डबल रोटी से जुड़ी खट्टी-मीठी यादें …

दो दिन पहले एक न्यूज़-रिपोर्ट देख रहा था जिस में पढ़ा कि विदेश में किस तरह से लोग अब ब्रेड से भागने लगे हैं…..यहां पर भी ब्रेड के बारे में विभिन्न कारणों से सुनने को मिलता ही रहता है।

लेकिन मुझे तो इस समय तब की बातें याद आ रही हैं जब हम लोग इसे डबलरोटी के नाम से ही जानते थे —बचपन के दिन – अकसर सुबह सुबह (विशेषकर छुट्टी वाले दिन) एक सरदार जी लोहे के एक बड़े से ट्रंक को अपने साईकिल पर रख कर हमारी कॉलोनी में ब्रेड, बंद (आज जिन्हें बन कहते हैं), अंडे आदि बेचने आते थे।

अकसर वह एक जगह खड़े हो जाया करते थे और बच्चों का जमावड़ा उन के इर्द-गिर्द लग जाया करता था .. शायद उन का बड़ा सा लोहे का चाकू देखने की उत्सुकता रहता होगी … आप भी सोच रहे होंगे कि वह ब्रेड बेचने आता था तो उस के पास बड़े से चाकू का क्या काम!

ऐसा है कि पहले लालच का कोढ़ इतना फैला नहीं था –उस भले मानुस की वैसे तो अपनी एक बेकरी थी जहां पर वह यह डबलरोटी, बिस्कुट आदि स्वयं बनाया करता था लेकिन कभी कभी वह इसे ट्रंक में डाल कर बेचने निकल पड़ता था।

और मुझे अच्छे से याद है उन दिनों ( late sixties or early seventies) एक ब्रेड शायद एक रूपये से भी कम दाम में मिलती थी —शायद दाम से भी कहीं ज़्यादा अहम् उस की क्वालिटी की बखान करना होगा। और तो और, जिसे डबलरोटी आधी चाहिए होती थी उसे आधी मिल जाया करती थी, और ब्रेड के पीस ग्राहक के सामने उस की पसंद के अनुसार –मोटे या पतले …..बस हमें उस का यह ब्रेड के पीस काटने वाला अंदाज़ ही बड़ा भाता था ..जिस के लिए वह ट्रंक को बंद कर के ब्रेड को काटने के लिए ऊपर टिका लिया करता था, पूरी लेनी हो तो कोई समस्या नहीं, वरना दो हिस्से साथ साथ खड़ा कर के दिखा देता था कि दोनों हॉफ एक जैसे ही हैं।

जब हम लोग उस बंदे की बेकरी में जाते थे या किसी भी बेकरी में तो भी वे लोग ब्रेड के पीस ग्राहक के सामन ही किया करते थे।

हम लोग भी ज्यादा डबलरोटी खाने के भी शौकीन रहे नहीं …बस कभी कभार मलाई-सैंडविच. या वैज-सैंडविच …कभी आलू वालू डाल कर स्कूल ले जाना ….ऐसी बचपन की कोई याद नहीं है कि इस डबलरोटी में कोई विशेष रूचि रही है। और बिना-सिंकी ठंडी ब्रेड में तो कभी नहीं …….

चलिए थोड़े बड़े हो जाते हैं — दुनिया भी बदलने लगी थी … ब्रेड कागज जैसी दिखने वाली थैली में मिलने लगी … लेकिन उस दौरान भी ज़रूरत अनुसार आधी ब्रेड तो मिलने ही लगी थी …और शायद ब्रेड शब्द भी हमारी जुबान पर आने लगा था….. क्या है ना बाद में समझ आने लगा कि वैसे भी डबलरोटी शब्द कहना भी अपने आप में बड़ा फुद्दु सा लगता है।

ये उस जमाने की बात है जब फ्रिज़ नहीं था …लेकिन शायद फ्रिज तो थे लेकिन हमारे यहां ही नहीं होगा …तो फिर 1975 के आस पास की बातें हैं ….. फ्रिज भी आ गया …. ब्रेड भी फ्रिज में रखी जाने लगी जैसे कि आज रखी जा रही हैं — कल रात को मैंने अपने बेटे को पूछा कि यार, क्या घर में ब्रेड है, क्या है ना ये भी कोई खास शौकीन नहीं है, झट से गया तो उठा लाया और मैंने तुरंत फोटू ले ली …पास में श्रीमति जी बैठी थीं तो मैंने पूछा कि यह कितने दिन पुरानी होगी तो पता चला कि यह दस दिन से फ्रिज में पड़ी हुई है।

बात तो शायद दकियानूसी सी ही दिखेगी लेकिन जो है सो है …पहले चाहे कोई आधी ब्रेड लेता था या पूरी उसे तुरंत खत्म कर लिया जाता था लेकिन इस फ्रिज और ब्रेड-बॉक्स ने यहां भी गड़बड़ कर दी है… आप का क्या ख्याल है?

