पुराने पेसमेकर बचा रहे हैं भारतीयों की जानें

आज मेरी खबर पर नज़र टिकी रह गई जिस में बताया गया था कि अमेरिका में रहने वाले कुछ लोगों की मृत्यु के बाद उन के शरीर में लगे पेस-मेकर को उतार पर मुंबई के 53 मरीज़ों में लगा दिया गया।

   नहीं, नहीं, यह कोई लफड़ेबाजी नहीं…अमेरिकी लोगों ने तो मानवता के नाते इस तरह का पेसमेकर दान दिया…और फिर इन पेसमेकरों को जिन 53 मरीज़ों पर लगाया गया, उन में से 51 की हालत में बहुत अच्छा सुधार हो गया।

पता चला है कि इन में कुछ की तो हालत इतनी खराब था, हृदय के रिधम (heart rhytm) में इतनी गड़बड़ी थी, पूर्ण हार्ट-ब्लॉक था जैसी तकलीफ़ें थीं कि मरीज़ पेसमेकरों के लगने से पहले अपने व्यक्तिगत एवं घरेलू काम करते हुए ही थक जाया करते थे….लेकिन पेसमेकर लगने के बाद वे अपने काम पर लौट चुके हैं, और सामान्य जीवन जी रहे हैं।

इन पुराने पेसमेकरों को नये मरीज़ों पर लगाने से पहले अच्छे से स्टैरीलाईज़ कर लिया जाता है, ऐसा भी मैडलाइन प्लस की इस स्टोरी में लिखा है…Donated Pacemakers From U.S Safely Reused in India : Study. और यह भी लिखा गया है कि इन्हें लगाने के दो वर्ष बाद तक न तो किसी तरह की कोई विशेष कंप्लीकेशन ही हुई और ना ही इन की वजह से कोई इंफैक्शऩ ही हुई।

बात खोपड़ी में यह आई कि अगर यह जुगाड़ इतना बढ़िया है तो फिर वहां पर ही इसे दूसरे अमेरिकी मरीज़ों को ही दान क्यों नहीं दे दिया जाता….. इस का जवाब भी साथ ही लिखा हुआ है कि अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन इस तरह के उपकरण को  एक से उतार कर दूसरे पर लगाने की अनुमति नहीं देती …. और यहां भारत में तो कोई ऐसी रोक टोक है नहीं…… इन मुल्कों के उतरे हुए स्वैटर, कोट,पतलूनें भारतवासी हंसी हंसी (यह बतला बतला कर पहन रहे हैं कि टोरांटों वाली मौसी ने भेजी हैं)..पहने जा रहे हैं…. लेकिन इस संबंध में कोई मज़ाक नहीं —क्या करे जिसे ऐसी ज़रूरत है, तन ढांपने के लिये कोई जो भी पहन रहा है, ठीक है….सब ठीक ही ठीक है। अब वहां के लोगों की मौत के बाद उन के शरीर से उतारे गये पेसमेकर भी हिंदोस्तानियों के दिल की धड़कन कंट्रोल किया करेंगे। भारत में एक पेसमेकर की कीमत एक से तीन लाख रूपये  इस आर्टिकल में बताई गई है।

वैसे मुझे तो यह स्टोरी पढ़ कर यह भी लगा कि शायद यह भी एक एक्सपैरीमैंट ही भारत में हुआ होगा…क्योंकि वहां की सरकार इस तरह के काम की वहां करने की इज़ाजत नहीं देती…..मुझे यह क्यों लगता है कि एक बार स्टडी पूरी होने पर जब वैज्ञानिक पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएंगे कि इस तरह से पेसमेकरों का रीयूज़ बिल्कुल सेफ़ है, कोई इंफैक्शन का खतरा नहीं और इस की कार्य-प्रणाली भी भली-भांति काम करती रहती है, तो फिर शायद इन का रियूज़ वहीं पर उन के अपने मरीज़ों पर ही शुरू हो जाएगा…………वहां भी रिशेसन के प्रभाव के कारण लोगों की सेहत से जुड़ी ज़रूरतों को पूरा करना दिन प्रतिदिन मुश्किल होता जा रहा है।

जो भी हो, पूरे 53 मरीज़ों का भला हो गया…..चलने फिरने लगे, नौकरी पर लौट आए….परमात्मा इन की दीर्घायु करे..लेकिन मेरा ध्यान बार बार पता नहीं क्यों गिनी-पिग्ज़ (guinea-pigs) की तरफ़ जा रहा है।

