विक्की स्पर्म डोनर ने अवेयरनैस तो बढ़ा दी लेकिन….

दो दिन पहले विक्की डोनर देखी… अच्छी फिल्म है, सब कलाकारों ने अपने अपने किरदार से पूरा इंसाफ किया है। सब से बढ़िया बात यह लगी कि आम दर्शक के मन में जो स्पर्म डोनर के बारे में भ्रांतियां रही होंगी …सैंपल देने के बारे में, टैस्ट-ट्यूब बेबी के बारे में, या बहुत से अन्य अहम् मुद्दे उन का निवारण हंसी हंसी में ही कर दिया गया।

जब हम लोग यह सिनेमा देख रहे थे तो पिछली सीटों पर बैठे कुछ युवकों का वार्तालाप सुनाई दे रहा था, उन में से एक अपने साथियों से कह रहा था ….यार, यही काम न कर लें? ..और उस के बाद उन के ठहाके। उन युवाओं का यह हंसी-मज़ाक उस समय कान में पड़ा जिस समय फिल्म में विक्की डोनर स्पर्म-डोनेशन से मिलने वाले पैसे को अपनी ऐशपरस्ती पर लुटा रहा था।

कल की टाइम्स ऑफ इंडिया में यह न्यूज-रिपोर्ट दिखी कि बॉलीवुड की एक दो फ़िल्में इस टापिक पर आने से स्पर्म-डोनरो का जैसे सैलाब सा आ गया है। एक और फिल्म के बारे में लिखा है ..रोड-ट्रिप जिस में युवा घूमने-फिरने पर जाने के खर्च का जुगाड़ करने के लिये स्पर्म-बैंक में जाते हैं।

मुद्दे इस स्पर्म डोनेशन से जुड़े बहुत से हैं, सब से पहले तो आप इस फिल्म को देखिए अगर पहले नहीं देखी तो भी।

टाइम्स वाली खबर में लिखा है इन फिल्मों के बाद तो लड़कों के, बुज़ुर्गों के फोन भी आने लगे हैं जो अपना वीर्य-दान करना चाहते हैं। लेकिन इन का क्राईटिरिया है कि 21-45 वर्ष के आयुवर्ग के लोग ही यह दान कर सकते हैं। और इन्होंने इस रिपोर्ट में इंडियन काउंसिल ऑफ मैडीकल रिसर्च के कुछ दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया है।

जिस तरह से हर शहर में ये आर्टीफिशियल कंसैप्शन के क्लीनिक खुल गये हैं, लगभग हर स्त्री रोग विशेषज्ञ अपने आप को इंफर्टिलिटि विशेषज्ञ लिखने लगी है, क्या आप को लगता है कि इतनी जबरदस्त हड़बड़ाहट में सभी दिशा निर्देश पालन किये जाते होंगे।

मुझे ऐसा इस लिये लगता है कि मैंने चार पांच दिन पहले एक न्यूज़-यार्क टाइम्स में रिपोर्ट देखी थी कि वहां पर इस तरह के डोनर स्पर्म से पैदा होने वाले बच्चों में कुछ जैनेटिक बीमारियां सामने आने लगी हैं, यह रिपोर्ट बहुत ही अच्छे ढंग से लिखी गई है …लगभग हरेक मुद्दे को छूने की कोशिश की गई है इसमें ….है तो इंगलिश में और यह रहा इस का लिंक ……In Choosing a sperm donor, a Roll of the Genetic Dice. —– a great coverage of the issues concerning donar babies.

रिपोर्ट से यह जानकर हैरानगी हुई कि अमेरिका में हर वर्ष लगभग 10 लाख बच्चे कृत्रिम इन्सैमीनेशन के द्वारा पैदा हो रहे हैं ….और बहुत बड़ा मुद्दा वहां यह बना हुआ है कि अकसर डोनर स्पर्म की जैनेटिक टैस्टिंग ढंग से होती नहीं …. इसलिए कुछ खतरनाक किस्म की बीमारीयां इस स्पर्म से पैदा होने वाले बच्चों में देखी जाने लगी हैं। बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है यह ….इतना हल्का फुल्का भी नहीं जितना विक्की डोनर के डा चड्ढा (अन्नू कपूर) ने इसे पेश करने की कोशिश है।

अगर अमेरिका जैसे देश में इस तरह के जैनेटिक टैस्टिंग के इतने बड़े मुद्दे हैं तो फिर हम कैसे यह उम्मीद कर लें कि अपने यहां सब कुछ परफैक्ट तरीके से हो रहा होगा…. जैनेटिक टैस्टिंग एक बहुत मुद्दा है जिस के बारे में जितनी जागरूकता बढ़ाई जाए कम है।

मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया वाली रिपोर्ट में यह देखा कि विदेशों से भी लोग इस काम के लिये ..भारतीय स्पर्म की खोज में … और फिर यहीं पर यह प्रोसिज़र करवाने के लिये आते हैं …..इस के बारे में आप का क्या ख्याल है? …..वे तो आते हैं सस्ते के चक्कर में लेकिन …………….क्या कहें यार, थोड़ा चुप रहने की भी आदत डाल लेनी चाहिए। कुछ तो पाठकों को भी सोचने का अवसर दिया जाना चाहिए।

Advertisements

घर में स्वयं ही वीर्य जांच करने वाली किट

पहले के ज़माने में शादी के कुछ वर्ष बाद तक अकसर नये कैलेंडर हर साल छापने की प्रक्रिया चालू रहती थी…. इतने वर्षों बाद भी इतने सारे कैलेंडर छापने की प्रवृति में चाहे बदलाव आया हो, लेकिन अगर पहला कैलेंडर शादी के एक वर्ष बाद तक छप नहीं पाया तो दुल्हन की शामत हो जाती है। इस देश में लोग (ज़्यादातर महिलायें) पूछ पूछ कर उसे परेशान कर देती हैं।
और अगर यह छपाई का काम अगर टल गया शादी के दो साल तक …तो समझो हो गई आफ़त……बस, इस के आगे तो फिर छींटाकशी। हिंदोस्तानी मानसिकता —अगर बच्चा नहीं हो रहा तो मतलब औरत में ही कोई डिफेक्ट है….और पुरूष के वीर्य (सिमन, semen) की जांच किए बिना उस की बीवी को बांझ (infertile) होने तक का खिताब दे दिया जाता है।
लेकिन पुरूष प्रधान समाज में पुरूष तो ठहरा सुप्रीमो—-अगर उस का मन अपना वीर्य टैस्ट करवाने का नहीं हो रहा तो बस ठीक है। अगर उसे किसी लैब में जाकर अपने वीर्य का सैंपल देने में झिझक महसूस होती है, तो भी कोई बात नहीं, ऐसा ही समझा जाता है….और गर्भ धारण न होने का दोष सारे का सारा पुरूष की टैस्टिंग किये बिना महिला के ऊपर जड़ दिया जाता है।


