नेट पर कहीं देख रहा था कि आट्रेलिया में बहुत बवाल मचा हुआ था कि बच्चों की जो प्लास्टिक की दूध वाली बोतलें हैं वे शिशुओं की सेहत के लिए अच्छी नहीं है… इन में से निरंतर Bisphenol-A (BPA) नामक कैमीकल निकलता रहता है जो मानव के लिए बहुत ही हानिकारक है।

मैं इतने दिनों तक यही सोच कर परेशान हो रहा था कि आट्रेलिया में निःसंदेह जो प्लास्टिक इस्तेमाल किया जा रहा है वह हमारे यहां के प्लास्टिक से तो उत्तम ही होगा। इस में तो कोई शक नहीं होना चाहिए।

लेकिन जिस तरह से हम इतने वर्षों से प्लास्टिक की बोतलों में पानी फ्रिज में रखते हैं ….यह भी एक गड़बड़ मामला तो है ही। और एक बात, प्लास्टिक की बोतल में पानी पीना कोई ऐसी बात भी नहीं कि इसे एक बार पीने से आदमी बीमार हो जाता है, लेकिन चूंकि ये कईं कईं वर्षों, कईं दशकों तक चलता रहता है इसलिए यह हमारे शरीर में बीमारीयां तो लाता ही है।

इस में कोई शक नहीं है कि प्लास्टिक की बोतलों में निरंतर पानी पीते रहना सेहत के लिए ठीक नहीं है, इसलिए मैंने गूगल अंकल के साथ ज़्यादा माथा-पच्ची नहीं की। बस एक लिंक दिखा जिसे यहां लगा रहा हूं —इस एक लिंक पर भी इस विषय के बारे में काफ़ी जानकारी दी गई है —Are plastic bottles a health hazard? –इस में अच्छे से बताया गया है कि इन बोतलों की वजह से हम कौन कौन सी आफ़त मोल ले रहे हैं !!

अच्छा एक बात शेयर करूं — जब किसी बात के बारे में पता चलता है तो उस का फायदा तो होता ही है। जब मैंने इस बात की चर्चा घर में की तो सब से पहले तो यही प्रतिक्रिया की आज कल के फ्रिज कांच की बोतलों का वजन कहां सह पाते हैं…लेकिन अगले दो चार दिनों में पानी के लिए कांच की बोतलें भी फ्रिज में दिखने लगीं। बड़ा अच्छा लगा यह देख कर…मैं कांच की बोतल से ही पानी लेना पसंद करता हूं …एक बात नोटिस की है कि सेहत के लिए तो यह सेहतमंद है ही, इस का स्वाद भी प्लास्टिक की बोतल वाले पानी से कहीं बेहतर होता है।

हमारे फ्रिज में रखी पानी की बोतलें — इस बात का प्रूफ़ कि हम ने वापिस कांच की बोतलों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है …..अब आप कब यह नेक काम कर रहे हैं? मुझे लिखियेगा…..

लिखते लिखते ध्यान आया कि यार, इतनी क्रांतिकारी सी बात लिख रहा हूं तो इस से पहले एक बार अपने घर के फ्रिज में झांक कर तो देख लूं ….और जो देखा उस की तस्वीर यहां लगा रहा हूं। कांच की बोतलें आप देख सकते हैं।

एक बात और ..प्लास्टिक की बोतलें महंगी से महंगी हमारी सेहत के लिए खराब तो हैं ही , लेकिन हम लोग एक और बहुत गलत काम करते रहते हैं …ये जो मिनरल वाटर की बोतलें, कोल्ड-ड्रिंक्स की खाली प्लास्टिक की बोतलें होती हैं ये एक बार ही इस्तेमाल करने के लिए बनती हैं, लेकिन इन्हें भी कितने समय तक बार बार पीने वाला पानी पीने के लिए हम इस्तेमाल करते रहते हैं।

बस जाते जाते यही बात कहना चाहता हूं अगर आपने कल से अपने फ्रिज में कम से कम एक कांच की बोतल ही रखनी शुरु कर दी तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा, हो सकेगा तो कमैंट में लिखियेगा।

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अब मशीनें खरीदी गईं हैं तो कमाऊ पूत भी बनेंगी …

कुछ दिन पहले मैं अंबाला अपने एक मित्र के पास गया हुआ था – घर पर नहीं था, बीवी के साथ कहीं गया हुआ था उस का चेक-अप करवाने।
घर आया तो बताने लगा कि जिस जगह वह अपनी श्रीमति का चेकअप करवाने गया था, वहां बता रहा था कोई मशीन आई हुई थी। बता रहा था कि अस्पताल की डाक्टर कहने लगी थी कि यह एक टैस्ट हो रहा है—वैसे तो बाहर एक हज़ार का होता है लेकिन आज यह केवल एक सौ रूपये में होगा। आप दोनों ही यह टेस्ट करवा लें।

बता रहा था कि अब मैं क्या कहता? –सो, उस ने भी वह टैस्ट करवा लिया। टैस्ट का नाम उस ने बताया – बी.एम.डी –अर्थात् ऐसी मशीन जिस के द्वारा किसी की हड्डीयों की सेहत का पता चलता है— और मेरा मित्र एवं उन की अर्धांगिनी दोनों एकदम स्वस्थ —इसलिए मैंने उन की रिपोर्ट देखनी तक ज़रूरी नहीं समझी। वैसे वह बाद में बता रहा था कि दोनों का टैस्ट नार्मल आया है।

इस तरह के हड्डी की सेहत को जांचने के लिए कैंपों के बारे में मैं पहले भी सुन चुका हूं… हमारे शहर में भी कईं बार लग चुके हैं –
सेहत से संबंधित विषयों की जानकारी पाने के लिए एक अति विश्वसनीय साइट है – मैडलाइन प्लस। इस साइट पर इस टैस्ट से संबंधित जानकारी आप इस लिंक पर क्लिक कर के जान सकते हैं — Bone mineral density test.

