तंबाकू चबाने वाले गले की सूजन को न करें नज़रअंदाज़

25 वर्ष से तंबाकू चबाने वाली महिला के मुंह की तस्वीर

यह जो मुंह के अंदर की तस्वीर आप देख रहे हैं यह लगभग 35वर्ष की महिला की है। उसे दांतों में कोई विशेष तकलीफ़ तो नहीं थी, बस वही थोड़ा बहुत थंडा-गर्म कभी कभी लगता है जो सारे हिंदोस्तान को लगता है…लेकिन उस का मेरे पास आने का कारण था उस का पति।

वह बता रही थी कि जब उस का पति मेरे पास आया था तो मैं किसी तंबाकू गुटखा चबाने वाले से बात कर रहा था, इसलिए उस के पति ने उसे कहा कि जाओ तुम भी अपना मुंह दिखा कर तो आओ।

हां, तो महिला ने बताया कि वह शादी से पहले ही जब वह 10-12 वर्ष की थी तब ही से वह तंबाकू-चूना चबा कर खा रही है, लगभग पिछले 25 वर्ष से यह सिलसिला चल रहा है। वह बता रही थीं कि वह दिन में तीन-चार बार ही तंबाकू-चूने का मिश्रण चबाती है। उस ने चुनौतिया भी साथ रखी हुई थी –एक स्टील की डिब्बी जिस के एक तरफ़ तंबाकू और दूसरी तरफ़ चूना भरा रहता है।

उस का मुंह चैक करने पर पाया गया कि उस के मुंह में तंबाकू-जनित घाव हैं … और इस तस्वीर में आप देख रहे हैं कि मसूड़ों में सूजन तो है, लेकिन बड़ी अलग किस्म की सूजन लग रही है। जो भी हो, इस महिला के गाल के अंदर या मसूड़ों में कैंसर के कोई लक्षण नहीं दिख रहे — लेकिन विडंबना यही है कि क्या तंबाकू को लात मारने के लिए कैंसर के प्रकट होने का इंतज़ार किया जा रहा है?

मुझे याद आ रहा था …20-21 वर्ष पहले जब मैंने रेलवे सर्विस ज्वाइन की तो एक मसूड़ों की सूजन का मरीज आया …देखने में ही गड़बड़ सी लग रही थी …शायद फरवरी 1992 की बात है, वह आया तो था मेरे पास दांत के दर्द के लिए। उन दिनों मैं बंबई के एक अस्पताल में काम कर रहा था, हम ने उसे तुरंत टाटा अस्पताल रेफ़र किया। वहां उस का डायग्नोज़ ओरल कैंसर का हुआ —उन्होंने तुरंत आप्रेशन कर दिया और वह मुझे कईं वर्षों तक आकर मिलता रहा …फिर दस वर्ष बाद मैं वहां से आ गया और मुझे उस के बारे में आगे पता नहीं।

अच्छा तो मैं बात तो इस 35 वर्षीय महिला की कर रहा था … बता रही थीं कि यह लत ऐसी है कि छूटती नहीं है। इस केस में पहली बार एक अजीब सी बात दिखी की उस का पति ऐसी किसी चीज़ का सेवन नहीं करता….बच्चे भी इन सब चीज़ों से दूर हैं। उस ने बताया कि बच्चों को तो इस तंबाकू से इतनी घिन्न आती है कि कईं बार जब मैं उन्हें तंबाकू बनाने को (तंबाकू-चूने को हाथ में मसलने की प्रकिया) कहती हूं तो साफ़ मना कर देते हैं।

महिला के चेहरे की दाईं तरफ़ वाली सूजन

अभी मैं उस का मुंह देख ही रहा था कि मुझे उस के चेहरे के दाईं तरफ़ सूजन दिखी — बता रही थी कि कुछ महीनों से है … देख कर चिंता ही हुई …बताने लगी कि दवाई खाती हूं दब जाती है फिर दोबारा हो जाती है… सूजन अजीब सी थी –ऐसी सूजन दांत एवं मुंह की इंफैक्शन के लिये तो कम ही दिखी थी, उसे मैंने विशेषज्ञ के पास भेजा है…..वह उसे चार पांच दिन के लिए एंटीबॉयोटिक दवाईयां देगा और वापिस बुला कर फिर से देखेगा। इस महिला को मेरी शुभकामनाएं.

