डांट डपट से बिस्तर गीला होना बंद नहीं होगा

अभी अभी दा हिंदु उठाई तो पहले ही पन्ने पर यह खबर देख कर चिंता हुई कि एक पांचवी कक्षा की बच्ची ने बिस्तर पर पेशाब निकल जाने पर उसे हास्टल की वार्डन द्वारा उसी का पेशाब पीने की सजा दी गई। बात यह यह विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन की … बच्ची की मां ने शिकायत की है कि उसे इस बात की सूचना बेटी ने फोन पर दी।

अगर खबर के परिणाम देखें तो बड़ी खौफ़नाक दिखती है …एक ऐसा मुद्दा जिसे पारिवारिक स्तर पर ही कितनी सेंसिटिविटि –संवेदनशीलता से हैंडल किए जाने की ज़रूरत होती है, उसे हास्टल में रह रही पांचवी कक्षा की बच्ची के बिस्तर गीले करने पर इतनी कठोरता से काबू करने की कोशिश की गई…बहुत बुरा लगा यह देख कर।

वैसे देखा जाए तो काबू करने वाली बात थी ही क्या इसमें ….कौन है जो बचपन में बचपन में कभी कभी बिस्तर गीला नहीं करता। मैंने भी किया और आगे मेरे बच्चों ने भी किया — लेकिन इस बात की दाद देनी पडेगी कि उस ज़माने में भी हमारे मां-बाप ने कभी इस का ज़िक्र तक नहीं किया …और वही हम लोगों ने पेरेन्ट्स बन कर अपने बच्चों के साथ किया।

बैड-वैट्टिंग (bed-wetting) एक ऐसा मुद्दा है जो किसी भी बच्चे के आत्म-विश्वास के साथ जुड़ा हुआ है – वह बिस्तर गीला कर के बेचारा अपने आप में ही थोड़ा-बहुत परेशान तो ही जाता है लेकिन मां-बाप या होस्टल के वार्डन आदि की डांट-डपट या कईं बार पिटाई …इस आग में घी डालने का काम करती है। है कि नहीं?

चक्कर यही कि वह बच्चा या बच्ची एक भयंकर अपराधबोध (guilty feeling) का शिकार हो जाते हैं … आप आप में ही सिमट कर रह जाते हैं ….और अगर इस को संवेदनशील ढंग से हैंडल न किया जाए तो पढ़ाई में भी इस का असर तो पड़ता ही है, बच्चे मानसिक तौर पर भी यंत्रणा सहने को मजबूर हो जाते हैं।

जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि घर में अगर बच्चे के साथ ऐसा होता है और मां-बाप इससे मैच्यूरिटि के साथ निपट नहीं पाते तो इस के परिणाम ठीक नहीं निकलते …लेकिन अगर होस्टल में यह बात हो रही है… तो आप अंदाज़ा लगा सकतेअ हैं कि ये बच्चे के मन को किस तरह से उद्वेलित करती होगी!

समझ में नहीं आता – आखिर आफ़त है क्या — बिस्तर ही गीला हुआ है ना ….धो लो उसे यार…. लेकिन गलत हैंडलिंग की वजह से बच्चे के मन पर जो इस तरह के इश्यू अमिट छाप छोड़ जाते हैं उसे वर्षों बाद भी कैसे धो पाएंगे।

बच्चे ने बिस्तर गीला किया है तो यह घर में या होस्टल में एक पालिसी होनी चाहिए कि कोई भी इस के बारे में चर्चा नहीं करेगा….. इसे मुद्दा बनाने की कोई बात ही नहीं है। अगर बच्चा स्वयं इस के बारे में अपनी मां से या पिता से ज़िक्र करे तो इसे बेहद सहजता से लें और हल्केपन में यह कह कर आश्वस्त कर दें कि कोई बात नहीं, होता है कभी कभी यह ….अपने आप ठीक हो जायेगा।

इस तकलीफ़ में बच्चे के साथ सहानुभूति पूर्वक पेश आना सब से बेहद ज़रूरी है —एक बार भी आपने भूल से भी उसे झिड़क दिया … दूसरों के सामने यह बात कर के उस का मज़ाक उड़ा दिया तो समझो आपने तिल का ताड़ बना दिया।

हां, अगर आप को लगे कि यह निरंतर हो रहा है तो पहले उसे यह सलाह दें कि रात में सोने से तुरंत पहले पानी न पिया करे, और पेशाब कर के सोया करे। कुछ दिन –कुछ हफ्ते — देखते रहें — कोई जल्दी नहीं ….यह किसी बीमारी-वीमारी की वजह से अकसर नहीं होता ….वैसे अगर आप को लगे कि कुछ ज्यादा ही हो रहा है तो किसी भी शिशु-रोग विशेषज्ञ से संपर्क कर लें ….इस को कंट्रोल करने के लिए एक टेबलेट भी आती है जिसे वह बच्चे को कुछ दिनों पर लेने की सलाह दे देगा।

लेकिन बात वही है कि इन केसों में सहानुभूति से बढ़ कर कोई दवाई है ही नहीं …. अपने आप यह समस्या ठीक हो जाती है।

ऐसे मुद्दे मुख्य अखबारों के शीर्ष पन्नों पर उठने चाहिए .. इस से लोगों में जागृति उत्पन्न होती है —आज जब मैं इस खबर को पढ़ रहा था तो यही सोच रहा था कि अगर शांतिनिकेतन जैसी जगह में यह सब हुआ तो देश के लाखों-करोड़ों होस्टलों के बच्चों पर क्या गुज़र रही होगी, यह कभी कोई मीडिया कवर नहीं कर पाता।

यह मुद्दा इतना गर्मा गया कि नेशनल कमीशन फॉर प्रोटैक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (NCPCR)  को इस में कूदना पडा –उन्होंने मीडिया को यह कह कर बहुत सही किया कि आप एक तो बच्चे का नाम नहीं छापें और दूसरा उस की फोटो को पूरी तरह से धुंधली कर के दिखाएं —-ताकि किसी भी प्रकार से बच्चे की पहचान न हो सके।

सोच रहा था कि आजकल NCPCR का काम भी बहुत बढ़ गया है …अभी रोहतक के अपना घर में बच्चों के साथ हो रहे कु-कृत्यों पर से पूरी तरह से पर्दा हटा नहीं है कि इस तरह के मुद्दों में भी उस के हस्तक्षेप की ज़रूरत आ पड़ी।

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