तंबाकू चबाने वाले गले की सूजन को न करें नज़रअंदाज़

25 वर्ष से तंबाकू चबाने वाली महिला के मुंह की तस्वीर

यह जो मुंह के अंदर की तस्वीर आप देख रहे हैं यह लगभग 35वर्ष की महिला की है। उसे दांतों में कोई विशेष तकलीफ़ तो नहीं थी, बस वही थोड़ा बहुत थंडा-गर्म कभी कभी लगता है जो सारे हिंदोस्तान को लगता है…लेकिन उस का मेरे पास आने का कारण था उस का पति।

वह बता रही थी कि जब उस का पति मेरे पास आया था तो मैं किसी तंबाकू गुटखा चबाने वाले से बात कर रहा था, इसलिए उस के पति ने उसे कहा कि जाओ तुम भी अपना मुंह दिखा कर तो आओ।

हां, तो महिला ने बताया कि वह शादी से पहले ही जब वह 10-12 वर्ष की थी तब ही से वह तंबाकू-चूना चबा कर खा रही है, लगभग पिछले 25 वर्ष से यह सिलसिला चल रहा है। वह बता रही थीं कि वह दिन में तीन-चार बार ही तंबाकू-चूने का मिश्रण चबाती है। उस ने चुनौतिया भी साथ रखी हुई थी –एक स्टील की डिब्बी जिस के एक तरफ़ तंबाकू और दूसरी तरफ़ चूना भरा रहता है।

उस का मुंह चैक करने पर पाया गया कि उस के मुंह में तंबाकू-जनित घाव हैं … और इस तस्वीर में आप देख रहे हैं कि मसूड़ों में सूजन तो है, लेकिन बड़ी अलग किस्म की सूजन लग रही है। जो भी हो, इस महिला के गाल के अंदर या मसूड़ों में कैंसर के कोई लक्षण नहीं दिख रहे — लेकिन विडंबना यही है कि क्या तंबाकू को लात मारने के लिए कैंसर के प्रकट होने का इंतज़ार किया जा रहा है?

मुझे याद आ रहा था …20-21 वर्ष पहले जब मैंने रेलवे सर्विस ज्वाइन की तो एक मसूड़ों की सूजन का मरीज आया …देखने में ही गड़बड़ सी लग रही थी …शायद फरवरी 1992 की बात है, वह आया तो था मेरे पास दांत के दर्द के लिए। उन दिनों मैं बंबई के एक अस्पताल में काम कर रहा था, हम ने उसे तुरंत टाटा अस्पताल रेफ़र किया। वहां उस का डायग्नोज़ ओरल कैंसर का हुआ —उन्होंने तुरंत आप्रेशन कर दिया और वह मुझे कईं वर्षों तक आकर मिलता रहा …फिर दस वर्ष बाद मैं वहां से आ गया और मुझे उस के बारे में आगे पता नहीं।

अच्छा तो मैं बात तो इस 35 वर्षीय महिला की कर रहा था … बता रही थीं कि यह लत ऐसी है कि छूटती नहीं है। इस केस में पहली बार एक अजीब सी बात दिखी की उस का पति ऐसी किसी चीज़ का सेवन नहीं करता….बच्चे भी इन सब चीज़ों से दूर हैं। उस ने बताया कि बच्चों को तो इस तंबाकू से इतनी घिन्न आती है कि कईं बार जब मैं उन्हें तंबाकू बनाने को (तंबाकू-चूने को हाथ में मसलने की प्रकिया) कहती हूं तो साफ़ मना कर देते हैं।

महिला के चेहरे की दाईं तरफ़ वाली सूजन

अभी मैं उस का मुंह देख ही रहा था कि मुझे उस के चेहरे के दाईं तरफ़ सूजन दिखी — बता रही थी कि कुछ महीनों से है … देख कर चिंता ही हुई …बताने लगी कि दवाई खाती हूं दब जाती है फिर दोबारा हो जाती है… सूजन अजीब सी थी –ऐसी सूजन दांत एवं मुंह की इंफैक्शन के लिये तो कम ही दिखी थी, उसे मैंने विशेषज्ञ के पास भेजा है…..वह उसे चार पांच दिन के लिए एंटीबॉयोटिक दवाईयां देगा और वापिस बुला कर फिर से देखेगा। इस महिला को मेरी शुभकामनाएं.

इस तरह की सूजन के संबंध में मैंने एक पोस्ट कुछ दिन ही पहले लिखी थी …..वह बंदा भी मेरे पास दो-तीन वर्ष पहले  कुछ इसी तरह की सूजन केसाथ ही आया था…जब दवाईयों से नहीं गई, दांतों में कुछ लफड़ा था नहीं ….ई.एन.टी विशेषज्ञ के पास भेजा गया… और उस का डायग्नोज़ यह हुआ कि उसे दाईं तरफ़ के टांसिल का कैंसर है…उस का समुचित इलाज हो गया ….आजकल वह ठीक चल रहा है, उस को भी मेरी शुभकामनाएं कि उस में उस बीमारी की पुनरावृत्ति न हो।

यह पोस्ट लिखते मैं सोच रहा हूं कि महिलाएं भी अपने देश के बहुत से हिस्सों में बीड़ी पीती हैं, तंबाकू, खैनी चबाती हैं, अपने मसूडों पर मेशरी (तंबाकू का पावडर) घिसने का चलन महाराष्ट्र में विशेष कर बंबई में काफ़ी देखा है — महिलाओं का इस तरह के व्यसन में लिप्त होना बहुत गंभीर मुद्दा है क्योंकि अकसर मां अपने बच्चों के लिये एक रोल-माडल होती है …अगर वह स्वयं ही इन चक्करों में पड़ी है तो बच्चों को कैसे रोकेगी?

