कुदरत का इंसाफ

जगन्नाथ मलीहाबाद में अपने आम के पेड़ों के बाग में खटिया डाले पकी हुई फसल को देख कर खुश हो रहा था… हर तरफ आमों से लहलहाती डालियां, उस की खटिया के आस पास खेलते उस के नाती-पोते-पोतियां…. बादल छाए हुए और खुशी का माहौल। मलीहाबाद लखनऊ के पास ही है और आम के बागों के लिए मशहूर है।

जगन्नाथ सरकारी नौकरी में था, पांच छः वर्ष पहले ही रिटायर हो कर अपने गांव में आकर बस गया था, बड़े बाबू के पद से रिटायर हुए जगन्नाथ को सुबह सुबह दो तीन घंटे अखबार चबाने का बहुत शौक था। अचानक अखबार पढ़ते पढ़ते हंसने लगा… चुटकुला भी तो कुछ ऐसा ही था…
बिल्कुल उस की तरह ही (जैसे वह आम के पेड़ों के नीचे लेटा हुआ था)… एक बेहद आलसी इंसान जामुन के पेड़ के नीचे लेट कर जामुन के गिरने की इंतज़ार कर रहा था, अचानक एक जामुन गिरा लेकिन यह गिरा उस के पेट पर… लेकिन वह भी इतना आलसी कि पेट से उठा कर मुंह में डालने की मेहनत कौन करे….ऐसे ही लेटा रहा, अचानक किसी राहगीर का ध्यान उस की तरफ़ गया, उसे तरस आ गया और उस ने जामुन उस के पेट से उठा कर मुंह में डाल दिया। अभी राहगीर कुछ ही दूर गया था कि उसे उस आलसी की आवाज़ सुनाई दी …. वह वापिस मुड़ कर उस के पास पहुंचा तो उस आलसी ने उस से शिकवे के अंदाज़ में कहा — मेरे मुंह से जामुन का गिटक कौन निकालेगा ?….

लेकिन यह कहा हुआ अचानक जगन्नाथ की हंसी एक उदासी में बदल गई …उस का ध्यान पहले पन्ने पर छपी उत्तराखंड मे हुई विनाश लीला की तस्वीरों की तरफ़ चला गया .. हर तरह तबाही, त्रासदी, भूख, बीमारी और जांबाज़ फौजियों के जां-बाजी के दृश्य………….ऐसी तस्वीरें ऐसी खबरें ऐसी आपबीती कहानियां कि पत्थर दिल भी पसीज जाए…. और जगन्नाथ यही सोचने लगा कि कैसे आज के मानव ने प्रकृति का हर तरह से शोषण किया और फिर प्रकृति जब हिसाब करने का निर्णय करती है तो किस की भला चल पाई है….. अपनी खटिया के आस पास खेल रहे बच्चों के शोरगुल और पहाड़ पर आई विपदा के बारे में सोचते सोचते कब जगन्नाथ की आंख लग गई पता ही नहीं चला। बस केवल सोने से पहले उस का ध्यान अपने २५ वर्ष पहले रहे एक विभागाध्यक्ष डा सुच्चा की तरफ़ चला गया …. उसको ध्यान आया कि डा सुच्चा किस तरह से बीस साल पहले आई एक ऐसी ही त्रासदी का शिकार हो गये थे….पहाड़ पर घूमने गये थे, बादल फूटे और कोई नामो निशां ही न मिला …. तब अभी उन को रिटायर हुए चंद महीने ही तो हुए थे।

सोते सोते कब जगन्नाथ स्वपनलोक में पहुंच गया पता ही नहीं चला। बीस वर्ष पहले के दिन बिल्कुल चलचित्र की भांति उस के सामने आने लगे। पहले तो उसे अपने बॉस डा सुच्चा के दर्शन हुए… कितना दबदबा सा उस के बास का………किसी से ढंग से बात नहीं करता था…इतनी बड़ी पोस्ट पर रहते हुए भी भद्रता उस से कोसों दूर थी। लेकिन दिखावे के लिए उस ने अपने घर में एक मंदिर बना रखा था जहां सुबह शाम टल ज़रूर खड़काता था, अपने कमरे में भी लगभग सभी तरह के भगवानों की तस्वीरें लगा रखी थीं कि आने वाला समझता था कि इस से बड़ा धर्मात्मा तो इस कलयुग में हो ही नहीं सकता था। हाथों में तरह तरह की अंगूठियां — विभिन्न ग्रहों को कंट्रोल करने के हेतु…।

