एंजेलिना जोली से किसे कितना सीखना होगा…

दो-तीन दिन पहले जब सुबह सवेरे दा हिंदु के पन्ने उलट पलट रहा था तो एंजेलिना जोली के लेख का एक शीर्षक सा दिखा …समय था नहीं, इसलिए शाम तक उसे पढ़ना स्थगित कर दिया। शाम को उस विषय पर स्टार न्यूज़ पर एक पूरी कवरेज देखी।

स्टार न्यूज़ का प्रोग्राम अच्छा था…लोगों को इस समस्या के बारे में जागरूक करने का एक अच्छा प्रयास किया। उस में उन्होंने महिलाओं को स्तन के स्वयं परीक्षण करने के लिए भी प्रेरित किया। जहां तक मुझे ध्यान है उस प्रोग्राम में इस तरह की सर्जरी पर होने वाले खर्च, जीन्स टैस्टिंग के खर्च एवं उस के बाद इंप्लांट लगवाने की कीमत पर कोई बात न हुई थी।

उस प्रोग्राम के बाद मैंने एंजेलिना जोली का न्यू-यॉर्क टाइम्स के सौजन्य से प्रकाशित हुआ लेख देखा —  My Medical Choice —उस ने बड़े ही खुलेपन से वह लेख लिख कर लोगों तक स्तनकैंसर के बारे में जागरूकता पैदा करने का प्रयास किया था। उस के ही लेख से पता चला कि उस ने इस तरह की सर्जरी के बाद इंप्लांट भी लगवा लिये और जिस जीन टैस्टिंग की बात चल रही थी उस का भी दाम शायद डेढ़ दो लाख के करीब है, मैं ऐसा समझ पाया।

बेशक इस तरह की पहल अमेरिका में बहुत सी महिलाएं पहले भी कर चुकी हैं लेकिन एक इतनी प्रसिद्ध हीरोइन ने जब इस तरह का एक मैडीकल निर्णय लिया तो ज़ाहिर सी बात है कि उस से इस समस्या के बारे में जागरूकता तो बढ़ेगी ही।

जब मैं विश्व की अधिकतर जनसंख्या के बारे में सोचता हूं तो मुझे यह प्रश्न परेशान करता है कि आखिर कितनी महिलाएं इस तरह का महंगा टैस्ट करवा पाएंगी… उस के बाद सर्जरी, फिर इंप्लांट ……लेकिन जो इस तरह का जीन टैस्ट करवाने में सक्षम होंगी, मार्कीट शक्तियों द्वारा उन का शोषण नहीं होगा, ऐसा भी नहीं लगता। हम अच्छे से जानते हैं किस तरह से अंधाधुंध गर्भाशय निकालने की रिपोर्टें, गुर्दे चोरी होने के मामले, बाईपास सर्जरी एवं स्टेंटों का बाज़ार — आज सब लोग बहुत कुछ जानते हैं।

ऐसा नहीं है कि जीन्स टैस्टिंग में इस तरह की कोई गड़बड़ी होने पर केवल स्तनों को आप्रेशन से उतरवाना ही एक रास्ता रह जाता है …. उस के लिए अन्य विकल्प भी हैं जैसे कि नियमित स्क्रीनिंग आदि … और आज मीडिया की राय भी यही है कि कैंसर विशेषज्ञों को इस तरह के विकल्पों की भी पूरी जानकारी महिलाओं तक पहुंचानी चाहिए।

जो भी हो, एंजेलिना ने लोगों को अपनी आपबीती बता कर एक बहुत ही साहसी काम तो किया ही है जिस से लोगों को कम से कम इस बीमारी की जीन-टैस्टिंग के बारे में पता तो चला….बहुत से लोग इस विषय पर सोचने के लिये मजबूर होंगे — भारत की बात करें, मैमोग्राफी तो अभी भी गिने-चुने लोगों तक ही मौजूद हैं, ब्रेस्ट शेल्फ परीक्षण के बारे में जागरूकता निरंतर बढ़ाए जाने की ज़रूरत है, और कम से कम तकलीफ़ होने पर डाक्टर के पास महिलाएं जाएं तो ……..अंधविश्वसाें, झाड़-फूंक, टोने टोटकों एवं झिझक की वजह से छोटा सा रोग कब बढ़ जाता है पता ही नहीं चलता।

हम सब की जिम्मेदारी है कि हम लोग इस की जागरूकता बढ़ाएं ……लिखते लिखते बाम्बे टाकीज़ की नवाजुद्दीन सिद्दकी की कहानी में उस का किरदार ध्यान में आ जाता है जिस में उसे केवल एक हीरो से धक्का खा कर बस एक शब्द .. ऐ... ही बोलना होता है …..और वह उस में भी कितनी क्रिएटिविटि ले आता है ….देखने लायक है। मैंने इस कहानी को अपने बेटे की इंगलिश की बुक में पिछले वर्ष पढ़ा था — सत्यजीत रे की कहानी पटोल बाबू …. मैं इस कहानी से बहुत इंस्पायर्ड हूं …….मैं जब कभी मरीज़ों के साथ बात करते करते ऊबने लगता हूं तो उस महान कहानीकार को याद कर लेता हूं …

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