बेटी को बेटा बनाने का गोरखधंधा इंदौर में

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वज़न कम करने के नाम पर होने वाला गोरखधंधा ..

आज कल सुबह पांच बजे के करीब उठ ही जाता हूं—कुछ करने को खास होता नहीं, नेट पर कुछ करने की इच्छा होती नहीं, आ-जा-कर वही बुद्धु बक्से (इडिएट बॉक्स) के सामने बैठना मजबूरी होती है, लेकिन यह क्या सुबह सुबह पब्लिक को अपने जाल में फंसाने की जैसे होड़ सी लगी होती है… तरह तरह के सुरक्षा कवच, काम-धंधा बढ़ाने वाले उपाय, जादुई तेल, नुस्खों…..जहां तक भी कल्पना की जा सकती है, सब कुछ बिक रहा होता है।

हर बार जब ये सब कुछ बिकता देखता हूं तो डर लगता है — कितने करिश्माई अंदाज़ में ग्राफिक्स के द्वारा दिखा देते हैं कि एक भारी-भरकम स्थूल काया वाले ने कैसे छरहरी काया पा ली और दूसरे चैनल पर दिखा रहे होते हैं कि किस तरह से एक पापड़ जैसे पतले बंदे को किस तरह से बॉडी-बनाने वाले पावडर ने तुरंत ही हृष्ट-पुष्ट बना दिया। मैं अकसर अपने दर्जनों लेखों के द्वारा इस तरह के उत्पादों के बारे में लिख चुका हूं।

हमारे देश की लगभग सभी समस्याएं विषम हैं—इस तरह की दवाईयों बेचने वालों के गोरखधंधों की बात भी कुछ ऐसी ही है। भोले भाले कम पढ़े लिखे लोगों को जाल में फंसाना इन के बाएं हाथ का खेल होता है, और तो और किसी को यह तक तो पता होता नहीं कि वे जो पावडर आदि ले रहे हैं —मोटा या पतला होने के लिए—उन में आखिर है क्या!!

Courtesy: FDA site

आज एक बार फिर इन का ध्यान आ गया जब मैं एफडीआई कि साइट देख रहा था…. अमेरिकी एजेंसी ने जनता को सचेत करते हुए अपनी साइट पर डाला हुआ था कि वज़न कम करने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले एचसीजी प्रोड्क्ट्स (HCG Weight loss products) को इस्तेमाल करना खतरनाक ही नहीं, जानलेवा भी सिद्ध हो सकता है।

सोच रहा हूं कि अमेरिका में तो लोगों को कम से कम यह तो पता है वे आखिर ले क्या रहे हैं, लेकिन यहां तो समस्या इतनी विकराल है कि लोगों को पता ही नहीं कि वह कौन सा नुस्खा ले रहे हैं—होम्योपैथिक है, अंग्रेजी है, देसी है …यूनानी है, क्योंकि जो भी कोई सयाना या नीमहकीम पुड़िया में थमा देता है, बस वही इस्तेमाल किया जाने लगता है।

हां, तो बात अमेरिका की हो रही थी कि किस तरह वहां पर वज़न कम करने के लिये एचसीजी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल हो रहा है और ऐसे लोगों को इस तरह की दवाईयों को इस्तेमाल न करने की सलाह के साथ साथ इन्हें फैंकने का मशविरा दिया गया है।

HCG (Human chorionic gonadotropin ) गर्भावस्था के दौरान ह्यूमन प्लेसैंटा द्वारा उत्पन्न किया जाता है। वैसे इस का इस्तेमाल महिलाओं की इन्फर्टिलिटि के उपचार के लिये भी किया जाता है।