लेकिन जगन्नाथ को बिल्कुल अच्छे से याद है कि उस जितना भ्रष्ट आदमी उस ने अपनी सारी सर्विस में नहीं देखा था। उसे सपने में साफ दिख रहा था कि किस तरह से वह विभिन्न शहरों में पर कार्यरत अपने मातहतों से आचार, मुरब्बे, सक्वायश, रूह-अफज़ा, मिठाईयां….और भी अनेकों चीज़ें निरंतर मंगवाता रहता था। अपने फर्जी मैडीकल बिल जमा कर के तनख्वाह में पैसे जुड़े देख कर उस के चेहरे की चमक देखते बनती थी।

डा सुच्चा गरीब को अच्छी तरह से निचोड लेता था, उस का एक तरह से मजाक बनाता था, लेकिन कोई भी काम करने के लिए उस से भी पैसा लिए बिना वह नहीं रह सकता था… जगन्नाथ को उस पर बहुत बार गुस्सा भी आया लेकिन बास तो ठहरा बास… अगर किसी ने भी सिर उठाया नहीं कि उस का तबादला ऐसी जगह कर देता था कि बंदा परेशान हो जाता था। कोई भी काम करने के लिए उस का रेट फिक्स था.. आफीस में लोग मजाक में आपस में बात किया करते थे कि यह बंदा तो कमर्शियल सैक्स वर्कर से भी ज़्यादा गया गुजरा है। किसी भी ज़रूरतमंद की यह शैतान मदद न करता।

लेकिन वह ट्रांसफर के लिए और किसी को अपनी पसंद की पोस्टिगं देने के लिए सरेआम पैसे लिया करता था.. मुंहमांगे पैसे न मिलने पर काम रूकवा दिया करता था.. डा सुच्चा बस नाम ही सुच्चा ही था, जगन्नाथ को ध्यान आ रहा था कि किस तरह से लोग वेतन आयोग के एरियर दे देकर अपनी अपनी पसंदीदा जगह पर पहुंच गये।

जगन्नाथ को ध्यान आ रहा था कि कोई इतना कमीना कैसे हो सकता है …. उस का बास कागज़ों में कुछ और सरकारी सामान खरीदता था लेकिन उस के एवज में घर के लिए साबुन, शैंपू, परफ्यूम …..और बीवी के सैनेटरी नैपकिन तक उस खाते से ही मंगवाता था … लेकिन बिल दफ्तर की दूसरी चीज़ों का आता था…. जगन्नाथ को तो सब बातों का पता चलता रहता था क्योंकि चपरासी उस से सारी बातें करता रहता था।

जगन्नाथ हमेशा यही सोचा करता था कि कोई इतनी बड़ी पोस्ट पर रहते हुए भी इतना भूखा कैसे रह सकता है …. किसी को नहीं बख्शा, जब तक उसे माथा नहीं टेका गया दान दक्षिणा के साथ, तब तक भूल जाएं कि कोई काम हो जायेगा। किसी भी ठेकेदार को उस ने नहीं बख्शा, उस डा सुच्चा का बस चलता तो ठेकेदारों के कपड़े तक उतरवा कर निलामी करवा देता।

जगन्नाथ को अच्छे से ध्यान है कि किस तरह से कर्मचारी संगठनों के लोग उस से सब तरह के ठीक और गलत काम उस की मेज पर हाथ मार कर करवा के ले जाया करते थे…उन्हें देखते ही उस शैतान की घिग्धी बंध जाया करती थी क्योंकि उन्हें भी सब पता था कि वह कितना भ्रष्ट है…. उन्हें खिसियानी हंसी के साथ चाय पिलवा कर समोसे खिलवा कर जमाई राजा की तरह उन की आवभगत करना उस की मजबूरी सी दिखती थी।

जगन्नाथ इतने सालों से यही सोचता रहता है कि आखिर उस ने इतने पैसे का किया क्या………दिल्ली में आलीशान बंगाला तो बना लिया था… लेकिन उसे उस में रहना तक नसीब नहीं हुआ…. पब्लिक को चूतिया बना बना कर ही उस ने बंगला बनाया………जगन्नाथ को यह भी पता था कि वह किस तरह से अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को यह कहा करता था, अच्छा, सुनो इतने बोरे सीमेंट, इतने टन सरिया, इतनी लकड़ी ….प्लाट पर पहुंचा आओ………और इस सब का नतीजा यह होता था कि अधीनस्थ कर्मचारी भी अपनी मनमानी करने लगे थे, लेट आना, जल्दी चले आना, उन्होंने कौन सा अपनी जेब से सरिया खरीदना होता था, उन्होंने आगे अंधेरगर्दी मचा रखी थी……कोई भी काम के लिए आए तो, हलाल हुए बिना कैसे जा पाए… उस की ऐसी की तैसी।