और तो और अगर महिलाएं धूम्रपान करती हैं तो भी सैकेंड हैंड धुआं (Passive smoking) तो घर के बाकी सभी सदस्यों आदि के लिये नुकसानदायक तो है ही।

यह पोस्ट केवल इस बात को रेखांकित करने के लिए कि तंबाकू, गुटखा, सुपारी से संबंधित किसी भी शौक को पालना किसी के भी हित में नहीं है। कुछ वर्ष पहले की बात है गुजरात में बहुत ही महिलाएं जब मुंह के कैंसर का शिकार होने लगीं तो पता चला कि वह दांतों की सफ़ाई के लिए तंबाकू वाली पेस्ट दांतों एवं मसूड़ों पर घिसती हैं और ये काम उन का दिन में कईं बार चलता है….और नतीजा फिर कितना भयानक निकला। ऐसी पेस्टें आज भी बाज़ार में धड़ल्ले से बिक रही हैं, इसलिए इन से सावधान रहने में ही बचाव है।

सब की बात की –अपनी नानी की नहीं की —मेरी नानी जी को अपने मुंह में नसवार (creamy snuff…. made of tobacco) रखने की आदत थी …वह बताया करती थीं कि बहुत साल पहले जब उन के दांत में दर्द हुआ तो उन्होंने एक बार नसवार लगाई –बस दो चार दिन में लत ऐसी लगी कि अफ़सोस इस आदत ने उन की जान ले ली…. तंबाकू का इस तरह से इस्तेमाल करने वालों में पेशाब की थैली (मूत्राशय, urinary bladder) का कैंसर होने का रिस्क होता है …….मेरी बेचारी नानी के साथ भी यही हुआ…. उन्हें अचानक पेशाब में रक्त आने लगा, डायग्नोज़ हुआ …आप्रेशन हुआ …रेडियोथैरेपी भी हुई —लेकिन जीत कैंसर की ही हुई।

बीमारी किसी को कोई भी किसी भी वक्त हो जाए इस पर किसी बंदे का कंट्रोल पूरा तो नहीं होता लेकिन अगर मक्खी देख कर भी निगली जाए तो फिर उसे आप क्या कहेंगे!!

पोस्ट के अंत में बस इतनी सी नसीहत की घुट्टी कि तंबाकू के सभी रूपों से कोसों दूर रहें……यह जानलेवा है, तंबाकू इस्तेमाल करने वाले को यह कब और कैसे डस लेगा, क्या अंजाम होगा ….यह सब जानते हुए भी अगर मुंह में रखे गुटखे को थूकने की इच्छा न हो तो फिर डाक्टर भी क्या करें?

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मुसीबत मोल लेने के बराबर है नीम-हकीम डैंटिस्ट के चक्कर में पड़ना

सड़कछाप डैंटिस्ट द्वारा किये गये इलाज का एक नमूना

यह तस्वीर एक 60-65 वर्षीय महिला की है…. परेशान है अपने नकली दांतों से ..बार बार मसूड़े सूज जाते हैं, रक्त निकलने लगता है… पस पड़ जाती है।

आप इस तस्वीर में जो ऊपर और नीचे वाले जबाड़े में नकली दांत देख रहे हैं, ये काम किसी सड़क-छाप दांतों की “डाक्टरी” करने वाले का है। ऐसे केस अकसर हमारी ओपीडी में आते रहते हैं। जितना भी समझा लें, नकली दांत लगवाने के लिये अकसर बहुत से लोग इन सड़कछाप दांतों के कारीगरों के पास पहुंच जाते हैं।

चूंकि से बहुत सस्ते में इस तरह की कारीगरी कर देते हैं … इसलिए ये लोगों को अपने जाल में फंसा ही देते हैं। और बस फिर दो-तीन महीने में ही जब मसूड़ें फूल जाते हैं, खून आने लगता है, कुछ भी खाना-पीना दूभर हो जाता है तो मरीज़ फिर हमारे पास लौट आते हैं।

इस तरह का काम इतने गलत ढंग से किया जाता है कि साथ वाले अच्छे भले स्वस्थ दांत भी कुछ ही हफ्तों नहीं तो महीनों में हिलने लगते हैं ….अकसर इन केसों में सब से पहले इस तरह की मुसीबत से निजात पाने के लिये इन नकली दांतों को निकाला जाता है और फिर बाद में बचे हुए असली दांतों की हालत देख कर ही उन निकलवाने या न निकलवाने का निर्णय लिया जाता है।

