तंबाकू चबाने वाले गले की सूजन को न करें नज़रअंदाज़

25 वर्ष से तंबाकू चबाने वाली महिला के मुंह की तस्वीर

यह जो मुंह के अंदर की तस्वीर आप देख रहे हैं यह लगभग 35वर्ष की महिला की है। उसे दांतों में कोई विशेष तकलीफ़ तो नहीं थी, बस वही थोड़ा बहुत थंडा-गर्म कभी कभी लगता है जो सारे हिंदोस्तान को लगता है…लेकिन उस का मेरे पास आने का कारण था उस का पति।

वह बता रही थी कि जब उस का पति मेरे पास आया था तो मैं किसी तंबाकू गुटखा चबाने वाले से बात कर रहा था, इसलिए उस के पति ने उसे कहा कि जाओ तुम भी अपना मुंह दिखा कर तो आओ।

हां, तो महिला ने बताया कि वह शादी से पहले ही जब वह 10-12 वर्ष की थी तब ही से वह तंबाकू-चूना चबा कर खा रही है, लगभग पिछले 25 वर्ष से यह सिलसिला चल रहा है। वह बता रही थीं कि वह दिन में तीन-चार बार ही तंबाकू-चूने का मिश्रण चबाती है। उस ने चुनौतिया भी साथ रखी हुई थी –एक स्टील की डिब्बी जिस के एक तरफ़ तंबाकू और दूसरी तरफ़ चूना भरा रहता है।

उस का मुंह चैक करने पर पाया गया कि उस के मुंह में तंबाकू-जनित घाव हैं … और इस तस्वीर में आप देख रहे हैं कि मसूड़ों में सूजन तो है, लेकिन बड़ी अलग किस्म की सूजन लग रही है। जो भी हो, इस महिला के गाल के अंदर या मसूड़ों में कैंसर के कोई लक्षण नहीं दिख रहे — लेकिन विडंबना यही है कि क्या तंबाकू को लात मारने के लिए कैंसर के प्रकट होने का इंतज़ार किया जा रहा है?

मुझे याद आ रहा था …20-21 वर्ष पहले जब मैंने रेलवे सर्विस ज्वाइन की तो एक मसूड़ों की सूजन का मरीज आया …देखने में ही गड़बड़ सी लग रही थी …शायद फरवरी 1992 की बात है, वह आया तो था मेरे पास दांत के दर्द के लिए। उन दिनों मैं बंबई के एक अस्पताल में काम कर रहा था, हम ने उसे तुरंत टाटा अस्पताल रेफ़र किया। वहां उस का डायग्नोज़ ओरल कैंसर का हुआ —उन्होंने तुरंत आप्रेशन कर दिया और वह मुझे कईं वर्षों तक आकर मिलता रहा …फिर दस वर्ष बाद मैं वहां से आ गया और मुझे उस के बारे में आगे पता नहीं।

अच्छा तो मैं बात तो इस 35 वर्षीय महिला की कर रहा था … बता रही थीं कि यह लत ऐसी है कि छूटती नहीं है। इस केस में पहली बार एक अजीब सी बात दिखी की उस का पति ऐसी किसी चीज़ का सेवन नहीं करता….बच्चे भी इन सब चीज़ों से दूर हैं। उस ने बताया कि बच्चों को तो इस तंबाकू से इतनी घिन्न आती है कि कईं बार जब मैं उन्हें तंबाकू बनाने को (तंबाकू-चूने को हाथ में मसलने की प्रकिया) कहती हूं तो साफ़ मना कर देते हैं।

महिला के चेहरे की दाईं तरफ़ वाली सूजन

अभी मैं उस का मुंह देख ही रहा था कि मुझे उस के चेहरे के दाईं तरफ़ सूजन दिखी — बता रही थी कि कुछ महीनों से है … देख कर चिंता ही हुई …बताने लगी कि दवाई खाती हूं दब जाती है फिर दोबारा हो जाती है… सूजन अजीब सी थी –ऐसी सूजन दांत एवं मुंह की इंफैक्शन के लिये तो कम ही दिखी थी, उसे मैंने विशेषज्ञ के पास भेजा है…..वह उसे चार पांच दिन के लिए एंटीबॉयोटिक दवाईयां देगा और वापिस बुला कर फिर से देखेगा। इस महिला को मेरी शुभकामनाएं.