पता नहीं जगन्नाथ को भी आज ही सारी तस्वीर सपने में दिखनी थीं. … डा सुच्चा ने बहुत सी मशीनें खरीदवाईं थींं लेकिन हर मशीन पर तय कमीशन उस के घर पहुंच जाया करती थीं। हर जगह कमीशन फिक्स, हर जगह जा जा कर मुर्गे और दारू के लिए चले जाना उस की फितरत में शामिल हो चुका था। बार बार जगन्नाथ को कहा करता था कि तुम लोग आफिस के लिए कुछ खरीदते ही नहीं हो… क्योंकि उसे पता था कि खरीद होगी तो ही उस का हिस्सा उस तक पहुंचेगा।

उस को वह भी साफ साफ याद है किस तरह से एक महिला कर्मी ने उसे केवल दो रेडीमड कमीज़ें देकर अपना तबादला अपनी मनपसंदीदा जगह करवा लिया था। जगन्नाथ का टूर अकसर रोहतक लगता था, वहां की गजक -रेवड़ी बड़ी मशहूर है .. एक बार वह भी ले गया बास के लिए यह सब कुछ .. दो दिन बाद उसे बुला कर कहता है कि आगे से जाओ तो फलां फलां दुकान से ही खरीदा करो …वहां देसी घी ही इस्तेमाल होता है।
जगन्नाथ रोहतक से तो कभी लाया नहीं ..लेकिन जब भी मलीहाबाद छुट्टी काट कर जाता तो सीजन होता तो उसे आठ दस किलो आम ज़रूर पहुंचा आता … कहता कि गांव के खेतन से ताज़ा लाया हूं लेकिन उठा लिया करता था अपने ही घर के पास किसी भी रेहड़ी से ………जगन्नाथ यही सोचा करता था कि अब इस लुक्खे के लिए भला कौन इतनी मेहनत करे कि मलीहाबाद से आम का टोकरा उठा कर रेलों में धक्का खाता फिरे….।

जगन्नाथ को याद आ गई उस बास की रिटायरमैंट पार्टी — कोई भी इस में शिरकत करना ही नहीं चाहता था, जैसे तैसे विदा तो किया गया लेकिन उस के जाने की खुशी में जो पार्टी उस के आफिस वालों ने की उस का मजा ही कुछ और था और उस शरीफ बदमाश बास के सारे कच्चे चिट्ठे खुल रहे थे …सब ठहाकों के साथ पार्टी का लुत्फ देर रात तक उठाते रहे।
उस बास रूपी मुसीबत को गये कुछ ही दिन हुये थे कि खबर मिली कि एक बडे़ हार्ट अटैक से बच गया था…कुछ महीने बाद प्रायश्चित के भाव से ही शायद चार धाम की यात्रा पर निकला होगा कि कुदरत ने हिसाब किताब बराबर कर दिया … जगन्नाथ को अच्छे से याद है यह उन दिनों की ही बात है जब पहाडों पर बादल फटे थे जिस में प्रोतिमा बेदी भी बह गये थे. बास का तो कोई नामो-निशां नहीं मिला —पूरे का पूरा कुनबा बह गया था उस ज़लज़ले में ……….

जगन्नाथ सोच रहा था कि किस तरह से कितने ही वर्षों तक वे लोग आफिस में आने वाले नये बाबूओं से डा सुच्चा की कहानी साझा किया करते थे ताकि उस के भी पैर जमीन पर ही टिके रहें।

दादू, चाय, दादू, चाय…………जगन्नाथ का छोटा पोता हाथ में चाय का स्टील का गिलास लिए उस का कंधा हिला रहा था, उस की निद्रा के साथ ही वह यादों के झरोखा रूपी सपना भी टूट गया।

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नसीहत ….

