डांट डपट से बिस्तर गीला होना बंद नहीं होगा

अभी अभी दा हिंदु उठाई तो पहले ही पन्ने पर यह खबर देख कर चिंता हुई कि एक पांचवी कक्षा की बच्ची ने बिस्तर पर पेशाब निकल जाने पर उसे हास्टल की वार्डन द्वारा उसी का पेशाब पीने की सजा दी गई। बात यह यह विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन की … बच्ची की मां ने शिकायत की है कि उसे इस बात की सूचना बेटी ने फोन पर दी।

अगर खबर के परिणाम देखें तो बड़ी खौफ़नाक दिखती है …एक ऐसा मुद्दा जिसे पारिवारिक स्तर पर ही कितनी सेंसिटिविटि –संवेदनशीलता से हैंडल किए जाने की ज़रूरत होती है, उसे हास्टल में रह रही पांचवी कक्षा की बच्ची के बिस्तर गीले करने पर इतनी कठोरता से काबू करने की कोशिश की गई…बहुत बुरा लगा यह देख कर।

वैसे देखा जाए तो काबू करने वाली बात थी ही क्या इसमें ….कौन है जो बचपन में बचपन में कभी कभी बिस्तर गीला नहीं करता। मैंने भी किया और आगे मेरे बच्चों ने भी किया — लेकिन इस बात की दाद देनी पडेगी कि उस ज़माने में भी हमारे मां-बाप ने कभी इस का ज़िक्र तक नहीं किया …और वही हम लोगों ने पेरेन्ट्स बन कर अपने बच्चों के साथ किया।

बैड-वैट्टिंग (bed-wetting) एक ऐसा मुद्दा है जो किसी भी बच्चे के आत्म-विश्वास के साथ जुड़ा हुआ है – वह बिस्तर गीला कर के बेचारा अपने आप में ही थोड़ा-बहुत परेशान तो ही जाता है लेकिन मां-बाप या होस्टल के वार्डन आदि की डांट-डपट या कईं बार पिटाई …इस आग में घी डालने का काम करती है। है कि नहीं?

चक्कर यही कि वह बच्चा या बच्ची एक भयंकर अपराधबोध (guilty feeling) का शिकार हो जाते हैं … आप आप में ही सिमट कर रह जाते हैं ….और अगर इस को संवेदनशील ढंग से हैंडल न किया जाए तो पढ़ाई में भी इस का असर तो पड़ता ही है, बच्चे मानसिक तौर पर भी यंत्रणा सहने को मजबूर हो जाते हैं।

जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि घर में अगर बच्चे के साथ ऐसा होता है और मां-बाप इससे मैच्यूरिटि के साथ निपट नहीं पाते तो इस के परिणाम ठीक नहीं निकलते …लेकिन अगर होस्टल में यह बात हो रही है… तो आप अंदाज़ा लगा सकतेअ हैं कि ये बच्चे के मन को किस तरह से उद्वेलित करती होगी!

समझ में नहीं आता – आखिर आफ़त है क्या — बिस्तर ही गीला हुआ है ना ….धो लो उसे यार…. लेकिन गलत हैंडलिंग की वजह से बच्चे के मन पर जो इस तरह के इश्यू अमिट छाप छोड़ जाते हैं उसे वर्षों बाद भी कैसे धो पाएंगे।

बच्चे ने बिस्तर गीला किया है तो यह घर में या होस्टल में एक पालिसी होनी चाहिए कि कोई भी इस के बारे में चर्चा नहीं करेगा….. इसे मुद्दा बनाने की कोई बात ही नहीं है। अगर बच्चा स्वयं इस के बारे में अपनी मां से या पिता से ज़िक्र करे तो इसे बेहद सहजता से लें और हल्केपन में यह कह कर आश्वस्त कर दें कि कोई बात नहीं, होता है कभी कभी यह ….अपने आप ठीक हो जायेगा।

इस तकलीफ़ में बच्चे के साथ सहानुभूति पूर्वक पेश आना सब से बेहद ज़रूरी है —एक बार भी आपने भूल से भी उसे झिड़क दिया … दूसरों के सामने यह बात कर के उस का मज़ाक उड़ा दिया तो समझो आपने तिल का ताड़ बना दिया।

