अब मशीनें खरीदी गईं हैं तो कमाऊ पूत भी बनेंगी …

कुछ दिन पहले मैं अंबाला अपने एक मित्र के पास गया हुआ था – घर पर नहीं था, बीवी के साथ कहीं गया हुआ था उस का चेक-अप करवाने।
घर आया तो बताने लगा कि जिस जगह वह अपनी श्रीमति का चेकअप करवाने गया था, वहां बता रहा था कोई मशीन आई हुई थी। बता रहा था कि अस्पताल की डाक्टर कहने लगी थी कि यह एक टैस्ट हो रहा है—वैसे तो बाहर एक हज़ार का होता है लेकिन आज यह केवल एक सौ रूपये में होगा। आप दोनों ही यह टेस्ट करवा लें।

बता रहा था कि अब मैं क्या कहता? –सो, उस ने भी वह टैस्ट करवा लिया। टैस्ट का नाम उस ने बताया – बी.एम.डी –अर्थात् ऐसी मशीन जिस के द्वारा किसी की हड्डीयों की सेहत का पता चलता है— और मेरा मित्र एवं उन की अर्धांगिनी दोनों एकदम स्वस्थ —इसलिए मैंने उन की रिपोर्ट देखनी तक ज़रूरी नहीं समझी। वैसे वह बाद में बता रहा था कि दोनों का टैस्ट नार्मल आया है।

इस तरह के हड्डी की सेहत को जांचने के लिए कैंपों के बारे में मैं पहले भी सुन चुका हूं… हमारे शहर में भी कईं बार लग चुके हैं –
सेहत से संबंधित विषयों की जानकारी पाने के लिए एक अति विश्वसनीय साइट है – मैडलाइन प्लस। इस साइट पर इस टैस्ट से संबंधित जानकारी आप इस लिंक पर क्लिक कर के जान सकते हैं — Bone mineral density test.

इस के बारे में कोई विशेष चर्चा मैं इसलिए नहीं करना चाहता क्योंकि मैं अकसर सोचता हूं कि हमारे देश के लोगों को विशेषकर महिलाओं को इस टैस्ट से कहीं ज़्यादा अच्छा खाने की ज़रूरत है। काश, ये टैस्ट करवाने वाली महिलाएं 100 रूपये के गुड़-चने ही खा लें तो कुछ तो बात बन जाए।

बात केवल इतनी सी है कि क्या हमें किसी महिला को देख कर यह पता नहीं चलता कि वह कितनी कमज़ोर है, कितनी बलिष्ठ है, कितना परिश्रम करने वाली है….और भी सेहत से जुड़ी बहुत सी जानकारियां किसी को भी देखने से लग जाती हैं। ऐसे में कैंपों में सभी का टैस्ट करवाने का क्या औचित्य है, यह मेरी समझ से परे है।

चलिए किसी आर्थिक तौर पर कमज़ोर वर्ग से संबंधित महिला का आपने टैस्ट कर लिया — रिपोर्ट आ गई कि उस की हड्डीयां कमज़ोर हैं, तो आप उसे इस कमज़ोरी को दूर करने के लिए खाध्य पदार्थ भी मुहैया करवाएंगे? –नहीं ना, वह तो वही खाएगी जो वर्षों से खाती आ रही है … इस की बजाए कितना अच्छा हो कि उस के खाने पीने की आदतों के बारे में पूछ कर कुछ न कुछ उन में आवश्यक सुधारों की चर्चा कर लें ताकि कुछ तो कैल्शीयम जो वह ले रही है उस के शरीर में समा सके।

ऐसे ही अंधाधुंध टैस्ट किए जाने से भला क्या हासिल होने वाला है?— कमज़ोर हड्डीयां होती हैं – 65 के ऊपर की महिलाओं की और 70 के ऊपर के पुरूषों की – यह आंकड़ें हैं अमीर मुल्कों के, हमारे यहां के थोडा बहुत अलग हो सकते हैं – लेकिन यह तो तय है कि हरेक का यह टैस्ट करने की बजाए उम्र या अन्य कारणों से चुने गये लोगों का ही यह टैस्ट किया जाए। महिलाओं में रजोनिवृत्ति (menopause- जब मासिक धर्म आना बंद हो जाता है) …के बाद हड्डीयां कमजोर हो जाती हैं, जो लोग कुछ तरह की दवाईयां जैसे कि स्टीरायड एवं पेट की एसिडिटि कम करने वाली दवाईयां लेते हैं उन की भी हड्डीयां कमज़ोर होने का अंदेशा बना रहता है ….ऐसे लोगों का यह टैस्ट होना चाहिए या फिर उन लोगों का जिन्हें देख कर लगे कि इस की हड्डीयां कमज़ोर हो सकती हैं। इस से ज़्यादा क्या लिखूं—-बहुत कुछ तो केवल एक नज़र भर से ही पता चल जाता है। वो अलग बात है कि अब अगर इस तरह की महंगी मशीनें खरीदी गई हैं तो कमाऊ पूत तो इन्हें बनना ही पड़ेगा। है कि नहीं?
लेकिन एक बात तो यह है कि जिन महिलाओं का इस तरह का टैस्ट यह बता देता है कि उन की हड्डीयां कमज़ोर हैं तो उन में फिर उपर्युक्त दवाईयां देकर समस्या का हल खोजने का प्रयत्न किया जाता है।

