मच्छर मार अभियान की चंद बातें …

हां, तो कल की दोपहर मैंने मच्छर चालीसा लिखने में गर्क कर दी, ….लेकिन इस से क्या मच्छर थोड़ा ही गायब होने वाले थे…रात हुई ..मेरा बेटा मेरे साथ लेटा हुआ था, वही मच्छरों से परेशान….कह रहा था, पापा इतने मच्छर, ओ हो ,वो हो…..मैंने भी आखिर कह ही दिया कि यार, मच्छर चालीसा पढ़ कर सोया कर। बस, मेरे इन कहने ने तो जैसे आग में घी डालने का काम कर दिया ….जैसे तैसे मुझे कोसता रहा और पता नहीं कब हम सो गये।

लेकिन सोने से पहले कुछ ध्यान आ रहे थे कि यार, हनुमान चालीसा तो अभी अधूरी सी दिख रही है क्योंकि कुछ बढ़िया बढ़िया यादें तो उस में छूट ही गईं। कोई बात नहीं, अभी शेयर कर लेते हैं, विश्व मलेरिया दिवस ही गुज़रा है, मच्छर थोड़े ही कहीं भाग गये हैं।

 

 

हां, तो जब मैं अपनी जीवन में मच्छरों की यादों को लिख रहा था तो वह गुड्नाईट तो मेरे मन से निकल ही गई जिसे बिजली के प्लग से लगाया जाता था, एक गोल सी तश्तरी सी हुआ करती थी, जिस में एक टीकिया रख दी जाती थी …और इस के धीरे धीरे जलने से मच्छर दूर से रहते थे … और अगले दिन फिर हम लोग इस टिकिया तो उल्टा कर के लगा देते थे … और रात में अगर मच्छर परेशान करते थे तो सुबह का पहला टॉपिक ही यही हुआ करता था कि टिकिया को उल्टा रख दिया होगा, कैसे आयेगा इफैक्ट।

 

फ्लिट पंप महाराज

इस से भी पहले का दौर …यूं कह लें कि सत्तर-अस्सी का दौर था …जिस में काफ़ी घरों में फ्लिट पंप हुआ करता था…जिस में फ्लिट नाम का लिक्विड उंडेल कर कमरों में सांझ के स्प्रे किया जाता था ..और फिर कमरे कुछ समय के लिये बंद कर दिये जाते थे। इन के बारे में मेरा अच्छा खुशनुमा अनुभव है। लेकिन कुछ ही अरसे तक यह टिक पाया …. क्योंकि यह फ्लिट पंप भी एक लफड़ा ही था, कमबख्त झट से खराब हो जाया करता था, स्प्रे तो कम किया करता था और लिक्विड नीचे ज़्यादा गिर जाया करता था, इसलिये इतने महंगे लिक्विड के नीचे गिरने से मन में कुछ कुछ होता था …..(यश चोपड़ा की फिल्म वाला नहीं…..नुकसान होने पर जो होता है) ….बहरहाल, कुछ समय बाद प्लास्टिक  के फ्लिट पंप आ गये , लेकिन ये भी कुछ ज़्यादा कामयाब नहीं हो पाये …..और हां, इन फ्लिट-पंपों को पड़ोसियों द्वारा मांगे जाने का बड़ा रिवाज था।

चलिये आगे चलते हैं…..मच्छरों की दवाई का छिड़काव कभी कभार हुआ करता था, लेकिन उस का भी कोई खास असर दिखता ही नहीं था, इस का कारण वही कि पब्लिक को लगता था यह तो जैसे पानी के घोल का ही छिड़काव किया जा रहा होता था।

फिर कुछ वर्ष पहले हम शहर के कुछ इलाकों में फॉगिंग-मशीनों से मच्छर मार स्प्रे होता देखते थे …और कुछ जगहों पर ऐसा सुनने में भी मिला (यह नहीं बताऊंगा कि कहां!) …..कि मच्छरों के लिये कुछ कर रहो हो, तो दिखना भी तो चाहिए …. ये जो फागिंग मशीन थी ये सारे इलाके में चंद-क्षणों के लिए बस एक बार धुंध जैसा वातावरण बना दिया करती थी …..और पब्लिक का क्या है, वह खुश …कि हो गया मच्छरों का खात्मा लेकिन उन के रात के मच्छरों के किस्से न किसे ने सुने, ना ही सुनने की कोशिश की।