इसलिए इन परिस्थितियों के मद्देनज़र मैं जब कल हैल्थ-न्यूज़ रिव्यू साईट बहुत दिनों बाद देख रहा था तो मुझे यह न्यूज़-रिपोर्ट दिख गई ...Men’s fertility test available for home…. और इस कवरेज को पांच सितारे मिले होने के कारण इस में उत्सुकता जागनी स्वभाविक ही थी।
बहुत अच्छी खबर है कि पुरूषों के लिये घर में ही अपना वीर्य चैक करने की किट आ गई है जो कि तुरंत बता देगी कि पुरूष में शुक्राणुओं की गिनती सामान्य है या कम है। इस टैस्ट से लोगों की मानसिकता बदलनी तय है।
जैसा कि अधिकांश प्रांतीय भाषाओं की अखबारों में होता है….अकसर खबर को यही छोड़ दिया जाता। और ध्यान से पढ़ने वाले को यही लगता कि यह खबर थी या किसी कंपनी का विज्ञापन….जिस में किस प्रोड्क्ट की खूबियां ही गिनाई गई हैं। लेकिन शिकागो-ट्रिब्यून ने इस खबर को यहीं पर नहीं छोड़ा, उस ने पाठकों को इस टैस्ट के विभिन्न पहलुओं से भी रू-ब-रू करवा दिया…. No wonder it is a 5-Star Story !
इस टैस्ट के सामान्य आने का यह मतलब नहीं कि गर्भधारण कर पाने के इश्यू पर पुरूष को क्लीन चिट मिल गई ….नहीं, ऐसा नहीं है। यह टैस्ट केवल एक शुरूआत है ….क्योंकि ऐसा भी हो सकता है कि टैस्ट की रिपोर्ट सामान्य आने के बावजूद भी पुरूष के शुक्राणु गर्भ धारण न कर पा रहे हों…..इस का कारण यही है कि यह टैस्ट केवल और केवल शुक्राणुओं (sperms) की गिनती देखता है, यह उन की अन्य विशेषताएं जैसे की उन की बनावट(morphology) , उन की गतिशीलता (motility) आदि की जांच नहीं कर सकता, यह जांच केवल लैब में ही हो सकती है।
ऐसे में यह विचार भी आ सकता है कि जब इस टैस्ट में सटीकता ही नहीं …जब इस ने कुछ भी पक्के तौर पर बताना ही नहीं तो फिर इसे करवाने का क्या फ़ायदा। नहीं, ऐसा नहीं है…अगर विकसित देशों में पुरूष लैब में जाकर अपनी इस तरह की जांच करवाने में झिझकते हैं तो अपने यहां कि स्थिति आप भली भांति समझ सकते हैं…..यहां तो केवल झिझक ही नहीं, कईं प्रकार के सामाजिक मुद्दे इस के साथ खड़े हो जाते हैं।
इस रिपोर्ट में घर में स्वयं ही किये जाने वाले इस टैस्ट की कीमत 40 यू-एस डालर लिखी गई है, जब कि किसी डाक्टर के पास जाकर इस टैस्ट को करवाने की कीमत 100 यू-एस डालर बताई गई है।
अभी पता नहीं कि यह टैस्ट भारत में कितने रूपये में उपलब्ध रहेगा, लेकिन लैब में जाकर करवाने वाला वीर्य-टैस्ट तो दो-तीन सौ रूपये में हो ही जाता है। चलिए, घर में ही किये जाने वाले इस वीर्य टैस्ट की कीमत तो एक अलग मुद्दा है, लेकिन एक बात तो है कि इस टैस्ट के आने से कम से कम लोगों में इसे स्वेच्छा से कर पाने की एक इच्छा तो जगेगी और बच्चा न हो पाने का सारा दंश महिला को ही सहने से मुक्ति मिलेगी।
इस रिपोर्ट में अमेरिका के आंकड़े दिये गये हैं कि वहां पर लगभग 15 प्रतिशत ऐसे दंपति हैं जो गर्भधारण करने में विफल हो रहे हैं .. और 50 प्रतिशत केसों में पुरूषों में कमी (male infertility) इस का कारण है। केवल पुरूषों का बांझपन (?— Male infertility) 30 प्रतिशत केसों में जिम्मेदार होता है और 20 प्रतिशत केसों में पुरूष-एवं महिला से जुड़े कारण मिल कर इस “बांझपन” का कारण होते हैं।
ठीक है टैस्ट आ गया है, लेकिन इस के परिणाम को ध्यान से देखा जाना चाहिए ….सामान्य टैस्ट का यह मतलब नहीं कि केवल शुक्राणुओं की गिनती ही काफ़ी है, अगर चिकित्सक चाहे तो वह आगे भी कईं टैस्ट करवा सकता है…शुक्राणुओं की गुणवत्ता देखने के लिए ….लेकिन एक बात तो तय है कि यह टैस्ट उन पुरूषो का काम आसान कर देगा जो झिझक-विझक की वजह से या ऐसे ही दूसरे बहानों की आड़ में यह टैस्ट करवाने नहीं जाते, क्योंकि निगेटिव टैस्ट आने से बात को आगे बढ़ाने का एक अवसर तो मिलेगा…….किसी प्रशिक्षित सर्जन से अथवा अन्य किसी विशेषज्ञ से मिल कर समाधान ढूंढा तो जा ही सकता है ……। लेकिन यह समाधान उन चोर-उचक्को-ठगों-नीम-हकीमों के पास बिल्कुल भी नहीं होता जो बड़ी बड़ी दुकाने सजा कर बैठे हैं कि हम पतले वीर्य को गाड़ा कर देंगे, शुक्राणुओं की गिनती बढ़ा देंगे, शीघ्र-पतन को खत्म कर देंगे, वीर्य की मात्रा बढ़ा देंगे …………..नहीं, ये लालची शख्स पहले ही से परेशान भोली भाली जनता को चू…या बनाने के सिवा कुछ भी तो नहीं कर सकते।

मैं जब भी इन ठगों की बात करता हूं तो मेरा सिर भारी हो जाती है, इसे ठीक करने के लिये मुझे वह कैलेंडर वाला गीत तो सुनना ही होगा…..

क्या 50 वर्षों में पुरूषों की पौरूषता लुप्त हो जायेगी?