इस तरह की सूजन के संबंध में मैंने एक पोस्ट कुछ दिन ही पहले लिखी थी …..वह बंदा भी मेरे पास दो-तीन वर्ष पहले  कुछ इसी तरह की सूजन केसाथ ही आया था…जब दवाईयों से नहीं गई, दांतों में कुछ लफड़ा था नहीं ….ई.एन.टी विशेषज्ञ के पास भेजा गया… और उस का डायग्नोज़ यह हुआ कि उसे दाईं तरफ़ के टांसिल का कैंसर है…उस का समुचित इलाज हो गया ….आजकल वह ठीक चल रहा है, उस को भी मेरी शुभकामनाएं कि उस में उस बीमारी की पुनरावृत्ति न हो।

यह पोस्ट लिखते मैं सोच रहा हूं कि महिलाएं भी अपने देश के बहुत से हिस्सों में बीड़ी पीती हैं, तंबाकू, खैनी चबाती हैं, अपने मसूडों पर मेशरी (तंबाकू का पावडर) घिसने का चलन महाराष्ट्र में विशेष कर बंबई में काफ़ी देखा है — महिलाओं का इस तरह के व्यसन में लिप्त होना बहुत गंभीर मुद्दा है क्योंकि अकसर मां अपने बच्चों के लिये एक रोल-माडल होती है …अगर वह स्वयं ही इन चक्करों में पड़ी है तो बच्चों को कैसे रोकेगी?

और तो और अगर महिलाएं धूम्रपान करती हैं तो भी सैकेंड हैंड धुआं (Passive smoking) तो घर के बाकी सभी सदस्यों आदि के लिये नुकसानदायक तो है ही।

यह पोस्ट केवल इस बात को रेखांकित करने के लिए कि तंबाकू, गुटखा, सुपारी से संबंधित किसी भी शौक को पालना किसी के भी हित में नहीं है। कुछ वर्ष पहले की बात है गुजरात में बहुत ही महिलाएं जब मुंह के कैंसर का शिकार होने लगीं तो पता चला कि वह दांतों की सफ़ाई के लिए तंबाकू वाली पेस्ट दांतों एवं मसूड़ों पर घिसती हैं और ये काम उन का दिन में कईं बार चलता है….और नतीजा फिर कितना भयानक निकला। ऐसी पेस्टें आज भी बाज़ार में धड़ल्ले से बिक रही हैं, इसलिए इन से सावधान रहने में ही बचाव है।

सब की बात की –अपनी नानी की नहीं की —मेरी नानी जी को अपने मुंह में नसवार (creamy snuff…. made of tobacco) रखने की आदत थी …वह बताया करती थीं कि बहुत साल पहले जब उन के दांत में दर्द हुआ तो उन्होंने एक बार नसवार लगाई –बस दो चार दिन में लत ऐसी लगी कि अफ़सोस इस आदत ने उन की जान ले ली…. तंबाकू का इस तरह से इस्तेमाल करने वालों में पेशाब की थैली (मूत्राशय, urinary bladder) का कैंसर होने का रिस्क होता है …….मेरी बेचारी नानी के साथ भी यही हुआ…. उन्हें अचानक पेशाब में रक्त आने लगा, डायग्नोज़ हुआ …आप्रेशन हुआ …रेडियोथैरेपी भी हुई —लेकिन जीत कैंसर की ही हुई।

बीमारी किसी को कोई भी किसी भी वक्त हो जाए इस पर किसी बंदे का कंट्रोल पूरा तो नहीं होता लेकिन अगर मक्खी देख कर भी निगली जाए तो फिर उसे आप क्या कहेंगे!!