इस तरह के उत्पादों के मोटापा कम करने वाले इस्तेमाल के बारे में गलत तरह के दावे भी किये जा रहे हैं कि इन को इस्तेमाल करने से 30-40 दिन में 20-30 पाउंड वजन कम हो जाता है, लेकिन इस तरह के प्रोड्क्ट्स के इस्तेमाल के साथ साथ दैनिक आहार को बहुत ही कम कर देने की सलाह दी जाती है…….संक्षेप में कहें तो सब कुछ गड़बड़—-लालच, धोखाधड़ी का खेल जो कि जान तक ले सकता है। इस तरह के प्रोड्क्ट्स का इस्तेमाल ओरल ड्राप्स (oral drops), pellets (छोटी छोटी गोलियों के द्वारा) या फिर स्प्रे के द्वारा किया जाता है।

तो इतना कुछ मेरे लिखने का मकसद……वैसे तो ऐसा हो नहीं सकता कि इस तरह की धोखाधड़ी यहां न होती हो, अगर अभी एचसीजी नाम की दवाई का मोटापा कम करने वाला गोरखधंधा अभी यहां नहीं चला, तो कोई बात नहीं, वहां से रिजैक्ट हो कर ये सब कुछ थर्ड-वर्ल्ड देशों में ही तो बिकेगा, इसलिये सचेत रहने में ही समझदारी है।

Further reading

HCG Diet products are illegal

पतला करने वाले हर्बल जुगाड़

मोटापे से संबंधित कुछ अन्य लेख

पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनों पर कोर्ट ने लगाया प्रतिबंध

मुझे ध्यान में आ रहा है कि आज से लगभग डेढ़ वर्ष पहले मैंने जब पाकेट साइज़ अल्ट्रासाउंड से संबंधित जानकारी अपने मीडिया डाक्टर ब्लॉग पर उपलब्ध करवाई थी, तो मेरे अंदर बहुत मिश्रित सी भावनाएं आ रही थीं… कारण यही था कि देश में रजिस्टर्ड अल्ट्रासाउंड सेंटरों के बावजूद यह जो गर्भावस्था में शिशु के सैक्स का पता करवाने का जुनून तो थमने का नाम नहीं ले रहा और जब जेब में फिट होने वाली पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीन आ गई हैं तो आगे आगे क्या होगा!!

लेकिन जिस बात का अंदेशा था वही हुआ….. आज के समाचार पत्र में पढ़ा कि बम्बई हाईकोर्ट ने दो दिन पहले ही पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनों पर प्रतिबंध लगा दिया है। अच्छा लगा यह पढ़ कर कि कोर्ट ने कहा है कि एक बच्चा इस परमात्मा का उपहार है और किसी को भी यह पता करने का प्रयास नहीं करना चाहिए कि गर्भ में पल रहा शिशु बेबी है या बाबा!

30 जुलाई 2011 को बृहन्मुंबई म्यूनिसिपल कार्पोरेशन में एक आदेश जारी किया था कि अल्ट्रासाउंड मशीनों को पंजीकृत सेंटर पर ही रखा जाएगा –न ही तो इन्हें शेयर किया जा सकता है और न ही वहां से किसी और जगह लेकर जाया जा सकता है और जो इन आदेशों की उल्लंघना करेगा, उस के ऊपर उचित कार्यवाही की जायेगी।
रेडियोलॉजी एवं इमेजिंग एसोशिएशन ने कार्पोरेशन के इस निर्णय को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी और इस केस का निर्णय करते समय कोर्ट ने इस प्रतिबंध को एकदम दुरूस्त ठहराया है।

याचिकाकर्त्ता के वकील ने यह तर्क दिया कि ऐसा करने से बिस्तर पर पड़े मरीज़ों को इस सुविधा से वंचित रहना पड़ेगा—लेकिन न्यायाधीशों का यह मत था कि सोनोग्राफी तो केवल निदान के लिये ही है, किसी तरह का इलाज देने के लिये तो इसे इस्तेमाल किया नहीं जाता, यह कोई आक्सीजन तो है नहीं जिस के बिना मरीज़ ज़िंदा ही नहीं रह पाएगा….