इस तरह की सूजन के संबंध में मैंने एक पोस्ट कुछ दिन ही पहले लिखी थी …..वह बंदा भी मेरे पास दो-तीन वर्ष पहले  कुछ इसी तरह की सूजन केसाथ ही आया था…जब दवाईयों से नहीं गई, दांतों में कुछ लफड़ा था नहीं ….ई.एन.टी विशेषज्ञ के पास भेजा गया… और उस का डायग्नोज़ यह हुआ कि उसे दाईं तरफ़ के टांसिल का कैंसर है…उस का समुचित इलाज हो गया ….आजकल वह ठीक चल रहा है, उस को भी मेरी शुभकामनाएं कि उस में उस बीमारी की पुनरावृत्ति न हो।

यह पोस्ट लिखते मैं सोच रहा हूं कि महिलाएं भी अपने देश के बहुत से हिस्सों में बीड़ी पीती हैं, तंबाकू, खैनी चबाती हैं, अपने मसूडों पर मेशरी (तंबाकू का पावडर) घिसने का चलन महाराष्ट्र में विशेष कर बंबई में काफ़ी देखा है — महिलाओं का इस तरह के व्यसन में लिप्त होना बहुत गंभीर मुद्दा है क्योंकि अकसर मां अपने बच्चों के लिये एक रोल-माडल होती है …अगर वह स्वयं ही इन चक्करों में पड़ी है तो बच्चों को कैसे रोकेगी?

और तो और अगर महिलाएं धूम्रपान करती हैं तो भी सैकेंड हैंड धुआं (Passive smoking) तो घर के बाकी सभी सदस्यों आदि के लिये नुकसानदायक तो है ही।

यह पोस्ट केवल इस बात को रेखांकित करने के लिए कि तंबाकू, गुटखा, सुपारी से संबंधित किसी भी शौक को पालना किसी के भी हित में नहीं है। कुछ वर्ष पहले की बात है गुजरात में बहुत ही महिलाएं जब मुंह के कैंसर का शिकार होने लगीं तो पता चला कि वह दांतों की सफ़ाई के लिए तंबाकू वाली पेस्ट दांतों एवं मसूड़ों पर घिसती हैं और ये काम उन का दिन में कईं बार चलता है….और नतीजा फिर कितना भयानक निकला। ऐसी पेस्टें आज भी बाज़ार में धड़ल्ले से बिक रही हैं, इसलिए इन से सावधान रहने में ही बचाव है।

सब की बात की –अपनी नानी की नहीं की —मेरी नानी जी को अपने मुंह में नसवार (creamy snuff…. made of tobacco) रखने की आदत थी …वह बताया करती थीं कि बहुत साल पहले जब उन के दांत में दर्द हुआ तो उन्होंने एक बार नसवार लगाई –बस दो चार दिन में लत ऐसी लगी कि अफ़सोस इस आदत ने उन की जान ले ली…. तंबाकू का इस तरह से इस्तेमाल करने वालों में पेशाब की थैली (मूत्राशय, urinary bladder) का कैंसर होने का रिस्क होता है …….मेरी बेचारी नानी के साथ भी यही हुआ…. उन्हें अचानक पेशाब में रक्त आने लगा, डायग्नोज़ हुआ …आप्रेशन हुआ …रेडियोथैरेपी भी हुई —लेकिन जीत कैंसर की ही हुई।

बीमारी किसी को कोई भी किसी भी वक्त हो जाए इस पर किसी बंदे का कंट्रोल पूरा तो नहीं होता लेकिन अगर मक्खी देख कर भी निगली जाए तो फिर उसे आप क्या कहेंगे!!

पोस्ट के अंत में बस इतनी सी नसीहत की घुट्टी कि तंबाकू के सभी रूपों से कोसों दूर रहें……यह जानलेवा है, तंबाकू इस्तेमाल करने वाले को यह कब और कैसे डस लेगा, क्या अंजाम होगा ….यह सब जानते हुए भी अगर मुंह में रखे गुटखे को थूकने की इच्छा न हो तो फिर डाक्टर भी क्या करें?

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एक ईमानदार बीड़ी पीने वाले की आप बीती

आज एक ईमानदारी बीड़ी पीने वाले से मुलाकात हो गई। वह आया तो था मेरे पास एक हिलते हुए दांत के लिए था लेकिन उस के मुंह में झांकने पर यह दिखा कि तंबाकू की वजह से उस के मुंह में गड़बड हो रही है।

गाल के अंदरूनी हिस्से में इरैथ्रोप्लेकिया (मुंह के कैंसर की पूर्व-अवस्था)

यह उस 56 वर्षीय बंदे के गाल के अंदरूनी हिस्से की तस्वीर है और यह जो बदलाव आप उस के मुंह के अंदर देख रहे हैं इसे चिकित्सा भाषा में एरिथ्रोप्लेकिया (erythroplakia) कहते हैं.. यह मुंह के कैंसर की पूर्व-अवस्था है (Oral pre-cancerous condition). क्या यह बदलाव इस बंदे में आगे चलकर कैंसर में तबदील होगा, अगर ऐसा होना है तो यह कितने समय में हो जायेगा –इस का जवाब देना मुश्किल है।

लेकिन एक बात तय है कि अगर यह बंदा बीड़ी मारना छोड़ दे और इस बदले हुये गाल के अंदरूनी हिस्से का उपचार करवा ले तो बचाव ही बचाव है। लेकिन यह क्या यह तो बीड़ी छोड़ने की बात सुनने को तैयार ही नहीं है।

