अब मशीनें खरीदी गईं हैं तो कमाऊ पूत भी बनेंगी …

कुछ दिन पहले मैं अंबाला अपने एक मित्र के पास गया हुआ था – घर पर नहीं था, बीवी के साथ कहीं गया हुआ था उस का चेक-अप करवाने।
घर आया तो बताने लगा कि जिस जगह वह अपनी श्रीमति का चेकअप करवाने गया था, वहां बता रहा था कोई मशीन आई हुई थी। बता रहा था कि अस्पताल की डाक्टर कहने लगी थी कि यह एक टैस्ट हो रहा है—वैसे तो बाहर एक हज़ार का होता है लेकिन आज यह केवल एक सौ रूपये में होगा। आप दोनों ही यह टेस्ट करवा लें।

बता रहा था कि अब मैं क्या कहता? –सो, उस ने भी वह टैस्ट करवा लिया। टैस्ट का नाम उस ने बताया – बी.एम.डी –अर्थात् ऐसी मशीन जिस के द्वारा किसी की हड्डीयों की सेहत का पता चलता है— और मेरा मित्र एवं उन की अर्धांगिनी दोनों एकदम स्वस्थ —इसलिए मैंने उन की रिपोर्ट देखनी तक ज़रूरी नहीं समझी। वैसे वह बाद में बता रहा था कि दोनों का टैस्ट नार्मल आया है।

इस तरह के हड्डी की सेहत को जांचने के लिए कैंपों के बारे में मैं पहले भी सुन चुका हूं… हमारे शहर में भी कईं बार लग चुके हैं –
सेहत से संबंधित विषयों की जानकारी पाने के लिए एक अति विश्वसनीय साइट है – मैडलाइन प्लस। इस साइट पर इस टैस्ट से संबंधित जानकारी आप इस लिंक पर क्लिक कर के जान सकते हैं — Bone mineral density test.

इस के बारे में कोई विशेष चर्चा मैं इसलिए नहीं करना चाहता क्योंकि मैं अकसर सोचता हूं कि हमारे देश के लोगों को विशेषकर महिलाओं को इस टैस्ट से कहीं ज़्यादा अच्छा खाने की ज़रूरत है। काश, ये टैस्ट करवाने वाली महिलाएं 100 रूपये के गुड़-चने ही खा लें तो कुछ तो बात बन जाए।

बात केवल इतनी सी है कि क्या हमें किसी महिला को देख कर यह पता नहीं चलता कि वह कितनी कमज़ोर है, कितनी बलिष्ठ है, कितना परिश्रम करने वाली है….और भी सेहत से जुड़ी बहुत सी जानकारियां किसी को भी देखने से लग जाती हैं। ऐसे में कैंपों में सभी का टैस्ट करवाने का क्या औचित्य है, यह मेरी समझ से परे है।

चलिए किसी आर्थिक तौर पर कमज़ोर वर्ग से संबंधित महिला का आपने टैस्ट कर लिया — रिपोर्ट आ गई कि उस की हड्डीयां कमज़ोर हैं, तो आप उसे इस कमज़ोरी को दूर करने के लिए खाध्य पदार्थ भी मुहैया करवाएंगे? –नहीं ना, वह तो वही खाएगी जो वर्षों से खाती आ रही है … इस की बजाए कितना अच्छा हो कि उस के खाने पीने की आदतों के बारे में पूछ कर कुछ न कुछ उन में आवश्यक सुधारों की चर्चा कर लें ताकि कुछ तो कैल्शीयम जो वह ले रही है उस के शरीर में समा सके।

ऐसे ही अंधाधुंध टैस्ट किए जाने से भला क्या हासिल होने वाला है?— कमज़ोर हड्डीयां होती हैं – 65 के ऊपर की महिलाओं की और 70 के ऊपर के पुरूषों की – यह आंकड़ें हैं अमीर मुल्कों के, हमारे यहां के थोडा बहुत अलग हो सकते हैं – लेकिन यह तो तय है कि हरेक का यह टैस्ट करने की बजाए उम्र या अन्य कारणों से चुने गये लोगों का ही यह टैस्ट किया जाए। महिलाओं में रजोनिवृत्ति (menopause- जब मासिक धर्म आना बंद हो जाता है) …के बाद हड्डीयां कमजोर हो जाती हैं, जो लोग कुछ तरह की दवाईयां जैसे कि स्टीरायड एवं पेट की एसिडिटि कम करने वाली दवाईयां लेते हैं उन की भी हड्डीयां कमज़ोर होने का अंदेशा बना रहता है ….ऐसे लोगों का यह टैस्ट होना चाहिए या फिर उन लोगों का जिन्हें देख कर लगे कि इस की हड्डीयां कमज़ोर हो सकती हैं। इस से ज़्यादा क्या लिखूं—-बहुत कुछ तो केवल एक नज़र भर से ही पता चल जाता है। वो अलग बात है कि अब अगर इस तरह की महंगी मशीनें खरीदी गई हैं तो कमाऊ पूत तो इन्हें बनना ही पड़ेगा। है कि नहीं?
लेकिन एक बात तो यह है कि जिन महिलाओं का इस तरह का टैस्ट यह बता देता है कि उन की हड्डीयां कमज़ोर हैं तो उन में फिर उपर्युक्त दवाईयां देकर समस्या का हल खोजने का प्रयत्न किया जाता है।