The judges said trying to know sex of child in advance removes the element of excitement. और कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक समाज लड़के और लड़की में भेदभाव करना बंद नहीं करता तब तक तो इस तरह की व्यव्स्था, नियम, कानून की ज़रूरत तो रहेगी ही।

Rejecting  the petition, the court concluded that the BMC circular is “most reasonable and in public interest” and added that “even if there is only one case in a million, this court will not interfere.”.

यह ख़बर देखने के बाद मुझे यही ध्यान आ रहा है कि क्या यह निर्णय बंबई में ही लागू होगा ….. क्या विभिन्न प्रांतों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को भी इस से संबंधित अलग अलग नियम बनाने होंगे या फिर केंद्र सरकार ही कुछ इस तरह के नियम बनायेगी जिस के द्वारा इन पोर्टेबल मशीनों पर प्रतिबंध लगाया जा सकेगा।

और मैं इस बारे में भी सोच रहा हूं कि नियमों के बावजूद इस तरह की पोर्टेबल मशीनों पर अंकुश कितने प्रभावशाली ढंग से लग पाएगा।

Source : Portable Ultrasound machines barred – Bombay HC upholds Civic body’s Move to Prevent Sex Determination Tests ( Times of India –November 19′ 2011).

बसों में बिकने वाले ये अंजन-मंजन

वैसे मैं जिस बस में सफर कर रहा था उस की हालत ऐसी न थी ..

परसों मैं अंबाला से पानीपत बस में सफर कर रहा था। एक दांतों का मंजन बेचने वाला चढ़ा …उस ने बढ़िया से एक बार ही समझाया कि उस के मंजन से दांत का कीड़ा मर जाएगा, मसूड़ों से खून आना बंद हो जायेगा, मुंह की दुर्गंध गायब हो जाएगी…उस की बात में ऐसा जादू कि देखते ही देखते आठ दस मंजन की शीशीयां उस ने बीस बीस रूपये में बेच दीं।

एक शीशी मैंने भी उस से देखने के लिये ली ……कुछ नहीं लिखा, क्या है उसमें क्या नहीं…… बहुत दुःख होता है यह सब देख कर कि आम आदमी इस तरह के मंजन, अंजन (सुरमा), आंखों में डाली जाने वाली बूंदे (Eye drops), हाजमे दुरूस्त करने वाली गोलियां, चूर्ण…. और तो और दर्द-निवारक ऐलोपैथिक दवाईयां भी बसों में बिकती देखी जा सकती हैं।

अब तो ऐसा नहीं दिखता, वरना मैं तो बहुत बार देख चुका हूं कि सेल्समैन इच्छुक लोगों की आंखों में बूंदे डाल भी दिया करता था .. दावा भी कर दिया करता था कि इस से मोतिया बिंद भी ठीक हो जायेगा।

और यह जो चूर्ण, गोलियां….. एक डिब्बी से निकाल कर थोड़ा थोड़ा बांटते अकसर देखा जाता था लेकिन अब इस तरह की मंजर बहुत समय से दिखा नहीं, शायद लोग कुछ कुछ समझने लगे हैं।

और यह जो मंजन की बात कर रहा था, पहले तो बसों के कईं रूटों पर दांत सफ़ेद करने वाले मंजन को भी लोगों की हथेली पर रख कर उसे दांतों पर मसलने के लिये कहा जाता था।

इन जगहों पर बिक रही चीज़ों के उत्पादन, बिक्री, गुणवत्ता पर कोई भी नियंत्रण नहीं ……पता नहीं कौन कौन सी अजीबोगरीब वस्तुएं इन्होंने इस में मिलाई होती हैं…..फायदा तो कोई होना रहा लेकिन इन से नुकसान पहुंचने की मेरी गारंटी है। ऐसा कोई मंजन नहीं जो दांत के कीड़े को मार सके ….वैसे एक बात है जब दांत का कीड़ा नाम का कोई कीड़ा होता ही नहीं तो वह मरेगा कैसे? ….और किसी भी मंजन से पायरिया अपने आप ठीक होने से रहा …और न ही ये पाउडर सांस की दुर्गंध का समाधान हैं।