ऐसे तो लिखता ही चला जाऊंगा और इसे पढ़ेगा कौन? — संक्षेप में कहूं तो यही है कि ब्रेड खाना सेहत के लिए कुछ ज़्यादा बढ़िया बात नहीं है …क्योंकि इस में रिफाईंड फ्लोर (मैदे) का इस्तेमाल होता है। कोई बता रहा था कि यह जो आजकर होल-व्हीट ब्रेड (Whole-wheat bread) का टशन चल रहा है …उस में भी केवल भूरा रंग आदि ही डाल दिया जाता है … बात वैसे तो सोचने वाली ही है कि क्या होल-व्हीट से बनी रोटी भी कभी इतनी भूरी होती है जितनी भूरी रंग की ब्रेड ये होल-व्हीट ब्रेड के नाम से बेचते हैं।

हमारे फ्रिज में पड़ी ब्रेड का रैपर

याद आ रहा है कि बहुत अरसा हो गया मैंने एक लेख लिखा था … पाव रोटी या पांव रोटी ? (इस लिंक पर क्लिक करिए) …बम्बई जैसी जगहों में ब्रेड को पाव रोटी भी कह देते हैं।

चलो यार अपनी बात को खत्म करता हूं …. पहली बात तो यह कि क्या मेरे यह कहने से कि ब्रेड कम खाया करें, क्या इतने से ही लोग ब्रेड खाना कम कर देंगे ….मुझे ऐसी कोई खुशफ़हमी भी नही  है।

यह खुशफहमी न होने का कारण यही है कि मैं सोचता हूं कि इस संसार में हर परिवार की, हर व्यक्ति की अपनी अलग परिस्थितियां हैं … पहली बात तो यह कि किसी के खाने पीने पर कोई टिप्पणी क्या करें, बस यह थोड़ा बहुत डाक्टरी ज्ञान कभी कभी इस तरह के लेख के रूप में फूट पड़ता है। कोई घर-परिवार से दूर रह रहा है, ढंग के नाश्ते की व्यवस्था नहीं हो पाती, ऐसे में कोई क्या करे? – पेट तो भरना ही है।

इस आलेख में मैंने यह लिख दिया कि मेरे कहने से कोई ब्रेड से दूर भागने से तो रहा …. लेकिन मेरा बस तुच्छ सा आग्रह है कि जो लोग परिवार के साथ रहते हैं अथवा जिन के पास दोनों विकल्प हैं – सीधी सादी हिंदोस्तानी रोटी या डबलरोटी .. तो इन दोनों में से किसी एक को चुनने से पहले यूपीआई की  न्यूज-रिपोर्ट का ध्यान कर लिया करेंगे (जिस का लिंक नीचे दे रहा हूं) ..तो सेहत के लिए ठीक रहेगा। बहुत से पहलू तो अभी हमने इस ब्रेड के छुए ही नहीं ….बस यादों की बारात के साथ ही हो लिए।

और आज का ब्रेड स्वरूप –मेरा स्कूल जाने वाला बेटा भी ब्रेड खरीदने से पहले उस की डेट ज़रूर जांच लेता है चाहे फिर अगले दस दिन फ्रिज में पड़ी रहे …और मुझे उस समय बहुत गुस्सा आता है जब मुझे कोई दुकानदार उस की शेल्फ़ से उठाई गई ब्रेड को मेरे हाथ से वापिस लेते हुए यह कहता है – डाक्टर साहब, यह आप के लिए नहीं है …….यह सुन कर मन बहुत दुःखी होता है … हर जगह भेदभाव …..उल्लू के पट्ठे जो मेरे लिए ठीक नहीं है, वह किसी और के लिए कैसे ठीक हो सकती है, न ही मैं तुम्हें ज़्यादा दाम दे रहा हूं और न ही वह तुम्हें कम दाम देगा जिसे तुम उछलते हुए यही थमा दोगे ………………..फ्रस्ट्रेटिंग!!