जैसा कि आप ऊपर दिये गये लिंक पर जाकर देख सकते हैं कि इस के लिए कोई सूईं आदि से आप के रक्त का नमूना नहीं लिया जाता — सब कुछ नॉन-ईनवेसिव ही है…कोई सूईं नहीं, कोई चीरा नहीं।

अपने दोस्त की बात सुन कर ध्यान आ रहा था लगभग 15 वर्ष पहले चली खतरनाक पीलिया के टीके (हैपेटाइटिस बी इंजैक्शन) लगाने की मुहिम – गली गली, मोहल्ले मोहल्ले…टीमें आईं – 100-100 रूपये में, 150 रूपये में टीके लगे……लेकिन उस के बाद क्या आजकल के बच्चों-युवाओं को ये टीके नहीं लगने चाहिए। पर यह अभियान है क्या ? —- बस भारत में तो एक ही आंधी चलती है बस एक बार—चाहे वह कुछ भी हो। लेकिन स्वास्थ्य कार्यक्रमों में स्थिरता (sustainability) की बहुत ज़रूरत है।

और एक बात …इस गीत को कभी कभी सुनने की भी बहुत ज़रूरत है ….यह याद रखने के लिये कि राल-रोटी में भी कितनी ताकत है …

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तंबाकू चबाने वाले गले की सूजन को न करें नज़रअंदाज़

25 वर्ष से तंबाकू चबाने वाली महिला के मुंह की तस्वीर

यह जो मुंह के अंदर की तस्वीर आप देख रहे हैं यह लगभग 35वर्ष की महिला की है। उसे दांतों में कोई विशेष तकलीफ़ तो नहीं थी, बस वही थोड़ा बहुत थंडा-गर्म कभी कभी लगता है जो सारे हिंदोस्तान को लगता है…लेकिन उस का मेरे पास आने का कारण था उस का पति।

वह बता रही थी कि जब उस का पति मेरे पास आया था तो मैं किसी तंबाकू गुटखा चबाने वाले से बात कर रहा था, इसलिए उस के पति ने उसे कहा कि जाओ तुम भी अपना मुंह दिखा कर तो आओ।

हां, तो महिला ने बताया कि वह शादी से पहले ही जब वह 10-12 वर्ष की थी तब ही से वह तंबाकू-चूना चबा कर खा रही है, लगभग पिछले 25 वर्ष से यह सिलसिला चल रहा है। वह बता रही थीं कि वह दिन में तीन-चार बार ही तंबाकू-चूने का मिश्रण चबाती है। उस ने चुनौतिया भी साथ रखी हुई थी –एक स्टील की डिब्बी जिस के एक तरफ़ तंबाकू और दूसरी तरफ़ चूना भरा रहता है।

उस का मुंह चैक करने पर पाया गया कि उस के मुंह में तंबाकू-जनित घाव हैं … और इस तस्वीर में आप देख रहे हैं कि मसूड़ों में सूजन तो है, लेकिन बड़ी अलग किस्म की सूजन लग रही है। जो भी हो, इस महिला के गाल के अंदर या मसूड़ों में कैंसर के कोई लक्षण नहीं दिख रहे — लेकिन विडंबना यही है कि क्या तंबाकू को लात मारने के लिए कैंसर के प्रकट होने का इंतज़ार किया जा रहा है?

मुझे याद आ रहा था …20-21 वर्ष पहले जब मैंने रेलवे सर्विस ज्वाइन की तो एक मसूड़ों की सूजन का मरीज आया …देखने में ही गड़बड़ सी लग रही थी …शायद फरवरी 1992 की बात है, वह आया तो था मेरे पास दांत के दर्द के लिए। उन दिनों मैं बंबई के एक अस्पताल में काम कर रहा था, हम ने उसे तुरंत टाटा अस्पताल रेफ़र किया। वहां उस का डायग्नोज़ ओरल कैंसर का हुआ —उन्होंने तुरंत आप्रेशन कर दिया और वह मुझे कईं वर्षों तक आकर मिलता रहा …फिर दस वर्ष बाद मैं वहां से आ गया और मुझे उस के बारे में आगे पता नहीं।

अच्छा तो मैं बात तो इस 35 वर्षीय महिला की कर रहा था … बता रही थीं कि यह लत ऐसी है कि छूटती नहीं है। इस केस में पहली बार एक अजीब सी बात दिखी की उस का पति ऐसी किसी चीज़ का सेवन नहीं करता….बच्चे भी इन सब चीज़ों से दूर हैं। उस ने बताया कि बच्चों को तो इस तंबाकू से इतनी घिन्न आती है कि कईं बार जब मैं उन्हें तंबाकू बनाने को (तंबाकू-चूने को हाथ में मसलने की प्रकिया) कहती हूं तो साफ़ मना कर देते हैं।

महिला के चेहरे की दाईं तरफ़ वाली सूजन

अभी मैं उस का मुंह देख ही रहा था कि मुझे उस के चेहरे के दाईं तरफ़ सूजन दिखी — बता रही थी कि कुछ महीनों से है … देख कर चिंता ही हुई …बताने लगी कि दवाई खाती हूं दब जाती है फिर दोबारा हो जाती है… सूजन अजीब सी थी –ऐसी सूजन दांत एवं मुंह की इंफैक्शन के लिये तो कम ही दिखी थी, उसे मैंने विशेषज्ञ के पास भेजा है…..वह उसे चार पांच दिन के लिए एंटीबॉयोटिक दवाईयां देगा और वापिस बुला कर फिर से देखेगा। इस महिला को मेरी शुभकामनाएं.

