एक ईमानदार बीड़ी पीने वाले की आप बीती

आज एक ईमानदारी बीड़ी पीने वाले से मुलाकात हो गई। वह आया तो था मेरे पास एक हिलते हुए दांत के लिए था लेकिन उस के मुंह में झांकने पर यह दिखा कि तंबाकू की वजह से उस के मुंह में गड़बड हो रही है।

गाल के अंदरूनी हिस्से में इरैथ्रोप्लेकिया (मुंह के कैंसर की पूर्व-अवस्था)

यह उस 56 वर्षीय बंदे के गाल के अंदरूनी हिस्से की तस्वीर है और यह जो बदलाव आप उस के मुंह के अंदर देख रहे हैं इसे चिकित्सा भाषा में एरिथ्रोप्लेकिया (erythroplakia) कहते हैं.. यह मुंह के कैंसर की पूर्व-अवस्था है (Oral pre-cancerous condition). क्या यह बदलाव इस बंदे में आगे चलकर कैंसर में तबदील होगा, अगर ऐसा होना है तो यह कितने समय में हो जायेगा –इस का जवाब देना मुश्किल है।

लेकिन एक बात तय है कि अगर यह बंदा बीड़ी मारना छोड़ दे और इस बदले हुये गाल के अंदरूनी हिस्से का उपचार करवा ले तो बचाव ही बचाव है। लेकिन यह क्या यह तो बीड़ी छोड़ने की बात सुनने को तैयार ही नहीं है।

उस ने बताया कि वह स्कूल के दिनों से ही बीड़ी पी रहा है — एक बात ज़रूर है कि उन दिनों में यह काम चुपके चुपके होता था लेकिन बड़े होने पर नौकरी-वोकरी मिलने पर यह काम धड़ल्ले से होने लगा …दो एक बंडल पी जाना तो कोई बात ही नहीं है।

मैं बहुत बार तंबाकू के मुंह के अदंरूनी हिस्सों पर होने वाले प्रभाव के बारे में, तंबाकू की मुंह के कैंसर में भूमिका के बारे में लिखता रहता हूं … कहीं पढ़ने वाले ये तो नहीं समझते कि तंबाकू के दुष्प्रभाव मुंह ही में होते हैं…नहीं नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, वह क्या है कि मेरा काम ही सारा दिन लोगों के मुंह में तांक-झांक करने का है, इसलिए मुंह में होने वाले दुष्प्रभाव तुरंत मेरी नज़र में आ जाते हैं। और कईं बार मरीज़ों की भीड़ के वजह से ऐसे बंदों के दूसरे अंगों के बारे में बात करने का अवसर ही कहां मिलता है।

लेकिन यह बंदा कुछ अलग था. मुझे भी बड़ा अजीब सा लगा कि यह तो सीधा ही कह रहा है कि बीड़ी तो मैं छोड़ ही नहीं सकता। हां, उस ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए आगे कहा कि डाक्टर साहब मेरे दो आप्रेशन हो चुके हैं, हार्ट अटैक भी हो चुका है। उस ने अपने पेट में आप्रेशन के निशान भी तुरंत दिखा दिए।

वह बता रहा था कि पेट के अल्सर के आप्रेशन के लिए वह पीजीआई चंडीगढ़ में तेईस दिन दाखिल भी रहा …. लेटे लेटे कैसे पीता बीड़ी? –इसलिए उसे उन दिनों के दौरान ऐसे लगा जैसे कि अब तो जैसे बीडी की आदत छूट गई …लेकिन नहीं ऐसा कैसे हो पाता, जैसे ही वह अपनी पुरानी दोस्ती की मंडली में वापिस आया तो बस झट से वापिस शुरू हो गया बीड़ी पीने-पिलाने का दौर।

बता रहा था कि पहले तो बच्चे कभी खास मना नहीं करते थे लेकिन जब से हार्ट-अटैक हुआ तब ही से उस के बच्चे जो अब बड़े बडे हो चुके हैं, उस के पीछे पड़े रहते हैं। यह बात बताते हुये वह हंस भी पड़ा कि नौबत यहां तक आ गई कि इसी चक्कर में होने वाली खींचा-तानी के दौरान बनियान पर फट चुकी है—यह पूछना मैंने कतई मुनासिब इसलिए नहीं समझा कि उस की या बेटों की !!

