टैलीग्राम…….टैलीग्राम……टैलीग्राम

बचपन में जैसे ही किसी के दरवाजे पर डाकिया दस्तक दे कर ये शब्द पुकारता था … तो जैसे की सारे परिवार की सिट्टी पिट्टी गुम हो जाया करती थी, सब से भयानक डर यही कि अब कौन सा सगा-संबंधी इस दुनिया से रूख्सत हो गया।  और होता भी अकसर यही था …मुझे याद है अपने कितने ही सगे-संबंधियों के कूच कर जाने की खबरें यही टैलीग्राम ही तो देती थी।

याद आता है उसे खोलने का वह समय ….उस कागज के फोल्ड खोलते खोलते हालत खराब हो जाया करती थी। मुझे अच्छे से याद है कि डाकिये की किताब पर साईन करने का भी सब्र नहीं होता था, उस से तुरंत पूछा जाता था — क्या है, किस के बारे में है…….लेिकन अगर बुरी खबर होती तो वह कभी कुछ अपनी जुबान से ना बोलता और चुपचाप खिसक लेता लेकिन अगर किसी की नौकरी लगने की या कोई और खुशी की बात होती… तो फिर बख्शीश लेकर ही हिलता था।

हम लोगों को याद है किस तरह से जब हम लोग मामा, चाचा बने तो टैलीग्राम ने हम तक ये संदेश पहुंचाए, किसी इंटरव्यू में बुलावा का संदेश भी यही लेकर आई, किसी संबंधी के वापिस अपने शहर पहुंचने पर आने वाला तार, किसी की शादी फिक्स होने का तार…………कैसे भुला पाएंगे …….और क्या हम लोगों की मनोस्थिति रहा करती थी उन क्षणों में …..यह सब ब्यां कर पाने में सक्षम होता तो अब तक ज्ञानपीठ पुरस्कार न पा लेता।

आज टैलीग्राम की बातें याद आ रही हैं क्योंकि यह दो दिन में बंद हो जाएंगी।

देखिए मैंने वेलापंथी करनी शुरू की तो दूसरी ही पोस्ट तार पर आ गई …….और आज से तेरह चोदह वर्ष पहले जब मैंने हिंदी में लेखन पर हाथ आजमाना शुरू किया था तो भी मैंने पहला लेख डाकिया डाक लाया नाम के शीर्षक से ही लिखा था, जो केंद्रीय हिंदी निदेशालय, भारत सरकार को भा गया, पता नहीं उन्हें उस में क्या अच्छा लगा, लेकिन उन्होंने मुझे दस दिन के नवलेखक शिविर में जोरहाट बुला लिया ……..बस वहां जा कर बात पल्ले पड़ गई कि लिखना विखना कुछ भी नहीं है, बस अपनी बात को कागज पर टिका कर छुट्टी करो……….बहुत बहुत महान लेखक उन्होंने आमंत्रित किये हुये थे, इसलिए बहुत कुछ सीखा, समझा और फिर लेखन में उतारने की कोशिश तो की, लेकिन नहीं कर पाया, बस हमेशा वही लिखा जो मन किया।

टैलीग्राम की तो बहुत सी बातें करेंगे हम मिल कर अगले दो तीन दिनों में ………लेकिन फिर डाकिये का ध्यान आ गया ……सैंकड़ों या हज़ारों में एक उस डाकिये के बारे में इस समय मत सोचिए जो डाक को नाली में फैंक देता है, फिर अखबार वाले वहां की फोटू छापते हैं, आप तो बस इस समय इस डाकिये की सुनिए…………और खो जाइए अतीत के झरोखों में …………………

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वेलापंथी आखिर क्यों ?