राजन विश्व विद्यालय में पढ़ाता है… हाल ही में उस ने पाबला जी का लेख पढ़ा था…हम सब सूअर की चर्बी खा रहे हैं। मन ही मन उस ने सोचा कि अब अपने नन्हे यिशु को इन सब चिप्स-विप्स से बचाना है। नहीं खाने देगा यह सब उसे।

कल शाम को जब वह घर लौटा तो उस की बीवी ने बताया कि दोपहर से यिशु ने कुछ नहीं खाया… शरीर भी थोड़ा थोड़ा गर्म था, लेकिन बस चिप्स खाने की रट लगाए हुए है। राजन ने सोचा कि नहीं, अब यह सब तो अब नहीं चलेगा, खाना ही खाना होगा…..लेकिन यिशु राजी नहीं हुआ।

कुछ समय बाद जब राजन को किसी काम से थोड़ा बाज़ार का काम आया तो यिशु भी उस के साथ उस के स्कूटर पर बैठ गया। और बाज़ार जाते ही चिप्स खरीदने की ज़िद्द करने लगा। आखिर उसे २० रूपये के चिप्स का पैकेट दिलाया गया, और उस पैकेट को खोलते ही बच्चे के चेहरे पर चमक देखने लायक थी… लेकिन राजन को पता चल चुका था कि वह क्या खा रहा है।

यह आज की बात नहीं थी, उस का बेटा खाने का तिरस्कार अकसर करता था लेकिन चिप्स, नूडल्स, भुजिया खाने में सदैव तत्पर रहता था। राजन को झुंझलाहट सी भी हो रही थी कि यार, हम लोगों के पढ़े लिखे होने का क्या फायदा। एक तो बुखार ऊपर से चिप्स………

अगले दिन सुबह जब उन के घर आने वाला धोबी कपड़े धोने के बाद फैला रहा था तो उस के चेहरे पर एक खुली मुस्कान, उन्मुक्त हंसी देख कर राजन से रहा नहीं गया और अनायास उस ने पूछ ही लिया —देवी गुलाम, तुम हमेशा इतने खुश कैसे रहते हो भाई?….देवी गुलाम के चेहरे पर हमेशा उत्साह, उमंग और खुशी छाई रहती थी, राजन की बीवी भी उसे बहुत बार कह चुकी थी कि ये लोग भी पता नहीं किस मिट्टी के बने होते हैं, कितना कमा लेते होंगे, चार पांच घरों के कपड़े कर के कुल चार-पांच हज़ार ….लेकिन हमेशा खुश रहना जैसे इन का स्वभाव बन चुका है।

देवी गुलाम ने मुझे कहा — साहब, मैं पहले काम नहीं करता था, मुझे कोई नहीं चाहता था, मैं काम नहीं करता था क्योंकि मैं अकेला था, कुछ भी कहीं से जैसे तैसे खा लिया करता था, लेकिन अब मेरी दो बेटियां हैं, मुझे काम करना पड़ता है … और लोग मुझे पसंद करते हैं, मेरी पूछ है हर जगह…….और फिर कहने लगा कि अब तीन साल की बच्ची घर जाने पर पूछती है, पापा, चीजी, पापा, चीजी…….

राजन को लगा कि चलो बच्चों को खाने पीने का सबक देने के लिए कोई तो मिला… देवी गुलाम बता रहा था कि बेटी को रोज़ कुछ न कुछ खाने को चाहिए ही होता है। राजन को लगा कि यह अब कहेगा चिप्स लेकर रोज़ जाता हूं ……..लेकिन देवी ने फिर आगे कहा —- साहब, उसे बस भुने हुए चने होते हैं ना, उसे तो वही पसंद हैं, जिन पर नमक लगा रहता था………

यह सुनते ही राजन को आभास हुआ कि असल में नसीहत किसे चाहिए ….उसे या देवी गुलाम को !!

अब कहानी लिखा करेंगे ….

बहुत हो गया यार ये लेख वेख…बोरियत सी होने लगी है। कुछ खुल के लिख नहीं पा रहा हूं…मन में दबा इतना कुछ और कहने को कुछ नहीं, यह तो कोई बात न हुई। अब मन की सभी बातें लिखने लगेंगे तो फसाद हो जाएंगे भाई, ऐसे में क्या करें क्या न करें।

इतने वर्ष कलम घिसाई का क्या फायदा अगर इस से बच निकलने का कोई रास्ता न निकाला तो…. बहुत सोचा, बहुत मगजमारी की…. सब से टिकाऊ तरीका यही समझ में आया कि यार अब बहुत कुछ दबी आवाज़ में कह कह के देख लिया … ऐसे बात नहीं बनेगी, खुल के लिखो यार और कहानी का रूप दे दो। लिखो सब कुछ यथार्थ पर आधारित लेकिन उसे कहानी की पोशाक ओड़ा दो………सच में जो बात अपने पाठकों तक रखनी थी वह भी रख थी …लेकिन फिर भी कहानी तो कहानी है।