उस ने बताया कि वह स्कूल के दिनों से ही बीड़ी पी रहा है — एक बात ज़रूर है कि उन दिनों में यह काम चुपके चुपके होता था लेकिन बड़े होने पर नौकरी-वोकरी मिलने पर यह काम धड़ल्ले से होने लगा …दो एक बंडल पी जाना तो कोई बात ही नहीं है।

मैं बहुत बार तंबाकू के मुंह के अदंरूनी हिस्सों पर होने वाले प्रभाव के बारे में, तंबाकू की मुंह के कैंसर में भूमिका के बारे में लिखता रहता हूं … कहीं पढ़ने वाले ये तो नहीं समझते कि तंबाकू के दुष्प्रभाव मुंह ही में होते हैं…नहीं नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, वह क्या है कि मेरा काम ही सारा दिन लोगों के मुंह में तांक-झांक करने का है, इसलिए मुंह में होने वाले दुष्प्रभाव तुरंत मेरी नज़र में आ जाते हैं। और कईं बार मरीज़ों की भीड़ के वजह से ऐसे बंदों के दूसरे अंगों के बारे में बात करने का अवसर ही कहां मिलता है।

लेकिन यह बंदा कुछ अलग था. मुझे भी बड़ा अजीब सा लगा कि यह तो सीधा ही कह रहा है कि बीड़ी तो मैं छोड़ ही नहीं सकता। हां, उस ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए आगे कहा कि डाक्टर साहब मेरे दो आप्रेशन हो चुके हैं, हार्ट अटैक भी हो चुका है। उस ने अपने पेट में आप्रेशन के निशान भी तुरंत दिखा दिए।

वह बता रहा था कि पेट के अल्सर के आप्रेशन के लिए वह पीजीआई चंडीगढ़ में तेईस दिन दाखिल भी रहा …. लेटे लेटे कैसे पीता बीड़ी? –इसलिए उसे उन दिनों के दौरान ऐसे लगा जैसे कि अब तो जैसे बीडी की आदत छूट गई …लेकिन नहीं ऐसा कैसे हो पाता, जैसे ही वह अपनी पुरानी दोस्ती की मंडली में वापिस आया तो बस झट से वापिस शुरू हो गया बीड़ी पीने-पिलाने का दौर।

बता रहा था कि पहले तो बच्चे कभी खास मना नहीं करते थे लेकिन जब से हार्ट-अटैक हुआ तब ही से उस के बच्चे जो अब बड़े बडे हो चुके हैं, उस के पीछे पड़े रहते हैं। यह बात बताते हुये वह हंस भी पड़ा कि नौबत यहां तक आ गई कि इसी चक्कर में होने वाली खींचा-तानी के दौरान बनियान पर फट चुकी है—यह पूछना मैंने कतई मुनासिब इसलिए नहीं समझा कि उस की या बेटों की !!

जब मैंने उसे यह ऊपर वाली तस्वीर दिखाई और साथ में यह समझाने की कोशिश की कि यह तो मुंह के अंदर जो तंबाकू ने कहर बरपाया हम ने देख लिया लेकिन शरीर के अंदर क्या क्या प्रभाव हो रहे हैं, वे तो हार्ट अटैक, पेट के अल्सर जैसे रोगों के द्वारा ही पता चलता है ….. मेरे इतना कहने पर उस ने बताया कि उस को पक्षाघात का अटैक (paralysis) भी कुछ महीने पहले हो चुका है, मुहं टेढ़ा हो गया था, शरीर के एक तरफ़ का हिस्सा बिल्कुल चल नहीं रहा था लेकिन फिर जैसे तैसे ठीक हो गया हूं। इस अटैक की वजह से वह कुछ दिन बोल भी नहीं पाया था।

लेकिन फिर भी वह अपनी बीड़ी न छोड़ने वाली बात पर अडिग है …कह रहा था कि मैंने जब भी इसे छोड़ने की कोशिश की है तो मैं पागल जैसा हो जाता हूं …. काम ही नहीं कर पाता हूं …बीड़ी पीते ही चैन की सांस आती है।

मेरे इतना कहने पर कि बीड़ी छुड़वाने के लिए तो एक च्यूंईंग गम (nicotine chewing gum) भी आ गई है …उस ने बताया कि उस ने बीड़ी छुड़वाने के लिये कुछ देसी दवा भी लेनी शुरू कर दी … लेकिन उस दवाई से तो बीड़ी से नफ़रत क्या होनी थी, बल्कि यह लत दौगुनी हो गई। फिर बताने लगा कि उस ने सभी पापड़ बेल कर देख लिये हैं …तलब होने पर सूखा आंवला मुंह में रखने से लेकर, छोटी इलायची, दालचीनी ….सब कुछ अजमा लिया है लेकिन अब उसने जान लिया है कि यह बीड़ी इस जीवन में तो उस का दामन नहीं छोड़ेगी।