हां, अगर आप को लगे कि यह निरंतर हो रहा है तो पहले उसे यह सलाह दें कि रात में सोने से तुरंत पहले पानी न पिया करे, और पेशाब कर के सोया करे। कुछ दिन –कुछ हफ्ते — देखते रहें — कोई जल्दी नहीं ….यह किसी बीमारी-वीमारी की वजह से अकसर नहीं होता ….वैसे अगर आप को लगे कि कुछ ज्यादा ही हो रहा है तो किसी भी शिशु-रोग विशेषज्ञ से संपर्क कर लें ….इस को कंट्रोल करने के लिए एक टेबलेट भी आती है जिसे वह बच्चे को कुछ दिनों पर लेने की सलाह दे देगा।

लेकिन बात वही है कि इन केसों में सहानुभूति से बढ़ कर कोई दवाई है ही नहीं …. अपने आप यह समस्या ठीक हो जाती है।

ऐसे मुद्दे मुख्य अखबारों के शीर्ष पन्नों पर उठने चाहिए .. इस से लोगों में जागृति उत्पन्न होती है —आज जब मैं इस खबर को पढ़ रहा था तो यही सोच रहा था कि अगर शांतिनिकेतन जैसी जगह में यह सब हुआ तो देश के लाखों-करोड़ों होस्टलों के बच्चों पर क्या गुज़र रही होगी, यह कभी कोई मीडिया कवर नहीं कर पाता।

यह मुद्दा इतना गर्मा गया कि नेशनल कमीशन फॉर प्रोटैक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (NCPCR)  को इस में कूदना पडा –उन्होंने मीडिया को यह कह कर बहुत सही किया कि आप एक तो बच्चे का नाम नहीं छापें और दूसरा उस की फोटो को पूरी तरह से धुंधली कर के दिखाएं —-ताकि किसी भी प्रकार से बच्चे की पहचान न हो सके।

सोच रहा था कि आजकल NCPCR का काम भी बहुत बढ़ गया है …अभी रोहतक के अपना घर में बच्चों के साथ हो रहे कु-कृत्यों पर से पूरी तरह से पर्दा हटा नहीं है कि इस तरह के मुद्दों में भी उस के हस्तक्षेप की ज़रूरत आ पड़ी।

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पंजाब के स्कूली बच्चों का इलाज बिल्कुल मुफ्त

पंजाब सरकार की तरफ़ से छपा विज्ञापन

आज सुबह कहीं बैठे हुए जब पंजाब केसरी अखबार के पन्ने पलट रहा था तो एक सरकारी विज्ञापन पर नज़र रूक गई। यह अलग सा विज्ञापन लगा –स्कूली बच्चों के मुफ्त इलाज के बारे में पंजाब सरकार द्वारा यह विज्ञापन जारी किया गया था।

इस विज्ञापन में बताया गया था कि पंजाब के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के बच्चे हृदय-रोग, कैंसर, थैलेसीमिया जैसे रोगों के लिए मुफ्त इलाज पा सकेंगे। खबर पढ़ कर बहुत अच्छा लगा।

सुबह उस विज्ञापन के नीचे लिखे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की तरफ़ मेरा ध्यान नहीं गया, मैंने यही सोचा कि यह पंजाब सरकार की अनूठी पहल है। लेकिन जब शाम को मैं गूगल अंकल से इस तरह की स्कीम के बारे में पूछ रहा था तो पता चला कि स्कूली बच्चों के इस तरह के इलाज के लिए यह स्कीम नेशनल रूरल हैल्थ मिशन के अंतर्गत अन्य कईं राज्यों में भी चलाई जा रही है।

मुझे इस स्कीम के बारे में जान कर बहुत अच्छा लगा …इस तरह की बीमारियों का इलाज अच्छा खासा महंगा होता है और सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे अकसर जिस आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हैं उन के अभिभावकों के लिए अपने बलबूते इन के इस तरह के इलाज की व्यवस्था कर पाना कहां संभव होता है।

लेकिन अब इस तरह की स्कीम के आ जाने से इन बीमारियों से जूझ रहे बच्चों के मां-बाप को तो राहत मिलेगी ही, इन बच्चों को भी जीवन दान मिलेगा।