इस के बारे में कोई विशेष चर्चा मैं इसलिए नहीं करना चाहता क्योंकि मैं अकसर सोचता हूं कि हमारे देश के लोगों को विशेषकर महिलाओं को इस टैस्ट से कहीं ज़्यादा अच्छा खाने की ज़रूरत है। काश, ये टैस्ट करवाने वाली महिलाएं 100 रूपये के गुड़-चने ही खा लें तो कुछ तो बात बन जाए।

बात केवल इतनी सी है कि क्या हमें किसी महिला को देख कर यह पता नहीं चलता कि वह कितनी कमज़ोर है, कितनी बलिष्ठ है, कितना परिश्रम करने वाली है….और भी सेहत से जुड़ी बहुत सी जानकारियां किसी को भी देखने से लग जाती हैं। ऐसे में कैंपों में सभी का टैस्ट करवाने का क्या औचित्य है, यह मेरी समझ से परे है।

चलिए किसी आर्थिक तौर पर कमज़ोर वर्ग से संबंधित महिला का आपने टैस्ट कर लिया — रिपोर्ट आ गई कि उस की हड्डीयां कमज़ोर हैं, तो आप उसे इस कमज़ोरी को दूर करने के लिए खाध्य पदार्थ भी मुहैया करवाएंगे? –नहीं ना, वह तो वही खाएगी जो वर्षों से खाती आ रही है … इस की बजाए कितना अच्छा हो कि उस के खाने पीने की आदतों के बारे में पूछ कर कुछ न कुछ उन में आवश्यक सुधारों की चर्चा कर लें ताकि कुछ तो कैल्शीयम जो वह ले रही है उस के शरीर में समा सके।

ऐसे ही अंधाधुंध टैस्ट किए जाने से भला क्या हासिल होने वाला है?— कमज़ोर हड्डीयां होती हैं – 65 के ऊपर की महिलाओं की और 70 के ऊपर के पुरूषों की – यह आंकड़ें हैं अमीर मुल्कों के, हमारे यहां के थोडा बहुत अलग हो सकते हैं – लेकिन यह तो तय है कि हरेक का यह टैस्ट करने की बजाए उम्र या अन्य कारणों से चुने गये लोगों का ही यह टैस्ट किया जाए। महिलाओं में रजोनिवृत्ति (menopause- जब मासिक धर्म आना बंद हो जाता है) …के बाद हड्डीयां कमजोर हो जाती हैं, जो लोग कुछ तरह की दवाईयां जैसे कि स्टीरायड एवं पेट की एसिडिटि कम करने वाली दवाईयां लेते हैं उन की भी हड्डीयां कमज़ोर होने का अंदेशा बना रहता है ….ऐसे लोगों का यह टैस्ट होना चाहिए या फिर उन लोगों का जिन्हें देख कर लगे कि इस की हड्डीयां कमज़ोर हो सकती हैं। इस से ज़्यादा क्या लिखूं—-बहुत कुछ तो केवल एक नज़र भर से ही पता चल जाता है। वो अलग बात है कि अब अगर इस तरह की महंगी मशीनें खरीदी गई हैं तो कमाऊ पूत तो इन्हें बनना ही पड़ेगा। है कि नहीं?
लेकिन एक बात तो यह है कि जिन महिलाओं का इस तरह का टैस्ट यह बता देता है कि उन की हड्डीयां कमज़ोर हैं तो उन में फिर उपर्युक्त दवाईयां देकर समस्या का हल खोजने का प्रयत्न किया जाता है।

जैसा कि आप ऊपर दिये गये लिंक पर जाकर देख सकते हैं कि इस के लिए कोई सूईं आदि से आप के रक्त का नमूना नहीं लिया जाता — सब कुछ नॉन-ईनवेसिव ही है…कोई सूईं नहीं, कोई चीरा नहीं।

अपने दोस्त की बात सुन कर ध्यान आ रहा था लगभग 15 वर्ष पहले चली खतरनाक पीलिया के टीके (हैपेटाइटिस बी इंजैक्शन) लगाने की मुहिम – गली गली, मोहल्ले मोहल्ले…टीमें आईं – 100-100 रूपये में, 150 रूपये में टीके लगे……लेकिन उस के बाद क्या आजकल के बच्चों-युवाओं को ये टीके नहीं लगने चाहिए। पर यह अभियान है क्या ? —- बस भारत में तो एक ही आंधी चलती है बस एक बार—चाहे वह कुछ भी हो। लेकिन स्वास्थ्य कार्यक्रमों में स्थिरता (sustainability) की बहुत ज़रूरत है।

और एक बात …इस गीत को कभी कभी सुनने की भी बहुत ज़रूरत है ….यह याद रखने के लिये कि राल-रोटी में भी कितनी ताकत है …