पोस्ट इतनी बड़ी हो गई लेकिन इस के इन्ग्रिडिऐंट्स में की जाने वाले मिलावट की पोल तो खुलने से रह ही गई —कोई बात नहीं, फिर कभी मौका मिल जाएगा।

Inspiration – Consumers turning back on white bread

 

 

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शेल्टर होम्स की महिलाओं का ही एचआईव्ही टैस्ट क्यों?

7 सितंबर 2012 की अमर उजाला में छपी खबर

आज सुबह जब मैं अमर उजाला अखबार देख रहा था तो यह खबर देख कर बड़ा अजीब सा लगा … शेल्टर होम्स की महिलाओं का होगा एचआईव्ही टेस्ट।

ऐसा है ना… कभी इस तरह की खबर सुनी नहीं कि फलां फलां ग्रुप का एचआईव्ही टैस्ट किया जायेगा… इस खबर के बारे में आप का क्या ख्याल है?

एचआईव्ही टैस्ट की अहम् शर्त ही यह है कि यह स्वैच्छिक होना चाहिए … और उस की पहले प्री-टैस्ट काउंसिलिंग होनी चाहिए।

एक बात तो है कि रोहतक के अपना घर वालों ने कम से कम सारे देश को तो हिला कर रख दिया… किस तरह से वहां पर कुछ लोग दरिंदगी करते रहे … किसी को बख्शा नहीं गया… जहां तक पाठकों की कल्पना जा सकती है वह सब कुछ वहां होता रहा।

पता नहीं मुझे तो नहीं लगता कि जिस तरह से शेल्टर होम्स में महिलाओं के एचआईव्ही टैस्ट की बात इस खबर में मैंने देखी है ..क्या उस के बाद उन टैस्ट रिपोर्टों की गोपनीयता को सुनिश्चित किया जा सकेगा, यह एक गंभीर मुद्दा है।

बातें तो इस पोस्ट में बहुत सी लिखी जा सकती हैं, लेकिन मैं लिखना नहीं चाहता, जो महिलाओं शेल्टर होम्स में रहती हैं वे अकसर बेसहारा, घरेलू हिंसा की शिकार, मानसिक रूप से बीमार, परित्यक्त्त और अनाथ होने की वजह से वलनर्बेल ग्रुप में आती ही हैं … चाहे हम मानें या न मानें, मीडिया जो किसी समाज का आईना होता है …हमें इन की हालत की सही तस्वीर तो दिखाता ही रहता है…आखिर उस का काम ही यही है …बेजुबान की जुबान…

सवाल मेरा अपनी जगह पर कायम है – आखिर इन्हीं का ही एचआईव्ही टैस्ट कयों ?

क्या सुधि पाठक इस के बारे में कुछ प्रकाश डालने का कष्ट करेंगे ?

बच्चों में रक्त की कमी की जांच हो जाएगी आसान

आज सुबह मैं कहीं बैठा हुआ था तो मेरी नज़र उस खबर पर पड़ी जिस में लिखा था कि बच्चों में एच.बी (हिमोग्लोबिन) की जांच के लिए अब हरियाणा एक दर्दरहित और आसान तरीका अपनाएगा। हिंदी के उस पेपर में खबर छोटी सी होने के कारण कुछ ज़्यादा बात समझ में नहीं आई। कुछ समय बाद जब दा हिंदु देख रहा था तो उस में भी वही खबर दिख गई..Haryana to adopt new Hb estimation method.

मैंने भी इस नये टेस्ट के बारे में जिस का नाम एच.बी कलर स्केल किट है ….इस के बारे में आज पहली बार ही सुना था। गूगल अंकल की मदद से इस के बारे में जानने में मदद मिली।
मोटी मोटी बात यह है कि रक्त की एक बूंद को एक स्ट्रिप पर डाल दिया जाता है और 30 सैकेंड इंतज़ार करने पर उस का जो रंग दिखता है उस का मिलान एक कार्ड पर दिये गये लाल रंग के छः शेडों से किया जाता है जो हीमोग्लोबिन की 4,6,8,10,12 और 14ग्राम प्रति 100 मिली को इंगित करते हैं।

जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि वैसे तो मैंने भी अभी इस किट को नहीं देखा लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आई कि खबरों में यह कैसे कहा जा रहा है कि यह हिमोग्लोबिन टैस्ट करने का दर्दरहित तरीका है… यह दर्दरहित कैसे हो गया? …. जब बच्चों से रक्त की एक बूंद निकालने के लिए उन्हें प्रिक तो करना ही पड़ेगा।

लेकिन दूसरी बात यह कि यह एक सुविधाजनक तरीका है –बेशक यह है क्योंकि इस में तुरंत रिजल्ट मिल जायेगा….ज़्यादा औज़ारों का, किसी कैमीकल को इस्तेमाल करने का कोई झंझट नहीं…. स्कूली बच्चों में, आंगनवाड़ियों जैसी सैटिंग्ज़ के लिए तो यह बहुत सुविधाजनक है।

लेकिन एक बात जो बहुत महत्वपूर्ण है वह यह कि जब बीसियों, सैंकड़े बच्चों का व्यापक स्तर पर यह टैस्ट किया जायेगा तो इस बात का ध्यान पूरा रखना होगा कि हर बार डिस्पोज़ेबल लैंसेट (जिसे अंगुली में चुभो कर रक्त की बूंद निकाली जाती है) का इस्तेमाल करना होगा….इस में बिल्कुल भी समझौता करने की कोई गुंजाईश है ही नहीं … जितने टैस्ट करने होंगे कम से कम उतने डिस्पोज़ेबल लैंसेट उपलब्ध रहने चाहिए …यह बात इस लिए भी ज़रूरी है क्योंकि जो मैं इस टैस्ट के विवरण से समझा हूं इसे लगभग सभी स्तर के चिकित्सा-कर्मी कर पाएंगे ..जिन के चिकित्सा-ज्ञान का स्तर अलग अलग हो सकता है ..इसलिए इस बात की सावधानी विशेष रूप से रखनी होगी।

मैं जब यह बात लिख रहा हूं तो मुझे दो बातें याद आ रही हैं –एक तो यह कि जब हम लोग बचपन में कोई ब्लड-टैस्ट आदि करवाने जाते थे तो वहां पर टैस्ट करने वाले एक ही सूईं को हरेक मरीज़ पर इस्तेमाल करता था ..बस स्प्रिट से थोडा पोंछ लिया करता था। लेकिन अब आप लोग इस बात की कल्पना नहीं कर सकते ….अगर कहीं ऐसा होगा या हो रहा है तो गलत हो रहा है जिसे चिकित्सा अधिकारीयों के नोटिस में लाया जाना चाहिए।

एक बात और ध्यान में आ गई …कुछ दिन पहले यह खबर एक अखबार में दिख गई … Contamination fears in Haemoglobin test at PGI…………..अभी मैंने खबर का शीर्षक ही देखा था कि मुझे लगा कि यही पंगा होगा कि एक ही सूईं चुभो कर बहुत से लोगों की अंगुली से रक्त का सैंपल लिया जाता होगा लेकिन मैं गलत निकला …क्योंकि यहां मुद्दा यह था कि लोगों ने आपत्ति जताई कि चाहे सूईं हर बार नईं ली जाती है लेकिन उस रक्त को जिस पिप्पट से अंगुली से खींचा जाता है वह तो एक ही है ..जिसे पानी से धो कर इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन आप इस खबर में पढ़ेंगे  कि हैड ऑफ डिपार्टमैंट ने यह बताया कि पिपेट को ऐंटीसैप्टिक द्रव से धोया जाता है …और चूंकि इस प्रक्रिया के दौरान रक्त मरीज़ के शरीर में डाला नहीं जाता इसलिए इससे इंफैक्शऩ नहीं हो सकती।

जब मैंने यह खबर देखी तो मैं यह सोच कर दंग रह गया कि लोगों की एवेयरनैस कितनी बढ़ गई है, और बढ़े भी क्यों नहीं, आखिर यह उन की सेहत का मामला है।

संबंधित लेख … अपने रक्त की जांच के समय ध्यान रखियेगा (मीडिया डाक्टर)
बच्चों में रक्त की कमी की तरफ़ ध्यान देना होगा