और एक विशेष बात इस विज्ञापन से पता चली कि इलाज के लिये बड़े बड़े अस्पतालों जैसे कि पी जी आई, चंडीगढ़, क्रिश्चियन मैडीकल कालेज, लुधियाना, दयानंद मैडीकल कालेज,लुधियाना …और चंडीगढ़के आसपास के कुछ अच्छे निजि कारपोरेट अस्पतालों को भी इन बच्चों के इलाज के लिये चुना गया है।

इस विज्ञापन में इन बीमारियों के लक्षण भी दिये गये थे ताकि अभिभावकों का मार्ग-दर्शन हो सके। किसी तरह की जानकारी के लिए इस विज्ञापन के नीचे संबंधित अधिकारी का फोन नंबर भी दिया गया था।

उत्सुकता वश मैंने पंजाब के सेहत विभाग की अभी वेबसाइट खोली और नेशनल रूरल हैल्थ मिशन के लिंक पर क्लिक किया और स्कूल हैल्थ प्रोग्राम के बारे में पढ़ा तो यह जानकारी मिली की साइट पर पंजाब के हरेक जिले में जिन बच्चों का इस स्कीम के अंतर्गत हृदय रोग की सर्जरी हुई है, उस का पूर्ण ब्यौरा वेबसाइट पर दिया गया था…साथ में उन का पूरा पता और मोबाइल नंबर भी दिया गया था।

मुझ इस विज्ञापन को देख कर अपना पुराना समय याद आ गया — 1991 में हमारी नईं नईं जाब लगी थी …ई एस आई कारपोरेशन के दिल्ली के मुख्य अस्पताल में। हमारा बेटा 2-3 महीने का था, उसे नियमित जांच के लिए शिशु रोग विशेषज्ञ के पास लेकर गये तो उसे यह शक हुआ कि उस के हृदय में सुराख है … बड़ी चिंता हो गई—बहरहाल उन्होंने हमे जी बी पंत अस्पताल जाकर उस का ईको-टैस्ट करवाने के लिए कहा….यह टैस्ट हमने दो-तीन दिन में करवा लिया….वह टैस्ट करने वाले डाक्टर ने बताया कि ऩहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।

मुझे अच्छी तरह से याद है कि उन दो तीन दिनों में एक बार तो यह चिंता भी हो गई कि कैसे हो पायेगा आप्रेशन के लिए इतनी मोटी रकम का जुगाड़ — नौकरी नईं नईं थी – कोई बैंक बेलेंस नहीं ….और इतना भी पता नहीं था कि सरकारी नौकरी में परिवार के इलाज का खर्च विभाग द्वारा वहन किया जाता है, लेकिन शायद उस समय यह नियम था कि पहले तो स्वयं ही खर्च करना पड़ता था।

यह बात मैंने इस लिए लिखी है कि बीमारी के समय हवा निकलते देर नहीं लगती … हाथ पैर फूल जाते हैं और बच्चों की जिन बीमारियों का रूरल हैल्थ मिशन प्रोग्राम के अंतर्गत फ्री इलाज करने की बात हो रही है, उन में तो खर्च ही बहुत आता है।

अच्छा लगा यह विज्ञापन देख कर —लेकिन फिर ध्यान लखनऊ में हुई इस एऩएचआऱएम के करोडों के घोटालों की तरफ़ भी चला गया – अब अगर सरकारें इतने नेक काम के लिये पैसे भेज रही है…..क्या इस पैसे में भी चोंच मारने वालों को आप दरिंदे नहीं कहेंगे। लेकिन हुआ क्या, कितने लोगों ने अपनी जानें गंवा दी, कितनों ने नौकरी …..लेकिन फिर भी यह लालच की दाद-खुजली कहां मिटने का नाम लेती है!

अच्छे ग्रेड पाने के लिए इस्तेमाल हो रही दवाईयां

आज की दा हिंदु में एक अच्छा सा ऐडिटोरियल सुबह देख रहा था –सर्व शिक्षा अभियान के बारे में लिखा गया था कि यह जो एक नियम बन गया है कि किसी को पांचवी कक्षा तक फेल ही नहीं करना …ऐसे में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का स्तर बहुत नीचे गिर गया है। अगर आप भी इस संपादकीय लेख को देखेंगे तो आपको भी लगेगा कि उस में बातें ठीक ही कही गई हैं।

चलिए बच्चों के स्कूल के ग्रेड की बात चली है तो मैं आपसे एक खबर ही शेयर कर लूं—बड़ा अजीब सा लगा यह न्यूज़ देख कर। न्यू-यार्क टाइम्स पर खबर छपी है…Risky Rise of Good-Grade Pill.