इस तरह के फिक्स दांत लगवाने का बहुत ही ज़्यादा नुकसान होता है ….क्योकि ये दो-चार सौ रूपये अपने शिकार से ऐंठ लेते हैं ….इसलिये मरीज़ को भी पहले पहले तो सब ठीक सा ही लगता है और उसे लगता है कि क्वालीफाईड डैंटिस्टों का तो जैसे काम ही है इन लोगों को कोसना। लेकिन कुछ ही समय में तस्वीर साफ़ हो जाती है।

Removable Partial Denture (RPD)

ये जो आप ऊपर वाली तस्वीर में एक गुलाबी सा मैटिरियल देख रहे हैं, इसे इस्तेमाल करने का ढंग भी इन नीमहकीमों का बहुत भयानक सा ही होता है ….ये इसे इस ढंग से मुंह में लगा देते हैं जिससे मसूडें सड़ सकते हैं …इस मैटिरियल से इतनी ज़्यादा गर्मी निकलती है… क्वालीफाइड डैंटिस्ट भी चाहे मैटिरियल यही पिंक ही इस्तेमाल करते हैं ….लेकिन वे इसे सही ढंग से डैंटल लैब से बनवा कर मरीज़ को देते हैं जैसा कि आप इस बाईं तरफ़ लगी तस्वीर में देख रहे हैं जो कि एक बुज़ुर्ग के ऊपर और नीचे के पार्शल डैंचर हैं (Removable partial denture) जिसे इन्होंने एक डैंटल कालेज से बनवाया है।

और ये जो सड़कछाप डैंटिस्ट जिसे फिक्स दांत कह कर पब्लिक को मूर्ख बना देते हैं, ये तो न फिक्स होते हैं और न ही रिमूवेबल …ये केवल मरीज़ के दांतों को पूरी तरह से नष्ट करने के लिये ही विशेष तौर पर तैयार किये जाते हैं।

फिक्सड़ पार्शल डैंचर (Fixed Partial Denture) ..इसे डैंटल ब्रिज भी कहा जाता है ..

जो ढंग से फिक्स दांत लगवाये जाते हैं ..उन्हें डैंटल ब्रिज भी कहते हैं …किसी डैंटल कालेज से एक मरीज़ ने यह लगवाया है जिस की तस्वीर आप को दाईं तरफ़ दिखाई दे रही है। इस महिला के ऊपर के जबड़े के आगे वाले दो दांत टूटे हुये थे जिस के लिये यह किसी नीमहकीम के चक्कर में पड़ गई… उस ने इस तरह से साथ वाले स्वस्थ दांतों को भी बांध दिया कि नकली दांतों के साथ साथ पास वाले असली दांत भी बुरी तरह से हिलने लगे और फिर उन को भी निकाला गया ….और फिर जाकर यह ब्रिज लगवाया गया है…. दांत चार लगे हैं ..लेकिन ब्रिज यह छः यूनिटों का है ….. दोनों तरफ़ के सुओं (canine) से सुपोर्ट ली गई है और इन्हें फिक्स कर दिया गया है …डैंटल सीमैंट लगा कर …………इसे कहते हैं फिक्स दांत।

कच्चे दांतों के रहते भी कईं बार आ जाते हैं पक्के दांत

दूध के दांत गिरने से पहले ही उन के पीछे जम गये पक्के दांत

यह तस्वीर एक छः वर्ष की बच्ची की है जिसके पिता परेशान हैं कि उस के दूध के दांत गिरे नहीं और पक्के दांत भी आ गये हैं। उन्हें बहुत चिंता थी कि कहीं इस के दांतों की तरतीब (dental arrangement) ही न बिगड़ जाए। अभी पक्के दांतों को आये हुये तो कुछ ही दिन हुये हैं लेकिन उन्हें लग रहा था कि शायद उन्होंने आने में देर कर दी है।

बच्चे तो मस्त होते ही हैं, लेकिन उस के पिता को बता दिया गया कि ऐसा कुछ नहीं है, ऐसा कईं केसों में हो जाता है और अकसर नीचे जबड़े में इन्हीं दांतों के साथ ही ऐसा होता है कि दूध के दांत गिरे नहीं और पक्के दांतों ने अपनी जगह बना ली।

इन केसों में करना बस इतना होता है कि इस तस्वीर में दिखने वाले आगे के छोटे छोटे दूध के दांतों को निकालना होता है। वैसे हिल तो वे पूरी तरह से रहे थे …और इन्हें निकालने के लिये सुन्न करने वाले इंजैक्शन आदि की भी ज्यादातर केसों में ज़रूरत नहीं पड़ती …केवल सुन्न करने वाली दवा को स्प्रे कर दिया जाता है अथवा सुन्न करने के लिये आने वाली जैल (gel) को थोड़ा इन दूध के दांतों के सामने वाले मसूड़ों पर लगा दिया जाता है और पांच सैकेंड में दोनों दांत बाहर निकाल दिये जाते हैं —बिना दर्द के।

और मैंने यह देखा है कि लगभग सभी केसों में जो पक्के दांत अंदर की तरफ़ निकल रहे होते हैं वे कुछ ही हफ़्तों में अपनी जगह ले लेते हैं …कहना का मतलब कि स्वभाविक तौर पर ही जिह्वा आदि के प्रेशर से वे बाहर की तरफ़ सरक जाते हैं।