टैटू गोदने वाली ईंक भी देती है भयंकर बीमारियां …

ये जो शरीर गुदवाने का बढ़ता क्रेज़ है जिसे हम टैटु गुदवाना भी बोल देते हैं यह हमेशा गलत कारणों की वजह से ही खबरों में रहते हैं। अभी कुछ दिनों पहले यह च्रर्चा भी गर्म रही कि आर्मी में भर्ती के समय उन्होंने ऐसे युवकों को शारीरिक जांच के दौरान बाहर कर दिया जिन के शरीर पर किसी तरह के भी टैटु गुदे हुये थे। ऐसे में एक युवक को कहा गया कि इसे उतरवा के आओ…तो ही तुम्हारी पात्रता पर विचार होगा।

वह युवक किसी “बंगाली” डाक्टर (No offence meant…. यहां पंजाब-हरियाणा में लगभग हर शहर में एक-दो डाक्टर हैं जिन्हें बंगाली डाक्टर कहा जाते हैं) —बेचारे लाचार लोग ऐसा मानते हैं कि इन के पास विशेष शक्तियां होती हैं …. मैं बिल्कुल नहीं मानता क्योंकि ऐसा कुछ भी तो नहीं होता … मेरे विचार में ये भी एक तरह के बिना डिग्री वाले नीम-हकीम ही होते हैं जो एक टीके से बवासीर को पूरी तरह से खत्म होने का दावा करते हैं .. और भी बहुत से कारनामों के इश्तिहार छपवाते रहते हैं ….हां तो वह भावी फौजी किसी ऐसे ही बंगाली डाक्टर के चक्कर में पड़ गया जिसने उस टैटू को हटाने के चक्कर में इतना बड़ा ज़ख्म बना दिया कि उस जगह पर एक बड़ा सा किलायड़ (keloid) ही बन गया है ….

लिखते लिखते ध्यान आया …गैंग्स ऑफ्स वासेपुर – टू … उस का एक संवाद सुन रहा था कि जब तक इस देश में सिनेमा बनता रहेगा, लोग ऐसे ही चूतिया बनते रहेंगे …. लेकिन मैं यह कहूंगा कि जब तक इस देश में ये झोलाछाप, नीम-हकीम पनपते रहेंगे, ये पब्लिक को ऐसे ही चूतिया बनाते रहेंगे।

टैटू से याद आया, कल शाम अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की साइट देख रहा था तो पता चला कि अमेरिका में टैटू के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ईंक को लेकर काफ़ी समस्याएं आ रही हैं … इस ईंक की मिलावट की वजह से वहां पर एक बैक्टीरिया –जिसे नॉन-ट्यूबरकुलस मॉयोबैक्टीरियम – Non-Tuberculous Mycobacterium — टैटू के दौरान कुछ बीमारियां फैला रहा है… पहले इस बैक्टीरिया की थोड़ी बात कर लें …ये बैक्टीरिया टी बी रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया जैसे होते हैं लेकिन ये टीबी रोग नहीं पैदा करते — बल्कि ये फेफड़े की बीमारी, जोड़ों की इंफैक्शन, आंख की बीमारी, और शरीर में अन्य संक्रमण उत्पन्न कर देते हैं जिन का डॉयग्नोज़ करना ही बहुत मुश्किल होता है और जिन का इलाज छः महीने या इस से भी ज़्यादा लंबे अरसे के लिए चलता है।

मैंने जब इस रिपोर्ट को पढ़ना शुरू किया तो मुझे यही लगा कि ये उन्हीं समस्याओं की बात करेंगे जिन के बारे में मैं पहले बहुत से लेखों मे लिख चुका हूं …अर्थात् इस तरह के टैटू गुदवाने से होने वाले हैपेटाइटिस.बी, एच आई व्ही संक्रमण, हैपेटाइटिस-सी आदि ….लेकिन यहां तो टैटू के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ईंक की मिलावट की बात हो रही थी।

जहां तक भारत में हमारी समस्या है, यह ईंक की हमारी समस्या है नहीं ….अमेरिका में तो यह ईंक भी एफडीआई के नियंत्रण के दायरे में आती है लेकिन अपने यहां तो सब चलता है …हमें कुछ नहीं पता कि वह ईंक उस मेलों में टैटू गोदने वाले को कहां से मिली है…..बैक्टीरिया वैक्टीरिया के बारे में तो हम बेकार सोचते ही नहीं, ये तो होने निश्चित ही हैं, हमें तो चिंता सताती है कि इन टैटू वालों ने कितने लोगों को मेलों में भयंकर बीमारियां परोस दी होंगी …..