जब मैंने उसे यह ऊपर वाली तस्वीर दिखाई और साथ में यह समझाने की कोशिश की कि यह तो मुंह के अंदर जो तंबाकू ने कहर बरपाया हम ने देख लिया लेकिन शरीर के अंदर क्या क्या प्रभाव हो रहे हैं, वे तो हार्ट अटैक, पेट के अल्सर जैसे रोगों के द्वारा ही पता चलता है ….. मेरे इतना कहने पर उस ने बताया कि उस को पक्षाघात का अटैक (paralysis) भी कुछ महीने पहले हो चुका है, मुहं टेढ़ा हो गया था, शरीर के एक तरफ़ का हिस्सा बिल्कुल चल नहीं रहा था लेकिन फिर जैसे तैसे ठीक हो गया हूं। इस अटैक की वजह से वह कुछ दिन बोल भी नहीं पाया था।

लेकिन फिर भी वह अपनी बीड़ी न छोड़ने वाली बात पर अडिग है …कह रहा था कि मैंने जब भी इसे छोड़ने की कोशिश की है तो मैं पागल जैसा हो जाता हूं …. काम ही नहीं कर पाता हूं …बीड़ी पीते ही चैन की सांस आती है।

मेरे इतना कहने पर कि बीड़ी छुड़वाने के लिए तो एक च्यूंईंग गम (nicotine chewing gum) भी आ गई है …उस ने बताया कि उस ने बीड़ी छुड़वाने के लिये कुछ देसी दवा भी लेनी शुरू कर दी … लेकिन उस दवाई से तो बीड़ी से नफ़रत क्या होनी थी, बल्कि यह लत दौगुनी हो गई। फिर बताने लगा कि उस ने सभी पापड़ बेल कर देख लिये हैं …तलब होने पर सूखा आंवला मुंह में रखने से लेकर, छोटी इलायची, दालचीनी ….सब कुछ अजमा लिया है लेकिन अब उसने जान लिया है कि यह बीड़ी इस जीवन में तो उस का दामन नहीं छोड़ेगी।

पता नहीं जाते जाते उस के मुंह मे यह कैसे निकल गया कि मैं इस आदत से निजात पाना चाहता हूं और कोई ऐसा मिले जो मुझे इस आदत से छुटकारा दिला दे तो मैं उसे एक हज़ार का ईनाम तक देने को तैयार हूं …जब वह यह बात कर रहा था उस समय मेरे अस्पताल का एक अन्य कर्मी अंदर दाखिल हुआ था, मैंने उसे संबोधित करते हुये कहा कि देखो, यह यह चैलेंज है इस बंदे का … इन की बीड़ी छुड़वाओ और एक हज़ार का ईनाम पाओ … और इस का फायदा यह होगा कि तुम्हारी बीड़ी की आदत भी छूट जायेगी। लेकिन उस ने तो यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि मुझे तो कुछ दवाईयां लिख दो, बहुत से मरीज़ उस का इंतजार कर रहे हैं।

यह बंदा यह भी कह गया कि मैंने तो अपने घर वालों को यहां तक कह दिया है कि देखो, मैं बीड़ी तो किसी कीमत पर नहीं छोडूंगा —अगर मुझ पर ज़्यादा दबाव डालोगे तो मैं घरबार सब कुछ छोड़ कर कहीं चला जाऊंगा, फिर मुझे ढूंढते रहना।

अब उस की यह बात सुन कर तो मैं भी चौंक गया … लेकिन एक बात का विचार ज़रूर आया कि एक हज़ार के ईनाम को जो घोषणा उस ने की वह अरबों-खरबों की सेहत की तुलना कितनी कम है!!