पोस्ट के अंत में बस इतनी सी नसीहत की घुट्टी कि तंबाकू के सभी रूपों से कोसों दूर रहें……यह जानलेवा है, तंबाकू इस्तेमाल करने वाले को यह कब और कैसे डस लेगा, क्या अंजाम होगा ….यह सब जानते हुए भी अगर मुंह में रखे गुटखे को थूकने की इच्छा न हो तो फिर डाक्टर भी क्या करें?

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एक ईमानदार बीड़ी पीने वाले की आप बीती

आज एक ईमानदारी बीड़ी पीने वाले से मुलाकात हो गई। वह आया तो था मेरे पास एक हिलते हुए दांत के लिए था लेकिन उस के मुंह में झांकने पर यह दिखा कि तंबाकू की वजह से उस के मुंह में गड़बड हो रही है।

गाल के अंदरूनी हिस्से में इरैथ्रोप्लेकिया (मुंह के कैंसर की पूर्व-अवस्था)

यह उस 56 वर्षीय बंदे के गाल के अंदरूनी हिस्से की तस्वीर है और यह जो बदलाव आप उस के मुंह के अंदर देख रहे हैं इसे चिकित्सा भाषा में एरिथ्रोप्लेकिया (erythroplakia) कहते हैं.. यह मुंह के कैंसर की पूर्व-अवस्था है (Oral pre-cancerous condition). क्या यह बदलाव इस बंदे में आगे चलकर कैंसर में तबदील होगा, अगर ऐसा होना है तो यह कितने समय में हो जायेगा –इस का जवाब देना मुश्किल है।

लेकिन एक बात तय है कि अगर यह बंदा बीड़ी मारना छोड़ दे और इस बदले हुये गाल के अंदरूनी हिस्से का उपचार करवा ले तो बचाव ही बचाव है। लेकिन यह क्या यह तो बीड़ी छोड़ने की बात सुनने को तैयार ही नहीं है।

उस ने बताया कि वह स्कूल के दिनों से ही बीड़ी पी रहा है — एक बात ज़रूर है कि उन दिनों में यह काम चुपके चुपके होता था लेकिन बड़े होने पर नौकरी-वोकरी मिलने पर यह काम धड़ल्ले से होने लगा …दो एक बंडल पी जाना तो कोई बात ही नहीं है।

मैं बहुत बार तंबाकू के मुंह के अदंरूनी हिस्सों पर होने वाले प्रभाव के बारे में, तंबाकू की मुंह के कैंसर में भूमिका के बारे में लिखता रहता हूं … कहीं पढ़ने वाले ये तो नहीं समझते कि तंबाकू के दुष्प्रभाव मुंह ही में होते हैं…नहीं नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, वह क्या है कि मेरा काम ही सारा दिन लोगों के मुंह में तांक-झांक करने का है, इसलिए मुंह में होने वाले दुष्प्रभाव तुरंत मेरी नज़र में आ जाते हैं। और कईं बार मरीज़ों की भीड़ के वजह से ऐसे बंदों के दूसरे अंगों के बारे में बात करने का अवसर ही कहां मिलता है।

लेकिन यह बंदा कुछ अलग था. मुझे भी बड़ा अजीब सा लगा कि यह तो सीधा ही कह रहा है कि बीड़ी तो मैं छोड़ ही नहीं सकता। हां, उस ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए आगे कहा कि डाक्टर साहब मेरे दो आप्रेशन हो चुके हैं, हार्ट अटैक भी हो चुका है। उस ने अपने पेट में आप्रेशन के निशान भी तुरंत दिखा दिए।

वह बता रहा था कि पेट के अल्सर के आप्रेशन के लिए वह पीजीआई चंडीगढ़ में तेईस दिन दाखिल भी रहा …. लेटे लेटे कैसे पीता बीड़ी? –इसलिए उसे उन दिनों के दौरान ऐसे लगा जैसे कि अब तो जैसे बीडी की आदत छूट गई …लेकिन नहीं ऐसा कैसे हो पाता, जैसे ही वह अपनी पुरानी दोस्ती की मंडली में वापिस आया तो बस झट से वापिस शुरू हो गया बीड़ी पीने-पिलाने का दौर।