कल मेरी अगली सीट पर बैठे एक वयोवृद्ध सरदार जी ने भी एक मंजन की डिब्बी खरीदी तो मैं एक दो मिनट सोचता रहा कि इन्हें इसे इस्तेमाल करने के लिये मना कर दूं कि नहीं … लेकिन मन माना नहीं किसी अनजान बंदे से इस तरह की लिबर्टी लेने के लिए…………….और एक बात की मुझे एक कहावत का भी ऐन वक्त पर ध्यान आ गया …..
Keep  your mouth shut and let people think that you are a fool rather than  opening  your mouth and removing  all their doubt.

सीवर में फेंका जा रहा बायो मेडिकल वेस्ट

अकसर मैं किसी कैमिस्ट या मैडीकल लैब आदि के आगे सिरिंज अथवा सूईंयां आदि पड़ी देखता हूं तो उन्हें ज़रूर टोक देता हूं …उस समय केवल उस क्षेत्र की सफ़ाई करने वाले बंदे का ही मुझे ध्यान होता है। कैमिस्ट ने अपनी चीज़ बेच दी, ग्राहक अपनी जगह डिस्पोज़ेबल सिंरिंज से इंजैक्शन लगवा कर निश्चिंत (really?) हो गया …..बस, क्या हमारा सरोकार बस यहीं तक है? ….उस के बाद उसे जो जो हैंडल करेगा, छुयेगा, बीनेगा…..वो चाहे जिये या मरे, भयंकर बीमारी का शिकार हो जाए,इस से हमें क्या? ……बायोमैडीकल वेस्ट जहां भी पैदा हो रहा है, उन सभी को यही मानसिकता बदलनी होगी …अपने आप बदल जाएगी तो ठीक है, वरना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड वाले तो बदल ही देंगे।

कैमिस्टों, छोटी मोटी लैबों, छोटे मोटे नर्सिंग होम्स के बाहर बायोमैडीकल वेस्ट (मैडीकल कचरा) देख कर कभी मैंने यह नहीं सोचा था कि कोई इन सब को सीवर में फैंकने की भी बेवकूफ़ी कर सकता है, आज की ही अखबार से पता चला कि शहर के सीवर डस्टबिन की तरह इस्तेमाल किये जा रहे हैं।

आप को दिखाने के लिेये इसे यहां चिपका रहा हूं…..भयभीत कर देने वाली तस्वीरें हैं, मेन सीवर की सफ़ाई के दौरान निकाला गया बॉयोमेडीकल वेस्ट का ढेर देख कर मन बेहद विचलित हुआ। बस इसी सोच में पड़ा हुआ हूं कि हम आखिर जा किधर रहे हैं? ..कहां जाकर यह दौड़ खत्म होगी!!

बॉयो-मेडीकल वेस्ट मैनेजमेंट का हो रहा कचरा

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मेडीकल वेस्ट का डिस्पोज़ल

इस्तेमाल की गई सिरिंजों, सूईंयों का रीसाईक्लिंग माफ़िया

कांच की सिरिंज और स्टील की सूईँयां

आज एक बार फिर से टाइम्स की रीसाईक्लिगं वाली खबर देख कर बीता ज़माना याद आ गया।

मुझे याद है जब हम लोग छोटे थे और इंजैक्शन की कभी ज़रूरत पड़ती थी तो टीका लगाने आया डाक्टर (ज़्यादातर वह झोलाछाप नीम हकीम ही हुआ करता था)….कांच की सिरिंज और स्टील की सूईं उबालने के लिये कह दिया करता था, उसे चंद मिनट उबाल कर उसे दिया जाता ….और वह टीका लगा कर खिसक लेता था। किसी दूसरे घर में जाता होगा, तो वहां भी उबालने वाली प्रक्रिया तो लाज़मी होती ही थी। यहां यह लिखने का मतलब यही है कि आम जनता यह जान चुकी थी कि कांच की सिरिंज और स्टील की सूईं को बिना उबाले इंजैक्शन लगाना ठीक नहीं है, इस से फोड़ा हो सकता है..इंजैक्शन वाली जगह पक जाती है, बस इतना ही पता होता था हमें और हमारे मां-बाप को।