केबल पर एक डरावना का प्रोग्राम आता है ना …..चैन से जीना हो तो जाग जाईए…. बड़ा सनसनीखेज़ लगता है वह प्रोग्राम …. और उसे पेश करने वाला का अंदाज़ भी लगभग डराने वाला…आज का मीडिया जब इतने कंपीटीशन के दौर से गुज़र रहा है तो सनसनी नहीं फैलाई जाएगी तो खबरें बिकेंगी कैसे। इलैक्ट्रोनिक मीडिया में तो ऐसा सब कुछ तिल को ताड़ कर के दिखाने वाली बातें के हम अभयस्त से ही हो चुके हैं….और हिंदी एवं आंचलिक भाषाओं में भी कुछ खबरों को सनसनी तरीके से पेश करना एक आम सी बात हो चुकी है।
आज जब मैंने अंग्रेज़ी के अच्छे-खासे सम्मानित पेपर के फ्रंट पेज पर एक न्यूज़ स्टोरी के अंदर यह पढ़ा कि आने वाले 40-50 वर्षों में हो सकता है भारत के सब “मर्द” खस्सी हो जाएं….. मुझे नहीं पता आप इस शब्द खस्सी को समझते हैं कि नहीं… लेकिन हम पंजाबी भाषी इस शब्द का प्रयोग मज़ाक मज़ाक में यदा कदा करते रहते हैं। सीधे सादे शब्दों में कहें तो पुरूष लोग अपनी प्रजननता क्षमता ही अगले चालीस-पचास वर्षों मे खो देंगे…लेकिन ऐसा आखिर क्यों ? यह समझने के लिए इस अंग्रेज़ी पेपर के पहले पन्ने पर प्रकाशिक ख़बर का रूख करना होगा।
हां, तो खबर का शीर्षक ही कुछ ऐसा था … Sperm Counts drop by the year globally. और इसके ऊपर एक  लाल रंग की पट्टी में यह हैडिंग – Worrying Highs, Depressing Lows as Health Crisis Looms.
वापिस उसी शुक्राणुओं के नंबर में लगातार गिरावट आने वाली खबर फिर से देखते हैं …. उस खबर में लिखा है कि लगातार बढ़ रहे तनाव, मोटापा, और प्रदूषण की वजह से वीर्य (स्पर्म)  में मौजूद शुक्राणुओं की संख्या में निरंतर गिरावट दर्ज की जा रही है….एक अनुमान के अनुसार पिछले 50 वर्षों में शुक्राणुओं की गिनती में 50 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है।
असिस्टैड रिप्रोडक्टिव तकनीक (Assisted Reproductive Technique) …अर्थात् यह जो आई.व्ही.एफ (IVF…in-vitro fertilization ) ..टैस्ट ट्यूब आदि के द्वारा बच्चे के जन्म के जो मुद्दे हैं, ऐसा कहा जा रहा है कि इन तकनीकों के लिये भारतीय दिशा-निर्देश लगभग तैयार हो चुके हैं (जो शीघ्र ही कानून का रूप ले लेंगे)…इन नियमों को तैयार करने वाले चिकित्सक के अनुसार पश्चिमी देशों में वीर्य में शुक्राणुओं की गिनती में कमी नब्बे के दशक के मध्य से हो रही है।
  और इस चिकित्सक का कहना है कि भारत में भी कुछ डाक्टर ऐसा मानते हैं कि यहां पर भी इन शुक्राणुओं में कमी आ रही है…पश्चिमी देशों में किये गये अध्ययन बताते हैं कि प्रत्येक वर्ष शुक्राणुओं की गिनती में दो प्रतिशत की कमी हो रही है और उस रेट से तो अगले 40-50 वर्षों में कोई भी प्रजनन-योग्य पुरूष (fertile man) रहेगा ही नहीं।
कुछ वर्ष पहले भी स्कॉटलैंड में 7500 पुरूषों पर किये गये अध्ययन से पता चला था कि औसत स्पर्म काउंट में 30 प्रतिशत की गिरावट आई है। ये पुरुष 1989 से 2002 तक एक फर्टिलिटी सैंटर में इलाज के लिये आ रहे थे। कोपनहैगन में हुये एक अध्ययन से पता चला कि शराब, धूम्रपान एवं मोटापे के अलावा कुछ एंडोक्राइन अवरोधक (endocrine disrupters) भी हैं जो इस के लिये जिम्मेदार हैं— दैनिक दिनचर्या में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक की बाल्टियां (या दूध की बोतलें) कुछ ऐसे रसायन छोड़ती हैं जो महिला हारमोन, इस्ट्रोजन से मिलते जुलते होते हैं। इस हारमोन की वजह से भी वीर्य में शुक्राणुओं की कमी हो रही होगी, डीडीटी एवं डाईओक्सिन्ज़ (DDT and dioxins) जैसे कीटनाशकों को भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।