बता रहा था कि पहले तो बच्चे कभी खास मना नहीं करते थे लेकिन जब से हार्ट-अटैक हुआ तब ही से उस के बच्चे जो अब बड़े बडे हो चुके हैं, उस के पीछे पड़े रहते हैं। यह बात बताते हुये वह हंस भी पड़ा कि नौबत यहां तक आ गई कि इसी चक्कर में होने वाली खींचा-तानी के दौरान बनियान पर फट चुकी है—यह पूछना मैंने कतई मुनासिब इसलिए नहीं समझा कि उस की या बेटों की !!

जब मैंने उसे यह ऊपर वाली तस्वीर दिखाई और साथ में यह समझाने की कोशिश की कि यह तो मुंह के अंदर जो तंबाकू ने कहर बरपाया हम ने देख लिया लेकिन शरीर के अंदर क्या क्या प्रभाव हो रहे हैं, वे तो हार्ट अटैक, पेट के अल्सर जैसे रोगों के द्वारा ही पता चलता है ….. मेरे इतना कहने पर उस ने बताया कि उस को पक्षाघात का अटैक (paralysis) भी कुछ महीने पहले हो चुका है, मुहं टेढ़ा हो गया था, शरीर के एक तरफ़ का हिस्सा बिल्कुल चल नहीं रहा था लेकिन फिर जैसे तैसे ठीक हो गया हूं। इस अटैक की वजह से वह कुछ दिन बोल भी नहीं पाया था।

लेकिन फिर भी वह अपनी बीड़ी न छोड़ने वाली बात पर अडिग है …कह रहा था कि मैंने जब भी इसे छोड़ने की कोशिश की है तो मैं पागल जैसा हो जाता हूं …. काम ही नहीं कर पाता हूं …बीड़ी पीते ही चैन की सांस आती है।

मेरे इतना कहने पर कि बीड़ी छुड़वाने के लिए तो एक च्यूंईंग गम (nicotine chewing gum) भी आ गई है …उस ने बताया कि उस ने बीड़ी छुड़वाने के लिये कुछ देसी दवा भी लेनी शुरू कर दी … लेकिन उस दवाई से तो बीड़ी से नफ़रत क्या होनी थी, बल्कि यह लत दौगुनी हो गई। फिर बताने लगा कि उस ने सभी पापड़ बेल कर देख लिये हैं …तलब होने पर सूखा आंवला मुंह में रखने से लेकर, छोटी इलायची, दालचीनी ….सब कुछ अजमा लिया है लेकिन अब उसने जान लिया है कि यह बीड़ी इस जीवन में तो उस का दामन नहीं छोड़ेगी।

पता नहीं जाते जाते उस के मुंह मे यह कैसे निकल गया कि मैं इस आदत से निजात पाना चाहता हूं और कोई ऐसा मिले जो मुझे इस आदत से छुटकारा दिला दे तो मैं उसे एक हज़ार का ईनाम तक देने को तैयार हूं …जब वह यह बात कर रहा था उस समय मेरे अस्पताल का एक अन्य कर्मी अंदर दाखिल हुआ था, मैंने उसे संबोधित करते हुये कहा कि देखो, यह यह चैलेंज है इस बंदे का … इन की बीड़ी छुड़वाओ और एक हज़ार का ईनाम पाओ … और इस का फायदा यह होगा कि तुम्हारी बीड़ी की आदत भी छूट जायेगी। लेकिन उस ने तो यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि मुझे तो कुछ दवाईयां लिख दो, बहुत से मरीज़ उस का इंतजार कर रहे हैं।

यह बंदा यह भी कह गया कि मैंने तो अपने घर वालों को यहां तक कह दिया है कि देखो, मैं बीड़ी तो किसी कीमत पर नहीं छोडूंगा —अगर मुझ पर ज़्यादा दबाव डालोगे तो मैं घरबार सब कुछ छोड़ कर कहीं चला जाऊंगा, फिर मुझे ढूंढते रहना।

अब उस की यह बात सुन कर तो मैं भी चौंक गया … लेकिन एक बात का विचार ज़रूर आया कि एक हज़ार के ईनाम को जो घोषणा उस ने की वह अरबों-खरबों की सेहत की तुलना कितनी कम है!!

