पैटर्निटी टैस्ट करेगा बची-खुची कसर भी पूरी

हां, मैं शॉट-ब्रेक लेकर हाज़िर हूं…..आपने आज की ताजा खबर तो अब तक देख ही ली होगी…..रिश्तों की अग्निपरीक्षा – बच्चे का पिता होने को लेकर संदेह में करा रहे डीएऩए जांच।
तो बतलाईए आप का क्या ख्याल है इस के बारे में? –अपनी बात शुरू करने से पहले मेरा ध्यान सब से पहले उस व्हीआईपी केस की तरफ़ जा रहा है जिस में एक युवक बार बार चिल्लाए जा रहा था कि मैं उस नेता का छोरा हूं …यह नेता मेरा बाप है…..लेकिन कोर्ट-कचहरियों के बारंबर कहने पर भी उस का टैस्ट न हो सका जिस से उस युवक की बात की पुष्टि अथवा खंडन हो सके। बड़ा आदमी तो आखिर बड़ा ही होता है ना …..उम्र की बात नहीं कर रहा हूं…..बस, वह टेस्ट के लिये सैंपल नहीं दे रहा था , नहीं दे रहा था, बस नहीं दे रहा था, कोई ज़ोर-जबरदस्ती है क्या …..मान लो वह सब को कह रहा था उखाड़ लो यार मेरा जो उखाड़ना है, मैं अपने ऊपर इस टेस्ट की अनुमति नहीं देता।
पता नहीं आगे उस केस का क्या बना होगा, लेकिन उस के बाद मैंने उस स्टोरी को फॉलो करना ही बंद कर दिया था….क्या फायदा ऐसी सिरदर्दी में पड़ने का।
पता नहीं इस समय मुझे तसलीमा नज़रीन की फिल्म लज्जा का क्यों बार बार ध्यान आ रहा है ….this movie moved me beyond words!  वही पुरूष प्रधान समाज में किस तरह से नारी हमेशा से घोर शोषित रही है, इस का चित्रण मार्मिक चित्रण फिल्म में किया गया है।
हां, तो बात चल रही थी…पैटर्निटी टैस्ट की …. सोचने की बात है कि आज तक किसी महिला ने तो अपने पति से ऐसी इच्छा ज़ाहिर नहीं की होगी कि बेटे का पैटर्निटी टैस्ट करवा लो….. लेकिन बात वही है कि अगर इस तरह का टैस्ट करवाए जाने की बात भी उठी है तो यह अपने आप में एक गंभीर मुद्दा है ….. इस का सीधा मतलब कि आदमी को अपनी औरत के चरित्र पर संदेह है, मैं ज़्यादा हाई-फाई प्रोफाइल वाले लोगों की बात अकसर नहीं करता लेकिन अगर मिडल क्लास लोगों के मन में मीडिया के द्वारा इस तरह के शक के बीज बोए जाएंगे तो फिर उस से तैयार होने वाली फसल काटने के लिये भी समाज को तैयार ही रहना होगा।
रिपोर्ट कुछ भी आए …वह तो बाद की बात है …लेकिन अगर टैस्ट में किसी पुरुष की पैटर्निटी सिद्ध (woh, what a relief!!………hip!hip! hurray!! Now I know I am the real father of my son!!……honey, let’s celebrate!!) …हो भी जाये तो भी उस की बीवी और बच्चा जब बड़ा होगा उस पर बाप के इस टैस्ट करवाने के फैसले का क्या असर होगा, यह भी कोई लिखने की बात है !!
लेकिन अगर टैस्ट में आ गया कि जिसे वह अपना छोरा समझ रहा था उस पर तो किसी और की ही मुहर लगी निकली ….इस के परिणाम भी कितने विस्फोटक निकलेंगे, भारत जैसी ढोंगी सामाजिक व्यवस्था के लिए इस का क्या मतलब है, यह भी कोई लिखने की बात नहीं है !!
सीधी सी बात है ..जो भी टैस्ट, मैडीकल मशीनें बाज़ार में आ चुकी हैं उन के लिए बकरे भी तो तैयार करने होंगे ….यह बात जग जाहिर है किस तरह से सीटी स्कैन, एमआरआई आदि सुविधाओं का घोर मिसयूज़ भी हो रहा है …..क्यों? …मुझ से ही क्यों सुनना चाहते हो भाई!! इसी तरह से जब ये टैस्ट विदेशों से पहुंच चुके हैं तो इन की मार्कीट भी तैयार होते देर न लगेगी।