पुरानी बातें बहुत हो गईं….अब लेटेस्ट पर आते हैं …..मुझे नहीं पता था …काकरोचों को खत्म करने जैसा कुछ स्प्रे मच्छरों के लिये भी आ गया है। मेरी मां भी उनके कमरे में मच्छरों से बहुत परेशान थीं, और अकसर टीवी पर उन्होंने मच्छर मार स्प्रे का विज्ञापन देखा होगा। इसलिये एक दिन उन्होंने उसे लाने को कहा …. जब मैं लेने गया तो वहां एक ही नाम के दो स्प्रे पड़े हुये थे …मेरे छोटे बेटे ने मुझे पहले ही से सावधान किया हुआ था कि मच्छरों वाला लाना पापा, इसलिए ध्यान से देखा तो पाया कि काकरोचों के लिये अलग है और मक्खियों-मच्छरों के लिये अलग …सो, वह दो सो रूपये वाला स्प्रे भी घर में आ चुका है।

हां तो काकरोचों के लिये ध्यान आ रहा है … पहले एक लक्ष्मणरेखा नामक की दवाई हुआ करती थी जिस के साथ किचन में एक लक्ष्मणरेखा रूपी लाइन खींच दी जाती थी, और यह षड़यंत्र रात को सोने से पहले रचा जाता था, और रात में जैसे ही काकरोच उस तरफ आया, उस का खात्मा…. सुबह किचन में दस-बीस काकरोच देखने को मिलते थे….यह सब बंबई में हम देखा करते थे। पता नहीं अब शायद वहां यह लक्ष्मणरेखा भी काम न करती होगी जो काकरोचों के लिये अलग से स्प्रे आ गया।

हां, तो अपने घर में जब से यह मच्छर मार स्प्रे वाली शीशी आई है, थोड़ी सी परेशानी बढ़ गई दिखती है। मां अपने कमरे में करती हैं लेकिन छोटे बेटे को बिल्कुल गवारा नहीं, उन्हें बार बार टोकता है बीजी, आप को पता नहीं इस का कितना नुकसान है इस तरह से इस्तेमाल करने का, न तो आप इसे करते समय नाक को कवर करती हो, और न ही बाद में कमरा बंद करती हो, बीजी, बस आप यह मत किया करो, मैं किया करूंगा …और कईं बार अपनी नाराज़गी मेरे कानों में भी डाल चुका है कि पापा, बीजी को थोड़ा कहो कि इसे स्वयं न इस्तेमाल किया करें, यह ज़हरीली चीज है……………बहरहाल, इस के बावजूद भी मच्छर वैसे का वैसा ही है।

क्या करें, समझ नहीं आ रहा ………….लेकिन अकसर ध्यान उन झोंपडीयों की तरफ़ चला ही जाता है जहां न तो इस तरह के कोई मच्छरमार इंतजाम होते हैं ….. पता नहीं कैसे मच्छरों से मुकाबला कर पाते होंगे!!

एक पंजाबी सुपर हिट गीत सुनिए जिसमें एक मुटियार अपने माही से कह रही कि उसे तो मच्छरों ने तोड़ कर खा लिया है, एक मच्छरदानी खरीद दे … यह जो आवाज है यह पंजाबी गीतों की महारानी है . .सुरिंदर कौरऔर पुरूष आवाज में भी रंगीला जट्ट पंजाब का बेहद पापुलर लोकगायक  है….

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आज विश्व मलेरिया दिवस है –मलेरिया चालीसा (भाग.2)