आज बीड़ी के बारे में लिखने का ध्यान इसलिए आ गया कि सुबह ही दा हिंदु में एक अच्छी खबर पढ़ने को मिली की अखिलेश यादव ने यू पी में तंबाकू पर नियंत्रण करने के लिये कमर कस ली है … आप भी यह जान कर चौंक जाएंगे कि बंबई के टाटा मैमोरियल अस्पताल में मुंह के कैंसर के जितने रोगी इलाज करवाने आते हैं उन में से हर तीसरा बंदा उत्तर प्रदेश से संबंध रखने वाला होता है। बहुत चिंताजनक बात है … और मैं इस कदम के लिए अखिलेश यादव को बधाई देता हूं…………….जहां भी, जिस भी रूप में इस तंबाकू की ऐसी की तैसी करने की बात होती है तो मैं वाहवाई किये बिना नहीं रह सकता। और जहां तक मुंह के कैंसर की बात है …. ये मरीज़ भी अकसर गंभीर अवस्था में ही टाटा अस्पताल जैसी जगह तक पहुंचते हैं … यह भी एक हारी हुई लड़ाई लड़ने जैसी ही बात होती है …. जब 23-24 साल से युवा इस मुंह के कैंसर का निवाला बनने लगें तो मामला सच में बिल्कुल गड़बड़ है।
Action Plan soon to make UP Tobacco-free

कईं बार सोचता हूं कि इस धूम्रपान को इस तरह के गानों ने भी तो कहीं न कहीं बढ़ावा दिया ही होगा ….

 

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भांग पीने से होता है कहीं ज़्यादा नुकसान

भांग के बारे में मेरा ज्ञान बहुत सीमित है —बस, भांग का नाम आते ही मुझे याद आ जाता है वह सुपर-डुपर गीत—जय जय शिव शंकर…कांटा लगे न कंकर और दम मारो दम…मिट जाये गम। इस के साथ ही ध्यान में आ जाता है भारत का एक धार्मिक त्योहार जिस में भांग को घोट कर पीने की एक परंपरा सी बना रखी है… कुछ लोग होली के दिन भांग के पकौड़े भी खाते-खिलाते हैं —ऐसे ही एक बार किसी ने हमारे होस्टल में भी शरारत की थी – और बहुत से छात्रों की हालत इतनी खराब हो गई थी कि उन्हें अस्पताल में दाखिल करना पड़ा था।

और एक ध्यान और भी आता है भांग का नाम लेने से —कुछ नशा करने वाले लोग कुछ सुनसान जगहों पर अपने आप उग आए भांग के पौधों से पत्ते उतार के उन्हें हाथों से मसल मसल कर फिर उन्हें कागज में लपेट कर एक सिगरेट-नुमा डंडी सी तैयार कर उसे पीते हैं। और तो और धार्मिक स्थानों पर कुछ तथाकथित साधू का वेश धारण किये हुये लोग भी भांग का खूब प्रयोग करते हैं।

हम तो हैं हिंदोस्तानी –हमारी बात कुछ और है …और अमीर देशों में रहने वाले गोरे लोगों की बात कुछ और ..वे साधन-सम्पन्न लोग हैं, कोई भी शौक पाल सकते हैं। लेकिन मुझे कल ही पता चला कि वहां पर भी भांग के सिगरेट पीने का जबरदस्त क्रेज़ है…. बहुत ही ज्यादा हैरानगी हुई यह जान कऱ।

ब्रिटेन के चिकित्सा वैज्ञानिकों ने यह रिसर्च की है कि यू के में भांग पीने वाले यही समझते हैं कि यह सिगरेट के मुकाबले में बिलकुल भी नुकसान दायक नहीं है।

लेकिन सच यह है कि भांग पीना भी सिगरेट पीने की तरह बहुत ही ज्यादा नुकसान दायक है। यह इसलिये है कि इसे पीने वाले इस का कश बहुत गहरा खींचते हैं जिस की वजह से सिगरेट के मुकाबले में कहीं ज्यादा टॉर और कार्बनमोनोआक्साईड गैस वे फेफड़े के अंदर खींच लेते हैं। इसलिये फेफड़े का कैंसर, ब्रोंकाइटिस और टी बी जैसे रोग पैदा होने का डर तो बना ही रहता है।