खबर अच्छी खासी लंबी है..मैं तो पहला पन्ना पढ़ कर ही ऊब सा गया ….इसलिये यह पोस्ट लिखने लग गया।

जब भी यह बच्चों के स्कूल के ग्रेड-व्रेड सुधारने की बात चलती है तो मुझे यहां की अखबारों में दिखने वाले वे विज्ञापन ध्यान में आ जाते हैं जिन में ये दावा किया गया होता है कि इन्हें पढ़ने से स्मरण-शक्ति बढ़ जाती है, एकाग्रता भी बहुत बढ़ जाती है …और भी कईं तरह के वायदे………..लेकिन सब के सब बोगस, पब्लिक को बेवकूफ़ बनाने की बातें।

हां तो जिस खबर की मैं बात कर रहा था वह यह है कि अमेरिका के स्कूली बच्चे अपने ग्रेड को बेहतर करने के लिये कुछ दवाईयों का इस्तेमाल करते हैं.. इन्हें खाने से ये बच्चे रात में जागे रहते हैं और पढ़ाई में उन की एकाग्रता बढ़ जाती है। लेकिन लफड़ा इन दवाईयों का यह है कि ये इस काम के लिये नहीं बनीं हैं —इन का इस्तेमाल डाक्टरों द्वारा –ADHD(Attention deficit hyperactivity disorder) जैसे मरीज़ों का इलाज करने के लिये किया जाता है।

इन दवाईयों का नाम है – amphetamines and methylphenidate. वहां पर ऐसा तो है नहीं कि कोई किसी भी कैमिस्ट से कोई भी दवाई खरीद कर लेनी शुरू कर दे। इस न्यूज़ में बताया गया है कि इन दवाईयों को हासिल करने के लिये अमेरिकी स्टूडेंट्स मानसिक तौर पर बीमार होने का नाटक करते हैं और ऐसा ड्रामा करते हैं जैसे कि उस बीमारी के लक्षण इन में मौजूद हैं ….और फिर डाक्टर इन्हें वे दवाईयां लेने की सलाह दे देता है।

और कुछ सीनीयर छात्र भी ये दवाईयां अपने जूनियर छात्रों को बेचते हैं।

लफड़ा इन दवाईयों का सब से बड़ा यह भी है कि इन्हें लेने वाले छात्र देर-सवेर अन्य प्रकार के नशों के चक्कर में पड़ जाते हैं और तरह तरह के मादक-पदार्थों का व्यसन इन्हें लग जाता है।

खबर का लिंक मैंने ऊपर दे दिया है, अगर चाहें तो पढ़ सकते हैं …वैसे पहला पन्ना ही पढ़ लेंगे तो भी चलेगा। लेकिन चिंता की बात यह है कि हम हर काम में अमेरिका जैसे देशों को नकल करने का बहाना ढूंढते हैं ….अगर हमारे युवा छात्रों ने भी रात रात भर जागने के लिए इन दवाईयों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया तो बड़ा अनर्थ हो जायेगा। यहां तो वैसे ही युवावर्ग तरह तरह के नशे की चपेट में आता जा रहा है।

इसलिए हमें चाहिए कि इस तरह की खबरों के बारे में बच्चों को सचेत करें और ऐसी दवाईयों के दुष्परिणामों के बारे में भी अकसर चर्चा करते रहा करें। आप का क्या ख्याल है? — मुझे पता इसलिये नहीं लगेगा कि आपने फीडबैक न देने की कसम खाई है ….बिल्कुल वैसे …. जैसे कि मैंने गूगल सर्च-ईंजन के लिये लिखने की  की ठान रखी है।

विक्की स्पर्म डोनर ने अवेयरनैस तो बढ़ा दी लेकिन….