बात सोचने वाली यह है कि इस तरह के ह्यूमन-ट्रायल (क्या इसे हम human trial कह सकते हैं, मुझे पता नहीं! )….से पहले भारत में डाक्टरों ने किस बॉडी/अथारिटि (medical authority) की अनुमति ली होगी या फिर यूं ही…..। इस मुद्दे के बारे में मेरे ज़हन में प्रश्न तो बहुत से उठ रहे हैं….लेकिन सोच रहा हूं अमेरिकी जर्नल ऑफ कार्डियोलॉजी का अग्रिम अंक पहले देख लूं जिस में इस की पूरी स्टडी छप रही है। बाकी बातें फिर कभी करेंगे। एक बात और भी है कि आने वाले दिनों में देखते है विशेषज्ञ इस तरह के इलाज के बारे में यहां भारतीय मीडिया में क्या कहते हैं, मेरे आंकलन की तुलना में  उन की बातें निःसंदेह बहुत ज़्यादा विश्वसनीय होंगी।

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नसबंदी कॉलोनी में ही बच्चों की भरमार की कैसे घपलेबाजी!

अभी अभी अखबार खोली तो देख कर पता चला कि दिल्ली के पास ही लोनी नामक जगह में एक नसबंदी कॉलोनी है जिस में बच्चों का तांता लगा हुआ है। बात पचती नहीं है ना, लेकिन हुआ यूं कि 1986 में डिस्ट्रिक्ट कलैक्टर ने एक स्कीम चलाई कि नसबंदी करवाओ और 50गज का एक घर पाओ। इसी दौर में 5000 लोगों ने नसबंदी तो करवा ली।

रिज़्लट तो इस नसबंदी का यह होना चाहिए था कि वह नसबंदी कॉलोनी का एरिया एक बिल्कुल शांत सा एरिया बन जाना चाहिए था …. लेकिन इस के विपरीत वहां तो कहते हैं बच्चों का तांता लगा रहता है… नंगे-धड़ंगे बच्चे कॉलोनी की गंदगी में खेलते कूदते जैसे कि इस स्कीम शुरु करने वालों को मुंह चिड़ा रहे हों।

कहते हैं कि जिन लोगों को यह घर मिले नसबंदी करवाने के बाद …उन में से तो कुछ तो इन को बेच कर पतली गली से निकल गये…लेकिन जो अधिकांश लोग इस मुस्लिम बहुल कॉलोनी में हैं, उन में से अधिकतर ने इस स्कीम के तहत् अपनी बीवी की नसबंदी करवा दी और स्वयं फिर से शादी कर ली …और एक बार फिर से यह सिलसिला चल निकला।

नसबंदी कॉलोनी —नाम ही में कुछ गड़बड़ सी लगती है … ऐसे नाम नहीं रखने चाहिए… किसी को कोई अपना पता क्या बताए ? – हो न हो, ऐसी कॉलोनी में रहना ही एक उपहास का कारण बन सकता है। नसबंदी कॉलोनी और एमरजैंसी के दौरान नसंबदी कार्यक्रम के दौरान नसबंदी के किस्से सुनते सुनते एक और किस्से का ध्यान आ गया …. हमारा एक सहकर्मी बता रहा था कि उसे दस नसबंदी करवाने को लक्ष्य दिया गया … यानि कि उस ने दस लोगों (पुरूष अथवा महिला) को नसबंदी के लिये प्रेरित करना था एक वर्ष में — कह रहा था कि वह यह टारगेट पूरा नहीं कर पाया और उस के बॉस ने उस की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में यह दर्ज कर दिया कि यह परिवार कल्याण कार्य में रूचि ही नहीं लेता…. उस चिकित्सक को जब रिपोर्ट मिली तो उस ने प्रशासन को इस के विरूद्ध अपील की और निर्णय उस के हक में हो गया और बता रहा था कि बॉस की वह टिप्पणी उस की ए.सी.आर से हटा दी गई।

हैरानगी यह है कि मैं दिल्ली को अच्छी तरह से जानता हूं … आज से बीस साल पहले बसों में भी खूब घूमा हूं लेकिन किसी बस पर यह लिखा नहीं पड़ा … नसबंदी कॉलोनी……….चलो, जो भी है, लेकिन इस कालोनी में दुनिया के आगे कम से कम एक उदाहरण तो पेश की किस तरह के परिवार नियोजन कार्यक्रम फेल हो जाते है।
Source : ‘Vasectomy Colony’ faces population explosion (Times of India, July25′ 2011)