भांग का पौधा

रिसर्च से यह भी पता चला है कि एक वर्ष तक रोज़ाना भांग का एक सिगरेट पीने से फेफड़े का कैंसर होने का जो रिस्क होता है वह उतना ही है जितना एक वर्ष तक रोज़ाना बीस सिगरेट पीने से होता है।

आज जब मैं बी बी सी न्यूज़ पर यह खबर पढ़ रहा था तो यही सोच रहा था कि आखिर क्यों लोग विदेशों में जाकर पढ़ाई करने के लिये आतुर होते हैं….. ठीक है वहां कुछ आधुनिक ज्ञान सीख लेते होंगे, लेकिन बहुत ही और चीज़ें भी तो सीख ही लेते होंगे ….अब यह भांग पीने की ही बात देखिये, मैं रिपोर्ट में यह पढ़ कर दंग रह गया कि वहां पर लगभग 40 प्रतिशत लोग इस का इस्तेमाल अपने जीवनकाल के दौरान कर चुके हैं।

अगर पर इस प्रामाणिक शोध के बारे में विस्तार से पढ़ना चाहें तो इस लिंक पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं….Health Risks of Cannabis ‘underestimated’ , experts warn.. जो भी हो, मेरे लिये तो यह एक बहुत बड़ी खबर थी। मुझे लगता था कि यह केवल हिंदोस्तान की ही समस्या है …. लेकिन यहां तो हमाम में सारे …..!!

 

पंजाब के स्कूलों में अब पढायेंगे नशा-मुक्ति

अच्छा लगा यह जान कर अब पंजाब के स्कूलों में बच्चों को नशा-मुक्ति से संबंधित जानकारी दी जाएगी। और इसे स्कूल के करिकुलम (सिलेबस) में ही डाल दिया जायेगा।
मुझे याद है कि आज से लगभग तीस साल पहले जब हम लोग डैंटिस्ट्री की एबीसी समझ रहे थे तो चर्चा गर्म थी कि अब स्कूली बच्चों की किताबों में एक पाठ मुंह की साफ़-सफ़ाई के बारे में डाला जायेगा….लेकिन जैसे होता है, इस लालफीताशाही के चलते कभी इस तरह का कोई पाठ किताबों जगह ले पाया कि नहीं, मुझे पता नहीं।
लेकिन पंजाब सरकार का यह फ़ैसला प्रशंसनीय है कि नशामुक्ति से बच्चों को कच्ची उम्र में ही पढ़ा दिया जायेगा…या यूं कहूं कि उन के मनों में नशे के प्रति नफ़रत के बीज बो दिये जाएंगे। बिल्कुल ठीक है, ये बीज तो जितनी जल्दी बोने शुरू किए जाएं उतना ही ठीक है।
हां, तो जब मुझे यह खबर मिली कि नशामुक्ति से संबंधित जानकारी स्कूली शिक्षा का एक हिस्सा बन जाएगी तो पहले मैंने भी यही सोचा कि शायद नसीहत की घुट्टी पिलाने वाला एक-आध चैप्टर डाल दिया जायेगा किताबों में …..लेकिन मेरा अंदाज़ा गलत निकला… क्योंकि पता चला है कि स्कूलों में सुबह मार्निंग असैंबली के समय इस टॉपिक पर विचार विमर्श किया जायेगा।
पंजाब सरकार की यही मंशा है कि छोटे बच्चे को इस नशे की दलदल में गिरने से छोटी उम्र में ही बचा लिया जाए क्योंकि स्कूली बच्चों को तरह तरह के नशों में लिप्त पाया जाना आज समाज के लिए एक बड़ी सिरदर्दी बन चुका है।
स्कूलों के सूचना-पट्टों पर नशामुक्ति से संबंधित एक नारा अथवा संदेश लिखा जाया करेगा….. और इस स्लोग्न से संबंधित, इस टॉपिक पर पोस्टर कंपीटिशन भी स्कूल स्तर पर आयोजित हुआ करेंगे।

चंडीगढ़ स्टेशन के आटो-स्टैंड पर यह देख कर अच्छा लगा...