इस तरह की सूजन के संबंध में मैंने एक पोस्ट कुछ दिन ही पहले लिखी थी …..वह बंदा भी मेरे पास दो-तीन वर्ष पहले  कुछ इसी तरह की सूजन केसाथ ही आया था…जब दवाईयों से नहीं गई, दांतों में कुछ लफड़ा था नहीं ….ई.एन.टी विशेषज्ञ के पास भेजा गया… और उस का डायग्नोज़ यह हुआ कि उसे दाईं तरफ़ के टांसिल का कैंसर है…उस का समुचित इलाज हो गया ….आजकल वह ठीक चल रहा है, उस को भी मेरी शुभकामनाएं कि उस में उस बीमारी की पुनरावृत्ति न हो।

यह पोस्ट लिखते मैं सोच रहा हूं कि महिलाएं भी अपने देश के बहुत से हिस्सों में बीड़ी पीती हैं, तंबाकू, खैनी चबाती हैं, अपने मसूडों पर मेशरी (तंबाकू का पावडर) घिसने का चलन महाराष्ट्र में विशेष कर बंबई में काफ़ी देखा है — महिलाओं का इस तरह के व्यसन में लिप्त होना बहुत गंभीर मुद्दा है क्योंकि अकसर मां अपने बच्चों के लिये एक रोल-माडल होती है …अगर वह स्वयं ही इन चक्करों में पड़ी है तो बच्चों को कैसे रोकेगी?

और तो और अगर महिलाएं धूम्रपान करती हैं तो भी सैकेंड हैंड धुआं (Passive smoking) तो घर के बाकी सभी सदस्यों आदि के लिये नुकसानदायक तो है ही।

यह पोस्ट केवल इस बात को रेखांकित करने के लिए कि तंबाकू, गुटखा, सुपारी से संबंधित किसी भी शौक को पालना किसी के भी हित में नहीं है। कुछ वर्ष पहले की बात है गुजरात में बहुत ही महिलाएं जब मुंह के कैंसर का शिकार होने लगीं तो पता चला कि वह दांतों की सफ़ाई के लिए तंबाकू वाली पेस्ट दांतों एवं मसूड़ों पर घिसती हैं और ये काम उन का दिन में कईं बार चलता है….और नतीजा फिर कितना भयानक निकला। ऐसी पेस्टें आज भी बाज़ार में धड़ल्ले से बिक रही हैं, इसलिए इन से सावधान रहने में ही बचाव है।

सब की बात की –अपनी नानी की नहीं की —मेरी नानी जी को अपने मुंह में नसवार (creamy snuff…. made of tobacco) रखने की आदत थी …वह बताया करती थीं कि बहुत साल पहले जब उन के दांत में दर्द हुआ तो उन्होंने एक बार नसवार लगाई –बस दो चार दिन में लत ऐसी लगी कि अफ़सोस इस आदत ने उन की जान ले ली…. तंबाकू का इस तरह से इस्तेमाल करने वालों में पेशाब की थैली (मूत्राशय, urinary bladder) का कैंसर होने का रिस्क होता है …….मेरी बेचारी नानी के साथ भी यही हुआ…. उन्हें अचानक पेशाब में रक्त आने लगा, डायग्नोज़ हुआ …आप्रेशन हुआ …रेडियोथैरेपी भी हुई —लेकिन जीत कैंसर की ही हुई।

बीमारी किसी को कोई भी किसी भी वक्त हो जाए इस पर किसी बंदे का कंट्रोल पूरा तो नहीं होता लेकिन अगर मक्खी देख कर भी निगली जाए तो फिर उसे आप क्या कहेंगे!!

पोस्ट के अंत में बस इतनी सी नसीहत की घुट्टी कि तंबाकू के सभी रूपों से कोसों दूर रहें……यह जानलेवा है, तंबाकू इस्तेमाल करने वाले को यह कब और कैसे डस लेगा, क्या अंजाम होगा ….यह सब जानते हुए भी अगर मुंह में रखे गुटखे को थूकने की इच्छा न हो तो फिर डाक्टर भी क्या करें?

विक्की स्पर्म डोनर ने अवेयरनैस तो बढ़ा दी लेकिन….