पता नहीं जाते जाते उस के मुंह मे यह कैसे निकल गया कि मैं इस आदत से निजात पाना चाहता हूं और कोई ऐसा मिले जो मुझे इस आदत से छुटकारा दिला दे तो मैं उसे एक हज़ार का ईनाम तक देने को तैयार हूं …जब वह यह बात कर रहा था उस समय मेरे अस्पताल का एक अन्य कर्मी अंदर दाखिल हुआ था, मैंने उसे संबोधित करते हुये कहा कि देखो, यह यह चैलेंज है इस बंदे का … इन की बीड़ी छुड़वाओ और एक हज़ार का ईनाम पाओ … और इस का फायदा यह होगा कि तुम्हारी बीड़ी की आदत भी छूट जायेगी। लेकिन उस ने तो यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि मुझे तो कुछ दवाईयां लिख दो, बहुत से मरीज़ उस का इंतजार कर रहे हैं।

यह बंदा यह भी कह गया कि मैंने तो अपने घर वालों को यहां तक कह दिया है कि देखो, मैं बीड़ी तो किसी कीमत पर नहीं छोडूंगा —अगर मुझ पर ज़्यादा दबाव डालोगे तो मैं घरबार सब कुछ छोड़ कर कहीं चला जाऊंगा, फिर मुझे ढूंढते रहना।

अब उस की यह बात सुन कर तो मैं भी चौंक गया … लेकिन एक बात का विचार ज़रूर आया कि एक हज़ार के ईनाम को जो घोषणा उस ने की वह अरबों-खरबों की सेहत की तुलना कितनी कम है!!

आज बीड़ी के बारे में लिखने का ध्यान इसलिए आ गया कि सुबह ही दा हिंदु में एक अच्छी खबर पढ़ने को मिली की अखिलेश यादव ने यू पी में तंबाकू पर नियंत्रण करने के लिये कमर कस ली है … आप भी यह जान कर चौंक जाएंगे कि बंबई के टाटा मैमोरियल अस्पताल में मुंह के कैंसर के जितने रोगी इलाज करवाने आते हैं उन में से हर तीसरा बंदा उत्तर प्रदेश से संबंध रखने वाला होता है। बहुत चिंताजनक बात है … और मैं इस कदम के लिए अखिलेश यादव को बधाई देता हूं…………….जहां भी, जिस भी रूप में इस तंबाकू की ऐसी की तैसी करने की बात होती है तो मैं वाहवाई किये बिना नहीं रह सकता। और जहां तक मुंह के कैंसर की बात है …. ये मरीज़ भी अकसर गंभीर अवस्था में ही टाटा अस्पताल जैसी जगह तक पहुंचते हैं … यह भी एक हारी हुई लड़ाई लड़ने जैसी ही बात होती है …. जब 23-24 साल से युवा इस मुंह के कैंसर का निवाला बनने लगें तो मामला सच में बिल्कुल गड़बड़ है।
Action Plan soon to make UP Tobacco-free

कईं बार सोचता हूं कि इस धूम्रपान को इस तरह के गानों ने भी तो कहीं न कहीं बढ़ावा दिया ही होगा ….

 

भांग पीने से होता है कहीं ज़्यादा नुकसान

भांग के बारे में मेरा ज्ञान बहुत सीमित है —बस, भांग का नाम आते ही मुझे याद आ जाता है वह सुपर-डुपर गीत—जय जय शिव शंकर…कांटा लगे न कंकर और दम मारो दम…मिट जाये गम। इस के साथ ही ध्यान में आ जाता है भारत का एक धार्मिक त्योहार जिस में भांग को घोट कर पीने की एक परंपरा सी बना रखी है… कुछ लोग होली के दिन भांग के पकौड़े भी खाते-खिलाते हैं —ऐसे ही एक बार किसी ने हमारे होस्टल में भी शरारत की थी – और बहुत से छात्रों की हालत इतनी खराब हो गई थी कि उन्हें अस्पताल में दाखिल करना पड़ा था।

और एक ध्यान और भी आता है भांग का नाम लेने से —कुछ नशा करने वाले लोग कुछ सुनसान जगहों पर अपने आप उग आए भांग के पौधों से पत्ते उतार के उन्हें हाथों से मसल मसल कर फिर उन्हें कागज में लपेट कर एक सिगरेट-नुमा डंडी सी तैयार कर उसे पीते हैं। और तो और धार्मिक स्थानों पर कुछ तथाकथित साधू का वेश धारण किये हुये लोग भी भांग का खूब प्रयोग करते हैं।

हम तो हैं हिंदोस्तानी –हमारी बात कुछ और है …और अमीर देशों में रहने वाले गोरे लोगों की बात कुछ और ..वे साधन-सम्पन्न लोग हैं, कोई भी शौक पाल सकते हैं। लेकिन मुझे कल ही पता चला कि वहां पर भी भांग के सिगरेट पीने का जबरदस्त क्रेज़ है…. बहुत ही ज्यादा हैरानगी हुई यह जान कऱ।

ब्रिटेन के चिकित्सा वैज्ञानिकों ने यह रिसर्च की है कि यू के में भांग पीने वाले यही समझते हैं कि यह सिगरेट के मुकाबले में बिलकुल भी नुकसान दायक नहीं है।