महीने के आखिर दिन जो बाल सभा (स्टूडैंट मीटिंग) होती है, उस में भी इस टॉपिक से संबंधित गतिविधियां हुआ करेंगी जिन में स्किट, कविता पाठ, फैंसी ड्रेस, डिबेट एवं भाषा प्रतियोगिता ….इसी विषय पर हुआ करेंगी। तंबाकू निषेध दिवस एवं अंतर्राष्ट्रीय ड्रग एब्यूज़ दिवस पर विशेष रैलियां निकाली जायेंगी।
यही नहीं, जो बच्चे इस नशे रूपी खाई में गिर चुके हैं उन्हें उस में से निकालने के भरपूर प्रयास किये जाएंगे ….और यह सब होना बच्चों की ऊर्जा को सही दिशा देकर जैसे कि खलेकूद गतिविधिओं को बढ़ावा दिया जायेगा, बच्चों द्वारा विभिन्न नशों से होने वाले नुकसान पर एक कोलाज (collage) तैयार किया जायेगा जिस स्कूल के नोटिस-बोर्ड पर लगाया जायेगा।
पंजाब सरकार को बहुत बहुत बधाई ऐसा सोचने के लिये और इस संवेदनशील मुद्दे के लिये इतनी बढ़िया रूप-रेखा तैयार करने के लिये ….आज विभिन्न तरह के नशे पंजाब की जवानों को खाये जा रहे हैं…………लेकिन पंजाब की क्यों, आज देश में हरेक प्रदेश को इस तरह की गतिविधियों की नितांत आवश्यकता है ताकि युवा पीढ़ी इस ज़हर से बच सके।
पंजाब का अनुसरण करते हुये देखते हैं और कौन कौन आगे आता है इस बढ़िया काम के लिये ……ऩफ़रत पैदा करने के लिये …..मैं अकसर सोचता हूं कि पता नहीं ज़िंदगी में मैंने कुछ और किया है कि नहीं, लेकिन विभिन्न तरह के नशों के प्रति हर स्तर पर अपने सामर्थ्य, अपनी समझ अनुसार बेहद ऩफ़रत पैदा की है और बेशक यह करता रहूंगा………ये अनथक प्रयास जारी रहेंगे।
आगे पढ़ने के लिये सुझाव .. तंबाकू का कोहराम

प्रेरणा …The Tribune, Chandigarh, Monday, April16′ 2012

भारत में विषैली देसी दारू से इतने लोग क्यों मरते हैं?

अभी हाल ही में हुई पश्चिमी बंगाल के देसी दारू कांड ने देश को हिला के रख दिया….इतनी सारी मौतें एक साथ, बेहद खौफ़नाक एवं निंदनीय घटना।
कईं बार आप के भी मन में सवाल तो उठता होगा कि आखिर देसी दारू या यूं कहें कि विषैली दारू पीने से भारत मे आए दिन इतने लोग मरते क्यों हैं। लेकिन हम इस के बारे में इतना ही जानते हैं कि इस तरह की दारू में मिथाईल एल्कोहल (methyl alcohol) होता है जिस की वजह से इसे पीने वाले मर जाते हैं। लेकिन ज़्यादातर लोग यह भी नहीं जानते कि  इस में एक दूसरा कैमिकल भी होता है जिसे अमोनियम नाईट्रेट कहते हैं जो मिथाईल एल्कोहल की तरह ही विषैला होता है।

लेकिन आज बीबीसी की साइट पर छपी एक न्यूज़-रिपोर्ट देखने से मैं इस समस्या से जुड़े कुछ नये पहलुओं से रू-ब-रू हो पाया जिसे मैं आप सब से शेयर करना चाहता हूं।

इस रिपोर्ट में इस बात पर भी चर्चा की गई है कि पश्चिमी बंगाल जैसे राज्यों में ही इस तरह के ज़्यादातर हादसे क्यों दिखते हैं। सारा माजरा यह बात जानकर समझ में आ गया …