दो दिन पहले विक्की डोनर देखी… अच्छी फिल्म है, सब कलाकारों ने अपने अपने किरदार से पूरा इंसाफ किया है। सब से बढ़िया बात यह लगी कि आम दर्शक के मन में जो स्पर्म डोनर के बारे में भ्रांतियां रही होंगी …सैंपल देने के बारे में, टैस्ट-ट्यूब बेबी के बारे में, या बहुत से अन्य अहम् मुद्दे उन का निवारण हंसी हंसी में ही कर दिया गया।

जब हम लोग यह सिनेमा देख रहे थे तो पिछली सीटों पर बैठे कुछ युवकों का वार्तालाप सुनाई दे रहा था, उन में से एक अपने साथियों से कह रहा था ….यार, यही काम न कर लें? ..और उस के बाद उन के ठहाके। उन युवाओं का यह हंसी-मज़ाक उस समय कान में पड़ा जिस समय फिल्म में विक्की डोनर स्पर्म-डोनेशन से मिलने वाले पैसे को अपनी ऐशपरस्ती पर लुटा रहा था।

कल की टाइम्स ऑफ इंडिया में यह न्यूज-रिपोर्ट दिखी कि बॉलीवुड की एक दो फ़िल्में इस टापिक पर आने से स्पर्म-डोनरो का जैसे सैलाब सा आ गया है। एक और फिल्म के बारे में लिखा है ..रोड-ट्रिप जिस में युवा घूमने-फिरने पर जाने के खर्च का जुगाड़ करने के लिये स्पर्म-बैंक में जाते हैं।

मुद्दे इस स्पर्म डोनेशन से जुड़े बहुत से हैं, सब से पहले तो आप इस फिल्म को देखिए अगर पहले नहीं देखी तो भी।

टाइम्स वाली खबर में लिखा है इन फिल्मों के बाद तो लड़कों के, बुज़ुर्गों के फोन भी आने लगे हैं जो अपना वीर्य-दान करना चाहते हैं। लेकिन इन का क्राईटिरिया है कि 21-45 वर्ष के आयुवर्ग के लोग ही यह दान कर सकते हैं। और इन्होंने इस रिपोर्ट में इंडियन काउंसिल ऑफ मैडीकल रिसर्च के कुछ दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया है।

जिस तरह से हर शहर में ये आर्टीफिशियल कंसैप्शन के क्लीनिक खुल गये हैं, लगभग हर स्त्री रोग विशेषज्ञ अपने आप को इंफर्टिलिटि विशेषज्ञ लिखने लगी है, क्या आप को लगता है कि इतनी जबरदस्त हड़बड़ाहट में सभी दिशा निर्देश पालन किये जाते होंगे।

मुझे ऐसा इस लिये लगता है कि मैंने चार पांच दिन पहले एक न्यूज़-यार्क टाइम्स में रिपोर्ट देखी थी कि वहां पर इस तरह के डोनर स्पर्म से पैदा होने वाले बच्चों में कुछ जैनेटिक बीमारियां सामने आने लगी हैं, यह रिपोर्ट बहुत ही अच्छे ढंग से लिखी गई है …लगभग हरेक मुद्दे को छूने की कोशिश की गई है इसमें ….है तो इंगलिश में और यह रहा इस का लिंक ……In Choosing a sperm donor, a Roll of the Genetic Dice. —– a great coverage of the issues concerning donar babies.

रिपोर्ट से यह जानकर हैरानगी हुई कि अमेरिका में हर वर्ष लगभग 10 लाख बच्चे कृत्रिम इन्सैमीनेशन के द्वारा पैदा हो रहे हैं ….और बहुत बड़ा मुद्दा वहां यह बना हुआ है कि अकसर डोनर स्पर्म की जैनेटिक टैस्टिंग ढंग से होती नहीं …. इसलिए कुछ खतरनाक किस्म की बीमारीयां इस स्पर्म से पैदा होने वाले बच्चों में देखी जाने लगी हैं। बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है यह ….इतना हल्का फुल्का भी नहीं जितना विक्की डोनर के डा चड्ढा (अन्नू कपूर) ने इसे पेश करने की कोशिश है।

अगर अमेरिका जैसे देश में इस तरह के जैनेटिक टैस्टिंग के इतने बड़े मुद्दे हैं तो फिर हम कैसे यह उम्मीद कर लें कि अपने यहां सब कुछ परफैक्ट तरीके से हो रहा होगा…. जैनेटिक टैस्टिंग एक बहुत मुद्दा है जिस के बारे में जितनी जागरूकता बढ़ाई जाए कम है।

मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया वाली रिपोर्ट में यह देखा कि विदेशों से भी लोग इस काम के लिये ..भारतीय स्पर्म की खोज में … और फिर यहीं पर यह प्रोसिज़र करवाने के लिये आते हैं …..इस के बारे में आप का क्या ख्याल है? …..वे तो आते हैं सस्ते के चक्कर में लेकिन …………….क्या कहें यार, थोड़ा चुप रहने की भी आदत डाल लेनी चाहिए। कुछ तो पाठकों को भी सोचने का अवसर दिया जाना चाहिए।

गर्भवती महिलाओं के लिए भी डायटिंग करना है सुरक्षित

कल रात जब मैंने बीबीसी की साइट पर इस खबर के हैडिंग को देखा तो मुझे कुछ कुछ अजीब सा लगा कि अब फिगर-कांसियस महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान भी डायटिंग करवाने का यह कौन सा नया पाठ पढ़वाने की तैयारी हो रही है।

मुझे इस खबर का शीर्षक कुछ इसलिए भी अटपटा सा लग रहा था कि हमारे देश में तो महिलाओं के कम खाने या यूं कहूं कि कम खाना मिलने की घोर समस्या है…इसलिए बीबीसी की इस कवरेज का हमारे से तो कोई संबंध है ही नहीं।