बचपन में स्कूल की किताबों में पढ़ी कहानियां अच्छे से याद हैं, नंदन, धर्मयुग एवं चंदामामा वाली कहानियां याद नहीं हैं। स्कूली किताबों की कहानियां उद्वेलित करती थीं… और आज भी गुदगुदाती हैं और रोमांच पैदा करती हैं।

मैंने १०-१२ वर्ष की उम्र में एक लघु कहानी एक हिंदी के अखबार को भेजी थी, उन्हें छाप भी दी…मिल कर काम करो। फिर लगभग १२-१५ वर्ष पहले लेखक शिविरों में गया, वहां कहानियां लिखीं …कुछ कुछ समझ में आया लेकिन कभी फिर वापिस आ कर अपनी बात कहानी में कहने का अंदाज़ सीख ही न पाया।

हां, एक राईटर्स ब्यूरो नाम का कोर्स भी लगभग १८-२० हज़ार रूपये भेज कर मंगवाया इंगलैंड से …….लेकिन मजा नहीं आया, आज उस का एक मोड्यूल खोल कर बैठ गया, इच्छा ही नहीं कुछ भी पढ़ने की ..इतना उबाऊ……….पता नहीं मोड्यूल में दम नहीं था या फिर मेरा अटैंशन स्पैन ही इतना कम हो गया है कि फेसबुक या ट्विटर की पोस्टें ही झेल पाते हैं।

इग्नू का हिंदी में रचनात्मक लेखन वाला कोर्स भी शुरू किया … उस की किताबें इतनी मुश्किल कि लगा कि यार इस से तो अच्छा है गुरूकुल कांगड़ी से पंडिताई का ही कोर्स कर लूं …एक पैराग्राफ से ज्यादा पढ़ा ही नहीं जाता था …चलिए एक दो महीने के बाद एक कंटैक्ट प्रोग्राम आया चंडीगढ़ में —आशा थी कि वहां जाकर कुछ फंडे वंडे क्लियर हो जाएंगे …….नहीं जी नहीं, फिरोज़पुर (पंजाब)—उन दिनों मैं वहां रह रहा था — से चंडीगढ़ जाने का पश्चाताप ही हुआ …जो मोहतरमा ने कंटैक्ट प्रोग्राम चंडीगढ़ में करना था, ऐसे लग रहा था जैसे उसे छात्र एवं छात्राएं देख कर अगर दुख नहीं हुआ तो खुशी का भी कोई चिन्ह नज़र नहीं आ रहा था, वरना वह यह बार बार क्यों कहतीं कि इस कंटैक्ट प्रोग्राम में आना अनिवार्य नहीं है। मैं तो जैसे उस बीबी की इस बात का इंतज़ार ही कर रहा था, दोबारा न तो उस कंटैक्ट प्रोग्राम में ही गया, न ही कोर्स की कोई किताब ही कभी खोली, न ही कोई भी असाईनमैंट ही भेजी और ज़ाहिर है परीक्षा में बैठने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था।

फिर मैंने २००७ में ब्लागिंग शुरू की … और जो मन में आया वैसा लिखता गया… बस यही सिलसिला चल रहा है, विभिन्न कारणों से ऐसा लग रहा है कि अब कहानी लिखना सीखना है। अपने मन में दबी बातों को कहानी का रूप देकर आपके सामने लाएंगे. बहुत कुछ है … देखते जाईए… आप के सामने क्या क्या आता है, मुझे भी पता नहीं…..

फिर सोचा यार कुछ नहीं होता यह सब सीखने वीखने से ….किस ने किस को कहानी कहने की तहजीब सिखाई होगी …लेकिन लोग इतनी इतनी रोचक प्रेरणात्मक कहानियां लिखते हैं, इसलिए हम भी अपनी एक नईं शैली इज़ाद करेंगे ……….कहना क्या है, अपने मन की बात ही तो कहनी है, इस में क्यों इतनी तैयारी-वैयारी…….बस इसी प्रेरणा के साथ कल से आप को कहानियों के साथ मिला करेंगे, कुछ खट्टी कुछ मीठी, कुछ गुदगुदाने वाली, कुछ सोचने पर मजबूर करेंगी, कुछ समाज का आइना और शायद कुछ ऐसी भी जिसे पढ़ते पढ़ते आंखें छलक जाएंगी।  और बहुत सी ऐसी भी जिन से हम कुछ न कुछ सीख पाएंगे।

लगता है अपनी बात कह दी है …. बात क्या, लगता है पहली कहानी छाप दी, आप को क्या लगता है, है कि नहीं ?