लेकिन कोई सुने तो ना……………….अब समझदारी इसी में है कि टैटू गुदवाने को शौक को न पाला जाए और इस के बारे में दूसरों को भी जागृत किया जाए।

संबंधित लेख .. टैटू गुदवाने से हो सकती हैं भयंकर बीमारियां

प्रेरणा .. Tattoo Inks Pose Health Risks
हिंदोस्तानी मेलों की बात आते ही यह गीत ध्यान में आ गया …

प्रोटीन सप्लीमैंट्स का बढ़ता क्रेज़ खतरनाक

कुछ पाठ ऐसे हैं जिन्हें बार बार दोहराया जाना चाहिए …चैनलों वाले भी तो यही करते हैं.. कितनी बार सुबह सुबह पाठ पढ़ाना शुरू करते हैं कि हम सब भाई भाई है, एकस् पिता एकस् के हम बारीक…..लेकिन हम ऐसे ढीठ प्राणी हैं कि हमें कहां ये एकता, अखंडता, आपसी प्रेम-प्यार की बातें सहजता से समझ में आती हैं, इस का प्रमाण हमने अभी आसाम में देखा कि किस तरह से इक्कीसवीं सदी में भी हम पशुओं जैसा व्यवहार करने से कहां चूकते हैं….फिर वही बात कि बार बार आध्यात्मिक पुरुषों द्वारा प्रेम-प्यार-मानवता का पाठ पढ़ाया जाना ज़रूरी है।

यही विचार में मन में आये जब मैंने आज एक बार फिर से वह रिपोर्ट देखी की ये जो युवा लोग जिम-विम में जाने वाले प्रोटीन सप्लीमैंट्स लेने लगे हैं, ये सेहत के लिए बहुत खतरनाक हैं। मैंने भी सोचा कि पिछले पांच वर्षों से इस विषय पर इतनी बार लिख चुका हूं कि अब बार बार वही बात दोहराने से क्या हासिल …..फिर अचानक ध्यान आ गया कि क्या लोगों ने बात मान ली है, नहीं ना, तो फिर बार बार दोहराने में हर्ज ही क्या है!!

मैं यहां बीबीसी की रिपोर्ट का लिंक दे रहा हूं …Dieticians say extra protein can do more harm than good… कितना साफ़ लिखा है कि एक सामान्य पुरूष को लगभग 55 ग्राम प्रोटीन रोज़ाना चाहिए और महिला को 45ग्राम और यह पढ़ कर आप भी आश्वस्त हो सकते हैं कि प्रोटीन की इतनी मात्रा तो हम सहजता से अपने नियमित खाने से पा ही लेते हैं।

अब दिक्कत इन प्रोटीन सप्लीमैंट्स की यह है कि इन को लेने पर जो अधिक प्रोटीन हम अपने शरीर के अंदर डाल रहे हैं उसे बाहर भी हमारे शरीर ने ही निकालना है (excretion) … इसलिए ज़रूरत से ज्यादा प्रोटीन लेने पर हमारे गुर्दे एवं लिवर (यकृत) पर बुरा प्रभाव पड़ने लगता है …. पोथियां लिखी जा चुकी हैं इस विषय पर कि किस तरह से प्रोटीन सप्लीमैंट्स हमारी सेहत खराब कर रहे हैं।

कंपनियां बड़ी स्मार्ट हैं –अब उन्होंने ने इस तरह के सप्लीमैंट्स बार के रूप में (चाकलेट बार जैसी बार के रूप में), शेक के रूप में, एनर्जी ड्रिंक्स के रूप में शापिंम माल पर भी फैला दिये हैं …आज का युवा किसी की सुनने का राजी तो है नहीं, बस ऐसे ही इन्हें लेने के चक्कर में अपनी अच्छी भली सेहत बिगाड़ता चला जाता है।

मेरी भी उम्र पचास के करीब पहुंच रही है और मैंने अब तक किसी भी क्वालीफाईड चिकित्सक को किसी को भी (चाहे वह कितना भी कमज़ोर व्यक्ति क्यों न हो) यह कहते नहीं सुना कि तुम्हें प्रोटीन सप्लीमैंट्स लेने होंगे … हां, कईं बार कैंसर आदि रोग की वजह से बिल्कुल शिथिल पड़ चुके मरीज़ों को वे कुछ सप्लीमैंट्स लेने को कह देते हैं लेकिन वह बात अलग है।