देखिये हम लोग मच्छर से टक्कर लेने के लिये कहां से शुरू हुय़े थे …और आज किस हद तक पहुंच चुके हैं लेकिन फिर भी इस पर काबू नहीं पाया जा सका …काबू की तो बात ही क्या करें, कमबख्त अब ये और भी ढीठ और बेशर्म से हो चुके हैं ..और पहले से हृष्ट-पुष्ट…।
पहले तो गांव में गोबर के उपले जला कर ही इस को दूर रखा जाता था ..लेकिन अब रेस्टरां आदि में बैठ कर मक्खी-मच्छर मारने के लिये मशीनें लगी हैं, बडा हास्यास्पद लगता है कि आदमी कितना बेबस हो गया है।
हैरानगी की बात है कि कुछ घरों में एक भी मक्खी नहीं दिखती, लेकिन अंधेरा छाते ही मच्छरों का मेला लग जाता है, रात को बाहर सोने के दिन तो लद ही गये …अब तो सुबह-सवेरे और सांझ को बगीचे में बैठना भी इन मच्छरों की वजह से दूभर हो जाता है…. अगर बैठना ही है तो एक हाथ में अखबार में दूसरे को पैरों, टांगों और बाजुओं को खुजाने के लिए फ्री रखना पड़ता है।
एक अहम् बात का ध्यान आ रहा है …बहुत वर्षों तक तो मलेरिया बस शरीर तोड़ दिया करता था, लेकिन लगभग बीस वर्ष पहले जब मलेरिया रोग से मौतें होने लगीं तो पता चला कि मलेरिया फ़ैलाने वाले एक मच्छर की किस्म (Plasmodium falciparum) से खतरनाक मलेरिया हो जाता है, जो दिमाग को चढ़ जाता है और कईं बार इस से मौत भी हो जाती है।
इलाज के बारे में बात करें तो आज से चालीस वर्ष पहले तो इस के लिये इतनी गोलियां खानी पड़ती थीं कि सोच कर ही मतली होने लगी है। बिल्कुल कड़वी …क्यूनिन की गोलियां … लेकिन मजबूर होकर खानी ही पड़ती थीं।
एक दौर ऐसा भी आया नब्बे के दशक में जब लोगों ने मलेरिया से बचने के लिये हर सप्ताह क्लोरोक्यूनिन की एक गोली लेनी शुरू कर दी …चाहे यह बचाव हमेशा ही से बड़ा कंट्रोवर्शियल सा ही रहा लेकिन बाप रे बाप ज़रूरत से ज़्यादा पढ़े लिखे लोगों को समझाने का पंगा कौन ले …. ज़ाहिर है यह समस्या ज़्यादा ज़रूरत से ज्यादा ऐजुकेटेड लोगों की ही थी…. आम आदमी का क्या है, बेचारा आंखें मूंद कर डाक्टर की बात मान लेता है… और फ़ायदे में भी रहता है।
अब मलेरिया के टैस्ट के लिये भी एक कार्ड-टैस्ट आ गया …जिस से तुरंत पता चल जाता है कि मलेरिया है कि नहीं ….यह भी पता लगाना ज़रूरी है …कुछ दशक पहले तो जब भी कंपकंपी से बुखार आता था तो इस का मतलब यही होता था कि यह हुआ मलेरिया .. और फिर दवा-दारू शुरू हो जाता है…अब कईं अन्य तरह के बुखार जैसे डेंगू (यह भी मलेरिया से ही फैलता है), चिकनगुनिया (हड्डी तोड़ बुखार) भी कंपकंपी के साथ ही होते हैं।
इस पोस्ट को बंद करते करते बस यही लिखना चाहता हूं कि आंकड़ों का तो मैंने आंकलन किया नहीं, लेकिन इतना तय है कि अभी तक तो इन मच्छरों से हार से चुके हैं… मच्छरदानियों को कीटनाशकों से ट्रीट भी किया गया है, सफलता मिली है खास कर के अफ्रीकी देशों में ……लेकिन अभी हमारे लिए बहुत काम करने बाकी हैं, बहुत कुछ करना बाकी है ……
अभी हारने की बात चली तो मेरे बेटे का एक फेवरिट पंजाबी गीत का ध्यान आ गया …अकसर सुन सुन कर मस्त होता रहता है …. असीं हारे हंबे आं ..लोक बीमार जहे …..

आज विश्व मलेरिया दिवस है…मच्छर चालीसा (भाग 1)

आज विश्व मलेरिया दिवस है …स्वभाविक रूप से मेरे मन में बचपन से लेकर अब तक के मच्छरों के अनुभव घूम रहे हैं। जहां तक मुझे होश है..साठ के दशक के अंत में या सत्तर के दशक के शुरू में हमें मलेरिया दिखने लगा था। मुझे याद है सत्तर के दशक के शुरू में मेरी मां को जब मलेरिया एक बार हुआ….पहले तो मलेरिया का पता ही तब चलता था जब दो-तीन बार कंपन के साथ तेज़ बुखार चढ़ता तो पड़ोसनों के सामूहिक विचार विमर्श से जब यह प्रमाणित हो जाता था कि हो न हो, यह तो मलेरिया ही है, तब कहीं जाकर मलेरिये की दवाई लाने का कष्ट किया जाता है, तब तक मरीज़ वैसे ही बुरी तरह से टूट चुका होता था।

शायद मलेरिया तो मुझे भी एक-दो बार हुआ है …लेकिन एक बात शेयर करता हूं कि मुझे गर्मी में वह कंपन वाली ठंडक का अहसास भा जाता था, अमृतसर की कमबख्त चिलचिलाती गर्मी में किसी पहाड़ की सैर का नज़ारा मिल जाता था ..लेकिन उस कंपन के बाद का हाल मत पूछिए।

बात, मच्छरों की करने लगा था कि पिछले चार दशकों में कैसा रहा मच्छर सफरनामा। हम बिल्कुल छोटे थे तो कभी मच्छर के बारे में सुना ही नहीं था, इसलिए ठाठ से नीली छत के नीचे अपनी खटिया पर लंबी तान कर (अपनी खटिया के नीचे एक छोटी सी पानी की सुराही टिका कर) सो जाया करते थे। और उस में हम लोग एक हाथ से हवा करने वाला पंखा भी अकसर रख लिया करते थे ….क्या पता कब ज़रूरत पड़ जाए!! ….कहने का मतलब कि सोने का भी पूरा सलीका हुआ करता था, पायजामा-वामा पहन कर, दूध (कभी कभी)  वरना पानी वानी पीकर इत्मीनान से सोया जाता था।