आज बीड़ी के बारे में लिखने का ध्यान इसलिए आ गया कि सुबह ही दा हिंदु में एक अच्छी खबर पढ़ने को मिली की अखिलेश यादव ने यू पी में तंबाकू पर नियंत्रण करने के लिये कमर कस ली है … आप भी यह जान कर चौंक जाएंगे कि बंबई के टाटा मैमोरियल अस्पताल में मुंह के कैंसर के जितने रोगी इलाज करवाने आते हैं उन में से हर तीसरा बंदा उत्तर प्रदेश से संबंध रखने वाला होता है। बहुत चिंताजनक बात है … और मैं इस कदम के लिए अखिलेश यादव को बधाई देता हूं…………….जहां भी, जिस भी रूप में इस तंबाकू की ऐसी की तैसी करने की बात होती है तो मैं वाहवाई किये बिना नहीं रह सकता। और जहां तक मुंह के कैंसर की बात है …. ये मरीज़ भी अकसर गंभीर अवस्था में ही टाटा अस्पताल जैसी जगह तक पहुंचते हैं … यह भी एक हारी हुई लड़ाई लड़ने जैसी ही बात होती है …. जब 23-24 साल से युवा इस मुंह के कैंसर का निवाला बनने लगें तो मामला सच में बिल्कुल गड़बड़ है।
Action Plan soon to make UP Tobacco-free

कईं बार सोचता हूं कि इस धूम्रपान को इस तरह के गानों ने भी तो कहीं न कहीं बढ़ावा दिया ही होगा ….

 

भटिंडा से बीकानेर पेसैंजर पुकारी जाती है कैंसर स्पेशल

अगली बार जब आप किसी भी रेहड़ी पर पानी-पूरी खाएं, चने-भटूरे खरीदें, किसी ढाबे में खाना खाएं या किसी रोडसाइड स्टाल पर चाय-भजिया खाएं तो इस बात की तरफ़ ध्यान दीजियेगा कि वहां पर पानी किस बड़े बड़े नीले, हरे प्लास्टिक के कंटेनरों में स्टोर किया जा रहा है। यहां उत्तर भारत में मैं देखता हूं कि लोगों को ऐसे खाली कंटेनर खरीदने का एक क्रेज सा हो गया है। अकसर मीडिया में आता रहता है कि इस तरह के डिब्बों में पानी को स्टोर किया जाना सुरक्षित नहीं है, लेकिन कौन सुनता है!!

आज इस बात का ध्यान ऐसे आ गया कि एक कैंसर विशेषज्ञ ने यह कहा है कि पंजाब के मालवा क्षेत्र में इतने ज़्यादा कैंसर के रोगी होने का एक कारण यह भी है कि किसान कीटनाशकों के खाली डिब्बों (empty pesticide cans) को जल एवं खाने-पीने वाली वस्तुएं को स्टोर करने के लिये करते हैं। लिखते लिखते कईं बातों का ध्यान आ जाता है …शायद आपने भी बहुत बार नोटिस किया होगा कि दूध की डेयरियों में भी जो भी काम- पनीर बनाना, क्रीम निकालना आदि चल रहा होता है वह भी इन्हीं कीटनाशकों के खाली डिब्बों में ही चल रहा होता है। अनुमान लगाया जा सकता है कि स्थिति कितनी भयावह हो चुकी है।

पंजाब के मालवा क्षेत्र की बात तो पीछे ही छूट गई … कल की टाइम्स ऑफ इंडिया में एक बेहद चिंताजनक रिपोर्ट थी कि किस तरह से पंजाब का मालवा क्षेत्र कैंसर की चपेट में है। सतलुज नदी के दक्षिण की तरफ़ पंजाब के मालवा क्षेत्र में 10 ज़िले आते हैं… इन में से भटिंडा, फरीदकोट, मोगा, मुक्तसर, फिरोज़पुर, संगरूर एवं मानसा बुरी तरह से कैंसर की गिरफ्त में है — A Train Ride to Cancer Care.