जैसा कि आप ऊपर दिये गये लिंक पर जाकर देख सकते हैं कि इस के लिए कोई सूईं आदि से आप के रक्त का नमूना नहीं लिया जाता — सब कुछ नॉन-ईनवेसिव ही है…कोई सूईं नहीं, कोई चीरा नहीं।

अपने दोस्त की बात सुन कर ध्यान आ रहा था लगभग 15 वर्ष पहले चली खतरनाक पीलिया के टीके (हैपेटाइटिस बी इंजैक्शन) लगाने की मुहिम – गली गली, मोहल्ले मोहल्ले…टीमें आईं – 100-100 रूपये में, 150 रूपये में टीके लगे……लेकिन उस के बाद क्या आजकल के बच्चों-युवाओं को ये टीके नहीं लगने चाहिए। पर यह अभियान है क्या ? —- बस भारत में तो एक ही आंधी चलती है बस एक बार—चाहे वह कुछ भी हो। लेकिन स्वास्थ्य कार्यक्रमों में स्थिरता (sustainability) की बहुत ज़रूरत है।

और एक बात …इस गीत को कभी कभी सुनने की भी बहुत ज़रूरत है ….यह याद रखने के लिये कि राल-रोटी में भी कितनी ताकत है …

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ओव्हर-डॉयग्नोसिस से ओव्हर-ट्रीटमैंट का कुचक्र.. 2.

हां तो बात चल रही थी बिना वजह होने वाले सी.टी स्कैन एवं एम आर आई की .. यह सब जो हो रहा है हम पब्लिक को जागरूक कर के इसे केवल कुछ हद तक ही कम कर सकते हैं। मार्कीट शक्तियां कितनी प्रबल हैं यह आप मेरे से ज़्यादा अच्छी तरह से जानते हैं।

नितप्रतिदिन नये नये टैस्ट आ रहे हैं, महंगे से महंगे, फेशुनेबल से फेशुनेबल … अभी दो दिन पहले ही अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने एक थ्री-डी मैमोग्राफी को हरी झंडी दिखाई है। वैसे तो अब मैमोग्राफी की सिफारिशें भी संशोधित की जा रही हैं … वैसे भारत में तो यह समस्या (बार बार मैमोग्राफी करवाने वाली ) भारत में देखने को बहुत कम मिलती है … क्योंकि विभिन्न कारणों की वजह से यहां महिलायें ये टैस्ट करवा ही नहीं पातीं… और विशेषकर वह महिलायें जिन्हें इन की बहुत ज़्यादा ज़रूरत होती है….. इन दिनों विदेशों में इस टैस्ट के बारे में भी गर्म चर्चा हो रही है …और जिस उम्र में यह टैस्ट किया जाना शुरू किया जाना चाहिए अब उसे आगे बढ़ा दिया गया है …

भारत में तो महिलायें अगर वक्ष-स्थल के नियमित स्वतः निरीक्षण (regular self-examination of breasts) के लिये भी जागरूक हो जाएं तो बहुत बड़ी उपलब्धि होगी …ताकि समय रहते वे किसी भी गांठ को अपनी डाक्टर को दिखा कर शंका का निवारण कर सकें।

अब थोड़ी बात करते हैं ..पौरूष-ग्रंथी (prostate gland) के लिये किये जाने वाले टैस्टों के बारे में …एक उम्र के बाद पुरूषों के नियमित चैक-अप में प्रोस्टेट ग्लैंड की सेहत पता करने के लिये भी एक टैस्ट होता है .. Prostate specific antigen. यह एक तरह की रक्त की जांच है और इस की वेल्यू नार्मल से बढ़ी होने पर कईं बार अन्य टैस्टों को साथ रख कर देखते हुये प्रोस्टेट ग्रंथी के कैंसर से ग्रस्त होने की आशंका हो जाती है और पिछले कुछ महीनों में यह इसलिये चर्चा में है क्योंकि इस टैस्ट के अबनार्मल होने की वजह से प्रोस्टेट के इतने ज़्यादा आप्रेशन कर दिये गये और बहुत से लोगों को तो कैंसर का इलाज भी दे दिया गया  …लेकिन चिकित्सा वैज्ञानिकों ने बाद में यह निष्कर्ष निकाला कि केवल इस टैस्ट की वेल्यू बढ़ी होने से ही इस ग्रंथी के इलाज के बारे में कुछ भी निर्णय लेना उचित नहीं है। इसलिये अब प्रोस्टेट ग्लैंड की बीमारी जानने के लिेये दूसरे पैरामीटर्ज़ पर भी ज़ोरों-शोरों से काम चल रहा है।

अमेरिका में हर साल 10 लाख बच्चों के टोंसिल का आप्रेशन कर के उन के टौंसिल निकाल दिये जाते हैं…और इन की उम्र 15 वर्ष से कम की होती है…लेकिन अब ताज़ा-तरीन सिफारिश कह रही है कि नहीं, नहीं, मॉडरेट केसों के लिये यह टौंसिल निकालने का आप्रेशन बंद किया जाए ….