“The state controls the alcohol business in India, almost completely. In many states, the alcohol is produced by state-appointed groups of people who are friends of the political parties that rule various states. West Bengal is one of the few states where this doesn’t happen but in Delhi, for example, all alcohol is sold in government shops,” says Aniruddha Mukherjee.C

Courtesy: BBC news

“भारत में शराब के धंधे पर लगभग पूरा सरकारी नियंत्रण है। बहुत से राज्यों में, इन राज्यों द्वारा चुने गये लोगों द्वारा ही शराब पैदा की जाती है जिनके इन राज्यों में शासन करने वाली राजनैतिक पार्टीयों से दोस्ताना ताल्लुकात होते हैं। पश्चिमी बंगाल एक ऐसा राज्य है जिस में यह सब नहीं होता लेकिन अगर दिल्ली की ही उदाहरण लें तो वहां पर सारी शराब सरकारी दुकानों पर ही बिकती है” – अनिरूद्द मुकर्जी

भारत मे तैयार होने वाली अंगेज़ी शराब (Indian made Foreign Liquor – IMFL) जो कानूनी तौर पर चीनी उद्योग के बाई-प्रोडक्ट मोलैसिस (bye-product molasses) से पैदा की जाती है, इस पर बहुत ज़्यादा ड्यूटी लगने की वजह से यह अस्सी प्रतिशत देशवासियों की पहुंच से बाहर होती है … 700मिलीलिटर की एक बाटली 400 रूपये में बिकती है जिसे आम आदमी खरीदने पाने में असमर्थ होता है।

इसलिये आम आदमी बेचारा रूख करता है सस्ते विकल्पों का …. जिसे सस्ती देसी दारू कहते हैं उसे जिसे गन्ने से तैयार किया जाता है। इसे दारू का एक पाउच या फिर एक गिलास 25-30 रूपये में मिल जाता है जिसे बिना किसी सोशल-ड्रिंकिंग के अंकुश के कहीं भी चढ़ा लिया जाता है, और इस तरह की नकली दारू का धंधा भी अंदर खाते जगह जगह पनपता रहता है।

लेकिन इस तरह की देसी दारू तैयार करने समय तापमान पर नियंत्रण अति आवश्यक है क्योंकि तापमान बढ़ जाने पर मिथाईल अल्कोहल (methyl alcohol) बन जाता है….और वैसे भी इसे तैयार करने वाले लोग इस में तरह तरह के कैमीकल (रासायन) एवं हर्ब (जड़ी-बूटियां) डालने की भूल कर के इसे किस कैमीकल-रिएक्शन से ज़हरीला बना दें, यह पता नहीं चल पाता।

बात नोट करने वाली यह है कि इस देसी दारू को कोई गल्ती से ज़हरीली नहीं बनाता क्योंकि इस से इन का धंधा चौपट हो जाता है –अधिकांश केसों में यह भूल का ही परिणाम होता है (लेकिन भूल भी ऐसी कि जिस से सैंकड़ों जानें चली जाती हैं) ….या फिर कोई विरोधी खेमे वाले ही इस में कुछ मिला कर अपना हिसाब किताब चुकता कर लेते हैं।

ज़रा यह तो देखें कि इस तरह की विषैली दारू में मौजूद रासायनों का शरीर पर क्या प्रभाव होता है….
ज़्यादा मात्रा में इस्तेमाल कर लेने से, अमोनियम नाईट्रेट से सिरदर्द, सिर चकराना, पेट में दर्द, उल्टीयां, हृदय की धड़कन की अनियमितताएं, दौरे पड़ सकते हैं, मरीज़ कोलैप्स हो कर मर सकता है। मिथाईल अल्कोहल अर्थात् मिथैनोल जिसे आम तौर पर एक एंटीफ्रीज़ की तरह इस्तेमाल किया जाता है, इसे देसी दारू का अल्कोहल कंटैंट बढ़ाने के लिये डाल दिया जाता है। मिथैनोल हमारे शरीर के लिये अत्यंत घातक है —- केवल 10 मिली लिटर (अर्थात् केवल दो चम्मच!!) लेने से कोई अंधा हो सकता है और अगर यह मात्रा 30 मिलीलिटर तक जा पहुंचे तो यह जानलेवा हो सकती है।