शायद ऐसा सोचने का कारण वही था जो अकसर हमें टीवी और प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों में देखने को मिलता है जिस में बताया जाता है कि महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान ज़्यादा खाना लेना चाहिए….जो सुनने में अकसर आता है वह भी यही है कि इस अवस्था के दौरान महिला को दोनों के लिये खाना है … अपने लिए और गर्भ में पल रहे शिशु के लिए —–बात है भी वैसे तो ठीक।

हम वैसे भी तो कितने पूर्वाग्रह पाले रहते हैं …और अकसर ये गलत ही निकलते हैं…. जब मैंने इस खबर को पूरा पढ़ा तो मेरा पूर्वाग्रह भी गलत साबित हुआ।

इस खबर को बहुत सी रिसर्च के बाद प्रकाशित किया गया है और इसमें ब्रिटिश मैडीकल जर्नल द्वारा गहन खोजबीन द्वारा यह कहा गया है कि अगर महिलाएं गर्भावस्था के दौरान डायटिंग करती हैं तो उन के लिये तो यह सुरक्षित है ही , उन के शिशु के लिए भी इस डॉयटिंग की वजह से कोई जोखिम पैदा नहीं होता।

मुझे अकसर एक टीवी का विज्ञापन देख कर यह अचंभा हुआ करता था कि यार, कोई महिला दो बंदों का खाना कैसे खा सकती है, जी मिचलाने से, उल्टी वुल्टी की वजह से वैसे ही उस की हालत कईं महीने तक खराब हुई होती है ऐसे में कैसे वह एक निवाला भी अपनी भूख से ज्यादा ले सकती है …. महिलाओं की छोड़िए, क्या कोई भी भूख से ज़्यादा निरंतर कुछ ले सकता है? …नहीं ना, ठीक है … लंडन की इस टीम ने भी ऐसा ही कहा है कि अगर गर्भवती महिला दो जनों के खाने की बजाए पौष्टिक खाना लेती है तो भी गर्भावस्था के दौरान होने वाले बढ़ने वाले वजन के साथ साथ प्रेगनेंसी की जटिलताओं से बचा जा सकता है।

नेशनल इंस्टीच्यूट फॉर हैल्थ एंड क्लीनिक ऐक्सेलेंस (NICE- National Institute for Health & Clinical Excellence) की एक सलाह जो 2010 में प्रकाशित हुई थी उस में कहा गया था कि गर्भावस्था के दौरान डॉयटिंग नहीं की जा सकती क्योंकि इस से पैदा होने वाले बच्चे पर बुरा असर पड़ सकता है।

लेकिन महिलाओं को गर्भ धारण करने से पहले एक सेहतमंद वजन को हासिल करने की सलाह दी जाती है।

इस में कोई संदेह नहीं कि मोटापा आज जंगल की आग की तरह फैल रहा है …य़ू.के, अमेरिका, यूरोप हो या फिर भारत, मोटापे का प्रकोप हर जगह दिखाई देने लगा है। ज़ाहिर सी बात है अगर मोटापा है तो गर्भावस्था के दौरान प्रि-एक्लैंपसिया, डॉयबीटीज़, उच्च रक्तचाप और समय से पहले ही डिलीवरी होने जैसी समस्याएं भी पैदा होने की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती है।

इस रिव्यू से यह निष्कर्ष निकाला गया है कि अगर महिलाएं गर्भावस्था के दौरान अपने खाने पर ज़्यादा ध्यान देते हुये ज़्यादा कैलोरी वाले खाने की बजाए पौष्टिक खाना खाती हैं (संतुलित आहार) तो पहली बात तो यह कि उन में प्रेगनैंसी से संबंधित जटिलताएं पैदा होने का खतरा बहुत कम हो जायेगा। और तो और पैदा होने वाले बच्चे के वजन पर भी इस का कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

वैसे अभी इस दिशा में और भी रिसर्च होगी लेकिन क्या तब तक गर्भवती महिलाएं अपने खाने-पीने पर ध्यान न दें? …संतुलित आहार के तो फायदे ही फायदे है।

इस खबर को पढ़ने के बाद जो बिंदु रेखांकित किये जाने मुझे ज़रूरी लगते हैं, वे नीचे लिख रहा हूं….

  •   मोटापा  की महामारी से परेशान सारी दुनिया का ध्यान अब गर्भावस्था के दौरान बढ़ने वाले वज़न की और भी गया है। एक बार बढ़ा हुआ वज़न इतनी आसानी से उतरता नहीं है, इसलिए सोच समझ के  पौष्टिक खाना ही इस दौरान खाने से सब ठीक ठाक चलता रहता है। एक की बजाए दो का खाना यह न तो संभव है और न ही ऐसा कुछ करने की सलाह दी जाती है। जितनी भूख है, बस तबीयत से छक लें।
  •   यह जो बात हुई कि गर्भधारण करने से पहले ही महिलाओं अपना हैल्दी वज़न हासिल कर लें …मतलब यह तो है ही कि पहले ही से अपनी ज़्यादा चर्बी को उतार लिया जाए लेकिन इस देश के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए जहां तक बहुत ही महिलाएं कुपोषण एवं खून की अल्पता (malnutrition and anemia) का शिकार हैं, उन का भी वजन एवं उन में खून की कमी को पूरा करने के उपाय भी उन के गर्भधारण करने से पहले किये जाने का पूरा प्रयास होना चाहिए।
  •   यह जो देसी मानसिकता में देसी घी, और देसी घी से तैयार हुये विभिन्न व्यंजनों को गर्भवती महिलाओं को डिलीवरी से पहले और बाद में बहुत ज़्यादा मात्रा में लगभग उन के मुंह में ठूंसे जाने की भ्रांतियां चल रही हैं, उन्हें कब हम लोग उखाड़ पाएंगे, यह हम ने देखना है, बीबीसी विशेषज्ञों ने नहीं।

