गर्भवती महिलाओं के लिए भी डायटिंग करना है सुरक्षित

कल रात जब मैंने बीबीसी की साइट पर इस खबर के हैडिंग को देखा तो मुझे कुछ कुछ अजीब सा लगा कि अब फिगर-कांसियस महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान भी डायटिंग करवाने का यह कौन सा नया पाठ पढ़वाने की तैयारी हो रही है।

मुझे इस खबर का शीर्षक कुछ इसलिए भी अटपटा सा लग रहा था कि हमारे देश में तो महिलाओं के कम खाने या यूं कहूं कि कम खाना मिलने की घोर समस्या है…इसलिए बीबीसी की इस कवरेज का हमारे से तो कोई संबंध है ही नहीं।

शायद ऐसा सोचने का कारण वही था जो अकसर हमें टीवी और प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों में देखने को मिलता है जिस में बताया जाता है कि महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान ज़्यादा खाना लेना चाहिए….जो सुनने में अकसर आता है वह भी यही है कि इस अवस्था के दौरान महिला को दोनों के लिये खाना है … अपने लिए और गर्भ में पल रहे शिशु के लिए —–बात है भी वैसे तो ठीक।

हम वैसे भी तो कितने पूर्वाग्रह पाले रहते हैं …और अकसर ये गलत ही निकलते हैं…. जब मैंने इस खबर को पूरा पढ़ा तो मेरा पूर्वाग्रह भी गलत साबित हुआ।

इस खबर को बहुत सी रिसर्च के बाद प्रकाशित किया गया है और इसमें ब्रिटिश मैडीकल जर्नल द्वारा गहन खोजबीन द्वारा यह कहा गया है कि अगर महिलाएं गर्भावस्था के दौरान डायटिंग करती हैं तो उन के लिये तो यह सुरक्षित है ही , उन के शिशु के लिए भी इस डॉयटिंग की वजह से कोई जोखिम पैदा नहीं होता।

मुझे अकसर एक टीवी का विज्ञापन देख कर यह अचंभा हुआ करता था कि यार, कोई महिला दो बंदों का खाना कैसे खा सकती है, जी मिचलाने से, उल्टी वुल्टी की वजह से वैसे ही उस की हालत कईं महीने तक खराब हुई होती है ऐसे में कैसे वह एक निवाला भी अपनी भूख से ज्यादा ले सकती है …. महिलाओं की छोड़िए, क्या कोई भी भूख से ज़्यादा निरंतर कुछ ले सकता है? …नहीं ना, ठीक है … लंडन की इस टीम ने भी ऐसा ही कहा है कि अगर गर्भवती महिला दो जनों के खाने की बजाए पौष्टिक खाना लेती है तो भी गर्भावस्था के दौरान होने वाले बढ़ने वाले वजन के साथ साथ प्रेगनेंसी की जटिलताओं से बचा जा सकता है।

नेशनल इंस्टीच्यूट फॉर हैल्थ एंड क्लीनिक ऐक्सेलेंस (NICE- National Institute for Health & Clinical Excellence) की एक सलाह जो 2010 में प्रकाशित हुई थी उस में कहा गया था कि गर्भावस्था के दौरान डॉयटिंग नहीं की जा सकती क्योंकि इस से पैदा होने वाले बच्चे पर बुरा असर पड़ सकता है।

लेकिन महिलाओं को गर्भ धारण करने से पहले एक सेहतमंद वजन को हासिल करने की सलाह दी जाती है।

इस में कोई संदेह नहीं कि मोटापा आज जंगल की आग की तरह फैल रहा है …य़ू.के, अमेरिका, यूरोप हो या फिर भारत, मोटापे का प्रकोप हर जगह दिखाई देने लगा है। ज़ाहिर सी बात है अगर मोटापा है तो गर्भावस्था के दौरान प्रि-एक्लैंपसिया, डॉयबीटीज़, उच्च रक्तचाप और समय से पहले ही डिलीवरी होने जैसी समस्याएं भी पैदा होने की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती है।

इस रिव्यू से यह निष्कर्ष निकाला गया है कि अगर महिलाएं गर्भावस्था के दौरान अपने खाने पर ज़्यादा ध्यान देते हुये ज़्यादा कैलोरी वाले खाने की बजाए पौष्टिक खाना खाती हैं (संतुलित आहार) तो पहली बात तो यह कि उन में प्रेगनैंसी से संबंधित जटिलताएं पैदा होने का खतरा बहुत कम हो जायेगा। और तो और पैदा होने वाले बच्चे के वजन पर भी इस का कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