लेकिन सच यह है कि भांग पीना भी सिगरेट पीने की तरह बहुत ही ज्यादा नुकसान दायक है। यह इसलिये है कि इसे पीने वाले इस का कश बहुत गहरा खींचते हैं जिस की वजह से सिगरेट के मुकाबले में कहीं ज्यादा टॉर और कार्बनमोनोआक्साईड गैस वे फेफड़े के अंदर खींच लेते हैं। इसलिये फेफड़े का कैंसर, ब्रोंकाइटिस और टी बी जैसे रोग पैदा होने का डर तो बना ही रहता है।

भांग का पौधा

रिसर्च से यह भी पता चला है कि एक वर्ष तक रोज़ाना भांग का एक सिगरेट पीने से फेफड़े का कैंसर होने का जो रिस्क होता है वह उतना ही है जितना एक वर्ष तक रोज़ाना बीस सिगरेट पीने से होता है।

आज जब मैं बी बी सी न्यूज़ पर यह खबर पढ़ रहा था तो यही सोच रहा था कि आखिर क्यों लोग विदेशों में जाकर पढ़ाई करने के लिये आतुर होते हैं….. ठीक है वहां कुछ आधुनिक ज्ञान सीख लेते होंगे, लेकिन बहुत ही और चीज़ें भी तो सीख ही लेते होंगे ….अब यह भांग पीने की ही बात देखिये, मैं रिपोर्ट में यह पढ़ कर दंग रह गया कि वहां पर लगभग 40 प्रतिशत लोग इस का इस्तेमाल अपने जीवनकाल के दौरान कर चुके हैं।

अगर पर इस प्रामाणिक शोध के बारे में विस्तार से पढ़ना चाहें तो इस लिंक पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं….Health Risks of Cannabis ‘underestimated’ , experts warn.. जो भी हो, मेरे लिये तो यह एक बहुत बड़ी खबर थी। मुझे लगता था कि यह केवल हिंदोस्तान की ही समस्या है …. लेकिन यहां तो हमाम में सारे …..!!

 

बस हुक्का पार्लरों के खुलने की ही कसर थी

आज अचानक मुझे चार महीने पहले लिखे एक लेख का ध्यान आ गया … दम मारो दम (लिंक पर क्लिक करिए)  ….इस में आज कल हमारे देश में छोटे बड़े शहरों में हुक्का पार्लरों की खबरों का खुलासा किया गया था।

विदेशों में तो ये पहले से हैं ही …. लेकिन आज एक बार फिर उस खबर पर ध्यान अटक गया जिसमें लिखा था कि कैलिफोर्निया जैसी जगह में भी युवाओं को भी इस हुक्का का इतना चस्का लग चुका है कि लगभग 25 प्रतिशत युवक इस नशे की गिरफ्त में हैं…………..इस खबर का लिंक यह रहा…Hookah use up among Calif. Young adults.

कैलिफोर्निया में समस्या यह है कि वहां पर इंडोर(बंद) पब्लिक जगहों पर धूम्रपान की मनाही है ….और वहां मनाही किस तरह की होती है, कोई कंशैशन नहीं ……….यह नहीं कि यहां कि तरह धूम्रपान निषेध की तख्ती के नीचे बैठ कर बिलकुल देवानंद के स्टाइल में धुएं के छ्ल्ले आप की तरफ़ फैंकता चला जाता है …………(हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया)। और फिर कैलीफोर्निया में कुछ हुक्का पार्लरों के खुलने से लोगों में कहीं न कहीं यह भ्रांति (2008 में प्रकाशित मेरा एक लेख, क्लिक करें)  तो है कि शायद तंबाकू का यह रूप नुकसान न करता होगा।

लेकिन ज़हर तो ज़हर है ही ….किसी भी रूप में इस्तेमाल किया जाए ….यह तो आग का खेल ही है। कईं बार सोचता हूं कि यह बड़ी बड़ी तंबाकू कंपनियों की कोई साज़िश ही होगी कि एक सुनियोजित ढंग से युवा वर्ग को इस तंबाकू रूपी इस गहरी खाई में धकेला जाए। एक बार इस हुक्के-वुक्के का आदि हो जाने पर फिर इस से अगली अवस्था यह गीत ब्यां कर रहा है …………..आप का क्या ख्याल है?

महिलाओं के ब्लैडर कैंसर में तंबाकू विलेन

अभी मैं यह समाचार पढ़ रहा था कि महिलायों में जो ब्लैडर(पेशाब की थैली) के कैंसर के केस होते हैं उन में से पचास प्रतिशत केसों में धूम्रपान की भूमिका रहती है– Cigarette smoking implicated in half of bladder cancers in women.  इसे पढ़ते पढ़ते मेरा ध्यान अपनी नानी की तरफ़ चला गया ….एकदम सेहतमंद, हिम्मती, परिश्रमी, हर हालत में खुश रहने वाली…..अब नानी थी तो उस की कितनी तारीफ़ करूं…. शायद उस जैसी महान् महिला कभी कोई और नहीं दिखी …. विपरित परिस्थितियों से किस तरह से जूझना है…. कभी दिमाग भारी होता है तो उन का ध्यान आ जाता है।