कोल्ड-ड्रिंक्स के नाम पर मचने वाली लूट

कल रात में मैं अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की साइट पर ये गैस वाली कोल्ड-ड्रिंक्स (carbonated cold drinks) के बारे में पढ़ रहा था… इस वेबपेज का लिंक मैं नीचे दे रहा हूं ..आप देख कर दंग रह जाएंगे कि किस तरह से अमेरिका में इन कोल्ड-ड्रिंक्स के एक एक इन्ग्रिडिऐंट्स को कैसे लैंस के नीचे से गुजरना पड़ता है। इतनी बारीकी से प्रिज़रवेटिव्स एवं स्टेबीलाइज़र्स के बारे में लोगों को आगाह करवाया गया है।

लेकिन ऐसी कोई व्यवस्था भारत में मुझे तो कभी दिखी ही नहीं ….याद है कुछ वर्ष पहले जब सेंटर फॉर साईंस एंड एनवायरनमैंट (Centre for science and environment) ने कोल्ड-ड्रिक्स में इस्तेमाल किए जाने वाले पानी की क्वालिटी पर ही सवाल खड़े कर दिये थे तो कितना बवाल मचा था ….हां, हां, हुआ था कुछ तो अखबारों में, मीडिया में खबरें छपीं थीं….लेकिन क्या हुआ? — वही कोल्ड-ड्रिंक्स धड़ल्ले से बिक रही हैं –बिक रही हैं क्योंकि लोगों को इन की लत पड़ चुकी है।

इन कोल्ड-ड्रिंक्स के बारे में चिकित्सक बिल्कुल ठीक कहते हैं कि ये केवल मीठा पानी के सिवाए कुछ भी नहीं है…. तो क्या हम लोग उस गैस की कीमत चुका रहे होते हैं!

कोल्ड-ड्रिंक्स पीना बिल्कुल नाली में पैसे फैंकने के बराबर है —कोई भी तो फायदा नहीं है इसका — बस फायदा कंपनी का तो है ही, साथ ही साथ उन सुप्रसिद्ध शख्सियतों का जो इन को बेचने के लिए पब्लिक को  मूर्ख बनाने से भी नहीं चूकते — लेकिन आप ही कहेंगे – वे कोई जबरदस्ती तो नहीं ना कर रहे, जब पब्लिक खुशी खुशी  बन रही है तो वे भला यह नेक काम कर के क्यों न करोड़ों कमा लें!

जो लिंक मैं नीचे दे रहा हूं उस पर जाकर आप यह देखिए कि अमेरिकी लोग इन कोल्डड्रिंक्स के दीवाने हैं – कुछ लिखा था कि इतने गैलन कोल्ड ड्रिंक एक औसत अमेरिकी एक साल में गटक जाता है।

कोल्ड-ड्रिंक्स पीने को मैं कभी भी प्रोत्साहित नहीं करता — लेकिन कभी कभार जब थोड़ी बहुत बदहज़मी सी हो जाए तो थोड़ी बहुत पी ही लेता हूं …इस से ज़्यादा कुछ दिन —बस, महीने में एक दो बार –बिल्कुल थोड़ी बहुत किसी के बहुत आग्रह करने पर।

जो हमारे पुराने पारंपिक पेय रहे हैं –वे अभी भी भाते हैं —-गन्ने का रस, शिकंजी, आम का पन्ना, सत्तू, छाछ  …यह सब पीना अच्छा लगता है …. याद है बचपन में हम लोग उस बंटे वाली बोतल के कितने दीवाने हुआ करते थे — दूध में डाल कर पीना कितना अच्छा लगता था।

आप सब के लिेए एक होम-वर्क है –अगली बार जब कोल्ड-ड्रिंक्स, एनर्जी ड्रिंक्स अथवा किसी ऐसे पेय को खरीदें तो इस पर दी गई न्यूट्रिशन से संबंधित जानकारी ध्यान से देखियेगा।

मेरे कुछ लेख किसी ज़माने में लिखे हुए जिन्हें पढ कर आप को ज़रूर कुछ अच्छा लगेगा….
गन्ने के रस के बारे में मेरा एक लेख
एनर्जी ड्रिंक्स की इधर पोल खोली है
फलों का रस पीते समय थोड़ा ध्यान दें
और हां, अपने लिंक लगाने के चक्कर में अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन का वह लिंक ही कहीं न भूल जाऊं ….
What you should know about Carbonated Soft drinks?

मरीज़ को पूरा हट्टा-कट्टा कर के घर भेजने की पीजीआई करेगा एक प्रशंसनीय पहल

10 जुलाई 2012 की अमर उजाला में प्रकाशित खबर

कुछ खबरें देख कर आस बंध सी जाती है ..अभी अभी जब आज की अमर उजाला अखबार उठाई तो यही हुआ। समाचार का शीर्षक ही कम रोचक न था …पी जी आई करेगा पूरा तंदरूस्त। इस के ई-पेपर से ली गई क्लिपिंग यहां लगा रहा हूं।

जैसा कि खबर में कहा गया है कि पी जी आई में भर्ती हुए मरीज अब सिर्फ एक तकलीफ़ का इलाज करवाने की बजाए पूरी तरह स्वस्थ होकर ही बाहर आएंगे। पी जी आई अपनी स्थापना के पचास साल पूरे होने पर मरीज़ों को यह बेहतर सुविधा देने जा रहा है।