फिर थोडे बड़े हुये शायद 10-12 साल के होंगे, कुछ काटने लगा …. पता चला कि ये खटमल नहीं है, ये मच्छर हैं। इसलिये शाम को सोने से पहले अपनी अपनी खटिया पर मच्छरदानी को चार डंडों से टिकाने की जिम्मेदारी भी हमारी सब की सांझी हुआ करती थी। और फिर उस मच्छरदानी में सोना ….मत पूछो …मत याद दिलाओ उन दिनों की… उस के आगे तो रेलगाड़ी का फर्स्ट ए.सी भी फीका लगे।

मुझे याद है जब मच्छरदानी के अंदर से हम लोग इस नीले आकाश में तारों को निहारा करते थे तो कब निंदिया रानी की गोद में चले जाते थे पता ही कहां चलता था, सुबह तभी उठते जब टहलने जाना होता….इस सब का शायद यही प्रताप है कि आज कल कभी भी अलार्म से जागने की ज़रूरत नहीं पड़ी। बॉडी-क्लाक तो शायद बचपन में ही सैट सी हो जाती होगी।

फिर हम लोग और बड़े हो गये … तब देखा कि मच्छरों की गिनती इतनी बढ़ गई कि मच्छरदानी के साथ साथ चारपाईयों की कतार के आगे एक बिजली का पंखा भी चलाया जाने लगा।

लो जी देखते ही देखते हमारे कालजीएट बनने तक अस्सी के दशक में आ गई वह कछुआ छाप कॉयल…. शुरू शुरू में यह एक स्टेट्स सिंबल सा ही जान पड़ता था, लेकिन उस जमाने में यह भी इतना महंगा लगता था कि जब यह जलता था तो साथ में दिल जलता था कि यह क्यों इतनी तेज़ी से जल रहा है। किसी मेहमान को अगर कोई कछुआ छाप की भी सुविधा प्रदान कर दिया करता था तो इस को एक शिष्टाचार का अंग ही माना जाता था। ये वो दिन थे जब कालेज में मच्छर का लाइफ-साइकिल अच्छी तरह से पढ़ा जाता था और रात में उस का प्रैक्टीकल हो जाया करता था…

चलिये आगे चलते हैं … या इस के साथ ही साथ या कछुआ छाप के आगे या पीछे …(कुछ ठीक से याद नहीं आ रहा) एक क्रीम जिसे आडोमास कहते हैं …वह भी चल पड़ी थी, उसे भी घर में रखा जाता। रात को सोने से पहले पैरों, टांगों ओर बाजुओं पर इसे नियमित लगाया जाता था …लेकिन बड़ी कंजूसी से …इतनी महंगी ट्यूब और झट से खत्म हो जाया करती थी।

कोई बात नहीं ….जैसा कि अकसर हुआ करता था, यह ट्यूब अकसर खत्म ही रहा करती थी ..ऐसे में हमारी नानी ने हमें नुस्खा बता दिया था कि चुपचाप सरसों का तेल लगा कर लेट जाओ…..फंडा मुझे आजतक समझ नहीं आया…यार कहां सरसों का तेल और कहां मच्छर का ढंक…. बहरहाल, अनजानेपन का भी अपना ही लुत्फ़ होता है, यह बहुत देर बाद पता चला।

हां जी, फिर वह तरह तरह की मशीनें आ गईं …. ऑल-ऑउट, गुड-नाइट ….. इन्हें लाने लगे …. एक एक महीने तक चलने लगीं….. फिर इन के रिचार्ज आने लगे …..और अब देखते हैं कि इन की मात्रा को नियंत्रण करने वाले यंत्र भी आने लगे हैं ताकि अगर मच्छर ज्यादा हैं तो इन को तेज़ कर दो, आता है यह सब टीवी विज्ञापनों में, आपने भी कईं बार देखा होगा।

हां, एक बात तो भूल ही गया … एक ही क्यों, बहुत सी बातें बतानी अभी बाकी हैं …एक काम करता हूं … लेख लंबा खिंचता चला जा रहा है, बाकी की बातें इस के दूसरे पार्ट में लिखता हूं …. कुछ ही घंटों में वापिस हाजिर होता हूं.

वैसे मैंने मच्छरों से परेशान होकर लगभग चार वर्ष पहले भी एक लेख लिखा था, यह आज किसी दूसरी साइट पर दिखा …लिंक भेज रहा हूं …. क्या यही विकास है?  हो सके तो इसे भी ज़रूर देखियेगा।