हां, तो बात ऐसी हुई कि 20 वर्ष पहले उन्हें अचानक पेशाब में रक्त आना शुरू हो गया…..सारा चैकअप हुआ ..वही हुआ जिस का डर था …उन्हें ब्लैडर कैंसर डॉयग्नोज़ हुआ। आप्रेशन भी हुआ, रेडियोथेरेपी भी हुई ..लेकिन लगभग एक वर्ष से ज़्यादा वह काट न पाई।

इतनी बढ़िया सेहत, इतना परिश्रम करने वालीं, हर हाल में खुश रहने वाली, सामाजिक तौर पर अति सक्रिय…धार्मिक स्वभाव वाली ……अब क्या क्या बताएं अपनी नानी के बारे में……..लेकिन एक बात तो बतानी ज़रूरी है ही…अगर किसी ने इस से सीख ले ली तो मेरी नानी मुझे उस का राज़ खोलने के लिये माफ़ कर देगी।

  मेरी नानी को नसवार का इस्तेमाल करने की आदत थी … नसवार – snuff—अर्थात् स्मोकलैस तंबाकू का एक रूप। वह दिन में कईं बार चुटकी भर के गालों के अंदर दबा लिया करती थीं। उन्हें भी इस आदत से बड़ी झुंझलाहट सी हुआ करती थी।

हम छोटे छोटे थे—उस के साथ लेटे लेटे मस्ती करते हुये कईं बार पूछा करते थे कि नानी, यह क्यों इस्तेमाल करती हो, वह हमें सारी बात बताया करतीं कि पाकिस्तान में अपने प्रवास के दौरान उन्हें दांतों में दर्द होना शुरू हुआ…. डाक्टर वाक्टर इतने होते नहीं थे, किसी ने सलाह दी कि मसूड़ों पर नसवार मल ले…..बस लगाते ही आराम क्या आया कि कुछ ही दिनों में उस की लत छूट न पाई।

जब भी हम उस से मिलने जाते वह हमें चुपके से कह देती कि बाज़ार से एक डिब्बी लेकर आओ…. और वह उस नसवार की डिब्बी को कहीं किसी फोटो-फ्रेम के पीछे छुपा कर रखा करतीं और परदे में ही इसे लगातीं …… लेकिन हम से कैसे परदा!! और हमारा अनाड़ीपन देखिये कि हमें बहुत वर्षों तक पता ही न था कि तंबाकू का यह रूप भी नुकसान ही करता था। हमें तो बस यही अच्छा लगता था कि नानी के मुंह से अच्छी सी महक आया करती थी।

नानी की बातें क्यों आप के सामने रखीं….क्योंकि अभी भी देश में यह नसवार – snuff – का चलन बहुत ज़्यादा है। और बहुत बार मेरी नानी की तरह दांतों के दर्द के इलाज के लिये ही इसे पहली बार उपयोग किया जाता है और देखते ही देखते लत पड़ जाती है। देश के कुछ क्षेत्रों में तो लोग इस नसवार को दांतों पर घिस कर दांत साफ़ करने की भूल भी करते हैं …. मुंह के कैंसर को खुला निमंत्रण…इस तरह के मंजन बनाने वाली कंपनियों पर बहुत से केस भी हुए…..लेकिन रिजल्ट क्या निकलता है आप सब जानते ही हैं!!

और तो और नसवार के अलावा देश में महिलाओं द्वारा धूम्रपान की आदत —बीड़ीयां, हुक्का, तंबाकू-चूना भी इस तरह की तबाही मचाने में किसी से कम नही है।

क्या आप यह सब पढ़ कर अपने आसपास किसी एक महिला को इन बातों के बारे में जागरूक करेंगे?…..वह भी किसी की नानी तो होगी ..नहीं होगी तो भी कल तो बनेगी !!

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Screening for bladder cancer

तंबाकू की नई चित्रमय चेतावनियां

आज  सुबह पंजाब केसरी अखबार में यह सार्वजनिक सूचना देख कर अच्छा लगा कि चलो, अब चार महीनों बाद कम से कम इन तस्वीरों को देख कर लोगों में तंबाकू से कुछ डर तो पैदा होगा….

ये चेतावनियां 01दिसंबर 2011 से सभी तम्बाकू उत्पाद पैकेजिज पर प्रदर्शित की जाएंगी…..जैसा कि आप इस इमेज में देख सकते हैं ये चेतावनियां तंबाकू के धूम्रपान रूपों (धूम्रपान प्राण घातक है) और धूम्र रहित रूपों (तम्बाकू प्राण घातक है) के लिए अलग होंगी।

अधिनियम के अधीन तम्बाकू उत्पादों में शामिल हैं सिगरेट्स, सिगार्स, चुरूटस, बीड़ीयां, सिगरेट तम्बाकू, पाइप तम्बाकू, हुक्का तम्बाकू, च्यूईंग तम्बाकू, स्नफ, गुटका, पान मसाला अथवा चबाने वाली कोई भी सामग्री जिसके घटकों में तम्बाकू एक घटक हो (चाहे किसी नाम से पुकारा जाए)

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय एवं राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम द्वारा जनहित में जारी एक सार्वजनिक सूचना जिसे आज 11 अगस्त 2011 की अखबारों में छपा देखा गया..

