अमेरिका में पचास प्रतिशत लोग दवाईयां लेने के बारे में कर जाते हैं गलती

कुछ खबरें देख कर पैरों के तले से जमीन निकल जाती है ..बहुत अचंभित करती हैं ..जैसे कि मैं अभी अभी देख रहा था –मैडलाइन प्लस की एक न्यूज़-स्टोरी जिस में बताया गया था कि अमेरिका में 50प्रतिशत हृदय रोगी अस्पताल से छुट्टी होने के बाद जब घर जाते हैं तो वे दवाईयां खाने से संबंधित वे कम से कम एक गलती तो कर ही देते हैं।

और रिपोर्ट में लिखा है कि कोई दवाई खाना भूल जाना या फिर दवाई की गलत डोज़ ले लेना जैसी गलतियों के दुष्परिणामों में यह भी शामिल है कि किसी मरीज़ का ब्लड-प्रेशऱ खतरनाक तरीके से नीचे गिर जाए। और लगभग 2 प्रतिशत केसों में ये गलतियां जान तक ले सकती हैं।
ये तो हुई अमेरिका की बातें—पढ़ें लिखे लोग, सचेत लोग, लेकिन अब आप अपने अनुभव के आधार पर यह अनुमान तो लगाईए कि ये आंकड़ें अगर हम लोग अपने देशवासियों के बनाने लगें तो क्या हालत होगी।

सब से पहली बात तो ईमानदारी से आंकड़ें तैयार हो जाएं …ऐसी की तैसी — उस में भी तरह तरह के स्वार्थ दिखेंगे …और तो और इस तरह के आंकड़ें तैयार करने में अगर किसी की जेब गर्म नहीं होगी तो भाड़ में जाए अनपढ़, लाचार, आम आदमी ….हम ने क्या 121 करोड़ लोगों का ठेका ले रखा है, यही मानसिकता दिखती है ना……मुझे तो कुछ कुछ ऐसा ही दिखता है।

ऊपर जिस स्टोरी का लिंक मैंने दिया है उस में लिखा है कि किस तरह से फार्मासिस्ट मरीज़ों को पूरा सहयोग करते हैं …. मैंने बहुत से अस्पतालों के बारे में लोगों से यही सुना है कि अगर वे फार्मेसी से दवाई लेने के बाद किसी फार्मासिस्ट से यह पूछना चाहते हैं कि फलां फलां दवाई किस तरह से लेनी है तो दो टूक जवाब यही मिलता है —यह तुम अपने डाक्टर से पूछो। और डाक्टर के पास वापिस जाने की कितने लोग सोच भी पाते हैं, यह मैं क्या बताऊं —आप सब पाठक सजग नागरिक हैं, सब कुछ देखते-सुनते एवं अनुभव करते रहते हैं।

मैं भी बहुत बार कुछ लोगों से उन के हाथ में पकड़ी दवाईयों के बारे में पूछ लेता हूं …मुझे ज्यादा बार गलत जवाब ही मिलता है। पब्लिक भी क्या करे …यहां तो सिरदर्दी यह भी है कि पहले तो बंदा पढ़ा लिखा हो और ऊपर से अंग्रेजी भी पढ़ना जानता हो तो हो सकता है वह दवाई का नाम पढ़ ले ….वरना दवाईयों की स्ट्रिपों के रंग, चमकीलेपन, पैकिंग, गोलियों के आकार, कैप्सूलों के रंग के आधार पर ही लोग याद कर लेते हैं कि कौन कौन सी दवाईयां लेनी हैं …और इस तुक्के से गलतियां होनी निश्चित ही हैं …. 50 प्रतिशत नहीं, इस से कहीं ज्यादा।

और क्या पता अगली बार वही दवाईयों की पैकिंग बदली हुई मिले, या फिर स्ट्रिपों की सजावट में ही बदलाव हुआ मिले, ऐसे में क्या?
मुझे बहुत बार यह देख कर डर लगता है कि कुछ लोगों ने आठ दस तरह की गोलियां पकड़ी तो होती हैं लेकिन उन्हें किसे के बारे में भी पता नहीं होता कि कौन सी दवाई किस तकलीफ़ के लिये है…बेचारे इधर उधर से पूछते फिरते हैं कि काश ! उन्हें कोई तो बता दे…… लेकिन ……आगे क्या लिखूं?