आपने भी सुना ही होगा कि अकसर चिकित्सक युवा-वर्ग को शरीर में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने के लिए सामान्य भोजन खाने का सलाह देते दिखते हैं ….दाल-रोटी,साग सब्जी, दूध दही से बढ़ कर और ताकत कहां से आ जायेगी….. वे अकसर इन युवाओं को भीगे हुए काले चने, भीगी हुई मूंगफली-गुड के साथ, भुने हुए चने गुड़ के साथ, सोयाबीन की दाल प्रचुर मात्रा में खाने की सलाह देते रहते हैं, लेकिन आज इंस्टैंट मैसेजिंग के ज़माने में इतने सब्र किस में है कि इंतज़ार करे ….रिज़ल्ट तुरंत चाहिए …और इन बाजारू सप्लीमैंट्स बेचने वालों ने युवा वर्ग का ब्रेन-वाश वैसे ही इतना कर दिया होता है कि इन्हें बस पट्ठे बनाने के लिए इन से आगे कुछ लगता ही नहीं है!

जिस रिपोर्ट का मैंने ऊपर लिंक दिया है कि उस में आप पढ़ सकते हैं कि किस तरह से हमारी दैनिक ज़रूरत से डबल प्रोटीन लेने पर हम कैसे तकलीफ़ में पड़ सकते हैं।

क्या कोई युवा इसे पढ़ भी रहा है, या मैं ऐसे ही प्रवचन झाड़े जा रहा हूं …. उन बीसियों चैनलों की तरह जो सुबह से सुबह विश्व-बंधुत्व का संदेश देते थकते नहीं, लेकिन पब्लिक भी कहां कानों में जूं तक रेंगने देती है!

एक विज्ञापन आता है ना आजकल जिस में कुछ युवा अपने मोबाइल पर यह गीत बजा कर ही गुंड़ों को भगा देते हैं …. अपने अपने दम की बात है!!

अब यह गटर-ऑयल का लफड़ा …

कुछ अरसा हो गया है जब खबरें दिखीं की किस तरह से मिलावटी पावडर दूध पीने से जिस में मैलामाइन की मिलावट थी …चीन में छः बच्चों की जान चली गई। चीन में बने खिलौनों के कारनामे तो हम लोग सुनते ही रहते हैं कि किस तरह से उस में मौजूद शीशा (lead) बच्चों के लिए घातक है….अमेरिकी एफडीआई की साइट पर अकसर उन्हें चीन में बनी हर्बल दवाईयों के बारे में सावधान करते देखा जाता है जिन की टैस्टिगं में हेवी-मेट्लस (heavy metals) अकसर पाये जाते रहे हैं।

और अब यह गटर-ऑयल का लफड़ा, बीबीसी साइट देखते समय यह खबर नज़र में पड़ गई कि किस तरह से चीन में इस गटर-ऑयल का इस्तेमाल दवाईयां बनाने के लिए किया जाता है….आप ठीक ही समझ रहे हैं, इस की तुलना आप बिल्कुल गटर से निकले तेल से ही कर सकते हैं।

गटर-ऑयल के बारे में आप अपनी जिज्ञासा एक मिनट के लिए विकिपीडिया पर जा कर शांत कर सकते हैं। और जिस तरह से इस तेल को कुछ रेस्टरां आदि खाना बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं यह भी कुछ कम हैरतअंगेज़ नहीं है।

