जैंडर सैंसेटाईज़ेशन तो हो गई लेकिन…..

आज सुबह अखबार के एक कोने में एक खबर दिखी कि डाक्टरों के सिलेबस में अब जैंडर सैंसेटाइज़ेशन के बारे में भी पाठ जोड़े जाएंगे….अर्थात् वही लिंग अनुपात के बारे में भावी डाक्टरों में संवेदनशीलता उत्पन्न की जाएगी।

चलिए जहां भी इस तरह की अच्छी बातें हों उन का हमें समर्थन ही करना चाहिए। क्या पता इस तरह की सेंसेटाइज़ेशन को सिलेबस में डालने से अगर चंद नन्हीं बच्चियां भी आने वाले दिनों में कोख में कत्ल होने से बच जाएंगी तो भी कितना सफल प्रयास होगा यह —शुभकामनाएं।

लेकिन आज जब मैं अस्पताल जा रहा था तो मैं यही सोच रहा था कि इस तरह की फ्रैग्मैंटेड अप्रोच से हम कितना हासिल कर लेंगे ? …उस समय मुझे ध्य़ान आया है और भी बहुत से विषय हैं जिन्हें चिकित्सा पाठ्यक्रमों में शामिल किए जाने की बहुत ही ज़्यादा ज़रूरत है।

एक अहम् विषय है … कम्यूनिकेशन …. सरल हिंदी में इसे क्या कहेंगे — संप्रेषण …वार्तालाप, बातचीत, संवाद ….कुछ भी……..मेरी हिंदी पंजाब में दूसरी भाषा में दसवीं कक्षा तक पढ़ी है, इसलिए इसमें गल्तियां गिने बिना पढ़ लिया करिए।

कुछ दिन पहले मैं यहां मैडीकल कालेज के एक प्रोफैसर के पास बैठा था …बात बात में वह कहने लगे कि समय इतना बदल गया है कि कुछ स्टूडैंट्स मरीज से बात करने तक की तमीज ही नहीं सीख पाते।

जो मरीज हमारे पास आता है उसे न तो हमारी डिग्रीयों से न ही हमारे एक्सपीरिएंस से और न ही हमारे पेपरों से कोई वास्ता होता है जो हमने विभिन्न कान्फ्रैंसों पर पढ़े —उसे सरोकार है तो सिर्फ़ इस बात से कि हम ने कितनी सहजता से उस की बात सुनी, उस की समस्या समझने की कोशिश की और उसके साथ मिल कर समाधान ढूंढने की बात की। बस बात इतनी सी है, यही सीखते सीखते कब बीस-तीस साल बीत जाते हैं पता ही नहीं चलता।

याद आता है डाक्टर लोग मरीज़ की चाल ढाल की बात करते हैं, वह उन के कमरे में कैसे प्रवेश कर रहा है, यह उन्हें मरीज़ की पर्सनैलिटी के बारे में बहुत कुछ बता देता है , ठीक है …. बताता होगा, लेकिन यह कम्यूनिकेशन इतना भव्य विषय है कि हम लोग जितना इस के विषय में जानने लगते हैं उतना ही लगने लगता है कि हम कितना कम जानते हैं।

सब से पहले मैं इस कम्यूनिकेशन विषय से रू-ब-रू १९९२-९३ के दौरान तब हुआ जब मैंने बंबई के टाटा इंस्टीच्यूट फॉर सोशल साईंसेस में एक विषय बिताया डिप्लोमा इन हास्पीटल एडमिनिस्ट्रेशन करते हुए……. तब ही पता चला कि यह भी एक विषय होता है और अस्पताल जैसी जगह में इस का कितना ज़्यादा महत्व है, इस के बारे में भी तभी पता चला। फिर उस के बाद २००२ से लेकर अब तक मैं कम्यूनिकेशन का निरंतर स्टूडैंट रहा हूं ……विभिन्न जगहों पर, विभिन्न कोर्सों, वर्कशापों आदि के माध्यम से।