मीडिया डाक्टर –— यह तो थी इंगलिश पेपर में आने वाली खबर की बात, अब मैं अपनी बात कहता हूं। वैसे आप अपने इर्द-गिर्द ध्यान करें, गाड़ीयों, बसों, फुटपाथों पर नज़र दौड़ा कर, जनसंख्या के विस्फोट को देख कर क्या कभी कल्पना कर सकते हैं कि पुरूष का पौरूष अब समाप्त होने की कगार पर है। इसलिए इतना डरने की भी बात नहीं है।
एक अच्छे-खासे इंगलिश के फ्रंट-पेज पर ऐसी खबर देख कर ऐसा लगा कि यह भी एक सनसनी ही फैला दी गई है। जो कुछ अखबार में लिखा होता है लोग अकसर उसे सच मान लेते हैं। लेकिन तथ्यों को सही तरीके स पेश नहीं किया जाता तो अकसर बात का बतंगड बनते देर नहीं लगती।
इस न्यूज़-रिपोर्ट के बारे में मेरे मन में कुछ प्रश्न उठ रहे हैं …..यह खबर तो आज सुबह इतनी अचानक मिली जैसे कि कोई सुनामी आ गई हो… पिछले कईं सालों से शुक्राणु कम हो रहे हैं, हर साल 2 प्रतिशत कम हो रहे हैं और अगले 40-50 वर्षो  में सारे पुरूष अपना पौरूष (fertility) खो देंगे, ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला। ऐसा नहीं होता कि अचानक एक दिन सुबह आप अखबार में पढ़ लें कि प्रलय हो जायेगी तो बस यही समझ लें कि अब तो तहस-नहस होनी तय ही है।
एक प्रश्न और है कितने पुरूष ऐसे हैं जिन्होंने कभी अपने वीर्य की जांच करवाई होगी, शायद जिन्हें किसी कारण वजह से किसी डाक्टर ने ही यह जांच करवाने को कहा होगा, वे ही यह जांच करवाते हैं। ऐसे में इन अध्ययनों में ऐसा कौन सी सैंपल पापुलेशन ली गई कि इतना ठोंक-पीट पर यह पोरूषता खत्म होने वाली बात कही जा रही है।
व्यक्तिगत रूप से मुझे इस में कंफ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट लगता है … कहीं ऐसा तो नहीं कि अब चूंकि ये कृत्तिम तरीके प्रोमोट किये जाने हैं ….लोगों को पहले ही से फीड कर दो …ताकि वे अपने आप ही शादी के कुछ समय बाद जब मां-बाप न बन पाएं तो अफरातफरी में अपने वीर्य को टैस्ट करवा के, बिना प्रकृति को कोई अवसर दिये बिना, कृत्ति उपायों की तरफ़ लपक पड़ें …….यह भी एक बहुत बड़ी मार्कीट बन चुकी है।
तो फिर क्या इस खबर में सारी बातें ही बेबुनियाद हैं…..नहीं, मैंने ऐसा तो नहीं कहा। सच है कि तरह तरह के नशे की लत की वजह से, लगातार बढ़ता मानसिक तनाव की वजह से, कैमीकल्स के अंधाधुंध इस्तेमाल की वजह से शुक्राणुओं में थोडी बहुत गिरावट आई होगी..(कोई भारतीय अध्ययन हों तो पुष्टि हो…), और इन शुक्राणुओं की गुणवत्ता पर भी बट्टा लगा होगा, लेकिन स्थिति इतनी भयावह भी नहीं है। इसलिए एक बार फिर से पुराना पाठ ध्यान रखें ……….नशों से दूर रहें,  सात्विक भोजन लें और किसी आध्यात्मिक लहर के साथ बहें …… लेकिन एक बार विशेष तौर पर नोट करें कि विशेषकर वे पुरूष जिन्होंने अभी पापा बनना है या अभी अपने परिवार को और भी आगे बढ़ाना है तो वे कृपया लैपटाप जैसे यंत्रों को अपनी गोदी में न ऱखा करें ….इस से होने वाली गर्मी scrotal health के लिये ठीक नहीं है ….ज़ाहिर सी बात है ऐसे में शुक्राणुओं के काउंट (गिनती) एवं गुणवता पर बुरा असर पड़ना स्वाभाविक है ……यह मेरी थ्योरी नहीं है, रिसर्च ने बताया है दोस्तो।

Related – यह लेख लिखने के बाद जब मैं इस आनलाईन स्टोरी को पढ़ रहा था तो मुझे विक्की डोनर का ध्यान तो आया ही और साथ ही साथ उस हीरो नं 1 अन्नू कूपर की विक्की डोनर के प्रोमो में सुनी विशुद्ध पंजाबी गालियों का भी एकदम चेता आ गया।

No fertile men in 50years as sperm counts slide?