  खबरें तो हम लोग पिछले लगभग दस साल से ऐसी सुन रहे हैं…..कीटनाशकों एवं खादों (उर्वरकों) के अंधाधुंध इस्तेमाल की वजह से अंडरग्राउंड पानी में भी इन के अंश भारी मात्रा में होने की वजह से कैंसर के रोगियों की संख्या बहुत ज़्यादा हो चुकी है। कीटनाशकों (pesticides) के बारे में कहें तो इस राष्ट्र में एक हैक्टेयर ज़मीन के लिये औसतन 570 ग्राम पैस्टीसाइड इस्तेमाल होते हैं जब कि पंजाब में प्रति एकड़ इस की मात्रा 923 ग्राम है। और जहां तक फर्टीलाइज़र (खाद) की बात है उस के इस्तेमाल के आंकड़े देश के लिये हैं 131 किलो प्रति हैक्टेयर लेकिन पंजाब में इन का इतना अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है कि एक हैक्टेयर में 380 किलोग्राम फर्टीलाइज़र का इस्तेमाल हो रहा है।

एक और भी बात है कि मालवा क्षेत्र कपास के उत्पादन के लिये भी जाना जाता है – Cotton belt of Punjab—और चूंकि कपास में कीड़ा लगने का अंदेशा ज़्यादा रहता है, इसलिये लगभग 15 अलग अलग तरह के कीटनाशक स्प्रे इस फसल पर किये जाते हैं जिन में से सात तो ऐसे हैं जिन्हें अमेरिकी एजेंसियों द्वारा कैंसर का कारण बताया गया है।

रिपोर्ट पढ़ रहा था तो पता चला कि फरीदकोट सरकारी मैडीकल कालेज के कैंसर रोग विशेषज्ञ बता रहे थे कि वे रोज़ाना 30से 35 कैंसर के नये केस देखते हैं।
और कैंसर के रोगी मुफ्त इलाज के लिये और सस्ती दवाईयों के लिये बीकानेर जाकर अपना इलाज करवाते हैं … भटिंडा से कैंसर के रोगी जिस पैसेंजर गाड़ी को लेते हैं बीकानेर जाने के लिये उस में प्रतिदिन लगभग 70 से 100 कैंसर के मरीज़ यात्रा करते हैं…और कुछ लोगों ने तो इसे कैंसर ट्रेन के नाम से संबोधन करना शुरू कर दिया है।

एक बात लगता है रिपोर्ट में छूट गई …. अप्रवासी मजदूर वर्ग…..यह वह वर्ग है जो अपने गांव से पंजाब की हरियाली-खुशहाली की रूख तो कर लेता है, लेकिन मजबूरी कह लें, या अज्ञानता वश कहें, वह वहां पर कीटनाशकों- फर्टीलाइज़रों से जुड़े सब जोखिम भरे काम करता है ….मैंने ट्रेन में आते जाते देखा है वही ये सब स्प्रे कर रहा होता है, और व्यक्तिगत तौर पर भी फिरोज़पुर के गांवों में देखा कि ये मजदूर बिना अपनी सेहत की परवाह किये बिना जोखिम-भरे कामों में लगे रहते हैं …..कोई सामाजित सुरक्षा नहीं, कोई इएसआई कवरेज नहीं…..बस, आठ-दस हज़ार इक्ट्ठा कर के जब अपने गांव का रूख करते हैं तो वह कीटनाशकों वाले खाली कैन भी बहुत बार उन के साथ ही होते हैं ……………..फिर पता नहीं कितने वर्षों तक उन कैनों में पानी स्टोर किये जाने की वजह से उन के कितने परिवार जन तरह तरह की बीमारियों की चपेट में आते होंगे।

रिपोर्ट में बिल्कुल सही लिखा है … Declare Malwa an ecological and environmental health emergency.