सीधी बात पर आता हूं क्योंकि इतना घुमा फिरा कर बात कर रहा हूं.. मुझे हमेशा यह बहुत ही बुरा लगता है कि कुछ अस्पतालों में किसी किसी डाक्टर के कक्ष में एक साथ कईं कईं मरीज़ घुसे होते हैं, महिला मरीज़ हैं तो साथ में पुरूष भी खड़े हैं, डाक्टर साहब वहीं सब के सामने प्रश्न पूछे जा रहे हैं, ऐसी परिस्थिति में कौन कितनी खुल के बात कर पाता होगा इस का निर्णय मैं आप पर छोड़ता हूं………बहुत ही बेकार सिस्टम लगता है यह, चाहे डाक्टर कोई भी एक्सप्लेनेशन दे दे, लेकिन वे सब की सब बेकार लगती हैं, अगर हम किसी मरीज़ की प्राईव्हेसी का ही सम्मान नहीं कर पा रहे हैं तो इस के आगे रह ही क्या जाता है।

मेरा यह यह लिखना भी ठीक नहीं लगता कि इस तरह की व्यवस्था किन अस्पतालों में होती है, पाठक सब जानते हैं लेकिन मैं इतना कहूंगा कि किसी भी डाक्टर की सफलता का एक इंडैक्स यह भी है कि उस का अपने मरीज़ों से संवाद कैसा है, लिखते समय लग रहा है कि जैसे कोई प्रोफैसर अपना ज्ञान झाड़ रहा है, ठीक है भाई मास्टरी नहीं की तो नहीं की, लेकिन ज़िंदगी के तीस वर्ष के करीब प्रोफैशन में रहने के बाद इस किताब को अच्छे से पढ़ने की कोशिश तो की  ही है, उसे पाठकों के साथ बांट लेने को कोई प्रवचनबाजी कहे तो कहा करे।

जो भी हो यह बहुत बड़ा एवं संजीदा विषय है जिस के ऊपर मैंने देखा है कि मैडीकल शैक्षिक संस्थानों में बहुत ही ज़्यादा ध्यान दिया जाना ज़रूरी है, बहुत ही ज़रूरी है, जैंडर सैंसेटाइज़ेशन को सिलेबस में डाल रहे हो भाईयो तो इस विषय को भी डाल लें ……..Communicating with patients. अभी अभी ध्यान आया मैंने ठीक इसी विषय पर एक बुक ब्रिटिश लाईब्रेरी से ले कर पढ़ी थी …………..once upon a time during those mid-1990 days!

इधर इस गीत में भी एक मुकद्दस क्लास चल रही है …इस तरह की क्लासों ने भी हमें हमारे फारमेटिव इयर्ज़ के दौरान बहुत प्रभावित किया …………….

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गुम होता बचपन…

कुछ दिन पहले में अजमेर से जयपुर आ रहा था…..गाड़ी में यह बच्चा अपने से लगभग दो वर्ष बड़ी बहन के साथ करतब दिखा रहा था …

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बच्चे में आत्मविश्वास उस की आंखों में झलक रहा है… पहले तो ये दोनों कोई गीत गाते रहे …आप इस दूसरी तस्वीर में देखिए कि उस की बहन एक लोहे की रिंग लेकर नीचे लेट गई और उस रिंग में से निकल गई……..यात्रियों ने सोचा कि खोल खत्म ……लेकिन नहीं साब, अब उसी लोहे की रिंग में से (जो उस की बहन के इर्द-गिर्द थी) यह बच्चा भी निकल गया………सब लोग बडे़ हैरान हुए…………

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फिर उठ कर अपनी टोपी को इस तरह से घुमाने लगे कि गाड़ी में मौजूद बच्चे खिलखिला उठे………..

ऐसे बहुत से बच्चे हम लोगों को गाड़ियों, बस स्टैडों, बाज़ारों में करतब करते दिख जाते हैं………..बाल श्रण कानून क्या इन नन्ही जानों के लिए लागू नहीं होता, मैं यही सोच रहा था, सारा दिन गाडियों में घूमते हैं, हर तरह के लोगों से इन का पाला पड़ता है, जोखिम वाला काम तो है ही ……..कोई स्पोर्ट सिस्टम नहीं, बस यात्री एक-दो रूपये का सिक्का उस की हथेली पर रख कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते दिखते हैं।