हम अकसर सुनते हैं ना कि पुराने वैध बड़े ग्रेट हुआ करते थे – होते भी क्यों ना, वे एक मरीज़ को विभिन्न अंगों से तैयार हुआ एक पुतला समझने की बजाए एक पूर्ण शख्सियत समझते थे। वे उन को एक समग्र इकाई के रूप में देखते थे —केवल उन के शरीर का ही नहीं, उन की मनोस्थिति, उन की पारिवारिक परिस्थिति, समाज में उन का स्थान, उन की आध्यात्मिक प्रवृत्ति …..शायद अपने मरीज़ों के बारे में इन सब के बारे में पुराने वैध-हकीम ज़रूरत जितनी जानकारी तो रखते ही थे…तभी तो नबज़ पर हाथ रखने के कमाल के किस्से हम सुनते आये हैं।

ऊपर वाली खबर स्निप्पिंग टूल से काटी गई है —इस खबर को कैमरे से खींच कर डाला है, इस पर क्लिक करके आप इसे पढ़ पाएंगें—-ऊपर वाली खबर में यह काम नहीं हो पाया…..

और देखा जाए तो विश्व स्वास्थ्य संगठन की सेहत की परिभाषा भी तो कुछ ऐसी है — एग्जैक्टली तो मैं लिख नहीं पाऊंगा …लेकिन उस के प्राण यही हैं — सेहत का मतलब है किसी बंदे की शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, सामाजिक सेहत और केवल बीमारी से रहित होना ही सेहत की निशानी नहीं है।

मैं भी कहां इन बातों के बारे में कभी सोचता अगर मैंने बंबई की टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साईंसिस (TISS) में अस्पताल प्रशासन की पढ़ाई पढ़ने के दौरान मैडीकल एंड साईकैटरिक सोशल-वर्क को न पढ़ा होता। उसे पढ़ने के बाद मेरी आंखे खुल गईं।

हमारी चिकित्सा व्यवस्था की एक अहम् बुराई ही यह है कि हम ने बहुत ज़्यादा फ्रेगमैंटेशन तो कर दिया है—अर्थात् हम ने आदमी के शरीर को या यूं कह लें उस की सेहत को बहुत ही ज़्यादा हिस्सों में बांट दिया है और अब हम से वह एक साथ जुड़ नहीं पा रहे हैं। नतीजा हमारे सामने हैं —-हर अंग के लिए अलग डाक्टर, मज़ाक होता है कि दाईं आंख के लिए अलग और बाईं के लिए अलग…..लेकिन इतने विशेषज्ञ होने के जितने फायदे होने चाहिए क्या आप को अपने आसपास लोगों के चेहरों की तरफ़ देख कर ये महसूस हुए हैं। नहीं ना, यह हो भी कैसे सकता है।

मानता हूं सेहतमंद रखना केवल सेहत विभाग का ही जिम्मा ही नहीं हैं, बहुत से अन्य फैक्टर्स हैं जो किसी समाज की सेहत में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं।

किसी बड़े अस्पताल में किसी मरीज़ को विशेषकर कम पढ़े लिखे को देख लें, किसी गांव से आये को देख लें….. हम कितना भी सुविधाओं का ढिंढोरा पीट लें, उस की हालत दयनीय होती है। कभी इधर भाग, कभी उधर ….एक जगह से दूसरी जगह भाग भाग कर ही बेचारा परेशान हो जाता है।

एक बीमारी के लिए अगर आप्रेशन होना है तो सर्जन के इलावा दूसरे डाक्टरों का केवल यही प्रयत्न रहता है कि इसे आप्रेशन के दौरान कोई कंप्लीकेशन न हो, सब कुछ ठीक ठाक हो जाए….. यही जांच करते हैं ना आप्रेशन से पहले …दवाईयां देकर हाई-ब्लड-प्रेशर नीचे लाया जाता है, शूगर का स्तर नीचे किया जाता है …. और क्या करें, ठीक ही तो कर रहे हैं …. लेकिन आप्रेशन होने पर जब मरीज़ घर आ जाता है ….तब कुछ दिनों बाद उसे कोई दूसरी पुरानी तकलीफ़ सताना शुरू कर देती है …बस फिर से अस्पताल के चक्कर पर चक्कर।

वैसे डाक्टर भी क्या करें, सरकारी अस्पतालों में इतनी भीड़ होती है कि वे चाहते हुए भी मरीज़ की वर्तमान बीमारी के अलावा और कोई बात उस से कर ही नहीं पाते….।

ऐसी बैकग्राउंड में पी जी आई की तरफ़ से इस खबर का दिखना एक ठंडे हवा के झोंके जैसा है …..देखते हैं इस का क्रियान्वयन कैसे किया जाता है … जो भी है, मंशा अच्छी है तो सब कुछ अच्छा ही होगा, लेकिन सब का माईंड-सैट चेंज होना ज़रूरी है —मरीज़ कहे कि मैं तो बस वही इलाज करवाऊंगा जिस की मुझे तकलीफ़ है, ऐसे तो नहीं चलेगा —कुछ भयंकर किस्म की बीमारियों के लक्षण शुरूआती दौर में होते ही नहीं है, ऐसे ही डाक्टरों एवं अन्य पैरा मैडीकल स्टॉफ को भी इस तरह की सुविधा के लिए– जिस के अंतर्गत मरीज़ को उस की सहमति से उस का एक बीमारी का सफल इलाज होने पर दूसरी अन्य तकलीफ़ों को भी दूर घर के हंसते-मुस्कुराते घर रवाना किया जायेगा.—पूरी तरह से डटे रहना होगा।

चलिए कहीं से शुरूआत तो हुई —अच्छा लगा यह खबर देख कर —इस का फॉलो-अप करते रहेंगे — वह कहावत भी कितनी सुदंर है कि तीन हज़ार मील का सफ़र भी शुरू तो पहले ही कदम से होता है!!