इस टॉपिक पर और कुछ न लिखते हुए यही कहना चाहता हूं कि जो लोग भी तरह तरह की दवाईयां लेते हैं वे इन की एक लिस्ट अपनी भाषा में बना कर जिस में दवाई का नाम, उस की डोज़ कितनी लेनी है, कब लेनी है और यह किस तकलीफ़ के लिए काम करती है, ये सब बातें उस पर लिखी होनी चाहिए।

और अगर घर में कोई बुज़ुर्ग किसी भी तरह की दवाईयां ले रहे हैं तो उन के पास भी एक लिस्ट इस तरह की उन की भाषा में ही लिख कर थमा दें ….और विभिन्न दवाईयों के साथ क्या क्या परहेज़ किए जाने हैं, अगर इस की चर्चा भी उस कागज़ पर हो जायेगी तो बहुत अच्छा होगा।

अनपढ़ लोग तो हैं, लेकिन क्या करें, मैं अकसर सोचता हूं कि सामने खड़ा बंदा अगर अनपढ हैं लेकिन हम ने तो हज़ारों नहीं तो सैंकड़ों पोथियां पढ़ पढ़ के दिमाग घिसा दिया (केवल घिसा दिया या फिर ….?) …लेकिन अगर हम उन हज़ारों पोथियों का सार ही उस अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे बंदे तक न पहुंचाए पाए तो क्या फायदा …..

चाहे वह अनपढ़ है, जुगाड़ तो पूरा लगाने की कोशिश करता है, मेरी मां कुछ दिन पहले बता रही थीं कि उन की एक सहेली ने दवाईयों को सही समय पर लेने की एक तरकीब की हुई है …वह हृदय रोग के लिए दवाईयां लेती हैं … सुबह वाली दवाई जिस रूमाल में बांध कर रखती है, उस में एक गांठ, दोपहर वाली में दो गांठें ओर रात वाली दवाईयों के रूमाल में तीन गांठे लगा कर रखती है ताकि गलती न लगे। मां की बात सुनते मैं यही सोच रहा था कि अगर गांठ मारने की गिनती ही किसी दिन गड़बड़ा जाए तो ……।

देश की विषम समस्याएं हैं..नकली घटिया किस्म की दवाईयों धड़ल्ले से बिकती हैं, पकड़ी जाती हैं, फिर बिकने लगती हैं, हर तरह के गोरखधंधे दवाईयों के संसार में हो रहे हैं …कहने से मेरा अभिप्राय़ है कि वैसे तो उपर्युक्त दवाईयां कितने प्रतिशत लोगों तक पहुंच ही पाती होंगी, क्या करेंगे ये आंकडें जान कर …..क्योंकि जिन के पास पहुंच भी जाती हैं उन में कितनी गलतियां होनी संभव है इस के बारे में हम ने अभी चर्चा की।

लेकिन एक बात है, एक आशा है, जब मैं इस देश के सैंकड़ों लोगों को किसी सत्संग में बैठते देखता हूं —बिना किसी जाति-पाति, ऊंच-नीच, छोटे-बडे के भेदभाव के तब मेरा मन गदगद हो उठता है कि चलो, यार, इन के साथ कहीं तो ढंग से व्यवहार हो रहा है, इन को पूरा सम्मान दिया जा रहा है…. और सब से बड़ी बात यह कि जब तक ये किसी सत्संग में होते हैं ये बहुत सुकून अनुभव करते हैं ….अपने आप में क्या यह सत्संग से जुड़ने ओर जुड़े रहने की उपलब्धि क्या कम है। ओर जब इन का मन सुकून पाता है तो शरीर की बहुत ही व्याधियां तो अपने आप ही छू-मंतर हो जाती हैं। यह कोई अंधश्रद्दा फैलाने वाली बात नहीं कर रहा हूं …कभी भी किसी भी सत्संग में जा कर देख लेना, अनुभव कर के देख लेना, बस मुझे तो यही लगता है कि हम लोग अध्यात्म को कितना भी कोस लें, इस देश के लोगों को इसी ने ही थाम के रखा है, सहारा दे रखा है ….कितने लोग इन जगहों पर जाने के बाद शराब पीना, तंबाकू खाना छोड़ देते हैं, यह मैं देख कर दंग रह जाता हूं …।

कहां से चले थे, किधर निकल गये … दवाईयों से बात शुरू की थी सत्संग के महत्व पर जा पहुंची …कोई बात नहीं .. कभी कभी यह भी चलता है।

Further Reading —

दवाईयों से संबंधित मेरे कुछ अन्य लेखों का लिंक

Half of all heart patients make medicine errors : MedlinePlus

जाते जाते यह लिंक पर यह गीत भी सुनियेगा …एम्बैड हो नहीं रहा, इसलिए लिंक दे रहा हूं … पता नहीं इतने बढ़िया गीत की एम्बैडिंग क्या डिज़ेबल की हुई है ..

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