कईं जगहों पर आपने भी देखा होगा कि बच्चे ठीकरी से (टूटे हुए मिट्टी के बर्तन के टुकडे) संगीत बजाते हैं और बहुत सुंदर गीत गाते हैं. मुझे याद आया कि एक बार मैं भटिंडा जा रहा था तो ऐसे ही एक बच्चा गीत गा रहा था —असीं दोवें रूठ बैठे तां मनाऊ कौन वे……….वह कितना मंजा हुआ गायक लग रहा था, गीत के बाद उस से  कुछ लोग उस के बारे में पूछने लगे …………….कईं बार ऐसे ही किसी पारखी को हीरे मिल जाते होंगे ………..जो आगे चल कर अपने फन से देश-विदेश में बहुत नाम कमाते हैं। सच में फन परिस्थितियों को मोहताज नहीं है, आप का क्या ख्याल है?

मिले जो कड़ी कड़ी ….

अभी अभी एफएम रेडियो लगाया तो पिटारा प्रोग्राम में एक दंत विशेषज्ञ देश को डैंटल इम्पलांट के बारे में बता रहे हैं…………

मुझे एक बार तो लगा कि यार यहां तो बार बार एक ही बात करने की ज़रूरत है कि पान-तंबाकू, गुटखा, पान मसाला, तंबाकू वाले मंजन छोड़ कर अच्छे से दांत और जिह्वा को साफ़ करने की बातें हों …..तीस वर्ष प्रोफैशन में बिताने के बाद यही लगने लगा है कि बस यही बातें इस देश के लिए ज़रूरी हैं, लेकिन फिर भी लोग कहां मानते हैं……..थक जाते हैं हम लोग सुबह से शाम तक यही प्रवचन देते देते कि पान-तंबाकू, गुटखा किस तरह से सेहत को बिगाड़ देता है ……लेकिन बहुत जगहों पर देखा है कि स्वास्थ्य कर्मी तो क्या, स्वयं चिकित्सक लोग भी यह सब खाते दिख जाते हैं।

कुछ दिन पहले मुझे कोई बता रहा था कि वह एक चिकित्सक के पास गया ..उस ने मुंह में इतना पान-गुटखा ठूंस रखा था कि मरीज़ ने सोचा कि चुपचाप दवाई लिखवा कर खिसक लूं कहीं डाक्टर के मुंह से निकले लाल-पीले छींटे उस के नये सफ़ेद कुर्ते को ही खराब न कर दें। विविध भारती को मेरी सलाह है कि वे सेहत से संबंधित विषयों का चयन करते समय इस बात पर विशेष ध्यान दिया करें कि किस तरह से उस एक घंटे में इस तरह की सेहत से जुड़ी बातें देश की जनता से साझी की जाएं जिन से अधिक से अधिक लोगों को लाभ पहुंच सके………..मेरी बात का यकीन कीजिए देश में मुंह के स्वास्थ्य का स्तर इतना गिर चुका है… यही सब तंबाकू-वाकू, गुटखा…. कहर बरपाये जा रहा है, ऐसे में इन्हें डैंलट इंप्लाट की जगह दांतों को साफ-स्वच्छ रखने की ज़रूरत कहीं ज्यादा है।

एफएम रेडियो पर आने वाले दंत चिकित्सक अच्छे से अपने विषय के बारे में बता रहे थे…..बीच बीच में उन से उन की पसंद के हिंदी फिल्मी गीत बजाए जाते हैं………उन की पसंद का एक गीत मेरी पसंद से मैच करता निकला ………मैंने एफएम थोड़ा पीछे सरका दिया और इस गीत को सुनने लग गया……….कालेज के जमाने में देखी इस फिल्म कस्मे-वादे की यादों में खो गया……

फेसबुक फोरम पर दिल खोल कर कुछ कहते क्यों नहीं….