दो दिन पहले विक्की डोनर देखी… अच्छी फिल्म है, सब कलाकारों ने अपने अपने किरदार से पूरा इंसाफ किया है। सब से बढ़िया बात यह लगी कि आम दर्शक के मन में जो स्पर्म डोनर के बारे में भ्रांतियां रही होंगी …सैंपल देने के बारे में, टैस्ट-ट्यूब बेबी के बारे में, या बहुत से अन्य अहम् मुद्दे उन का निवारण हंसी हंसी में ही कर दिया गया।

जब हम लोग यह सिनेमा देख रहे थे तो पिछली सीटों पर बैठे कुछ युवकों का वार्तालाप सुनाई दे रहा था, उन में से एक अपने साथियों से कह रहा था ….यार, यही काम न कर लें? ..और उस के बाद उन के ठहाके। उन युवाओं का यह हंसी-मज़ाक उस समय कान में पड़ा जिस समय फिल्म में विक्की डोनर स्पर्म-डोनेशन से मिलने वाले पैसे को अपनी ऐशपरस्ती पर लुटा रहा था।

कल की टाइम्स ऑफ इंडिया में यह न्यूज-रिपोर्ट दिखी कि बॉलीवुड की एक दो फ़िल्में इस टापिक पर आने से स्पर्म-डोनरो का जैसे सैलाब सा आ गया है। एक और फिल्म के बारे में लिखा है ..रोड-ट्रिप जिस में युवा घूमने-फिरने पर जाने के खर्च का जुगाड़ करने के लिये स्पर्म-बैंक में जाते हैं।

मुद्दे इस स्पर्म डोनेशन से जुड़े बहुत से हैं, सब से पहले तो आप इस फिल्म को देखिए अगर पहले नहीं देखी तो भी।

टाइम्स वाली खबर में लिखा है इन फिल्मों के बाद तो लड़कों के, बुज़ुर्गों के फोन भी आने लगे हैं जो अपना वीर्य-दान करना चाहते हैं। लेकिन इन का क्राईटिरिया है कि 21-45 वर्ष के आयुवर्ग के लोग ही यह दान कर सकते हैं। और इन्होंने इस रिपोर्ट में इंडियन काउंसिल ऑफ मैडीकल रिसर्च के कुछ दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया है।

जिस तरह से हर शहर में ये आर्टीफिशियल कंसैप्शन के क्लीनिक खुल गये हैं, लगभग हर स्त्री रोग विशेषज्ञ अपने आप को इंफर्टिलिटि विशेषज्ञ लिखने लगी है, क्या आप को लगता है कि इतनी जबरदस्त हड़बड़ाहट में सभी दिशा निर्देश पालन किये जाते होंगे।

मुझे ऐसा इस लिये लगता है कि मैंने चार पांच दिन पहले एक न्यूज़-यार्क टाइम्स में रिपोर्ट देखी थी कि वहां पर इस तरह के डोनर स्पर्म से पैदा होने वाले बच्चों में कुछ जैनेटिक बीमारियां सामने आने लगी हैं, यह रिपोर्ट बहुत ही अच्छे ढंग से लिखी गई है …लगभग हरेक मुद्दे को छूने की कोशिश की गई है इसमें ….है तो इंगलिश में और यह रहा इस का लिंक ……In Choosing a sperm donor, a Roll of the Genetic Dice. —– a great coverage of the issues concerning donar babies.

रिपोर्ट से यह जानकर हैरानगी हुई कि अमेरिका में हर वर्ष लगभग 10 लाख बच्चे कृत्रिम इन्सैमीनेशन के द्वारा पैदा हो रहे हैं ….और बहुत बड़ा मुद्दा वहां यह बना हुआ है कि अकसर डोनर स्पर्म की जैनेटिक टैस्टिंग ढंग से होती नहीं …. इसलिए कुछ खतरनाक किस्म की बीमारीयां इस स्पर्म से पैदा होने वाले बच्चों में देखी जाने लगी हैं। बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है यह ….इतना हल्का फुल्का भी नहीं जितना विक्की डोनर के डा चड्ढा (अन्नू कपूर) ने इसे पेश करने की कोशिश है।

अगर अमेरिका जैसे देश में इस तरह के जैनेटिक टैस्टिंग के इतने बड़े मुद्दे हैं तो फिर हम कैसे यह उम्मीद कर लें कि अपने यहां सब कुछ परफैक्ट तरीके से हो रहा होगा…. जैनेटिक टैस्टिंग एक बहुत मुद्दा है जिस के बारे में जितनी जागरूकता बढ़ाई जाए कम है।

मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया वाली रिपोर्ट में यह देखा कि विदेशों से भी लोग इस काम के लिये ..भारतीय स्पर्म की खोज में … और फिर यहीं पर यह प्रोसिज़र करवाने के लिये आते हैं …..इस के बारे में आप का क्या ख्याल है? …..वे तो आते हैं सस्ते के चक्कर में लेकिन …………….क्या कहें यार, थोड़ा चुप रहने की भी आदत डाल लेनी चाहिए। कुछ तो पाठकों को भी सोचने का अवसर दिया जाना चाहिए।

बच्चों में पैनेसिलिन की डोज़ का फिर से जायजा लेने की बात

बच्चों को किसी भी दवा की डोज़ (खुराक) उस की उम्र के अनुसार ही दी जाती है। अब अब यह चर्चा गर्म है कि आज के बच्चे 50 साल पहले वाले बच्चों से मोटे हैं, इसलिए आज के बच्चों में पैनेसिलिन जैसे कि अमोकीसिलिन जैसी एंटीबायोटिक दवाईयों की डोज़ का फिर से जायजा लिया जाना चाहिए।

उम्र के आधार पर बच्चों को दी जाने वाली दवाईयों की खुराक पचास वर्ष पहले तय की गई थी …लेकिन आज बच्चों के बढ़ते वज़न को देखते हुए इन पर फिर से नज़र डालने की बहुत ज़रूरत है।

Child Penicillin Doses Should be Reviewed, say experts —- बीबीसी साइट पर यह न्यूज़-स्टोरी देख कर मुझे यह भी पता चला कि वहां पर बच्चों में बैक्टीरिया से होने वाली इंफैक्शन (संक्रमण) के इलाज के लिये हर वर्ष लगभग 60 लाख प्रेसक्रिप्शन (नुस्खे) डाक्टरों द्वारा जो लिखे जाते हैं उन में से लगभग 45 लाख नुस्खों में मुंह के रास्ते से दी जाने वाली पैनेसिलिन दवाई जैसे कि अमोक्सीसिलिन ही होती है।

डोज़ वाली बात में तो दम है ही कि इस का फिर से जायज़ा लेना ज़रूरी तो है ही …..वरना ज़्यादा उग्र इंफैक्शन में अगर बच्चों को पूरी डोज़ न दी जाए तो उन के ठीक होने में तो यह रूकावट है ही …साथ ही साथ ऐंटीबॉयोटिक ड्रग रिसिस्टैंस (जब बैक्टीरिया पर कोई ऐंटीबायोटिक दवाई असर करना बंद कर दे) की सिरदर्दी तो है ही।

लेकिन सुखद बात मुझे यह लगी कि वहां पर डाक्टर अभी भी अमोक्सीसिलिन पर इतना भरोसा करते हैं…. बहुत ही अच्छा लगा यह देख कर ….यहां सब से बड़ी सिरदर्दी है कि हायर ऐंटीबॉयोटिक (जो नये नये महंगे ऐंटीबॉयोटिक आ रहे हैं) भी धड़ाधड़ नीम-हकीमों द्वारा भी लिखे जाते हैं, कैमिस्टों के द्वारा बिना किसी डाक्टर के पर्चे के धड़ाधड़ बेचे जा रहे हैं, और सेहत खराब हो रही है बच्चों की। कुछ संक्रमण तो वैसे ही बिना ऐंटीबॉयोटिक दवाईयों के ही ठीक होने वाले होते हैं …लेकिन अगर संयोग कुछ ऐसा हो गया कि दो-एक दिन कोई हायर ऐंटीबॉयोटिक लिया गया था, तो समझिए कि उस ने तो कंज्यूमर को हमेशा के लिए खरीद लिया। यह आज भारत जैसे देशों में एक बहुत बड़ा मुद्दा है।

जितना मिस-यूज़ आज ऐंटीबॉयोटिक का हो रहा है, शायद ही किसी दूसरी दवाई का हो रहा होगा— बिना किसी क्वालीफाइड चिकित्सक की सलाह के ऐंटीबॉयोटिक लेना, एक दो दिन लेकर बंद कर देना, सही मात्रा में डोज़ न लेना, कुछ चालू घटिया किस्म की दवाईयां….. एक दिन एक, अगले दिन कोई और ऐंटीबॉयोटिक लेना, वॉयरल इंफैक्शन के लिये भी ऐंटीबॉयोटिक लेते रहना ……ये सब मुद्दे हैं जिन पर पिछले बीस वर्षों से चर्चा होती देख रहा हूं……. बड़े उत्साह के साथ अस्पतालों के द्वारा ऐंटीबॉयोटिक पालसी तैयार भी की जाती हैं लेकिन फिर…….बस टांय—टांय….फिस्स!!