आप सोच रहे होंगे कि इस बच्ची के दांतों में से रक्त क्यों आ रहा है, उस का कोई विशेष कारण नहीं….मसूड़ें सुन्न होने के बाद बस वह जिद्द करने लगी कि हिलते हुये दांतों को वह स्वयं ही निकालेगी। यह रक्त उस बच्ची के द्वारा अपने दांतों को स्वयं निकालने के संघर्ष का परिणाम है –कोई खास बात नहीं।

इस केस के द्वारा भी इस बात को रेखांकित किया जा सकता है कि बच्चों का नियमित दांतों का नियमित निरीक्षण करवाना कितना ज़रूरी है। यह केवल बच्चों के नीचे वाले जबाड़े के अगले हिस्से में ही नहीं होता, इसे अकसर हम बच्चों की दूध की जाड़ों के एरिया में कभी कभी देखते हैं कि वे अभी पूरी तरह गिरी नहीं है और उन की जगह पर पक्के दांत अपनी जगह लेने को तैयार हैं……इलाज उन का भी वैसा ही, जल्दी से जल्दी दूध के दांत को  उखाड़  कर पक्के दांतों को रास्ता देने से सब कुछ आम तौर पर सामान्य हो जाता है।

सांसें महकाए रखने का सुफरहिट फार्मूला

आज हमारी ज़िंदगी बहुत व्यस्त है, हम समझते हैं कि हमारी प्रत्येक समस्या का कोई क्विक-फिक्स हल होना चाहिए। लेकिन यह अकसर संभव नहीं होता। मेरे पास रोज़ाना बहुत से ऐसे मरीज़ आते हैं जो सांस की दुर्गंध से परेशान होते हैं—किसी की नई नई शादी हुई होती है, किसी का कोई अपना उसे टोक देता है, किसी के सहकर्मी उसे टोकते तो नहीं लेकिन उस से थोड़ा किनारा करने लगते हैं।
सांस की दुर्गंध एक बहुत ही आम समस्या है। लेकिन इस का समाधान वे महंगे माउथवॉश बिल्कुल भी नहीं हैं जिन्हें आज लोग किसी भी शापिंग प्लॉजा से अपनी इच्छा अनुसार लेकर आ जाते हैं।
मुझे भी मरीज़ आकर बताते हैं कि टुथपेस्ट ही नहीं, बल्कि फलां फलां माउथवॉश का भी नियमिंत इस्तेमाल करते हैं लेकिन सांस की दुर्गंध पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं लेती। उन्हें फिर यही समझाना पड़ता है कि क्या यह हो सकता है कि हम साफ़-स्वच्छ पानी से स्नान करने की बजाए एक बढ़िया सा महंगा, विदेशी परफ्यूम इस्तेमाल करने से तरोताज़ा अनुभव कर लेंगे? – नहीं ना, बस ठीक उसी तरह जब तक हम अपने मुंह की सफ़ाई की तरफ़ पूरा ध्यान नहीं देंगे, यह बदबू कहीं जाने वाली नहीं है।
बस इतनी सी बात से सब कुछ उन की समझ में आ जाता है। एक बात तो है कि सदियों पहले हमारे पूर्वजों ने यह रहस्य जान लिया था और वे इस का नित्य-प्रतिदिन अभ्यास भी किया करते थे। लेकिन हम ही हैं जो कि आधुनिकता की दौड़ में बस सरपट दौड़े ही जा रहे हैं ….यह सोच लेते हैं कि हर बात का समाधान पैसे से हो सकता है। आपने गांवों में भी देखा होगा कि लोग किस तरह से अपनी दातुन को बीच में से काट कर जिह्वा की सफ़ाई के लिए इस्तेमाल करते हैं।
भूमिका कुछ ज़्यादा ही खिंच सी गई है …चलिए सीधे अपनी बात पर आता हूं। मेरे पास बहुत से मरीज़ ऐसे आते हैं जो बताते हैं कि वे अपनी जिह्वा को कभी साफ़ करते ही नहीं। अगर आप के मसूड़े स्वस्थ हैं, और आप दिन में दो बार —सुबह और रात में सोने से पहले टुथब्रुश इस्तेमाल करते हैं —लेकिन फिर भी यह मुंह की दुर्गंध पीछे पड़ी हुई है तो इस का सब से आम कारण है नियमित तौर पर रोज़ाना जिह्वा का साफ़ न किया जाना।

जिह्वा पर जमी इस मैल की परत को भी लोग साफ़ ही समझते हैं

जिह्वा (जुबान) के ऊपर जमी गंदगी हमारी सांसों की दुर्गंध का एक बहुत महत्वपूर्ण कारण है। देखने में तो अकसर जुबान साफ़ ही लगती है लेकिन जितनी गंदगी इस से रोज़ाना उतरती है, यह केवल वही जानते हैं जो रोज़ाना जुबान साफ करने वाली पत्ती (टंग-क्लीनर) का इस्तेमाल करते हैं।
वास्तव में जिह्वा के ऊपर जो कीटाणु (बैक्टीरिया) एकत्रित हो जाते हैं वही मुख्य रूप से सांस की दुर्गंध के लिये जिम्मेदार होते हैं।
एक बात महत्वपूर्ण यह भी है कि मुझे अकसर मरीज़ कहते हैं कि हम लोग ब्रुश के पीछे जो लगा आता है खुरदरा सा हैंडल, उस से यह काम कर लेते हैं। लेकिन यह ठीक से सफ़ाई कर नहीं पाता। जुबान की सफ़ाई तो किसी अच्छे टंग-क्लीनर से ही हो सकती है।