फेसबुक पर बहुत से फोरमों में मैंबर हूं … अच्छा है, लेकिन अधिकतर फोरमों को तो कभी खोल के देखा तक नहीं, इतनी फ़ुर्सत ही कहां होती है…….लेकिन अकसर जिन फोरमों पर जाता हूं–सोचने लगा हूं कि वहां पर भी कहां दिल खोल कर अपनी बात कह पाता हूं।

बहुत बार ऐसा होता है कि किसी फोरम पर दिखी किसी पोस्ट पर दिल खोल कर कुछ लिख दिया …फिर ध्यान आता है उन लोगों का जो हमारी हर टिप्पणी को सुक्ष्मदर्शी लैंस से जांचेंगे —एक तरह से अपने अधिक बुद्धिजीवि होने का प्रमाण देने के लिए कुछ भी भारी भरकम लिखने लगेंगे …..सिर दर्द कर देने वाला।

कुछ ऐसे फोरम होते हैं जो किसी सर्विस से संबंधित लोगों ने बनाए होते हैं … पता है कि ये अनऑफीशियल तरह के फोरम हैं ..लेकिन फिर भी मुझे मेरा एक मित्र बता रहा था कि उस ने कुछ चुभती बातें रख दीं वहां पर — अब जिसे चुभनी थीं उसे चुभ गईं ….बड़ा लफड़ा हुआ ..कह रहा था कि उसे धमकी वमकी मिली…उस की पोस्टों एवं टिप्पणीयों के प्रिंट आउट निकलवा कर कहीं ऊपर पहुंचा दिए गये — वही कह रहा था, मुझे तो ऐसा कभी लगा नहीं, लेकिन एक बात तो है कि आदमी जो भी लिखे फिर उस पर अडिग रहे।

वैसे भी फेसबुक पर जिन फोरमों पर हमारे स्कूल, कॉलेज एवं सर्विस के शुरूआती दिनों के संगी-साथी होते हैं, उन पर हमारा विश्वास बिल्कुल अपने परिवार के सदस्यों के जैसा होता है, हम कैसे भी कुछ भी लिख लेते हैं, साझा कर लेते हैं, चैटिंग में सब दुःख सुख बांट लेते हैं , लेकिन ऐसा हर एक के साथ नहीं हो पाता। आदमी चाह कर भी दिल खोल के दूसरे फोरमों पर कुछ लिख नहीं पाता।

मेरे साथ भी कितना बार हुआ कि मैंने एक पूरी टिप्पणी लिखी किसी ऐसे फोरम पर ……….चार पांच पंक्तियां लिखने पर ऐंटर दबाने से पहले ही डिलीट कर दिया ….और कईं बार अपना कमैट ओके करने के चंद मिनटों बाद ही डिलीट कर दिया …. या अपनी पोस्ट ही कुछ दिनों के बाद उड़ा दी।

अकसर इन फोरमों पर कुछ होता वोता नहीं है, कुछ लोग होते हैं जिन्हें चंद लोग मिल जाते हैं जिन्हें लगता है कि चलो, इन की पीठ खुजाते हैंं, पता नहीं कब काम आ जाएं। ऐसी मानसिकता भी बड़ी घातक है —अपने लिए और किस के लिए, बड़ा दुःख होता है यह सब देख कर।

अच्छा चर्चाएं पता है किस तरह की होंगी — हम इस सर्विस को कैसे सुधार कर पाएंगे, हम कान्ट्रैक्ट पर लगे डाक्टरों को पक्का कैसे कर पाएंगे, हम क्या करेंगे कि नये नये भर्ती होने वाले लोग भाग न जाएं ———-कुछ नहीं, खाली पीली जुबानी जमा खर्ची। और मज़े की बात एक एक हज़ार के मैंबर्ज़ वाले ऐसे फोरमों पर १०-२० मैंबर ही सक्रिय होते हैं, बाकी सब के सब मजा लेते हैं ….किनारे पर खड़े हो कर ………। और अगर किसी सदस्य ने काम की कोई बात पूछ ली तो कोई रिस्पांस नहीं आएगा……..यह बात हो सकती है कि आप लोग अपनी जगह पर लोकल परचेज किन शर्तियों पर करते हैं, आप के यहां क्या ट्रांसफर पालिसी का ढंग से अनुपालन होता है ….. कोई भी जवाब नहीं देगा, मेरी गारंटी है। क्योंकि इन बातों का जवाब देकर कोई भी लफड़ा मोल ही नहीं लेना चाहता।