पोस्ट कुछ ज़्यादा ही बोझिल सी नहीं हो गई ? —इसे हल्का फुल्का करने का भी जुगाड़ अपने पास है , लीजिए क्लिक करिए ….

ऐंटीबॉयोटिक दवाईयों से संबंधित खतरे की घंटी अभी भी सुन लें….

अभी अभी मेरी नज़र एक चाईनीज़ वेबसाइट की एक स्टोरी पर पड़ी कि वहां पर किस तरह से ऐंटीबॉयोटिक दवाईयों का दुरूपयोग हो रहा है और किस तरह से वहां इस मुसीबत पर शिकंजा कसने हेतु कायदे-कानून बनाए जा रहे हैं। इसे पढ़ते हुये मुझे ऐसे लग रहा था कि जैसे भारत की भी कहानी है, इस मामले में हमारे हालात कुछ ज़्यादा बढ़िया नहीं है।

कितने अरसे से सुन रहे हैं कि ऐंटीबॉयोटिक दवाईयां अब पुरानी बीमारियों पर काम करना बंद किए जा रही हैं, लेकिन स्थिति जैसी की तैसी बनी हुई है। नए नए ऐंटीबॉयोटिक्स को ढूंढ निकालने में –उन की रिसर्च पर इतना खर्च होता है कि पाठक कल्पना भी नहीं कर सकते।
मैं ऐंटीबॉयोटिक दवाईयों के बारे में खूब सुना, पढ़ा और समझा और केवल एक निष्कर्ष निकाला। जब तक एक आम मरीज या यूं कह लें कि ग्राहक नहीं जागेगा तब तक कुछ भी उम्मीद नहीं दिखाई देती।

आठ वर्ष पुराना मेरा एक लेख

कितने कानून बनाएंगे, और कितनी कढाई से उन का पालन हो पाएगा, कितने कैमिस्टों पर नियंत्रण हो पाएगा (क्या आप सब कुछ नहीं जानते), अस्पतालों की कितनी ऐंटीबॉयोटिक पालिसियां बनेंगी …और भी बहुत कुछ होता आ रहा है होता रहेगा लेकिन जब तक कैमिस्ट इस काम में सहयोग नहीं देंगे, मरीज़ इस गंभीर मुद्दे को समझने की कोशिश नहीं करते और बिना डाक्टरों के सहयोग के तो कुछ भी संभव नहीं है।

कुछ दिन पहले आमीर खान ने अपने टीवी शो सत्यमेव जयते के दौरान दवाईयों के गोरखधंधों की इतने बड़े प्लेटफार्म पर पोल खोलने की कोशिश की।

आज मैंने एक टॉपिक ऐसा उठा लिया है जिस पर चाहें तो एक किताब लिख दें …..लेकिन उससे भी क्या होगा, जिस तरह से ऐंटीबॉयोटिक दवाईयां डाक्टरों के मना करने पर भी अपनी मनमरजी से खाई जा रही है, देख कर दुःख होता है….उधर कुछ कैमिस्ट बस अपनी जेबें ठूंसने में लगे हुए हैं। ठूंस लो यार …..शायद कभी तो जेब के साथ साथ पेट भी भर जाए।

मुद्दा तो बहुत बड़ा है …लेकिन कुछ अहम् बातें कर के विराम लेता हूं…..कभी भी अपनी मरजी से या कैमिस्ट की सलाह से ऐंटीबॉयोटिक दवाईयां खरीद कर खानी शुरू न कर दें …..डाक्टर अपने मरीज़ों की सारी खबर रखता है, केवल उसे ही पता है कि मरीज़ को क्या ऐंटीबॉयोटिक दवाई चाहिए, कौन सी चाहिए, कितनी डोज़ चाहिए, उस के संभावित दुष्परिणामों को उस के फायदों से संतुलित कर के रखना, कितने दिन ये दवाईयां लेनी हैं, कोई साइड इफैक्ट होने पर क्या करना है….अनेकों अनेकों ऐसी बातें …कितनों का उल्लेख करें।

दूसरी बात यह कि कभी भी कैमिस्ट से इस तरह की दवाई लें तो उस का बिल अवश्य लें —इस में झिझक न करें क्योंकि नकली, घटिया किस्म की ऐंटीबॉयोटिक दवाईयां बाज़ार में भरी पड़ी हैं …क्योंकि कुछ लोगों को आप की सेहत की बिल्कुल चिंता नहीं है, आप को ही सचेत रहना होगा।

कभी भी कैमिस्ट के पास जाकर यह मत कहें कि मुझे यह यह तकलीफ़ है, कुछ ऐंटीबॉयोटिक दवा दे दें…..यह पढ़े लिखों वाली बात नहीं है।
अपनी मरजी से इन दवाईयों की खुराक को न तो घटाएं बढ़ाएं और न ही इसे कितने दिनों तक लेना है, इस में अपनी इच्छा घुसाने की चेष्टा करें। संभवतः आप का चिकित्सक यह काम हज़ारों-लाखों लोगों के ऊपर कर चुका है …इसलिए उसे ही अपना काम करने दें।

यह जो मैं नीचे उस चाइनीज़ न्यूज़ का लिंक दे रहा हूं—उस में साफ़ साफ़ लिखा है कि हालात इस कद्र बिगड़ चुके हैं कि यौन जनित रोग जैसे कि गोनोरिया के लिए कारगर ऐंटीबॉयोटिक ही नहीं रहा। यह तो केवल एक उदाहरण है …. बर्फ़ के पहाड़ का मात्र एक शीर्ष बिंदु है —what you call tip of the iceberg!