बाएं तरफ़ तांबे का टंग-क्लीनर और गुलाबी वाला बच्चों के लिए टंग-क्लीनर

आजकल तांबे के अच्छे अच्छे टंग-क्लीनर मिलने लगे हैं… स्टील का भी चलता है। और अब तो बढ़िया प्लास्टिक की बनी पत्तियां भी आ गई हैं….बचपन में जिन प्लास्टिक के टंग-क्लीनरों को इस्तेमाल हम किया करते थे, वे तो अकसर टूट जाया करते थे, लेकिन अब तो बच्चों के लिए बहुत अच्छे अच्छे टंग-क्लीनर भी मिलने लगे हैं।
यह तो हुई बात कि दांत मसूड़े स्वस्थ हैं, सामान्य स्वास्थ्य भी ठीक है फिर भी दुर्गंध आती है तो इस का समाधान तो जिह्वा की नियमित सफ़ाई से हो जाता है। लेकिन अगर दांतों मसूडो़ं में कुछ गड़बडी है तो क्या न डैंटिस्ट से एक बार अच्छी तरह से स्केलिंग करवा ली जाए। एक बात और भी है कि कुछ शारीरिक रोग ऐसे होते हैं जिन में कुछ अलग तरह  की मुंह से दुर्गंध आती है जैसे कि लिवर की कुछ बीमारियां, गुर्दे की कुछ बीमारियां ….ऐसे हालात में मरीज़ को अपने फ़िज़िशियन से संपर्क करना होता है ताकि उस तकलीफ़ की जड़ तक पहुंच कर उस का समाधान किया जाए।
बहुत बार लोग कहते हैं कि हम प्याज़ खाते हैं तो मुंह से दुर्गंध आने लगती है, ऐसा भी क्या कि कुछ समय के लिये थोड़ी सांस की महक की परेशानी के लिये कोई प्याज़ ही न खाए … खाओ भाई जो मन करे खाओ, बाद में अच्छे से कुल्ला कर लें और जिह्वा साफ  कर लें, सांसों की महक वापिस लौट आयेगी। और ये जो धूम्रपान करने वाले शाम को घर लौटते समय पनवाड़ी से टाफी लेकर अपने मुंह की दुर्गंध दूर भगाने की फ़िराक में रहते हैं …उन के बारे में एक अंग्रेज़ी कहावत का ध्यान आ गया जिस का अर्थ कुछ यूं है …किसी सिगरेट पीने वाले या वाली का चुंबन करना ऐशट्रे को चुंबन करने जैसा होता है। 

मेलजोल दांतों का भी परफैक्ट चाहिए….

अकसर लोग यही समझते हैं ना कि मुंह की कोई भी बीमारी हो ..दंत-छिद्र हों या फिर मसूड़ों की सूजन हो … पायरिया हो, कुछ भी हो …इस का मूल कारण है दांतों की और मुंह की ढंग से सफ़ाई न हो पाना …नियमित ब्रुश न करना, और दिन में बार बार टॉफी, चाकलेट, गुड़, रेवड़ी आदि बस खाते ही जाना और कुछ भी खाने के बाद कुल्ला न करना और फिर दांतों के बीच फंसी खाने की चीज़ों को टुथ-पिक या दियासिलाई की तीली से कुरदते रहना।
ये सब बातें बिल्कुल सही हैं, पूरी की पूरी सच्चाई है। लेकिन एक बार और भी है कि ऐसा भी हो सकता है कि कोई बंदा अपने मुंह की ठीक से सफाई रखता हो, और भी सब तरह की सावधानियां बरतता होगा लेकिन फिर भी हो सकता है कोई मुंह में ऐसी तकलीफ़ हो जाए ..इस की एक उदाहरण मैं आप को इस केस द्वारा देना चाहता हूं।

बेतरतीब लगे हुये नीचे के दांत

इस तस्वीर में आप जिस युवक के दांतों की तस्वीर देख रहे हैं …उस के दांत देखने में ठीक ठाक ही लगते हैं, कोई खास टारटर आदि भी नहीं, मसूड़े भी काफी हद तक ठीक से ही लगते हैं, दांतों में कैवीटीज़ (दंत-छिद्र) भी नहीं दिख रहे लेकिन फिर यह दंत चिकित्सक के पास आया तो आया कैसे? ….. रोज़ कईं कईं बार रोज़ाना टीवी पर अपने बेटे के साथ बैठ कर सीआईडी शो देख देख कर मेरी भाषा भी लगता है एसीपी प्रदुमन जैसी हो गई है …आया तो आया कैसे? …आया तो आया, ऐसा क्या है, क्या वह नियमित डैंटल चैक-अप के लिये नहीं आ सकता? बेशक आ सकता है, लेकिन ऐसा कोई रिवाज यहां दिखता नहीं …साल में शायद दो-चार लोग ही ऐसे आते होंगे जो रूटीन चैक-अप के लिये आते होंगे।