आज सोचता हूं कि इतना भी पता होना और उबालने वाली बात को हमेशा मानना कोई कम बात तो नहीं थी। हम लोग आधुनिकता की दौड़ते दौड़ंते हांफ से गये लेकिन इस का शायद उस हिसाब से परिणाम मिला नहीं।

डैंटल कॉलेज अस्पताल के दिनों की बात करें …आज से 25 वर्ष पहले की बातें.. वहां पर भी सभी सिरिंज कांच के ही हुआ करते थे और सूईंयां स्टील की ही हुआ करती थीं…लेकिन हमारे पैरामैडीकल स्टॉफ वाले एकदम सचेत.. अच्छी तरह से उबालने के बाद ही हमें उसे थमाया करते थे।

फिर मैडीकल कालेज में जॉब की ..वहां भी एक अच्छा सिस्टम था कि इंजैक्शन के लिये जो भी सिरिंज-सूईं इस्तेमाल की जाएगी ..वह आटोक्लेव ही होगी …आटोक्लेव सूईंयों, सिरिंजो और अन्य सर्जीकल उपकरणों को जीवाणुरहित करने का एक बेहतर तरीका होता है।

औऱ फिर आ गये दूसरी जॉब में… वहां भी आटोक्लेविंग आदि का अच्छा इंतजाम था… लेकिन एक नई व्यवस्था यह थी कि कांच की सिरिंज तो आटोक्लेव होगी ….लेकिन इंजैक्शन के लिये इस्तेमाल की जाने वाली सूईं डिस्पोज़ेबल ही होगी। यह भी अच्छा व्यवस्था थी … यह समय था 192-93 के आस पास जब हैपेटाइटिस बी और एच आई व्ही संक्रमण की दहशत से फैलने लगी थी।

फिर धीरे धीरे सब जगह प्लास्टिक की डिस्पोज़ेबल सिरिंजें एवं सूईंयां ही दिखने लगी …लेकिन बार बार प्रिंट एवं इलैक्ट्रोनिक मीडिया में यह भी दिख ही रहा है कि किस तरह से डिस्पोज़ेबल सिरिंजों एवं सूईंयों को रीसाईकिल किया जा रहा है।

ध्यान आ रहा है एक ऐसी ही मीडिया रिपोर्ट का जिस में एक बड़े से टब में सभी इस्तेमाल की गई सिरिंजो, सूईँयों, अन्य सर्जीकल उपकरणों को धोया जा रहा था —ताकि उन्हें फिर से मार्कीट में उतारा जा सके।

आज की टाइम्स ऑफ इंडिया में यह रिपोर्ट देख कर फिर से चिंता हुई कि किस तरह से हर तरफ़ साईक्लिंग का यह गोरखधंधा हर तरफ़ ही चल रहा है। अब तो लगता है कि छोटे बड़े शहर का कोई फर्क ही नहीं रहा।

टाइम्स की यह खबर देखिये (लिंक लेख के अंत में दिया गया है ) कि किस तरह से अस्पताल में इस्तेमाल की गईं इन सब वस्तुओं को जब फैंक दिया जाता है तो वहां से उसे उठा कर कुछ लोग उसे बेच देते हैं और फिर यह रीसाईक्लिंग का सिलसिला चलता है।