बेशक शराब ज़हर ही तो है और इस के ज़्यादा ले लेने से जान तो जा ही सकती है लेकिन अवैध तरीके से तैयार की गई दारू के साथ लफड़ा यह है कि इसे पीने वाले को यह भी पता नहीं होता कि आखिर इसे तैयार करते समय इस में क्या क्या डाला गया है, और इस में मौज़ूद अल्कोहल की मात्रा है क्या!!

ऐसा कहा गया है कि यू के एक हफ़्ते में लगभग 500 लोग अल्कोहल से होने वाली प्वाईज़निंग की वजह से अस्पतालों की एमरजैंसी में भर्ती किये जाते हैं ….. नहीं, नहीं, ये वैसे केस नहीं है जैसे पश्चिमी बंगाल में दुःखद घटना में मरने वाले थे ………….मेरे विचार में यूके के 500 लोगों की तो यह वह गिनती है जो अपने यहां हर गली-मोहल्ले-नुक्कड़ पर रोज़ाना दिखते हैं जिन् पट्ठों को कुछ ही समय में आवारा पशु ही चूम-चाट कर एकदम दुरूस्त कर देते हैं।

Further Reading

Who, what, why….why Indians are dying of Alcohol Poisoning?

थोड़ी थोड़ी पिया करो

विषैली दारू ने डस ली 57 जानें……बेहद शर्मनाक!!

बी बी सी की साइट खोलते ही पश्चिमी बंगाल में देसी दारू पीने से 50 लोगों की मौत के बारे में सुन कर मन बहुत दुःखी हुआ। इस समय यह मौका नहीं कि मैं यह लिखना शुरू करूं कि लोग दारू पीते ही क्यों है, उस पर चर्चा सदियों से चल रही है और शायद चलती रहेगी।

लेकिन चर्चा का विषय यह है कि आखिर देसी दारू जिस गरीब तबका ही पीता है, यह धंधा कब तक चलेगा आखिर ?  –लालच से अंधे हो चुके लोगों को क्यों नहीं कढ़ी सजा मिलती ताकि लोगों को सबक मिल सके। अकसर इस तरह के हादसों में मरने वाले गरीब मज़दूर, दिहाड़ीदार होते हैं जिनकी अकसर कोई आवाज़ होती नहीं, मामला दो-तीन दिन अखबारों में आता है, मीडिया की टीआरपी ऊंची रहती है थोडे दिन….बस बात खत्म।

इन्सैंसेटिव लोग यह भी कह देते हैं कि ये लोग इस तरह की देसी दारू पीते ही क्यों हैं?…मैं पूछता हूं कि हमें पता है ना कि इस से आए दिन हादसे होते रहते हैं, लोगों की जान जाती है, आंखों की रोशनी चली जाती है, पर फिर भी यह बिकती ही क्यों है?

जब से खबर पढ़ी है मन बेहद दुःखी है। इस तरह के नरसंहार से जूझने का गुजरात सरकार ने एक तरीका ढूंढ लिया है –वहां पर भी घटिया किस्म की देसी दारू से मरने वालों की तादाद काफ़ी थी, आए दिन हादसे होते रहते थे, अब कुछ दिन पहले ही उन्होंने तो इस तरह के जुर्म के लिये मौत की सजा देने का कानून बना दिया है। अब देखते हैं इस कानून के अंतर्गत कौन सा दरिंदा यह सजा पाता है?