…..अब लगता है इसे यही बंद करूं ….यह सब कुछ कईं बार केवल पेपर काले करने जैसा लगता है…ज़मीनी हालात बहुत ही ज़्यादा भिन्न हैं, दो बंदों की खुराक लेने की तो बात क्या करें, आप स्वयं सोचिए कि कितनी महिलाएं हैं जिन्हें इस देश में गर्भावस्था के दौरान एक वक्त का खाना भी ढंग से नसीब नहीं होता, और ऊपर से सब की सब चीज़ों में मिलावट —दूध की ही बात करें जिसे हम पौष्टिक लेबल करते हैं पता नहीं वह सिंथेटिक है या कुछ और है….और ऊपर से बेटे ही बेटे पैदा करने का प्रैशर ….अब इस लड़के पैदा करने वाली मशीन समझे जाने वाले पुतला को भी कितने हफ़्तों तक तो यह भी पता नहीं होता कि उस के गर्भ में पल रहे शिशु को बाहर की हवा देखनी नसीब भी होगी कि नहीं….कहीं कन्या होने पर उस का गला गर्भ में ही तो घोंट दिया जायेगा।

जितनी हमारे देश में विषमता है …उतनी ही हमारी समस्याओं की भी विषमता है …. No quick-fix solutions. Only the wearer knows where the shoe pinches. वैज्ञानिकों ने रिसर्च कर ली, बीबीसी ने छाप दी, मैंने कमैंटरी लिख दी लेकिन जूता पहनने वाले को ही पता है कि वह कहां काट रहा है।

बहरहाल, जब मैं दूरदर्शन में दिखाया जाने वाले वह विज्ञापन ढूंढ रहा था तो इस एक अच्छे वीडियो पर नज़र पड़ गई … है तो इंगलिश में …लेकिन इस में महिलाओं से संबंधित एक अच्छी वेबसाईट   www.indianwomenshealth.com  का उल्लेख किया गया है, कभी देखियेगा, हिंदोस्तानी डाक्टरों द्वारा हिंदोस्तानी महिलाओं की सेहत को कवर करती हुई एक वेबसाइट।

 

Further reading – Weight management ‘benefits’ for mother and baby

वक्ष सुढौल करने वाले इंजैक्शन पर लगा प्रतिबंध

महिलाओं के लिये वक्ष-स्थल को सुढौल बनाने के भारतीय हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की अखबारों, पत्रिकाओं में अजीबो-गरीब क्रीमों आदि के भ्रामक विज्ञापन दिखते रहते हैं…….क्या कहा? ….कोई कुछ इनका कुछ करता क्यों नहीं। प्रश्न है …कौन करेगा? …इसलिये यह सब तो यूं ही चलता रहेगा।

लेकिन जब अमेरिका-इंगलैंड से खबरें आयेंगी कि इस तरह से वक्ष को उन्नत करने के क्या नुकसान हैं, हमारी जनता तो तभी जगेगी। तो सुनिए…..यू.के में महिलाओं में “लंच-टाइम बूब जॉब” का क्रेज़ बढ़ रहा है लेकिन विशेषज्ञों ने इस तरह के इलाज पर प्रतिबंध लगाने का समर्थन किया है।

आप भी ज़रूर यही सोचे जा रहे हैं कि यह लंच-टाइम बूब जॉब का आखिर लफड़ा है क्या? — नहीं, कोई ऐसा वैसे लफड़ा नहीं है जैसा कि आप सोच रहे हैं, यह बूब जॉब रूपी शोशा यह है कि महिलाएं जैसे ब्यूटी-पार्लर अपने रूप रंग के लिये किसी भी समय जा सकती हैं, ऐसे ही यू .के में कुछ महिलाएं अपने वक्ष-स्थल को सुढ़ौल करने के लिये मैक्रोलेन नामक फिल्लर का टीका अपने वक्ष-स्थल पर लगवाती हैं।

इस तरह का फिल्लर बनाने वाली कंपनियां तो हमेशा की तरह यही कहेंगी कि नहीं, इन का कोई नुकसान नहीं है, लेकिन बात तो विशेषज्ञों की हमेशा से वजन रखती है जिन्होंने इस के कईं नुकसान गिनाये हैं। वैसे तो पिछले वर्ष सिलोकॉन-इंप्लांट भी गलत वजहों के कारण खबरों में छाए हुये थे ….क्यों कि इन का शरीर के अंदर फट जाने का अंदेशा बना रहता है।