दांतों के नीचे पस की वजह से सूजन दिख रही है

हां, तो इस युवक के नीचे वाले दांतों के नीचे एक फोड़ा (abscess) बना हुआ है जिस में पस बनी हुई है … इस के दांत तो ठीक ठाक से ही लग रहे हैं तो फिर यह क्यों पड़ गया इस झमेले में? …इस का कारण है कि इस के दांतों का एरेंजमैंट ठीक नहीं है, ये तरतीब से नहीं लगे हुए ….एक जबाड़े के दांतों का आपस ही में सही तरतीब से जुड़ा होना ही काफी नहीं होता, बल्कि दूसरे जबाड़े के साथ भी उस का संबंध बिल्कुल ठीक होना चाहिए…. आप देखिये इस में न तो एक जबाड़े के दांतों का ही अपने में कोई हिसाब-किताब ठीक बैठ रहा है और न ही दूसरे जबाड़े के साथ ही संबंध इन के ठीक हैं। देखिये किस तरह से दांत इस रगड़ की वजह से घिसे हुये से दिख रहे हैं।

ऊपर-नीचे के बेतरतीब दांतों का आपसी रिश्ता भी चोट पहुंचाने वाला

इस के   कारण जब ऊपर और नीचे वाले दांत आपस में मिलते हैं तो चाहे वे सामान्य फोर्स से ही मिल रहे हों, एक दूसरे को चोटिल करते हैं …इस का असर नीचे जबड़े की हड्डी तक जाता है ….लगातार होने वाले इस प्रहार से दांत डैड हो जाता है और फिर उस के नीचे पस का फोडा तक बन जाता है जैसा कि इस केस में दिख रहा है … मरीज़ अत्यंत पीड़ा में है। एक्सरे करने के बाद इस के डैड दांत की तुरंत रूट-कनॉल-ट्रीटमैंट की जायेगी ….कुछ दवाईयां दी जाएंगी …एंटीबॉयोटिक एवं सूजन एवं दर्द निवारक टेबलेट्स— एक दो दिन में ही ठीक तो  हो जायेगा…..लेकिन आर्थोडॉंटिक्स इलाज के द्वारा इस के दांतों के अरेंजमैंट को दुरूस्त करना भी बहुत ज़रूरी है, वरना कभी एक दांत में लफड़ा, कभी दूसरे में, यह लफड़ा चलता ही रहेगा।
इस पोस्ट से यह सबक लेना होगा कि बाल अवस्था से ही बच्चों के दांतों की नियमित जांच होनी चाहिए …..ताकि दांतों की किसी भी तरह की अनियमितता को तुरंत दुरूस्त किया जा सके …. A stitch in time saves nine!  ……… वैसे इस दांतों का इस तरह का जो अनियमित अरेंजमैंट होता है – (irregular arrangement of teeth…… इसे Trauma from Occlusion नामक बीमारी लिख कर हम अकसर लोगों को “ डराते” हैं।