पिछले सात वर्षों से ब्लागिंग कर रहा हूं ..लेकिन विषय आधारित ब्लॉग में लिख लिख कर ऊब सी होने लगी थी…हर समय मास्टरों जैसी फीलिंग जैसे कि आपने सारे संसार को प्रवचन देने का ठेका ले रखा है।

कुछ दिन पहले मैं रेडियो सुन रहा था… एफएम सुनना मुझे बहुत अच्छा लगता है… वहां से यह शब्द कान में पड़ गया …वेलापंथी … बस, मन को भा गया। उसी समय सोच लिया कि यार हम भी कुछ तो वेलापंथी करेंगे। बस वही वेलापंथी करने पहुंच गया हूं।

ब्लॉग की दुकान पर तो मैंने छः सात ब्लॉग तो सजाए ही होंगे …लेकिन हर ब्लॉग में लिखने के लिए पहले सोचना पड़ता था…..सोचना भी ऐसा कि यह हैल्थ से संबंधित ब्लाग है  तो इस में सभी सीरियस बातें ही होनी चाहिएं…यह हैल्थ टिप्स के बारे में है तो यहां बस वही माल डाला जायेगा। एक ब्लॉग है जिसे में केवल अपने लिए लिखता हूं … जिसे मैं अपनी स्लेट कहता हूं… एक है डाक्टर की डायरी ..एक है जिस का नाम है…हां, मुझे भी शिकायत है, एक रेडियो से जुड़ी यादों के बारे में है ………..फिर फ्लिकर है, स्लाईड-शेयर, ट्िवटर, पिनट्रस्ट, इंस्टाग्राम ………यू-ट्यूब चैनल, सेहतनामा है, मीडिया डाक्टर है और इंगलिश में हेल्थ बाबा भी है……..लेकिन इतना सब कुछ करने के बाद भी वेलापंथी की ज़रूरत महसूस हो रही थी।

हर इंसान की तरह मुझे भी अपने मन की बात कहने से सुकून मिलता है और हर किसी को अपनी बात को अपनी बात कहनी चाहिए, इस का मैं पक्का पक्षधर हूं। और अगर कोई अपनी बात कह रहा था तो कोई बुद्दिजीवि टाइप का बाशिंदा उस रंग में भंग डालने आ जाए तो मज़ा नहीं आता………..यह बर्दाश्त सा नहीं होता, होगा यार तूं सिकंदर ……..लेकिन लेखन में प्रवचनबाजी नहीं चाहिए। सोच सोच कर डर डर कर लिखा तो क्या लिखा, अगर इसी तरह का लेखन ही करना है तो किसी भी चैनल में ही  घुसे रहने में क्या बुराई है।

फेसबुक के कुछ फोरमों पर कुछ मजा नहीं आ रहा था, अब मन की बात लिख नहीं पा रहा था, अगर कभी लिख भी देता तो उसे पब्लिश करने से पहले ही मिटा देता, वरना पब्लिश होने के चंद मिनटों में पोंछ देता………यह तो कोई बात न हुई……..बहरहाल, जो भी हो अपने मन की मन में ही रह रही थी, ऐसा लग रहा था बहुत समय से…. और हम ठहरे फ्री-स्पीच के कट्टर समर्थक, ऐसे में अपने आप से ही पूछने लगा था कि अगर लिख कर भी मन हल्का न हुआ तो फिर यह सब ढोंग क्यों, बस इसी उधेड़बुन में यह वेलापंथी ब्लॉग आप तक पहुंच गया……..इस के माध्यम से आप सब से खूब बातें होंगी जो कि मैं अपने हैल्थ ब्लॉग्स पर या इंगलिश के हेल्थबाबा ब्लॉग पर डालने में असहज अनुभव करता था।

चलिए फिर थोड़ी वेलापंथी हो जाए……………मुझे अभी अभी पता चला है कि प्राण साहब नहीं रहे, और बचपन में मैं उन के जिस गीत को आल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस पर सुन सुन कर बड़ा हुआ……चलिए उसे सुनते हैं………..फिल्म भी बहुत बढ़िया थी…..धर्मा…………….