और एक बात का ध्यान आ रहा है …. हमने अगर कांटों से बचना है तो सारे संसार में चटाई बिछाने से बेहतर क्या यह नहीं है कि हम स्वयं ही जूते पहन लें।

प्रेरणा — Crackdown on antibiotic abuse stepped up

कहीं आप की सेहत न बिगाड़ दें ऐंटीबॉयोटिक दवाईयां

डांट डपट से बिस्तर गीला होना बंद नहीं होगा

अभी अभी दा हिंदु उठाई तो पहले ही पन्ने पर यह खबर देख कर चिंता हुई कि एक पांचवी कक्षा की बच्ची ने बिस्तर पर पेशाब निकल जाने पर उसे हास्टल की वार्डन द्वारा उसी का पेशाब पीने की सजा दी गई। बात यह यह विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन की … बच्ची की मां ने शिकायत की है कि उसे इस बात की सूचना बेटी ने फोन पर दी।

अगर खबर के परिणाम देखें तो बड़ी खौफ़नाक दिखती है …एक ऐसा मुद्दा जिसे पारिवारिक स्तर पर ही कितनी सेंसिटिविटि –संवेदनशीलता से हैंडल किए जाने की ज़रूरत होती है, उसे हास्टल में रह रही पांचवी कक्षा की बच्ची के बिस्तर गीले करने पर इतनी कठोरता से काबू करने की कोशिश की गई…बहुत बुरा लगा यह देख कर।

वैसे देखा जाए तो काबू करने वाली बात थी ही क्या इसमें ….कौन है जो बचपन में बचपन में कभी कभी बिस्तर गीला नहीं करता। मैंने भी किया और आगे मेरे बच्चों ने भी किया — लेकिन इस बात की दाद देनी पडेगी कि उस ज़माने में भी हमारे मां-बाप ने कभी इस का ज़िक्र तक नहीं किया …और वही हम लोगों ने पेरेन्ट्स बन कर अपने बच्चों के साथ किया।

बैड-वैट्टिंग (bed-wetting) एक ऐसा मुद्दा है जो किसी भी बच्चे के आत्म-विश्वास के साथ जुड़ा हुआ है – वह बिस्तर गीला कर के बेचारा अपने आप में ही थोड़ा-बहुत परेशान तो ही जाता है लेकिन मां-बाप या होस्टल के वार्डन आदि की डांट-डपट या कईं बार पिटाई …इस आग में घी डालने का काम करती है। है कि नहीं?

चक्कर यही कि वह बच्चा या बच्ची एक भयंकर अपराधबोध (guilty feeling) का शिकार हो जाते हैं … आप आप में ही सिमट कर रह जाते हैं ….और अगर इस को संवेदनशील ढंग से हैंडल न किया जाए तो पढ़ाई में भी इस का असर तो पड़ता ही है, बच्चे मानसिक तौर पर भी यंत्रणा सहने को मजबूर हो जाते हैं।

जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि घर में अगर बच्चे के साथ ऐसा होता है और मां-बाप इससे मैच्यूरिटि के साथ निपट नहीं पाते तो इस के परिणाम ठीक नहीं निकलते …लेकिन अगर होस्टल में यह बात हो रही है… तो आप अंदाज़ा लगा सकतेअ हैं कि ये बच्चे के मन को किस तरह से उद्वेलित करती होगी!

समझ में नहीं आता – आखिर आफ़त है क्या — बिस्तर ही गीला हुआ है ना ….धो लो उसे यार…. लेकिन गलत हैंडलिंग की वजह से बच्चे के मन पर जो इस तरह के इश्यू अमिट छाप छोड़ जाते हैं उसे वर्षों बाद भी कैसे धो पाएंगे।

बच्चे ने बिस्तर गीला किया है तो यह घर में या होस्टल में एक पालिसी होनी चाहिए कि कोई भी इस के बारे में चर्चा नहीं करेगा….. इसे मुद्दा बनाने की कोई बात ही नहीं है। अगर बच्चा स्वयं इस के बारे में अपनी मां से या पिता से ज़िक्र करे तो इसे बेहद सहजता से लें और हल्केपन में यह कह कर आश्वस्त कर दें कि कोई बात नहीं, होता है कभी कभी यह ….अपने आप ठीक हो जायेगा।

इस तकलीफ़ में बच्चे के साथ सहानुभूति पूर्वक पेश आना सब से बेहद ज़रूरी है —एक बार भी आपने भूल से भी उसे झिड़क दिया … दूसरों के सामने यह बात कर के उस का मज़ाक उड़ा दिया तो समझो आपने तिल का ताड़ बना दिया।

हां, अगर आप को लगे कि यह निरंतर हो रहा है तो पहले उसे यह सलाह दें कि रात में सोने से तुरंत पहले पानी न पिया करे, और पेशाब कर के सोया करे। कुछ दिन –कुछ हफ्ते — देखते रहें — कोई जल्दी नहीं ….यह किसी बीमारी-वीमारी की वजह से अकसर नहीं होता ….वैसे अगर आप को लगे कि कुछ ज्यादा ही हो रहा है तो किसी भी शिशु-रोग विशेषज्ञ से संपर्क कर लें ….इस को कंट्रोल करने के लिए एक टेबलेट भी आती है जिसे वह बच्चे को कुछ दिनों पर लेने की सलाह दे देगा।