बचपन से देख रहे हैं कि जो लोग इस तरह की मिलावटी किस्म की दारू पीते हैं, वे अगर इस के तुरंत होने वाले प्रभावों से बच भी जाते हैं तो इसके विषैले तत्वों की वजह से तिल तिल मरते रहते हैं। और तो और आजकल यह जो छोटी छोटी पोलीथीन की थैलियों में यह देसी दारू बिकने लगी है…….कुछ लोग सुबह सुबह ठेके के बाहर इसे पीने लगते हैं, यह मंज़र देख कर कभी भी इन पाउचों को खरीदने या पीने वालों पर तो गुस्सा आया ही नहीं, गुस्सा बहुत से दूसरे लोगों पर ज़रूर आता है, जो इस वर्ग को यह कह कर धिक्कार देते हैं कि यह तो दारूबाज है, बस इन का तो काम है पीना और नाली में गिरना, और अकसर ऐसा कहने वाले लोग एक महंगी सी बोतल शाम को चिकन, ड्राई-फ्रूट और पता नहीं किस किस के साथ बैठ कर क्या क्या खोलते हैं, और नशे में धुत्त होकर फिर क्या कुछ नहीं होता, मीडिया दिखाता ही रहता है।

बस, और क्या लिखूं…….मन बेहद दुःखी है कि इतने सारे लोगों की बेशकीमती जानें चली गईं….मेरी इन सब को भावभीनि श्रद्रांजलि इस उम्मीद के साथ कि इस हादसे के लिये जिम्मेदार लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी। इतने परिवारों का सहारा छिन गया —-दारूबाज था तो क्या हुआ, किसी बच्ची का बाप था, किसी का बेटा था, किसी बहन का भाई था……………अब इस तबके की अकसर अपनी आवाज़ तो होती नहीं है, और किसी दूसरी आवाज़ को हॉयर करने के लिये भी इन के पास साधनों की अत्यंत कमी रहती है। ऐसे में कोई करे तो क्या करे? ………………बेहद दुःखद, घोर निंदनीय, बेहद लज्जाजनक, अत्यंत शर्मनाक……इस की जितनी भी निंदा की जाए कम है।

बस हुक्का पार्लरों के खुलने की ही कसर थी

आज अचानक मुझे चार महीने पहले लिखे एक लेख का ध्यान आ गया … दम मारो दम (लिंक पर क्लिक करिए)  ….इस में आज कल हमारे देश में छोटे बड़े शहरों में हुक्का पार्लरों की खबरों का खुलासा किया गया था।

विदेशों में तो ये पहले से हैं ही …. लेकिन आज एक बार फिर उस खबर पर ध्यान अटक गया जिसमें लिखा था कि कैलिफोर्निया जैसी जगह में भी युवाओं को भी इस हुक्का का इतना चस्का लग चुका है कि लगभग 25 प्रतिशत युवक इस नशे की गिरफ्त में हैं…………..इस खबर का लिंक यह रहा…Hookah use up among Calif. Young adults.

कैलिफोर्निया में समस्या यह है कि वहां पर इंडोर(बंद) पब्लिक जगहों पर धूम्रपान की मनाही है ….और वहां मनाही किस तरह की होती है, कोई कंशैशन नहीं ……….यह नहीं कि यहां कि तरह धूम्रपान निषेध की तख्ती के नीचे बैठ कर बिलकुल देवानंद के स्टाइल में धुएं के छ्ल्ले आप की तरफ़ फैंकता चला जाता है …………(हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया)। और फिर कैलीफोर्निया में कुछ हुक्का पार्लरों के खुलने से लोगों में कहीं न कहीं यह भ्रांति (2008 में प्रकाशित मेरा एक लेख, क्लिक करें)  तो है कि शायद तंबाकू का यह रूप नुकसान न करता होगा।

लेकिन ज़हर तो ज़हर है ही ….किसी भी रूप में इस्तेमाल किया जाए ….यह तो आग का खेल ही है। कईं बार सोचता हूं कि यह बड़ी बड़ी तंबाकू कंपनियों की कोई साज़िश ही होगी कि एक सुनियोजित ढंग से युवा वर्ग को इस तंबाकू रूपी इस गहरी खाई में धकेला जाए। एक बार इस हुक्के-वुक्के का आदि हो जाने पर फिर इस से अगली अवस्था यह गीत ब्यां कर रहा है …………..आप का क्या ख्याल है?