जो मुझे लगता है कि कितने भी नियम बन जाएं, कितने भी प्रदूषण नियंत्रण नियम बन जाएं चब तक अस्पतालों के कर्मचारी इस काम में पूर्ण सहयोग नहीं देंगे, इस रीसाईक्लिग के अजगर से बच पाना अगर नामुमकिन नहीं तो भी बहुत मुश्किल काम है।

इस्तेमाल की गई सिरिंजो एंवं सूईंयो को नष्ट करने का सही ढंग

 

बात केवल यह सोचने की है अगर सभी चिकित्साकर्मी अपनी अपनी ड्यूटी इस ढंग से करें कि उन के द्वारा इस्तेमाल की गई सिरिंज, सूईँ एवं अन्य सर्जीकल उपकरण इस तरह से नष्ट कर दिये जाएं कि उन को फिर से रीसाईक्लिंग कर के इस्तेमाल ही न किया जा सके तो बहुत बेहतर होगा। फिर जब कचरा प्रबंधन (waste disposal  agency) वाले इसे उठा कर उसे डिस्पोज़ ऑफ करेंगे तो किसी तरह के मिसयूज़ का जोखिम भी नहीं रहेगा। इस के बारे में मेरा एक लेख भी देखें जिस का लिंक मैं यहां दे रहा हूं….डिस्पोज़ेबल सिरिंजो एवं सूईंयों का डिस्पोज़ल।

इंस्पीरेशन — Times of India — HIV-infected, recycled syringes sting Kolkata

टीबी के ब्लड-टैस्टों में हो रहा इतना गड़बड़-झाला

पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में ऐसे बहुत से केस देखने-सुनने को मिले जिस में कहा जाता रहा कि टीबी का रोग तो था ही नहीं, बस बेवजह टीबी की दवाईयां शुरू कर दी गईं…और दूसरे किस्से ऐसे जिन में यह आरोप लगते देखे कि टीबी की बीमारी तो डाक्टरों से पकड़ी नहीं गई, ये मरीज़ को और ही दवाईयां खिलाते रहे और जब टीबी का पता चला तो यह इतनी एडवांस स्टेज तक पहुंच चुकी थी कि कुछ किया न जा सका।

अभी दो-चार वर्षों से मैं जब सुना करता था कि टीबी के निदान (डायग्नोसिस) के लिये अब महंगे ब्लड-टैस्ट होने लगे हैं जिन्हें इलाईज़ा टैस्ट भी कहते हैं …Elisa Tests – Blood tests for Tuberculosis. मुझे इन के बारे में सुन कर यही लगता था कि चलो, जैसे भी अब थोड़ा पैसा खर्च करने से टीबी का सटीक निदान तो हो ही जाया करेगा। ये टैस्ट वैसे तो प्राइव्हेट अस्पतालों एवं लैबोरेट्रीज़ में ही होते हैं …लेकिन कुछ सरकारी विभाग अपने कर्मचारियों को इस तरह के टैस्ट बाज़ार से करवाने पर उस पर होने वाले खर्च की प्रतिपूर्ति कर दिया करती हैं — reimbursement of medical expenses.

मैं इस टैस्ट के बारे में यही सोचा करता था कि एक गरीब आदमी को अगर ये टैस्ट चाहिये होते होंगे तो वे इस का जुगाड़ कैसे कर पाते होंगे, लगभग पिछले एक वर्ष से यही सोचता रहा कि डॉयग्नोसिस तो हरेक ठीक होना ही चाहिये —यह तो नहीं अगर किसी के पास पैसे नहीं हैं इस टैस्ट को करवाने के लिये तो वह बिना वजह टीबी की दवाईयां खाता रहे या फिर बीमारी होने पर भी दवाईयां न खा पाए क्योंकि कुछ भी पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता।

ये हिंदोस्तानी लोग पूजा पाठ बहुत करते हैं ना ….और कोई इन की सुने ना सुने, लेकिन ईश्वर इन की बात हमेशा सुन लेते हैं। इस केस में भी यही हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह चेतावनी दी है कि ये जो टीबी की डॉयग्नोसिस के लिये जो ब्लड-टैस्ट भारत जैसे देशों में हो रहे हैं, इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