कहर बरपा रहे हैं तंबाकू के रैडीमेड पाउच

10-12 वर्ष पहले की बात है कि मैं बंबई के टाटा मैमोरियल हास्पीटल के डायरैक्टर डा आर एस राव को सुन रहा था…उन्होंने अपने लैक्चर को वाईंड-अप करते समय यह कहा कि अगर हिंदोस्तानी लोग रात को सोने से पहले दांत-ब्रुश करना शुरू कर दें तो भारत में मुंह के कैंसर के रोगियों की संख्या आधी हो जाएगी। एक बेहद अनुभवी कैंसर विशेषज्ञ का ऐसा कहना बहुत मतलब रखता है और वह यह पूरे विश्वास के साथ कह रहे थे।

इस बात की व्याख्या करते हुए उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि भारत में अधिकांश तंबाकू-चूना चबाने वाले इस मिश्रण को मुंह में गालों एवं होठों के अंदर दबा कर ही सो जाते हैं जिस से उन में मुंह का कैंसर होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। उनका कहना था …और मैं भी इस से पूर्णतयः सहमत हूं कि अगर रात को सोने से पहले कोई बंदा दांत साफ़ कर लेगा तो फिर से मुंह में तंबाकू रूपी कचरा ठूंसने का चांस बहुत कम हो जाएगा।

दरअसल यह जो तंबाकू-चूने के मिश्रण को होठों और गालों के अंदर चुटकी में भर कर दबाने की भारतीयों की आदत है यही आदत मुंह के कैंसर को इतना बढ़ावा दिये जा रही है।

1991 में टाटा मैमोरियल हास्पीटल ने ओरल-कैंसर (Oral Cancer) पर एक किताब प्रकाशित की थी…अभी मैं वह किताब ही पढ़ रहा था। उस में बिल्कुल साफ़ साफ़ लिखा है कि मुंह के अंदरूनी हिस्सों –गालों, होठों, नीचे वाले जबड़े की हड्डी के कैंसर को भारतीय मुंह का कैंसर कहा जा सकता है…मुंह के कैंसर के 60 प्रतिशत से भी अधिक कैंसर भारत में मुंह की इन्हीं जगहों पर होते हैं। और इस का प्रमुख कारण है इन जगहों पर तंबाकू-चूने के मिश्रण (खैनी) को दबाए रख के धीरे धीरे चूसा जाना।

ध्यान दें कि टाटा मैमोरियल हास्पीटल की यह किताब बीस साल पहले लिखी गई थी .. उन दिनों पान मसाला थोड़ा सिर उठा रहा था ….लेकिन गुटखे के इतने पाउच वाउच नहीं मिलते थे .. ध्यान दें कि पिछले बीस वर्षों में इस गुटखे के पैकेटों का किस कद्र देश में कोने-कोने में प्रचलन बढ़ा है और मुंह के कैंसर के आंकड़े कितने भयभीत करने वाले होंगे।

तंबाकू सैशे की तस्वीर जिसे देख कर मुझे चार दिन पहले यह लगा कि यह भारत की समस्या नहीं है

तंबाकू-चूने के मिश्रण से बात याद आ गई … दो चार दिन पहले ही मैं गूगल-इमेज़ेज में गुटखा-च्यूईंग सर्च कर रहा था …अचानक मेरी नज़र में एक तस्वीर पड़ी जिस में कोई व्यक्ति अपने मुंह के अंदर तंबाकू का एक पाउच सा दबाते दिखाई दे रहा था ….मैंने इस तरफ़ इतना तवज्जो नहीं दी क्योंकि मुझे लगा कि इस तरह के पाउच दबाने का शुक्र है चलन अभी इस देश में नहीं है। लेकिन अगले दो ही दिन में मैं गलत साबित हो गया।

इतने वर्षों से तंबाकू पर लिख रहा हूं …. तंबाकू का विभिन्न रूपों में इस्तेमाल करने वालों से बातें करता रहता हूं लेकिन मुझे दो दिन पहले ही पता चला कि यहां पर भी ये मुंह में दबाने वाले पाउच यहां भी धड़ल्ले से बिक रहे हैं, मुंह में निरंतर दबाए जा रहे हैं।

ये तंबाकू के छोटे छोटे पाउच पांच पांच रूपये की पैकिंग में बिकते हैं …..कोई तंबाकू को हथेड़ी पर रगड़ने की ज़हमत नहीं… … इन में तंबाकू-चूना या फिर फिल्टर तंबाकू..चूने की दस छोटी छोटी थैलियां (पाउच, sachets) होती हैं जिन्हें मुंह में दबा कर धीरे धीरे चूसा जाता है।