एक मजेदार बात और कईं कईं लोग तो ऐसे भी दिख जाते हैं जो सर्विस के दौरान तो कभी फोरम पर आये नहीं, एक भी कभी टिप्पणी तक नहीं की……….लेकिन रिटायर होने के तीसरे ही दिन से अपने सेलेटमैंट के सभी चैक बैंक खाते में डाल कर फारिग होने पर — पूरी तैयारी से फोरम की सेवा में डट जाते हैं। लेकिन इन्हंें कौन समझाए कि अब इन की कौन सुनना चाहता है …….चढ़ते सूरज को ही सलाम करने का दस्तूर है जहां में —–और अगर इन लोगों ने सर्विस में रहते हुए लोगों के साथ ढंग से बर्ताव किया होता है तो बात और होती है, लोग सब समझते हैं …………..सर्विस के दौरान तो किसी से ढंग से बात की नहीं, और अब देने चले मीठे मीठे प्रवचन ………..no body is interesed better they keep in safe custody  for their grandchildren…

यही कुछ होता देखा है मैंने कुछ फोरमों पर ….किन फोरमों पर यह भी मैंने आप से साझा कर लिया…….यारों, दोस्तों और कुछ ज्ञान विज्ञान सांझा करने वाले फोरम बहुत कमाल के होते हैं …सब लोग सब कुछ कितने खुलेपन से शेयर करते हैं। मुझे ध्यान आ रहा है एक फोरम का rtiindia.org ………कमाल का फोरम है, मुझे कभी भी किसी गाइडैंस की ज़रूरत होती थी तो मैं वहां पूछता और तुरंत जवाब आ जाता, याहू-आंसर्ज भी तो ऐसा ही है …………..और भी अनेकों हैं मदद करने वाले…….।

इसलिये मेरा तो मन इस तरह के फोरमों से उचाट सा हो गया है…….इसलिये अब तो सोचा है वेलापंथी पर ही जम जाया करेंगे। आप भी कुछ तो वेलापंथी जैसा ढूंढिए …शुरू तो कर के देखिए …अच्छा लगेगा।

आज के दौर के ये कैसे रोल माडल हैं…

अभी अभी लखनऊ टाइम्स में किसी उभरते हीरो का इंटरव्यू पढ़ रहा था — वही सारी की सारी घिसी पिटी बातें ..मैं बचपन में बड़ा शरारती था, पढ़ाई में मन नहीं लगता था, आठ स्कूल बदले….चाहे निकाला नहीं गया, लेकिन निकलने पर मजबूर होना पड़ता, सारी क्लास को तंग करना, टीचरों की नाक में दम करना……वगैरह वगैरह …..पक गया यार मैं यह सब पढ़ते पढ़ते …….कहीं यह फैशन तो नहीं गया ……एक फिल्म आते ही अपने इस तरह के इंटरव्यू देना …….और दुनिया को बताना कि देखो मैं क्या था और क्या हो गया, भाई क्या तुम लोग आज के युवा को ठेंगा दिखा रहे हो यह सब कह कर ……….और वह भी उसे जो तुम लोगों को अपना रोल माडल मानने की बेवकूफ़ी कर बैठा है।

यह इस इंटरव्यू की ही बात नहीं थी,  अनेकों बार इस तरह की बातें इन हीरो लोगों के बारे में पढ़ चुके हैं हम सब। हीरो ही नहीं, बड़े बड़े निर्देशक भी यही सब बातें शेयर करते हैं कि वे किस तरह से बिल्कुल आवारा थे और अब अचानक कितने पूज्यनीय बन गये हैं।

कुछ पूज्यनीयों को पहली बीवी के ज़िदा होते हुए भी कोई दूसरी भा गई, बड़े बड़े बच्चे, कोई परवाह नहीं, चलिए यह उन का व्यक्तिगत जीवन है, अखबार के इसी तरह के सप्लीमैंट्स में पिछले हफ्ते देख रहा था एक बहुत प्रसिद्ध विलेन के बारे में …बच्चे बड़े बड़े हैं, दूसरी शादी की है ……पट्ठा लिख रहा था कि अपने से बारह वर्ष कम उम्र की बीवी के साथ कहीं जाना अच्छा लगता है।

तरह तरह के स्कैंडल देखते हैं हम इन लोगों के –किसी सिक्योरिटी वाले से झगड़ा, गाली-गलौज, प्रैस वालों से बदतमीजी, दारू, जुआ, नशा…..रेव पार्टीयां ………..सोचने की बात है कि अगर यह सब है तो फिर आज के युवाओं के कैसे रोल माडल बन सकते हैं।