भरोसा नहीं किया जा सकता – यह क्या? डब्ल्यू.एच-ओ को यह चेतावनी जारी करने के लिये इसलिये विवश होना पड़ा क्योंकि इन एलाईज़ा किटों के द्वारा जितने भी टीबी के लिये ब्लड-टैस्ट किये जा रहे हैं…उन में से लगभग 50 प्रतिशत –जी हां, पचास प्रतिशत केसों में रिज़ल्ट गलत आते हैं …इस का मतलब यह है कि इन टैस्टों को करवाने वाले कुछ लोग तो ऐसे हैं जिन्हें यह बीमारी न होते हुये भी उन की टैस्ट रिपोर्ट पॉज़िटिव (false positives) आएगी और उन की टीबी की दवाईयां शुरू कर दी जाएंगी। और कुछ बदकिस्मत लोग ऐसे होंगे (होंगे, होंगे क्या, होते हैं, WHO जब खुले रूप में यह कह रही है तो कोई शक की गुंजाइश ही कहां रह जाती है!) जिन को यह रोग होते हुये भी उन का रिज़ल्ट नैगेटिव (false negatives) आता है ….परोक्ष रूप से उन्हें दवाईयां दी नहीं जातीं और उन का रोग दिन प्रति दिन बढ़ता जाता है …संभवतः जिस का परिणाम उन के लिये जानलेवा सिद्ध हो ही नही सकता, होता ही है।

टीबी के लिये होने वाले इन ब्लड-टैस्टों की पोल तो आज विश्व स्वास्थ्य संगठन में खोली जिस के लिये सारा विश्व इन का सदैव कृतज्ञ रहेगा… पूरी छानबीन, संपूर्ण प्रमाणों के आधार पर ही इस तरह की चेतावनी जारी की जाती है और यहां तक कहा गया है कि इन पर प्रतिबंध लगाये जाने की ज़रूरत है।

मुझे सब से ज़्यादा दुःख जो बात जान कर हुआ वह यह कि इस तरह की टैस्ट की किटें तो उत्तरी अमेरिका एवं यूरोप में तैयार किया जाता है लेकिन उन का इस्तेमाल भारत जैसे विकासशील देशों में किया जाता है … ऐसा क्यों भाई? …यह इसलिये कि वहां पर इस तरह के टैस्टों के ऊपर नियंत्रण एकदम कड़े हैं, कोई समझौता नहीं …यहां तक कि अमेरिकी एफ डी ए (फूज एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) ने इस तरह के टैस्टों को अप्रूव ही नही किया ….इसलिये जिन देशों में जहां इस तरह की व्यवस्था बिल्कुल ढीली ढाली है, वहां ये टैस्ट बेधड़क किये जाते रहे हैं ….और भारत भला फिर कैसे पीछे रह जाता लेकिन लगता है आज डबल्यू एच ओ के कहने पर अब हमारा नियंत्रण दस्ता भी हरकत में आयेगा और शायद इन टैस्टों पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया शुरू हो जाए…काश, ऐसा जल्द ही हो जाए।

मैं सोच रहा था …ये जो तरह तरह के घोटाले होते हैं इन पर तो हम चर्चा करते थकते नहीं लेकिन इन मुद्दों का क्या….कितने वर्षों तक इस तरह के टैस्ट होते रहे जिन के नतीज़े भरोसेमंद थे ही नहीं, जिन की वजह से तंदरूस्त लोग टीबी की दवाईयां खाते रहे होंगे और कुछ लोग टीबी से ग्रस्त होते हुये भी रिपोर्ट ठीक ठीक होने पर जिन्होंने इस की दवाई न लेकर अपना रोग साध्य से असाध्य कर लिया होगा और एक तरह से टैस्ट करवाना ही तो जानलेवा सिद्ध हो गया।