वैसे अभी इस दिशा में और भी रिसर्च होगी लेकिन क्या तब तक गर्भवती महिलाएं अपने खाने-पीने पर ध्यान न दें? …संतुलित आहार के तो फायदे ही फायदे है।

इस खबर को पढ़ने के बाद जो बिंदु रेखांकित किये जाने मुझे ज़रूरी लगते हैं, वे नीचे लिख रहा हूं….

  •   मोटापा  की महामारी से परेशान सारी दुनिया का ध्यान अब गर्भावस्था के दौरान बढ़ने वाले वज़न की और भी गया है। एक बार बढ़ा हुआ वज़न इतनी आसानी से उतरता नहीं है, इसलिए सोच समझ के  पौष्टिक खाना ही इस दौरान खाने से सब ठीक ठाक चलता रहता है। एक की बजाए दो का खाना यह न तो संभव है और न ही ऐसा कुछ करने की सलाह दी जाती है। जितनी भूख है, बस तबीयत से छक लें।
  •   यह जो बात हुई कि गर्भधारण करने से पहले ही महिलाओं अपना हैल्दी वज़न हासिल कर लें …मतलब यह तो है ही कि पहले ही से अपनी ज़्यादा चर्बी को उतार लिया जाए लेकिन इस देश के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए जहां तक बहुत ही महिलाएं कुपोषण एवं खून की अल्पता (malnutrition and anemia) का शिकार हैं, उन का भी वजन एवं उन में खून की कमी को पूरा करने के उपाय भी उन के गर्भधारण करने से पहले किये जाने का पूरा प्रयास होना चाहिए।
  •   यह जो देसी मानसिकता में देसी घी, और देसी घी से तैयार हुये विभिन्न व्यंजनों को गर्भवती महिलाओं को डिलीवरी से पहले और बाद में बहुत ज़्यादा मात्रा में लगभग उन के मुंह में ठूंसे जाने की भ्रांतियां चल रही हैं, उन्हें कब हम लोग उखाड़ पाएंगे, यह हम ने देखना है, बीबीसी विशेषज्ञों ने नहीं।

…..अब लगता है इसे यही बंद करूं ….यह सब कुछ कईं बार केवल पेपर काले करने जैसा लगता है…ज़मीनी हालात बहुत ही ज़्यादा भिन्न हैं, दो बंदों की खुराक लेने की तो बात क्या करें, आप स्वयं सोचिए कि कितनी महिलाएं हैं जिन्हें इस देश में गर्भावस्था के दौरान एक वक्त का खाना भी ढंग से नसीब नहीं होता, और ऊपर से सब की सब चीज़ों में मिलावट —दूध की ही बात करें जिसे हम पौष्टिक लेबल करते हैं पता नहीं वह सिंथेटिक है या कुछ और है….और ऊपर से बेटे ही बेटे पैदा करने का प्रैशर ….अब इस लड़के पैदा करने वाली मशीन समझे जाने वाले पुतला को भी कितने हफ़्तों तक तो यह भी पता नहीं होता कि उस के गर्भ में पल रहे शिशु को बाहर की हवा देखनी नसीब भी होगी कि नहीं….कहीं कन्या होने पर उस का गला गर्भ में ही तो घोंट दिया जायेगा।

जितनी हमारे देश में विषमता है …उतनी ही हमारी समस्याओं की भी विषमता है …. No quick-fix solutions. Only the wearer knows where the shoe pinches. वैज्ञानिकों ने रिसर्च कर ली, बीबीसी ने छाप दी, मैंने कमैंटरी लिख दी लेकिन जूता पहनने वाले को ही पता है कि वह कहां काट रहा है।

बहरहाल, जब मैं दूरदर्शन में दिखाया जाने वाले वह विज्ञापन ढूंढ रहा था तो इस एक अच्छे वीडियो पर नज़र पड़ गई … है तो इंगलिश में …लेकिन इस में महिलाओं से संबंधित एक अच्छी वेबसाईट   www.indianwomenshealth.com  का उल्लेख किया गया है, कभी देखियेगा, हिंदोस्तानी डाक्टरों द्वारा हिंदोस्तानी महिलाओं की सेहत को कवर करती हुई एक वेबसाइट।