सोच रहा हूं कि केवल इस आधार पर ही कि आप का जन्म किसी फेमस परिवार में हुआ ..और आप उसी ठप्पे के बल पर ऊपर पहुंच गए……जिम विम जाकर शरीर ठीक कर लिया, खाने पीने की कोई समस्या इन लोगों को होती नहीं, पर्सनल ट्रेनर ………डॉयलाग डिलिवरी सीख ली…. सोचने की बात यह है कि बस अपना बाहर बाहर ही ठीक कर लेने से क्या कोई भी रोल माडल बन सकता है।

नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है, अगर ज़िंदगी में इस तरह के रोल माडल होंगे तो लफड़ा ही लफड़ा है……….तो फिर क्या उन सौ साल पुराने रोल माडल्स को ही आज भी रोल माड्लस बना ले आज का युवा ……….यह मैं कैसे कह सकता हूं, यह हर बंदे का अपना स्वयं का निर्णय है, नहीं ज़रूरत तो कोई बात नहीं, अपने आप को ही रोल माडल बना कर पेश कर दिया जाए………यह किसी की बपौती थोड़े ही ना है……….

मुझे कुछ दिन पहले एक संघर्ष कर रहे एक्टर से मिलने का मौका मिला ——–उस ने हार तो नहीं मानी, लेकिन उस के मुंह से निकले चंद शब्दों ने बहुत कुछ कह दिया — बातचीत के दौरान कहने लगा कि स्टारों के बच्चों में स्टारों जैसी बात तो होती ही है……………..

यह उस की राय हो सकती है, मेरे विचार में दुनिया में हर शख्स एक अच्छा एक्टर है, हर युवक के अपने अनूठे सपने हैं, आकांक्षाएं हैं, लेकिन अकसर उस की परवाह करने की किसे पढ़ी है, दूसरा वह दिनचर्या की चक्की में इतना पिस जाता है कि उस के क्रिएटिव जूस कब सूख जाते हैं उसे पता ही नहीं चलता। मैं घर में आने वाली धोबी की ही बात करता हूं … २५-२६ वर्ष का बिल्कुल ठिगना सा बंदा है, लेकिन बात करने का लहजा, प्रणाम करने का सलीका …बात इस तरह से करता है मानो कोई एक्टर भी क्या करे। क्या है ना इन लोगों ने एक्टिंग ज़िदंगी के रंग मंच से सीखी होती है  और इसलिए दुनिया कुछ भी इन्हें कहे, अपने छोटी सी दुनिया में ये बिल्कुल फिट हैं, बिल्कुल सफल हैं।

आप सोच रहे होंगे कि आखिर तुम कहना क्या चाहते हो, बस इतना ही ………….कि यार फिल्में देखो इन सभी कलाकारों की, इन पर फिल्माये बढ़िया बढ़िया गीत सुनो, बार बार सुनो ……..इन की काम की प्रशंसा करो, बस यहीं तक ठीक है, या इतनी भी कल्पना करो कि इन्होंने कितनी मेहनत की है …………..लेकिन इन में से किसी को रोल वोल माडल बनाना ठीक नहीं लगता ………………….आप अपने आप में विलक्षण हैं, आप जैसा कोई नहीं है, you are yourself a unique piece, God’s own creation, beautiful child of God ……..then why to waste time in trying to emulate these so-called ‘role-models’ which in any case they are not! What do you say?

ऩईं फिल्मों के बहुत बढ़िया गीत ध्यान में आ रहे हैं, लेकिन अगर किसी का लिंक यहां दूंगा तो यही लगेगा कि मैं उस हीरो या हीरोइन के बारे में बात कर रहा था, that’s not fair.

Bye…take care! Watch out for the real model in you!!

क्या ये फरिश्तों से कम हैं…

अभी मैं लेटा लेटा वेलापंथी में मसरूफ़ था तो मेरे बेटे के मोबाइल पर यह गीत बज रहा था …..