इस तरह के टीकों की एक बहुत बड़ी हानि यह भी है कि ये मैमोग्राफी टैस्ट को प्रभावित करते हैं….. और सोचने की बात यह है कि किसी महिलाओं के लिये वक्ष-स्थल के सुढ़ौल दिखने से कहीं ज्यादा यह ज़रूरी है कि वह नियमित मैमोग्राफी जांच करवाती रहे और उस से भी ज़रूरी यह है कि ऐसी किसी ऐरी-गैरी चीज़ की वजह से उस टैस्ट के परिणाम में कोई गड़बड़ी न हो क्योंकि यह उसके जीवन का प्रश्न है।

मैमोग्राफी क्या है, इस लिंक पर क्लिक कर के देख सकते हैं। दुर्भाग्य यह है कि भारत में विभिन्न कारणों की वजह से मैमोग्राफी की तरफ़ जनता का ध्यान नहीं जा रहा …..महिलाओं में कैंसर की रोक थाम अथवा प्रारंभिक अवस्था में ही इसे पकड़े जाने के लिये व्यापक तौर पर सरकारी संस्थानों में उपलब्ध करवाया जाना चाहिए ….

स्रोत– Breast surgeons back withdrawal of ‘lunchtime boob job’ jab

 

बच्चों के जन्म के अंतराल पर दिया जायेगा ज़्यादा ध्यान

कुछ ज़्यादा अरसा नहीं बीता होगा … पता चला कि एक सरकारी डाक्टर की गोपनीय रिपोर्ट में किसी “भले मानुस” ने टिका दिया कि वह परिवार नियोजन कार्यक्रम में ज़्यादा रूचि नहीं लेता। कोई बता रहा था कि ऐसा इसलिये लिख दिया गया था कि उस ने नसबंदी एवं नलबंदी के दिये टॉरगेट से कम लोगों को प्रेरित किया था….. बस, ऐसी बात को उठाना भी मधुमक्खियों के छज्जे को छेड़ कर वहीं खड़ा रहने की बात थी।  बताते हैं कि उस डाक्टर ने तबीयत से दिल खोल कर उच्च अधिकारियों को लिखा कि आज के परिप्रेक्ष्य में तो इस तरह के टॉरगेट-वॉरगेट का कोई औचित्य ही नहीं रह गया। बहरहाल, फिर कुछ ही दिनों में सुनने को मिल गया कि उस की बात मान ली गई और वह टिप्पणी उस की गोपनीय वार्षिक रिपोर्ट से हटा दी गई……यह गोपनीय शब्द भी ऐसा लगता था कि मानो किसी अपराधी की रिपोर्ट लिखी जा रही हो जिसे अति गोपनीय रखा जाना ज़रूरी है। सब से ज़्यादा खुशी इस बात की होती है कि यह गोपनीय शब्द भी अब हट गया है ….गोपनीयता काहे की, अपने ही लोग, उन के द्वारा ही तैनाती किए गये जनता के सेवक….लेकिन जब उन की वर्किंग की बात आए तो यह गोपनीय है…….अच्छा है अब सूचना के अधिकार ने बहुत से रास्ते साफ़ कर दिये हैं ….कोई किसी की भी वार्षिक रिपोर्ट मांग सकता है क्योंकि जनता को भी यह जानने का हक है कि उन के सेवक कैसा परफार्म कर रहे हैं।

क्या यार ….एक बात चलती है तो फिर कहां से कहां निकल जाती है….. मुझे भी ऐसा टॉरगेट मिलता रहा है कि तून एक साल में पांच पुरूषों अथवा महिलाओं को नसबंदी अथवा नलबंदी के लिए प्रेरित करना है…..जी हां, मैं भी यह काम करता रहा हूं। कितने लोगों का कल्याण करवाया? —देखना पड़ेगा, इस समय ध्यान नहीं है, बस ध्यान है तो उन एक सौ –या डेढ़ सौ रूपये के कड़क नोटों का जिन्हें पा कर ऐसे लगता था कि स्कॉलरशिप मिला है।
बात बहुत लंबी खिंच गई है, लेकिन अभी भी मैं मुद्दे पर तो आया नहीं ….हां तो मुद्दा यह है कि अब सरकार ने फैसला कर लिया है कि नसबंदी एवं नलबंदी की बजाए बच्चों में अंतर रखने के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले उपायों पर ज़्यादा फोकस किया जायेगा। इस के लिए युवा माताओं पर ज़्यादा ध्यान देते हुए उन्हें दो तरह के इंट्रा यूटरीन कंट्रासैप्टिव डिवाईस (IUCD) – सुरक्षा -5 और सुरक्षा -10 उन में लगाये जायेंगे।
सुरक्षा-5 इंट्रा यूटरीन कंट्रासैप्टिव डिवाईस के द्वारा थोड़ी अवधि तक बच्चों के जन्म में अंतर रखने में मदद मिल सकेगी और सुरक्षा-10 के द्वारा महिलाओं को दस वर्ष तक गर्भधारण करने की चिंता से मुक्ति मिल पाएगी।
बात बढ़िया लगी कि देखा गया है कि ज़्यादातर जच्चा मौतें (maternal deaths) 15 से 24 वर्ष की उम्र में होती हैं, उस छोटी उम्र में महिलाओं की नलबंदी कैसे कर दी जाए?
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के द्वारा यह योजना बड़े व्यापक तौर पर शुरु की जा रही है …इस के अंतर्गत दो लाख प्रशिक्षित दाइयों (ANM)  को भी महिलाओं में इस तरह का डिवाईस फिट करने की ट्रेनिंग दी जायेगी।
एएऩएम (ANM) को भी इस काम के लिये ट्रेनिंग इसलिए दी जायेगी ताकि इस व्यापक नेटवर्क का इस नेक में इस्तेमाल किया जा सके और प्रसव के तुरंत बाद इसे लगाने के बहुत लाभ हैं। IUCD 380A  तो पहले ही से महिलाओं को सरकारी संस्थानों में मुफ्त फिट की जाती हैं …अब  Cu IUCD 375 को शुरु किया जा रहा है जिसे स्वास्थ्य संस्थानों में सप्ताह के फिक्स दिनों को लगाया जायेगा और इन्हें सुरक्षा -5 और सुरक्षा-10 के नाम से पुकारा जायेगा।