तो, ये तो थी केवल कुछ उदाहरणें … बातें केवल यही रेखांकित करती हैं कि हम लोग कभी भी शैल्फ-डॉयग्नोसिस के चक्कर में न ही पड़ें तो ठीक है, वरना तो रिस्क ही रिस्क है। और आप देखिये कि मैडीकल साईंस में रोज़ाना बदलाव हो रहे हैं…. विभिन्न तरह के टैस्टों की, दवाईयों की, आप्रेशनों की सिफारिशें नये शोध के मद्देनज़र अकसर बदलती रहती हैं, ऐसे में अगर कोई समझ ले कि नेट पर सेहत के बारे में दो बातें पढ़ कर वह स्वयं कोई टैस्ट करवा लेगा और स्वयं भी अपनी तकलीफ़ का निदान और शायद चिकित्सीय उपचार भी ढूंढ ही लेगा, तो ऐसा सोचना एकदम फ़िजूल की बात है…. इस जटिल शरीर-प्रणाली को समझते जब डाक्टरों की उम्र बीत जाती है तो फिर आम जन कहां ….!! लेकिन इस का मतलब यह भी नहीं कि सामान्य बीमारियों, जीवनशैली से संबंधित रोगों के बारे में अपना ज्ञान ही न बढ़ाया जाए …..यह बहुत ज़रूरी है, इस से हमें होलिस्टिक जीवनशैली (holistic lifestyle) अपनाने के बारे में सोचने का कम से कम अवसर तो मिलता ही है।
शेष …अगली पोस्ट में..

पिचयासी किलो है तो मशीन-वाली का क्या दोष ?

यह तस्वीर देख कर यही लगता है ना कि अगर वज़न बताने वाली मशीन वज़न एक आध-किलो ऊपर नीचे बता रही है तो मशीन वाली से तकरार होने लगी है — दो दिन पहले भी पिचयासी और आज भी उतना ही! तुम्हें पता है कि मैं पिछले तीन दिनों से कितना टहल रहा हूं। ठीक है, मुबारक है भाई तुम खूब टहले — लेकिन यह सब इस बेचारी से कहने से क्या फायदा? और इस ने तो सुबह की चाय भी नहीं पी है। इस से क्यों खाली-पीली कहा-सुनी करने का —-ठीक है, टहले हैं तो टहलते रहिये —आज नहीं तो कुछ दिनों में वज़न कम होने लगेगा। और हां, टहलने के साथ साथ अगर खाने पीने पर भी थोड़ा ध्यान दे दिया जाए तो कैसा रहेगा !!

कईं बार ऐसे ही टहलते टहलते कुछ ऐसा दिख जाता है कि उसे कैमरे में बंद करने की इच्छा होती है। पिछले महीने मैं एक कांफ्रैंस के सिलसिले में बाहर गया हुया था और समुद्र के किनारे पर सुबह सुबह मैंने यह तस्वीर खींची। दरअसल उन दो दिनों में मैं एक फोटोग्राफी वर्कशाप भी कर रहा था —मुझे कुछ खास समझ में आया नहीं, क्योंकि बहुत से लोग तो अपने साथ एसएलआर कैमरा लाये हुये थे और मेरे जैसे डिजीटल कैमरा वाले चंद ही लोग थे।

यह तस्वीर चैन्ने की मैरीना बीच पर पिछले महीने एक सुबह को खींची गई है। इस महिला को इतनी सुबह सुबह वज़न करने वाली मशीन रखे देख मेरी उत्सुकता बढ़ गई। मैं दूर बैठा देख रहा था —बहुत से लोग जो समुद्र के सुंदर किनारे पर टहलकदमी कर रहे थे वे इस महिला से वज़न भी करवा रहे थे। मैंने अपने पास बैठे एक स्थानीय सज्जन से जब पूछा तो उस ने बताया कि कुछ लोग तो सैर करने से पहले और सैर करने के बाद भी वज़न करवाते हैं——–मैं सोच रहा था कि शायद आज का वयस्त मानव वज़न कम करने का क्विक-फिक्स सोल्यूशन ढूंढ रहा है?

चलिये, जो भी है स्वास्थ्य जागरूकता देख कर अच्छा लगा–और उस से भी अच्छा यह लगा कि इस जागरूकता से एक महिला को एक अच्छा सा व्यवसाय मिला हुआ है।