थोड़ा बहुत ही राहत दे पाती हैं ये ठंडा-गर्म पेस्टें

हमारे देश के लोगों को हिंदी एक माला की तरह पिरो कर रखती है……रखती होंगी, करोड़ों लोगों को हमारी रेलें जोड़ कर रखती हैं, सांझ बना कर रखती हैं ……..रखती होंगी…………..लेकिन क्या आपने सोचा है कि इन करोड़ों लोगों को एक और बात आपस में बांध के रखती है ..टुथपेस्ट का एक ऐसा ब्रॉड जो करोड़ों लोगों की ज़िंदगी में शामिल है। मुझे बहुत हैरानगी होती है कि बिल्कुल अंगूठा-टेक लोग भी टुथपेस्ट का नाम पूछने जब इस ब्रांड का नाम लेते हैं।
हां, तो आप भी इस गलतफहमी में न रहियेगा कि कहीं मैं किसी टुथपेस्ट आदि का ब्रैंड-अम्बैसेडर तो नहीं बन गया…. वैसे तो ऐसा कभी होगा नहीं …और न ही मुझे ऐसा करने पर रती भर भी खुशी होगी। लेकिन बहुत दिनों से यह सोच रहा हूं कि अब आने वाले समय में एक और सांझ इस देश को बांध कर रखेगी ….दांतों पर ठंडा-गर्म लगने के लिये इस्तेमाल की जाने वाली टुथपेस्टें।
वैसे तो मैं इस तरह की पेस्टों के बारे में पहले भी बहुत सी बातें शेयर कर चुका हूं लेकिन कुछ बातें बार बार दोहराते रहने की भी ज़रूरत होती है। इन के विज्ञापन भी तो बार बार दिखते हैं तो फिर इन के बारे में क्यों एक ही बार लिख कर अपनी ड्यूटी पूरी समझ ली जाए।
तो सुनिए ….सब से महत्वपूर्ण बात कि स्वस्थ दांतों को तो किसी भी ठंडा गर्म का इलाज करने वाली टुथपेस्ट की ज़रूरत होती ही नहीं। किसी के दांतों में अगर ठंडा-गर्म लग रहा है तो इस का मतलब है कि उस के दांतों में कोई न कोई गड़बड़ है ……यार, इतना भी सीरियस होने की भी बात नहीं है, आइसक्रीम आदि खाते समय अकसर हम लोग अपने मुंह को कुछ लम्हों को पकड़ लेते हैं ….कोई बात नहीं…नो टैंशन।
लेकिन अगर सादा पानी भी ठंडा लगने लगे, कुछ भी मीठा, खट्टा, ठंडा हर बार परेशान करने लगे तो किसी दंत चिकित्सक को दिखा कर अपनी समस्या का निदान करना ही होगा……..ताकि उस का समुचित उपचार किया जा सके। और यह बात हम सब लोग गांठ बांध लें कि ऐसे ही जगह जगह इश्तिहार पढ़ कर , देख-सुन कर अगर मरीज ठंडे गर्म के लिये ऐसे ही कुछ पेस्टें दांतों पर घिसनी शुरू कर देंगे तो इस से कोई लाभ तो होने से रहा लेकिन नुकसान ज़रूर हो सकता है।
आप यही सोच रहे हैं ना कि यार अब टुथपेस्ट ही तो है, फायदा न हो—चलो यह बात तो मान लेते हैं लेकिन अपने आप खरीद कर इस्तेमाल करने से नुकसान भला कैसे हो सकता है। तो इस का जवाब यह है कि अगर इन पेस्टों से हमारी तकलीफ़ थोड़े समय के लिये दूर हो जाती है या यूं कह लें कि दब सी जाती है तो सीधी सी बात है कि हम कम से कम उतने समय के लिये तो दंत-चिकित्सक के पास नहीं जाएंगे….. यही तो सब से बड़ा नुकसान है। जैसा कि बार बार कहा है कि ये ठंडे-गर्म की पेस्टें बिना डाक्टरी सलाह के इस्तेमाल करना कोई इलाज है ही नहीं..। बड़ी संभावना है कि अगर हम दंत चिकित्सक के पास जाएं और वह हमारे दांतों में अगर कोई छिद्र है तो उसे भर दे, मसूड़ों की सूजन का उपचार सुझा दें या फिर ताबड़-तोड़ ब्रुश को दांतों पर घिसने से जो दांत का इनैमल घिस चुका है उस का समाधान कर सके, भविष्य के लिये ब्रुश रूपी तलवार के इस्तेमाल की समझ दे दे ….कुछ भी .. संभावनाएं बहुत सी हैं, लेकिन अगर हम दंत चिकित्सक के पास जाएंगे तो ही ….।
जब हम लोग डैंटिस्ट्री कर रहे थे तो हमें अच्छे से समझा दिया जाता है कि किन किन परिस्थितियों में मरीज़ को ऐसी दवा-युक्त पेस्टों को इस्तेमाल करने की सलाह दी जानी है। लेकिन अब तो पब्लिक स्वयं ही इन्हें खरीद खरीद कर घिसती रहती है। और ऊपर से विज्ञापनों का माया जाल —- सुभान-अल्ला।
एक विचार आ रहा है कि भारत की अधिकांश जनता क्वालिटी डैंटल केयर से महरूम है …इस के बहुत से कारण हैं, उन में ना जाते हुए अगर यह समझ लें कि ऐसे लोग जो डैंटिस्ट के पास जाते नहीं या जा पाने में असमर्थ हैं, जिन की दांतों और मसूड़ों की बीमारी बहुत ही ज़्यादा एडवांस ही हो चुकी है…. अगर वे इस तरह की पेस्टें इस्तेमाल कर के अस्थायी तौर पर ही सही लेकिन थोड़ी राहत महसूस कर लेते हैं तो इस में खराबी क्या है, अब इस का मैं क्या जवाब दूं। समस्या सारी यही है कि दांतों व मसूड़ों के मामले में करोड़ों हिंदोस्तानी इसी श्रेणी में आते हैं, ऐसे में तो ऐसी सभी कंपनियों की हो गई चांदी। इसीलिये इस तरह की पेस्टें बनाने वाली सभी कंपनियां चांदी कूट रही हैं और तब तक कूटती रहेंगी जब तक डैंटल अवेयरनैस रूपी मशाल की रोशनी प्रखर नहीं हो जायेगी।
बहरहाल, मुझे तो इन पेस्टों के इश्तिहार मीडिया में (प्रिंट हो या इलैक्ट्रोनिक…) देख कर अच्छा नहीं लगता। हम दांतों की झनझनाहट के इलाज की बात तो करते थकते नहीं, लेकिन इसी मीडिया पर इसी झन-झनाहट के कारणों और इन की साधारण रोकथाम की बातें कब किया करेंगे………………सोच कर मेरा सिर भारी होता है। जय बाजारवाद…….जय उपभोक्तावाद…..जय मार्कीट शक्तियां !!!!!!