मुझे सब से ज़्यादा डर तब लगता है जब मुझे यह पता चलता है कि लोग अपने आप ही बच्चों को छोटी-मोटी खांसी जुकाम के लिए कोई बहुत ही महंगा सा बाज़ार में हाल ही आया ऐंटीबॉयोटिक पिला रहे होते हैं, मैं यह देख कर कांप जाता हूं………….कहीं नये नये हायर-ऐंटीबॉयोटिक खिलाना, पिलाना आज का एक आधुनिक स्टेट्स सिंबल ही न बन जाए।

आगे की पढ़ाई के कुछ संकेत —

कहीं आप की सेहत न बिगाड़ दें ऐंटीबॉयोटिक्स

बच्चों में खांसी –जब कुछ न करना ही होता है गोल्डन

नई दवाईयों से इंप्रैस होने का लफड़ा

 

दूध के दांत भी पक्के दांतों के निकलने में रूकावट डाल सकते हैं

वैसे तो डैंटल चैकअप करवाने जैसा कोई कंसैप्ट इस देश में है ही नहीं…. बिल्कुल भी नहीं है, अपने 26-27 वर्षों के अनुभव के आधार पर यह बड़े विश्वास के साथ कह रहा हूं। जो ज़्यादातर इलाज है वह दांत की दर्द से ही शुरू होता है।

जब बड़ों के दांतों की रूटीन केयर का यहां कोई फंडा नहीं है तो बच्चों का क्या हाल होगा। नियमित निरीक्षण का अभाव और ऊपर से बच्चों में स्वीट्स एवं जंक फूड का क्रेज़ दांतों के स्वास्थ्य की ऐसी तैसी किये जा रहा है।

दूध के दांत के टुकड़े पक्के दांत के उगने में रूकावट पैदा कर रहे हैं

यह जो तस्वीर आप देख रहे हैं यह आठ साल के लड़के की तस्वीर है। देख सकते हैं कि इस की ऊपर वाले जबड़े की ऊपर वाली जाड़ (दाड़- milk molar) गल सड़ गया लेकिन पूरी तरह से टूटा नहीं, कोई नियमित चैक-अप नहीं, आज इसे दर्द की वजह से लेकर आया गया था। और साथ में उस का बापू यह जानना चाहता था कि कोई नया दांत गलत जगह पर क्यों आ रहा है?

इस बच्चे की दूध की जाड़ पूरी तरह से ना गिरने की वजह से उस की जगह लेने वाला पक्ता दांत अपनी सामान्य स्थिति से बाहर की तरफ़ आ रहा है, अब तो जितना निकलना था निकल चुका है …आगे दूध वाले दांत के टुकड़े पड़े होने की वजह से निकल नहीं पा रहा है। और साथ में सूजन आ गई है।

सूजन-दर्द की तो कोई बात ही नहीं …दो-तीन दवा-ववा से ठीक हो ही जाएगी लेकिन इस के पक्के इलाज के लिये इस के दूध के दांत के ऊपरी जबड़े में फंसे हुये टुकड़े निकालने होंगे और फिर कुछ ही दिनों में —ज़्यादा से ज़्यादा कुछ ही हफ्तों में पक्का दांत (इस केस में permanent first premolar) अपनी नार्मल जगह पर सरकना शुरू कर देता है….यह लगभग तय ही है।

इस केस से भी यही पाठ दोहराया जा सकता है कि अपने दांतों की नियमित जांच कितनी ज़रूरी है … बच्चा तो यह आया था दांतों की एक तकलीफ़ के लिये –लेकिन आप देख सकते हैं इस के अन्य दांतों में भी दंत केरीज़ — Dental Caries—दंत क्षय लगा हुआ है और इस अवस्था में इन का उचित इलाज किया जा सकता है।

वैसे आपने अपना रेगुलर डैंटल चैकअप कब करवाया था?