अच्छा मुझे यह बतलाईये, यह जो यू.के है यह यूरोप ही में ही हैं ना ….. देखिये मैं पहले ही बता चुका हूं कि मुझे जिस ने भी मुझे मैट्रिक में ज्योग्राफी में पास किया, मैं उस का सारी उम्र उस महात्मा का ऋणी रहूंगा…. हां, तो खबर दो-तीन महीने पहले थी कि जो लोग यूके में बाहर से आते हैं उन का टीबी चैकअप ब्लड-टैस्ट के द्वारा किया जाना चाहिये क्योंकि उन की स्क्रीनिंग जो एक्स-रे से होती है, उस की वजह से कईं केस मिस हो जाते हैं क्योंकि उस रिपोर्ट में लिखा था कि ये एक्स-रे केवल सक्रिय टी बी (active TB) को ही पकड़ पाते हैं।

और एक बात …कुछ पंक्तियां विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा जारी किये गये एक दस्तावेज से लेकर आप के समक्ष रख रहा हूं …हु-ब-हू … यह इस दस्तावेज़ के पेज़ नं.6 पर लिखी गई हैं……

“ India is the country with the greatest burden of TB, nearly 2 million incident cases per year. Conservatively, over 10 million TB suspects need diagnostic testing for TB each year. Findings from a country survey done for the Bill & Melinda Gates Foundation showed that the market for TB serology in India exceeds that for the sputum smears and TB Culture; six major private lab. Networks (out of hundred) perform more than 500,000 TB Elisa Tests each year, at a cost of approx. 10 US Dollars per test or 30 Dollars per patient (for 3 simultaneous tests). Overall an estimated 1.5 million TB Elisa Tests are performed every year in the country, mostly in private sector.
(Commericial Serodiagnostic Tests for diagnosis of Tuberculosis— WHO Policy Statement 2011…Page 6)

सोच रहा हूं मैंने यहां यह लिख कर कौन सा तीर मार लिया —सौ दो सौ पाठक पढ़ लेंगे …और फिर भूल जाएंगे … लेकिन जिन लोगों तक इस आवाज़ को पहुंचने की ज्यादा ज़रूरत है, उन तक भला यह सब कैसे पहुंचे, अब विश्व स्वास्थ्य संगठन की साइट को तो आम आदमी खंगालने से रहा …ज्यादा से ज्यादा वह किसी न्यूज़ चैनल पर खबरें देख-सुन लेगा …और एक बात, एक न्यूज़-चैनल को इस का पता चल गया लगता है क्योंकि आज दोपहर खाना खाते समय मेरे कानों में कुछ आवाज़ पड़ तो रही थी कि विदेशों में लोग टीबी के निदान (diagnosis) के लिये डीएनए टैस्ट करवाते हैं………..यह एक बहुत महंगा टैस्ट होता है शायद दो हज़ार रूपये में होता है …अब इस से पहले कि लोगों तक इलाईज़ा टैस्टों पर प्रतिबंध लगाने की ख़बरें पहुंचे क्यों ना पहले ही से जाल बिछा कर रखा जाए, है कि नहीं?

अरे यार, डीएनए टैस्ट की बात कैसे यहां छेड़ दी … इस पर तो वैसे ही इतना बवाल खड़ा हुआ है … यह तो एक राष्ट्रीय मुद्दा बना हुआ है लेकिन वह टैस्ट टीबी की जांच के लिये नहीं मांगा जा रहा , वहां माजरा कुछ और ही है … एक युवक कह रहा है कि एक राजनीतिज्ञ उस का पिता है, इसलिये उस का डीएऩए टैस्ट करने की गुहार लगा रहा है लेकिन नेता जी कह रहे हैं कि उन्हें टैस्ट करवाने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता।

चलिये, चर्चा यहीं खत्म करें ……………Thanks, WHO for calling for ban on such blood tests. Tons of thanks, indeed.