अभी लिखते लिखते दशकों पुराने उस पंजाबी गीत का ध्यान आ गया जिसे हम लोग रेडियो पर सुना करते थे ….चिट्टे दंद हसनों नहीं रहंदे, लोकीं भैडे शक करदे…….(सफेद दांत हंसने से बाज नहीं आते ….पर यह बुरा ज़माना शक करने से बाज़ नहीं आता ……….) यह पंजाबी का एक सुपर-डुपर हिट गीत है….आप भी सुनिए…

डैंटिस्ट के पास जाते हैं, फ़िज़िशियन के पास नहीं…

बात कुछ अजीब सी लगती है ना, मुझे भी पहले तो इस का शीर्षक ही अजीब सा लगा लेकिन है यह सच कि अमेरिका में लाखों बच्चे एवं व्यस्क लोग ऐसे हैं जो डैंटिस्ट के पास तो हर वर्ष जाते हैं लेकिन सामान्य सेहत के लिये किसी सामान्य चिकित्सक (general doctor) के पास नहीं जाते। इस तरह की एक से संबंधित एक स्टडी अमेरिकन जर्नल ऑफ पब्लिक हैल्थ में छपी है।

चिंता की बात यह है कि जो लोग सामान्य चिकित्सक के पास नहीं जाते ऐसा नहीं है कि उन के पास हैल्थ इंश्योरैंस नहीं होता…,सब कुछ है, जिन लोगों पर यह स्टडी की गई उन में से 93 प्रतिशत लोगों के पास हैल्थ-बीमा भी था, लेकिन नहीं, वे नहीं जाते सामान्य चिकित्सक के पास जब कि डैंटिस्ट के पास उन का नियमित जाना होता है।

इसी कारण से अब यह बात तूल पकड़ रही है कि डैंटिस्टों को ऐसे मरीज़ों की अन्य शारीरिक बीमारियों पर भी नज़र रखनी होगी …जैसे कि डायबीटीज़, हाई ब्लड-प्रेशर, हृदय-रोग आदि। वैसे तो एक क्वालीफाइड डैंटिस्ट पहले ही से इन सब के बारे में मरीज़ से पूछता भी है और ज़रूरत पड़ने पर फ़िज़िशियन को रैफर भी किया जाता है।

लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अगर अमेरिका जैसे देश में जहां हैल्थ-इंश्योरैंस लोगों के पास है, फिर भी जर्नव डाक्टर के पास वे नियमित नहीं जाते तो स्थिति भारत जैसे देश में कितनी भयावह हो सकती है जहां पर लोग डैंटिस्ट के पास भी नियमित तौर पर चैक-अप आदि के नहीं जाते। अभी भी दांत के इलाज का अधिकतर लोगों के लिए मतलब यही है कि जब दांत में दर्द हो तभी जाएंगे और उखाड़ लेंगे, जब तक चलता है चलता रहे। दो दिन पहले एक 55 वर्ष के करीब का व्यक्ति मेरे पास आया …एडवांस्ड पायरिया से ग्रस्त था…मैंने अभी इतना ही पूछा था कि आप ब्रुश करते हैं, तो तपाक से उसने उत्तर दिया –यह सब ब्रुश का ही तो किया धरा है—बस कुछ अरसे के लिये किया था, मसूड़े खराब कर हो गये। बड़ा मुश्किल है लोगों के व्याप्त, उन की मानसिकता में रच-बस चुकी भ्रांतियां को उखाड़ फैंकना —–शायद दांत उखाड़ने से भी ज़्यादा ज़रूरी।

हां, तो बात हो रही थी डैंटिस्ट की सामान्य सेहत में भागीदारी के बारे में — बिल्कुल दुरूस्त है कि अगर सही समय पर डैंटिस्ट किसी सामान्य बीमारी के लिये मरीज़ को सामान्य चिकित्सक को रैफ़र भी कर देता है, तो भी यह एक अच्छी सर्विस है।

लाखों मरीज़ों के मुंह में झांकने के बाद विश्वास और भी पक्का हो गया है कि मुंह के अंदर देख लेने मात्र से ही मरीज़ की सामान्य सेहत के बहुत से पहलुओं का अच्छा खासा अनुमान लग जाता है जिसे फिर विभिन्न टैस्टों द्वारा कंफर्म किया जा सकता है, फ़िज़िशियन को रैफ़र किया जा सकता है, मैंने केवल मरीज़ों की बात ध्यान से सुन कर, उन के चेहरे से, मुंह के अंदर झांकने से ही बहुत बार ऐसा कुछ ढूंढा है जिस का उसे पहले से पता नहीं था।

इसलिये मैं अमेरिकी स्टडी से पूर्णतयः सहमत हूं कि डैंटिस्ट ऐसे मरीज़ों की सेहत में बडा योगदान दे सकते हैं जो उन के पास तो नियमित तौर पर पहुंच जाते हैं लेकिन सामान्य चिकित्सक से कन्नी कतराते रहते हैं। इस बारे में मेरा स्वयं का अनुभव बहुत ही सकारात्मक है…. अकसर लोगों को डैंटिस्ट के पास इलाज के लिये कईं बार आना होता है, इसलिये भी वे उस की बात को सुनते हैं, उस पर गौर करते हैं…………और तो और, डैंटिस्ट तंबाकू की आदत छुड़वाने के लिये बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं…… मैंने अनगिनत लोगों को सभी तरह के तंबाकू के सेवन से दूर रहने के लिये प्रेरित किया है।

Source :

Dentists could gap in health care, study says (Medline Plus)