गीत सुनते सुनते मुझे यही ध्यान आ रहा था कि हिंदी फिल्मों के गीत फुटपाथ पर किसी दानवीर की इंतज़ार में बैठे भिखारी से लेकर २०लाख की गाड़ी में चलने वाले रईस के एफएम पर बज कर एक सी खुशी देते हैं…..शायद पहले वाला इस का लुत्फ़ ज्यादा उठा पाता होगा।

मैं कल्पना कर रहा था उन लोगों कि जिन्हें सब से पहले किसी गीत का आईडिया आता है, फिर बोल लिखने, संगीत, गायक, फिल्म में परफैक्ट तरीके से फिल्माया जाना ……..और सब से ऊपर देश के करोड़ों लोगों के दिलों पर फिर किसी गीत का राज करना……कितना मुश्किल सा लगता है यह सब। लेकिन फिर भी सैंकड़ों लोगों के टीम-वर्क, मेहनत, निष्ठा यह सब संभव हो पाता है।

दशकों गुज़र जाते हैं हमें किसी गीत को सुनते सुनते –ऊबने का प्रश्न नही, समय के चक्र के साथ साथ हम उन के शब्दों को और भी स्पष्टता से समझने लगते हैं।

ऐसे में मुझे तो यही लगता है कि जो लोग गीतों को हम तक पहुंचाते हैं वे किसी फरिश्तों से कम नहीं हैं। हम बचपन से लेकर बुढ़ापे तक इन्हें बार बार सुनते हैं लेकिन फिर भी बार बार सुनना चाहते हैं. यह सब इन लोगों के फन का जादू ही तो है…………

प्राण साहब की मय्यत पर न जा पाए तुम…..

अभी द हिंदु देख रहा था …आखिरी पन्ने पर यह खबर दिखी….http://www.thehindu.com/news/national/family-fans-bid-adieu-to-pran/article4911559.ece
प्राण साहब की क्या तारीफ़ करें, उस स्तर के शब्द भी तो होने चाहिएं……बस इतना याद है कि बचपन से ही उन की फिल्में देख देख के ही बड़े हुए हैं। कोई शब्द नहीं हैं अपने पास उन की तारीफ़ करने के लिए। कल मैं यू-ट्यूब पर उन के कुछ पर्सनल वीडियो देख रहा था, बेहद सादगी वाला जीवन, प्रेम-सुकून से भरा……….

आज द हिंदु में यह रिपोर्ट देखी तो उस में लिखी चंद पंक्तियां पढ़ कर मन बहुत दुखी हुआ……..While most of Bollywood’s younger generation flooded twitter to express their grief over Pran’s death, very few, unfortunately, were present at the funeral.

 “Had this been a glitzy event or an IIFA award function, a whole lot of celebrities would have come. It is sad that you cannot give 70 minutes of your time to a man who gave 70years of his life to Bollywood,” observed Mr Murad.

Actors such as Sridevi, Shah Rukh Khan, Madhuri Dixit, Priyanka Chopra and Arjun Rampal, who were expected to pay their last respects, preferred to offer their condolences through social media instead.

यह रिपोर्ट देखने के बाद यही सोच रहा हूं कि बंदे ने सारी लाइफ फिल्मों को दे दी, ४०० फिल्मों में काम किया …….लेकिन फिर भी लोग उन के लिए चंद मिनट न निकाल पाए।

दरअसल हम जीते जी भी कहां खुल कर जी पाते हैं, कभी उस की टेंशन, कभी उसकी, कभी बॉस की फिक्र, कभी दुनिया की …………कुछ भी कह लें हम सारी लाइफ अपनी इस फुद्दुपन में ही धो डालते हैं कि यार यह ठीक नहीं, वह ठीक नहीं, दुनिया क्या कहेगी, लोग क्या कहेंगे, मेरी साख पर बट्टा लग जाएगा, लेकिन दुनिया का चेहरा साफ़ नज़र आता है जब आदमी इस दुनिया से रूखस्त होता है ……….किसी को कोई नहीं पड़ी किसी की, सब का सब दिखावा……..किसी के लिए किसी के पास टाइम ही नहीं है, इत्मीनान से किसी दुखी के पास बैठने की तो छोडिए, लोग किसी दुखी बंदे के साथ बात करने की तमीज़ तक भूलने लगे हैं, कुछ लोग यही सोच पर इत्मीनान कर लेते हैं कि ट्विटर पर बढ़िया सा कुछ लिख देंगे ………………….no, it doesn’t work here ….here personal interaction is much more valued than all those cold, clammy 140 words howsoever ornamental they might be…………better take a cue, youngsters!