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बच्चों में एक्स्ट्रा दांतों का झंझट

स्कूली बच्चों का लंच ठंडा होना कोई मुद्दा लगा ही नहीं!

दो दिन पहले मैं अपने नेटिव प्लेस गया हुआ था, वहां एक दिहाड़ी करने वाला मज़दूर हमारे बगीचे की साफ़-सफ़ाई के लिये बुलाया गया था। आते ही उसने अपनी पतलून की दोनों जेबों से एक एक पैकेट निकाला—मैं अभी सोच ही रहा था कि यह क्या हो सकता है ..तभी उस ने उन दोनों पैकेटों को मेरे सामने पड़े एक तख्त पर रख दिया….मेरे हाथ में कैमरा था पता नहीं क्या सोच कर मैंने उन पैकेटों की तस्वीर खींच ली।

और आज सुबह जब मैं सीएऩएऩ साइट पर यह देख रहा था कि टैक्सॉस यूनिवर्सिटी में एक अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला गया है कि स्कूली बच्चों को जिन डिब्बों में लंच दिया जाता है, उसे सही तापमान पर नहीं रखा जाता जिस की वजह से ऐसा खाना खाने से बच्चों में खाद्य पदार्थों से जनित (food-borne illness) बीमारियां होने की संभावना हो सकती है। रोचक लेख है ..यह रहा इस का लिंक .. Bag lunches kept at unsafe temperatures.

ऐसा कभी भारत में सुनने को नहीं मिला —यहां तो हम लोगों के लिए इतना इत्मीनान ही काफ़ी होता है कि बच्चे टिफ़िन बॉक्स लेकर चले जाते हैं। स्कूली बच्चों में कभी यह इश्यू रहा ही नहीं कि खाने का तापमान ठीक नहीं है। हम लोग अपना समय भी याद करें तो कभी इस तरफ़ इतना ध्यान ही नहीं गया।
मुझे लगता है कि शायद विदेशों में एक तो तापमान कम रहने की बात है और दूसरा वहां पर लंच-बाक्स में अलग तरह के खाद्य पदार्थ पैक किये जाते हैं।

इस देश में गर्म-ठंडे का मुद्दा तो है ही नहीं, गनीमत है जिन्हें कुछ खाने को मिल रहा है। मिड-डे मील के बारे में तो हम अकसर बहुत कुछ पढ़ते-सुनते ही रहते हैं। मुझे वैसे भी लगता है कि यहां पर स्कूल में बच्चों के लिये घर से लाए खाने को गर्म करने की व्यवस्था कर पाना कहां प्रैक्टीकल है।

सब कुछ किसी परिवार की क्षमता पर निर्भर है…..इतनी ज़्यादा विषमताएं हैं कि खाने के ठंडे हो जाने का मुद्दा तो जैसे कोई मुद्दा है ही नहीं ….कुछ बच्चे आज भी हमारे उस मज़दूर की तरह आज भी किसी कागज़ के टुकड़े में दो रोटियां लपेट कर स्कूल ले जाते हैं, कुछ इसे हाईजैनिक तरीके से एल्यूमीनियम फॉयल में रख कर ले जाते हैं, कुछ ऐसे डिब्बों का इस्तेमाल कर पाते हैं जिन में खाना गर्म ही रहता है, और तो और कुछ फाइव-स्टार स्कूलों में बच्चों को लंच स्कूल में ही उपलब्ध करवाया जाता है।

क्या आप को नहीं लगता कि इस देश में बच्चा अगर घऱ से खाना लेकर जा रहा है, वही ठीक है, इस के आगे कुछ ज़्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं। जिस मजदूर की मैं बात कर रहा था, वह भी लगातार परिश्रम के बाद पेट की आग बिल्कुल सीधे-सादे खाने से ही मिटा कर फिर से काम में जुट जाता है………………कोई विटामिन पिल नहीं, कोई एनर्जी ड्रिंक नहीं…………..लेकिन उसे दिन में 8-9 घंटे काम करने की शक्ति यही सूखी, ठंडी रोटी-सब्जी ही दे रही है।

लिखते लिखते ध्यान आ रहा है कि हर तरह की बेइमानी कर के पैसा इधर-उधर दबा के भी तो कुछ लोग यही रोटी ही खाते हैं……………Then is it really worth it to indulge in corrupt practices and invite plethora of problems?  No way.