विकिपीडिया पर पड़ी जानकारी को यहां टिका रहा हूं ….Gutter oil (simplified Chinese: 地沟油; traditional Chinese: 地溝油; pinyin: Dìgōu yóu) is a term used in China to describe illicit cooking oil which has been recycled from waste oil collected from sources such as restaurant fryers, drains, grease traps and slaughterhouse waste. Reprocessing is often very rudimentary; techniques include filtration, boiling, refining and the removal of adulterants.[1] It is then packaged and resold as a cheaper alternative to normal cooking oil. Another version of gutter oil uses discarded animal parts, animal fat and skins, internal organs, and expired or otherwise low-quality meat which is then cooked in large vats in order to extract the oil. Used kitchen oil can be purchased for between 859 and 937 dollars per ton while the cleaned and refined product can sell for 1,560 per ton.[2] Thus there is great economic incentive to produce and sell gutter oil. It is estimated that up to one in every ten lower market restaurant meals consumed in China is prepared with gutter oil.[3] This high prevalence is due to what Feng Ping of the China Meat Research Center has made clear: “The illegal oil shows no difference in appearance and indicators after refining and purification because the law breakers are skillful at coping with the established standards.”[4]
गटर-ऑयल से मतलब जो तेल इस्तेमाल करने के बाद बड़े बड़े होटलों-रेस्टराओं के द्वारा फैंकने लायक हो जाता है उसे गटर-ऑयल की परिभाषा दी जाती है और बीबीसी की साइट पर आप इस खबर को देख कर अचंभित रह जाएंगे कि किस तरह से एक माफिया इस तेल को इक्ट्ठा कर के, यहां तक की रेस्टरां के गटर से इस एकत्रित कर के फिर से कुछ जुगाड़बाजी कर के इसे लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं।

मेरी श्रीमति जी बता रही थीं – वे सामान्य चिकित्सक हैं – कि कायदे से तो तेल का उपयोग तलने के लिए केवल एक ही बार होना चाहिए .. बता रही थीं कि घर में हम लोग कईं बार थोड़ा नया तेल मिक्स कर के इसे दूसरी बात इस्तेमाल कर तो लेते हैं लेकिन यह गलत है….क्योंकि हम सब जानते हैं कि किस तरह से अगर तेल को बार बार गर्म कर के इस्तेमाल किया जाता है तो वह बहुत हानिकारक बन जाता है … इस से ट्रांसफैट्स पैदा हो जाते हैं जो शरीर के लिए बहुत हानिकारक होते हैं।

यह तो थी घर की बात ..लेकिन कभी अपने पड़ोस वाले समोसे, कचौरी, भजिया, वड़ा-पाव वाले के उस बर्तन को देखिये जिस में तेल उबाला जाता है …यह सुबह से शाम तक उबलते उबलते काला हो जाता है ..ट्रांस-फेट्स तो बहुत कम है, इन में क्या क्या होता होगा, इस की जांच कभी वैज्ञानिक फुर्सत में करेंगे तो सही पता चल पाएगा। इस का सीधा सा प्रमाण है कि बाहर से कुछ भी तला हुआ खाने से क्यों तुरंत गला खराब हो जाता है। गले खराब का तो हमें पता चल जाता है ..अंदर क्या क्या उत्पात मचाता होगा ऐसा तेल इस से पर्दा तो बहुत बाद ही उठता है।

मैं अकसर देखता हूं कि आज कल के युवा वर्ग को बाहर से बर्गर, हॉट-डॉग, चाउमीन, हाका नूडल्स, मैकरोनी आदि बहुत पसंद है, लेकिन अकसर सड़क किनारे खड़े इन खोमचे वालों को खूब तेल का इस्तेमाल करते तो आपने देखा ही होगा ….कभी इस की गुणवत्ता के बारे में थोड़ा सा सोच विचार करने के बाद फिर से ऐसा कुछ खाने की इच्छा नहीं होगी।

यह चीन में इस्तेमाल हो रहे गटर-ऑयल वाली खबर पढ़ कर मुझे यही लग रहा था कि चीन की खबर पढ़ ली …तो क्या यह गटर-ऑयल पाने की तकनीक क्या इतनी मुश्किल है कि यह सब लफड़ेबाजी यहां नहीं होती होगी……वैसे ही इंडस्ट्री चीन की दीवानी है, कहीं यह दीवानगी कुछ ऐसे वैसे गुल तो नहीं खिला रही।

बस यह लिख कर अपनी बात को विराम दे रहा हूं कि गटर-ऑयल के बारे में आप सब को भी सचेत रहने की ज़रूरत है, कम से कम बाहर कुछ भी खाते पीते वक्त तो इस का ध्यान रख ही सकते हैं ……मान लिया कि दवाईयों में गटर-ऑयल के इस्तेमाल वाली बात आप की पहुंच से दूर की बात है लेकिन बाहर खाते-पीते वक्त तो हम इस चीनी सच्चाई को ध्यान में रख ही सकते हैं।

प्रेरणा — China probes ‘gutter oil in medicine’ claims

जाते जाते बचपन में अकसर रेडियो पर बजने वाला यह गीत याद आ गया …