लेकिन बात वही है कि इन केसों में सहानुभूति से बढ़ कर कोई दवाई है ही नहीं …. अपने आप यह समस्या ठीक हो जाती है।

ऐसे मुद्दे मुख्य अखबारों के शीर्ष पन्नों पर उठने चाहिए .. इस से लोगों में जागृति उत्पन्न होती है —आज जब मैं इस खबर को पढ़ रहा था तो यही सोच रहा था कि अगर शांतिनिकेतन जैसी जगह में यह सब हुआ तो देश के लाखों-करोड़ों होस्टलों के बच्चों पर क्या गुज़र रही होगी, यह कभी कोई मीडिया कवर नहीं कर पाता।

यह मुद्दा इतना गर्मा गया कि नेशनल कमीशन फॉर प्रोटैक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (NCPCR)  को इस में कूदना पडा –उन्होंने मीडिया को यह कह कर बहुत सही किया कि आप एक तो बच्चे का नाम नहीं छापें और दूसरा उस की फोटो को पूरी तरह से धुंधली कर के दिखाएं —-ताकि किसी भी प्रकार से बच्चे की पहचान न हो सके।

सोच रहा था कि आजकल NCPCR का काम भी बहुत बढ़ गया है …अभी रोहतक के अपना घर में बच्चों के साथ हो रहे कु-कृत्यों पर से पूरी तरह से पर्दा हटा नहीं है कि इस तरह के मुद्दों में भी उस के हस्तक्षेप की ज़रूरत आ पड़ी।

अमेरिका में पचास प्रतिशत लोग दवाईयां लेने के बारे में कर जाते हैं गलती

कुछ खबरें देख कर पैरों के तले से जमीन निकल जाती है ..बहुत अचंभित करती हैं ..जैसे कि मैं अभी अभी देख रहा था –मैडलाइन प्लस की एक न्यूज़-स्टोरी जिस में बताया गया था कि अमेरिका में 50प्रतिशत हृदय रोगी अस्पताल से छुट्टी होने के बाद जब घर जाते हैं तो वे दवाईयां खाने से संबंधित वे कम से कम एक गलती तो कर ही देते हैं।

और रिपोर्ट में लिखा है कि कोई दवाई खाना भूल जाना या फिर दवाई की गलत डोज़ ले लेना जैसी गलतियों के दुष्परिणामों में यह भी शामिल है कि किसी मरीज़ का ब्लड-प्रेशऱ खतरनाक तरीके से नीचे गिर जाए। और लगभग 2 प्रतिशत केसों में ये गलतियां जान तक ले सकती हैं।
ये तो हुई अमेरिका की बातें—पढ़ें लिखे लोग, सचेत लोग, लेकिन अब आप अपने अनुभव के आधार पर यह अनुमान तो लगाईए कि ये आंकड़ें अगर हम लोग अपने देशवासियों के बनाने लगें तो क्या हालत होगी।

सब से पहली बात तो ईमानदारी से आंकड़ें तैयार हो जाएं …ऐसी की तैसी — उस में भी तरह तरह के स्वार्थ दिखेंगे …और तो और इस तरह के आंकड़ें तैयार करने में अगर किसी की जेब गर्म नहीं होगी तो भाड़ में जाए अनपढ़, लाचार, आम आदमी ….हम ने क्या 121 करोड़ लोगों का ठेका ले रखा है, यही मानसिकता दिखती है ना……मुझे तो कुछ कुछ ऐसा ही दिखता है।

ऊपर जिस स्टोरी का लिंक मैंने दिया है उस में लिखा है कि किस तरह से फार्मासिस्ट मरीज़ों को पूरा सहयोग करते हैं …. मैंने बहुत से अस्पतालों के बारे में लोगों से यही सुना है कि अगर वे फार्मेसी से दवाई लेने के बाद किसी फार्मासिस्ट से यह पूछना चाहते हैं कि फलां फलां दवाई किस तरह से लेनी है तो दो टूक जवाब यही मिलता है —यह तुम अपने डाक्टर से पूछो। और डाक्टर के पास वापिस जाने की कितने लोग सोच भी पाते हैं, यह मैं क्या बताऊं —आप सब पाठक सजग नागरिक हैं, सब कुछ देखते-सुनते एवं अनुभव करते रहते हैं।

मैं भी बहुत बार कुछ लोगों से उन के हाथ में पकड़ी दवाईयों के बारे में पूछ लेता हूं …मुझे ज्यादा बार गलत जवाब ही मिलता है। पब्लिक भी क्या करे …यहां तो सिरदर्दी यह भी है कि पहले तो बंदा पढ़ा लिखा हो और ऊपर से अंग्रेजी भी पढ़ना जानता हो तो हो सकता है वह दवाई का नाम पढ़ ले ….वरना दवाईयों की स्ट्रिपों के रंग, चमकीलेपन, पैकिंग, गोलियों के आकार, कैप्सूलों के रंग के आधार पर ही लोग याद कर लेते हैं कि कौन कौन सी दवाईयां लेनी हैं …और इस तुक्के से गलतियां होनी निश्चित ही हैं …. 50 प्रतिशत नहीं, इस से कहीं ज्यादा।

और क्या पता अगली बार वही दवाईयों की पैकिंग बदली हुई मिले, या फिर स्ट्रिपों की सजावट में ही बदलाव हुआ मिले, ऐसे में क्या?
मुझे बहुत बार यह देख कर डर लगता है कि कुछ लोगों ने आठ दस तरह की गोलियां पकड़ी तो होती हैं लेकिन उन्हें किसे के बारे में भी पता नहीं होता कि कौन सी दवाई किस तकलीफ़ के लिये है…बेचारे इधर उधर से पूछते फिरते हैं कि काश ! उन्हें कोई तो बता दे…… लेकिन ……आगे क्या लिखूं?