बड़ी अजीब सी बात लगी कि आधार जैसे कार्ड पर तो इस तरह के डीएऩए चिप लगाने की बात कभी नहीं सुनी लेकिन स्कूलों में डीएनए चिप युक्त पहचान पत्र बनाने पर विचार किया जा रहा है। क्या ज़रूरत है, स्कूलों में बच्चों के लिये शौचालय एवं पेयजल की सुविधाओं को उन्नत करने की बजाए अगर इस तरह के चक्करों में पड़ा जाएगा तो बात बनेगी नहीं।
जो ढंग की बात होगी उस की बात कोई यहां करता नहीं …. मैं पिछले लंबे समय से विवाह पूर्व मैडीकल परीक्षण आदि की बात उठाता रहा हूं ….. लेकिन उस मुद्दे को कभी मीडिया में इतनी शिद्दत से नहीं देखा। लेकिन अगर बाजार की शक्तियों का बश चले तो ये भारतीय गृहणियों को इस बात के लिये भी उकसा दें कि अपने पतिदेव के हरेक आफिशियल टूर के बाद उसे तभी अपने आप को छूने की इजाजत देना जब वह फ्रेश एचआईव्ही की जांच की निगेटिव रिपोर्ट उस के हाथ में होगी….और तो और अगर मार्कीट का मूड समझाने का होगा तो यह भी उसे समझा दिया जाएगा कि एचआईव्ही संक्रमण में 45 दिन के विंडो पीरियड का क्या मतलब है और क्यों उसे टूर से लौटने पर विंडो पीरियड के दौरान दूसरे कमरे में रहने को कहा जाए ……..अनगिनत संभावनाएं, शक की हज़ारों—लाखों सूईंयां……… सीधे सादे आम आदमी को कहां कहां चुभो कर दम लोगो, भाई।
मेरे विचार में अगर पढ़े लिखे लोग इस तरह की बात कर रहे हैं कि पैदा होते ही बच्चों का डीएनए टेस्ट आसान होता है …इस से बच्चों की अदला-बदली भी नहीं होगी… अब इस के ऊपर क्या टिप्पणी दें। हो गये अगर कभी कभार अदला बदली के एक-दो केस मानवीय चूक की वजह से और पैटर्निटी टेस्ट ने फैसला कर दिया तो क्या बडी बात है……….अब उसे आधार बना कर हरेक शिशु का पैटर्निटी टैस्ट करवाना न तो कभी भी इस देश में संभव जान पड़ता है और शायद न ही यह उचित होगा………जिस देश में गर्भवती महिलाएं अपनी खून की कमी तो पूरी कर नहीं सकतीं, ठीक से खाना खा नहीं पाती, नियमित जांच करवा नहीं पाती, सरकारी संस्थानों में अपनी डिलिवरी करवा नहीं पाती ……….अब उस के पति के लिये क्या प्रसव के तुरंत बाद यह जानना ही सब से महत्वपूर्ण है कि उस को लोंडा उसी का अपना ही है, उस पर किसी दूसरे की स्टांप नहीं है।
क्या यार, इस विषय पर तो लिखते ही चला जाऊंगा…… बस करता हूं ….स्कूलों की बात कि उन्हें डीएऩए युक्त चिप लगाना है, इस के बारे में क्या लिखूं……लेकिन इस टेस्ट का खर्च कौन भरेगा …. मनरेगा में मजदूरी करने वाला किसान या कोई सरकारी संस्थान ………कोई भी हो, चांदी ही चांदी हो जाएगी (लेकिन कूटेगा कौन? —मुझे क्या पता!) …………….करोड़ों, अरबों के टैंडर खुलेंगे, मज़ा आ जाएगा……..है कि नहीं ?
और जहां तक बच्चों और पिता के नमूने मेल नहीं खाने की बात है, यह तलाक का आधार भी बनता है…….अब इस के बारे मे क्या कहें, अब अगर कोई बंदा इस तरह का टैस्ट करवाने की मानसिकता रखता है, तो फिर किसी दूसरी को लाने के चक्कर में कहीं वह मेल खाते हुए टेस्ट की रिपोर्ट को न मेल खाती हुई रिपोर्ट में बदलवा ले तो !!……………..अच्छा, आप यही सोच रहे हैं कि टेस्ट की रिपोर्टें ऐसे थोड़े ही बदली जाती हैं………………अच्छा, भाई, मैं हार गया, आप यही खुशफहमी पाले रखें और मुझे अपना अगला टॉपिक ढूंढने की अनुमति दें।

जाते जाते उस महान फिल्म एक फूल दो माली के उस बेहतरीन गीत का ध्यान आ गया ….सो यह चिपका रहा हूं …..कुछ मिलती जुलती ही कहानी है…..

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