 

Further reading – Weight management ‘benefits’ for mother and baby

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मधुमेह की एक दवा को हटाने के लिए चली मुहिम

हम लोगों ने अपने यहां किसी उपभोक्ता संगठन को किसी हानिकारक दवा को बाज़ार से वापिस लेने के लिये कोई अंदोलन होते नहीं देखे …कभी न देखे और न ही किसी मीडिया में इस तरह का मुद्दा उठता ही देखा।
इसलिये दो-तीन दिन पहले मुझे यह खबर देख कर बहुत हैरानगी हुई कि वाशिंगटन में पब्लिक सिटिज़न नामक एक कंज्यूमर ग्रुप ने नोवो नॉरडिक्स की एक इंजैक्शन से दी जाने वाली मधुमेह की दवाई पर रोक लगाने की मांग की है क्योंकि इस से थायरॉय़ ग्रंथि का कैंसर, पैनक्रियाज़ की सूजन एवं गुर्दै के फेल होना (thyroid cancer, pancreatitis, kidney failure) का खतरा बना रहता है। दवाई का नाम है …विक्टोज़ा (Victoza).
इस संस्था ने अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन को लिख भेजा है कि इस दवा से होने वाले नुकसानों का पलड़ा इस से डायबीटीज़ की दवा के तौर पर होने वाले फायदे से कहीं ज़्यादा भारी है। और इस तरह की तो पहले ही से एक दर्जन के लगभग दवाईयां उपलब्ध हैं।
अब यह भी आवाज़ उठ रही है कि फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इस दवा को तीन वैज्ञानिकों के विरोध को नज़रअंदाज़ करते हुए इसे क्लियर कर दिया था।
डायबीटीज़ 2 के लिये नईं नईं दवाईयों का इतना ज़्यादा भी टोटा नहीं है कि इस के लिये गंभीर दुष्परिणामों की आकंशा हमेशा बनी रहे।
नोट करने योग्य बात यह है कि जब चूहों को यह दवा दी गई तो उन में थॉयरायड कैंसर हो गया …और तो और फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन को पिछले 17 महीनों में (जब से यह मार्कीट में आई है) पैनक्रियाटाईटिस अर्थात् पैनक्रिया की सूजन की 200 रिपोर्टें मिली हैं….. उपभोक्ता समूह ने यह भी कहा है कि सारे केस तो एफ डीआई को रिपोर्ट ही नहीं किये जाते …केवल 10प्रतिशत केस ही एफडीआई तक पहुंचते हैं …इसलिये अनुमान है कि 2000 केस इस दुष्परिणाम के हो चुके हैं।
उपभोक्ता संगठन ने तुरंत इस दवा को बाज़ार से हटाने की मांग की है लेकिन एफडीआई को इस तरह के केसों में कोई निर्णय लेने में कईं कईं महीने, यहां तक कि कईं बार वर्षों लग जाते हैं ……. यह बात मुझे कुछ जमी नहीं, वाशिंगटन जैसी जगह ..जहां इस तरह का मुद्दा उठा …….और इस का निर्णय होने में लंबा समय लग जायेगा।
बहरहाल, वाशिंगटन वाले अपनी जानें, अब जब जनता ने आवाज़ उठाई है तो इस का समाधान हो जायेगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि वहां से धिक्कारे जाने के बाद बाहर की कंपनीयां  अपना डेरा यहां भारत में जमा लें….. अकसर सुनते रहते हैं पहले भी कईं दवाईयों के साथ ऐसा हो चुका है, वहां नहीं चलीं, या नहीं चलने दी गईं तो फिर हमारी मार्कीट तो है ही , आप का इस के बारे में क्या ख्याल है?

Source: Public Citizen wants withdrawal of diabetes drug

सच में सब गोलमाल ही है …..