Idea ..Centre to focus more on spacing of children than sterilisation (The Hindu, April13′ 2012)

झोलाछाप डाक्टरों ने 61महिलाओं की नसबंदी तो कर डाली, आखिर क्यों?

कोई कोई खबर बिल्कुल एक्सपेक्टेड नहीं होती, झोलाछाप डाक्टरों के कारनामें अकसर सुनते रहते हैं लेकिन यह कारनामा तो इतना घिनौना है कि इस की जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है। कल की दा हिंदु अखबार सुबह उठाते ही पहले पन्ने पर जिस खबर की तरफ़ ध्यान गया –उस का शीर्षक था… तीन झोलाछाप डाक्टरों ने दो घंटे में 61महिलाओं की नसबंदी कर डाली।
बात कुछ अजीब सी लगती है ना कि अब झोलाछाप नीम-हकीम इस काम में भी अपना सिक्का मनवाने पहुंच गये हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इस तरह के आप्रेशन करते समय मैडीकल व्यवस्था की तो बात ही क्या करें, सेलाइन की बोतलें तक बची-खुची चढ़ा दी गईं। खबर में लिखा है कि ये लोग अपने आप को किसी एनजीओ से जुड़े होने की बात कह रहे थे और महिलाओं ने 600 रूपये के लालच में नसबंदी करवा लीं।
अराजकता इतनी रही कि एनसथीसिया तक नहीं दिया गया, महिलाओं इस बर्बरता के दौरान चीखती-चिल्लाती रहीं। जब कुछ महिलाओं की हालत नाजुक होने लगी तो गांव वाले पुलिस के पास पहुंच गये। कहा जा रहा है कि बिहार के अरारिया क्षेत्र के लोगों की अनपढ़ता का फायदा उठा कर तीन युवकों ने यह स्कीम बना डाली।
एक बार तो खबर पढ़ कर यकीन ही नहीं होता….लेकिन दा हिंदु के फ्रंट-पेज पर अगर कोई न्यूज़ है तो किसी तरह के संदेह की तो बात ही नहीं रह जाती। इन आप्रेशनों को करने वाले युवकों को पकड़ तो लिया गया है लेकिन सोचने वाली बात तो यही है कि जिन महिलाओं के ऊपर जो जुल्म हुआ, उन का क्या होगा। बात चिंताजनक बात यह भी है कि अगर इन झोलाछापों के औज़ार भी दूषित थे तो ऐसा तो नहीं कि वे कुछ भयंकर बीमारियां इन महिलाओं को दे गये हों, बाकी तो सब जांच हो ही जायेगी, क्वालीफाईड महिला डाक्टर अपना काम कर ही लेंगी लेकिन अगर महिलाओं के शरीर में कुछ बीमारियां पहुंच चुकी होंगी तो इस के लिये  गिरोह (गिरोह ही कहेंगे इन्हें) कैसे इस त्रासदी की भरपाई करेगा, भरपाई हो ही नहीं पाएगी।
पता नहीं कुछ दिनों से मैं कुछ ज़्यादा ही व्यस्त सा हो गया लगता हूं — पिछले बीस पच्चीस दिनों से ढंग से अखबार देखी ही नहीं, लेकिन यह खबर किसी चैनल पर भी दिखी नहीं…..ऐसा क्यों, शायद इसलिए कि वे सब की सब अनपढ़ थीं, साधन-संपन्न परिवारों से नहीं थीं………….मुझे ध्यान आ रहा है दो तीन दिन पहले टीवी पर तसलीमा नसरीन के नावल पर आधारित लज्जा फिल्म भी आ रही थी ……कहीं ऐसा तो नहीं कि हम लोग लज्जा देखने में डूबे हुये थे और दूसरी तरफ़ कुछ दरिंदे यह घिनौना काम अंजाम दे रहे होंगे। हिंदी के मास्टर साब का सिखाया हुआ वह मुहावरा भी कल से बार बार याद आ रहा है ……गरीब की जोरू, जने खने की भाभी।

Source : 3 quacks do 61 tubectomies in 2 hours; arrested (The Hindu, Jan10, 2012)