इस टॉपिक पर और कुछ न लिखते हुए यही कहना चाहता हूं कि जो लोग भी तरह तरह की दवाईयां लेते हैं वे इन की एक लिस्ट अपनी भाषा में बना कर जिस में दवाई का नाम, उस की डोज़ कितनी लेनी है, कब लेनी है और यह किस तकलीफ़ के लिए काम करती है, ये सब बातें उस पर लिखी होनी चाहिए।

और अगर घर में कोई बुज़ुर्ग किसी भी तरह की दवाईयां ले रहे हैं तो उन के पास भी एक लिस्ट इस तरह की उन की भाषा में ही लिख कर थमा दें ….और विभिन्न दवाईयों के साथ क्या क्या परहेज़ किए जाने हैं, अगर इस की चर्चा भी उस कागज़ पर हो जायेगी तो बहुत अच्छा होगा।

अनपढ़ लोग तो हैं, लेकिन क्या करें, मैं अकसर सोचता हूं कि सामने खड़ा बंदा अगर अनपढ हैं लेकिन हम ने तो हज़ारों नहीं तो सैंकड़ों पोथियां पढ़ पढ़ के दिमाग घिसा दिया (केवल घिसा दिया या फिर ….?) …लेकिन अगर हम उन हज़ारों पोथियों का सार ही उस अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे बंदे तक न पहुंचाए पाए तो क्या फायदा …..

चाहे वह अनपढ़ है, जुगाड़ तो पूरा लगाने की कोशिश करता है, मेरी मां कुछ दिन पहले बता रही थीं कि उन की एक सहेली ने दवाईयों को सही समय पर लेने की एक तरकीब की हुई है …वह हृदय रोग के लिए दवाईयां लेती हैं … सुबह वाली दवाई जिस रूमाल में बांध कर रखती है, उस में एक गांठ, दोपहर वाली में दो गांठें ओर रात वाली दवाईयों के रूमाल में तीन गांठे लगा कर रखती है ताकि गलती न लगे। मां की बात सुनते मैं यही सोच रहा था कि अगर गांठ मारने की गिनती ही किसी दिन गड़बड़ा जाए तो ……।

देश की विषम समस्याएं हैं..नकली घटिया किस्म की दवाईयों धड़ल्ले से बिकती हैं, पकड़ी जाती हैं, फिर बिकने लगती हैं, हर तरह के गोरखधंधे दवाईयों के संसार में हो रहे हैं …कहने से मेरा अभिप्राय़ है कि वैसे तो उपर्युक्त दवाईयां कितने प्रतिशत लोगों तक पहुंच ही पाती होंगी, क्या करेंगे ये आंकडें जान कर …..क्योंकि जिन के पास पहुंच भी जाती हैं उन में कितनी गलतियां होनी संभव है इस के बारे में हम ने अभी चर्चा की।

लेकिन एक बात है, एक आशा है, जब मैं इस देश के सैंकड़ों लोगों को किसी सत्संग में बैठते देखता हूं —बिना किसी जाति-पाति, ऊंच-नीच, छोटे-बडे के भेदभाव के तब मेरा मन गदगद हो उठता है कि चलो, यार, इन के साथ कहीं तो ढंग से व्यवहार हो रहा है, इन को पूरा सम्मान दिया जा रहा है…. और सब से बड़ी बात यह कि जब तक ये किसी सत्संग में होते हैं ये बहुत सुकून अनुभव करते हैं ….अपने आप में क्या यह सत्संग से जुड़ने ओर जुड़े रहने की उपलब्धि क्या कम है। ओर जब इन का मन सुकून पाता है तो शरीर की बहुत ही व्याधियां तो अपने आप ही छू-मंतर हो जाती हैं। यह कोई अंधश्रद्दा फैलाने वाली बात नहीं कर रहा हूं …कभी भी किसी भी सत्संग में जा कर देख लेना, अनुभव कर के देख लेना, बस मुझे तो यही लगता है कि हम लोग अध्यात्म को कितना भी कोस लें, इस देश के लोगों को इसी ने ही थाम के रखा है, सहारा दे रखा है ….कितने लोग इन जगहों पर जाने के बाद शराब पीना, तंबाकू खाना छोड़ देते हैं, यह मैं देख कर दंग रह जाता हूं …।

कहां से चले थे, किधर निकल गये … दवाईयों से बात शुरू की थी सत्संग के महत्व पर जा पहुंची …कोई बात नहीं .. कभी कभी यह भी चलता है।

Further Reading —

दवाईयों से संबंधित मेरे कुछ अन्य लेखों का लिंक

Half of all heart patients make medicine errors : MedlinePlus

जाते जाते यह लिंक पर यह गीत भी सुनियेगा …एम्बैड हो नहीं रहा, इसलिए लिंक दे रहा हूं … पता नहीं इतने बढ़िया गीत की एम्बैडिंग क्या डिज़ेबल की हुई है ..