तंबाकू के सैशे (पाउच) जिन्हें होठों एवं गालों के अंदर दबा दिया जाता है

इन में से एक का विज्ञापन तो मैं बहुत समय से टीवी एवं समाचार-पत्रों में देखता आ रहा था लेकिन मुझे पता नहीं था कि इस के अंदर क्या पैक है!  उस पैकेट को खोलने पर यह देखिये कि उस में ये छोटे छोटे तंबाकू-खैनी के पाउच पड़े हैं … पैकेट खोलते ही महक ऐसी आती है कि इसे पहले से इस्तेमाल न करने वाले का भी मन इसे यूज़ करने के लिये ललचा जाए।

मुझे अब समझ में आया कि इस के ऊपर क्यों लिखा रहता है.. चैन से मज़ा लो। चलिये, ज़रा इस की पैकिंग पर जल्दी से एक नज़र दौड़ाएं …. इस खैनी के पैकेट के ऊपर इसे यूज़ करने वालों के लिये दिशा-निर्देश भी दिये गये हैं … सब कुछ सरल हिंदी में —
होंठों के नीचे फिल्टर तम्बाकू सैशे दबाओ और मजे लो (चबाये नहीं) और साथ में तीन तस्वीरों के द्वारा इस बात को स्पष्ट किया गया है .. 1. फिल्टर तम्बाकू का एक सैशे लें 2. होठों के नीचे रखें 3. और मजा लें। और साथ में बड़े बड़े शब्दों में लिखा है … स्टेटस ……सुरक्षा …… संतुष्टी

एक और ब्रांड देखा — उस की पेपर पैकिंग थी …उस के ऊपर फिल्टर तंबाकू लिखा हुआ था और इसी तरह के पाउच पैक किये हुए…. और फ्लेवर का क्या कहें, कमबख्त पिपरमिंट की इतना स्ट्रांग महक पैकेट खोलते ही स्वागत करती है कि मुझे तो बचपन में उन पांच पांच पैसे में मिलने वाली पिपरमिंट की गोलियों की याद आ गई …. इसलिये मैंने झट से फोटो खींच कर इसे कूड़ेदान में फैंक देना ही उचित समझा।

तंबाकू के सैशे का एक ब्रांड जिस की पैकिंग पर अंग्रेज़ी झाड़ी गई है...

और हां, एक बात और …इस पैकिंग पर अंग्रेजी भी झाड़ी गई है …शायद इस ब्रांड का टॉरगेट ग्रुप पढ़े लिखे बाबू लोग रहे होंगे …इस पर लिखे दिशा-निर्देशों की तरफ़ भी ज़रा ध्यान दें …

  • POP it under upper lip
  • Wait a few minutes for a Tingle
  • Enjoy the true freshness of tabbaq
  • No spitting required

( Notice the spellings of Tobacco – it is written as tabbaq everywhere on the packet  और हिंदी में इसे तब्बाक लिखा गया है) …. ऐसा करना भी ज़रूर कंपनी की शरारत रही होगी क्योंकि वैधानिक चेतावनी में अगर बिच्छू की फोटो के साथ पैकिंग पर यह लिखा है …Tobacco kills  ..तम्बाकू जानलेवा है… Tobacco causes Cancer..तम्बाकू से कैंसर होता है…. तो फिर क्यों न कुछ को तो कम से बेवकूफ़ यह बता कर बना ही दिया जाए कि हम तो तब्बाक बेच रहे हैं, तम्बाकू नहीं। यह भी तंबाकू और चूना का ही मिश्रण है…….तंबाकू किस भी रूप में आता हो, जान ही लेता है।

एक बात बेहद चिंताजनक यह भी है कि वैसे तो तंबाकू-चूना चबाने वाला—(हथेली पर रगड़ कर)– बहुत बार थूक भी देता है … और शायद थोड़े समय बाद फैंकने में कोई झिझक भी न महसूस करता हो, लेकिन एक बार पाउच मुंह में रखने पर उसे अच्छी तरह से विनाश कर लेने के बिना कोई भी बाहर न फैंकता होगा … और ऊपर से यह जो दुष्प्रचार हो रहा है इन के पैकेटों के ऊपर ही … थूकने की भी ज़रूरत नहीं .. बस, धीरे धीरे मज़ा लेते रहो। यह छोटे छोटे पाउच बिल्कुल बारीक से कपड़े के बने हुये हैं … जैसा की आप ऊपर लगाई तस्वीर में देख सकते हैं …..लेकिन यह रूपया का सिक्का इस पैकिंग में से नहीं निकला, इसे केवल पाउच के साइज़ का सही साइज दर्शाने के लिये रखा गया है……………….ऊपर से .इस लेख को लिखने के चक्कर में दो पाउचों को खरीदने में मेरे दस रूपये खराब हो गये…..कोई बात नहीं, अगर कुछ लोगों ने भी इस लेख को देख कर इस ज़हर को चबाने-दबाने-चूसने से तौबा कर ली तो भाई अपने लिए —-पैसा वसूल !!