Public Citizen wants withdrawal of diabetes drug

मधुमेह (डायबीटीज़) छीन सकती है आंखों की रोशनी

कुछ दिन पहले जब मैं उसे अस्पताल के कारीडोर में मिला तो मुझे लगा कि उस की वह गर्मजोशी क्यों गायब है। पहले तो वह दूर से ही देखते ही हाथ हिला कर इशारा किया करता है और फिर बड़ी गर्मजोशी से हम लोग मिल कर एक-दो मिनट अकसर गुफ्तगू किया करते थे।
उस दिन भी मैंने उस बंदे को दूर से देख लिया था, उस की उम्र साठ साल के करीब है, उस के बेटे ने उस का हाथ पकड़ रखा था, मुझे दूर से लगा कि शायद तबीयत ठीक नहीं होगी, लेकिन जैसे ही मैं उस के पास पहुंचा और मेरे आवाज़ लगाने पर भी जब वह मेरे बिल्कुल पास पहुंच गया और उसे मेरे करीब आने पर भी मेरी द्वारा कही गई सतश्रीअकाल का जवाब देने में 10-15 सैकेंड का समय लग गया तो मुझे यही अंदेशा खटकने लगा कि इस बंदे के मस्तिष्क में कहीं कोई कमज़ोरी न आ गई हो।
बहरहाल, मेरे पूछने पर कि तबीयत तो ठीक है ना सरदार जी, तो पता चला कि वह तो एक महीने से ठीक नहीं है। उस ने बताया कि उसे मधुमेह (डायबीटीज़) तो थी लेकिन अचानक ही शूगर की मार आंखों पर हो गई और उसे दिखना बहुत ही कम हो गया है, इसलिये उस के बेटे ने उस का हाथ थामा हुआ है। बता रहा था कि उसे इतना कम दिखता है कि बस यही पता चलता है कि उस के अंधेरा है या उजाला (रोशनी)…..।
उस के साथ आगे बात करते हुये पता चला कि एक बहुत अच्छे सरकारी संस्थान से उस का इलाज चल रहा है – लेकिन उन्होंने भी एक तरह से जवाब ही दे दिया है कि जो क्षति हो चुकी है उस की भरपाई नहीं हो सकती, बस, किसी तरह से इलाज के द्वारा उस क्षति को जस-का-तस रोका जा सकता है। यह सब सुन कर मुझे बहुत बुरा महसूस हुआ।
उसे मिलने के बाद मुझे ध्यान आ रहा था कि जब यह बंदा मेरे पास अपने दांतों के इलाज के लिये आया करता था तो एक दो बार बात चली थी कि उसे डायबीटीज़ है लेकिन वह इस के लिये कोई दवाई नहीं लेता, बस जामुन की गुठलियों का पावडर लेता है……. लेकिन मेरी उसे बार बार यही कहना होता था कि कुछ भी करो, किसी भी चिकित्सा पद्धति के अनुसार अपनी शूगर को कंट्रोल करो लेकिन यह ज़रूर देखो कि क्वालीफाईड डाक्टर से नियमित मिल कर अपनी जांच करवाते रहो ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सब कुछ ठीक ठाक है। और ब्लड-शूगर आदि की भी नियमित जांच होनी चाहिए।
मेरे यह कहना …. शूगर के लिये कुछ भी करो लेकिन अपनी जांच नियमित करवाते रहो —इस का यह मतलब नहीं कि शूगर के रोगी किसी भी ऐसे ऐरे-गैरे से पुड़िया लेनी शुरू कर दें कि कुछ दिन के इस्तेमाल से शूगर रोग गायब हो जायेगा, ऐसा कभी नहीं होता, इस से रोग को बढ़ावा मिलता है। और रोगी अपने आप में सोचने लगता है कि सब कुछ ठीक ठाक है।
अपने नियमित इलाज के साथ साथ परहेज़ और विभिन्न तरह की नियमित जांच के साथ आंखों का भी नियमित परीक्षण नेत्र-रोग विशेषज्ञ द्वारा करवाया जाना ज़रूरी है…..पहले तो ऐसे कहा जाता था कि वर्ष में एक बार शूगर के मरीज़ अपनी आंखों की जांच करवा लिया करें लेकिन कुछ महीने पहले में नेट पर एक विश्वसनीय अमेरिकी साइट देख रहा था कि यह जांच हरेक छः महीने में होनी चाहिए।
फिर भी हम लोग नियमित जांच के प्रति इतने उदासीन से, इतने लापरवाह क्यों हैं, समझ नहीं आता….इस हट्टे-कट्टे सरदार जी को आंखों की कमज़ोरी से परेशान देख कर मन इतना दुःखी हुआ कि यह पोस्ट लिखने लग गया।