अच्छे ग्रेड पाने के लिए इस्तेमाल हो रही दवाईयां

आज की दा हिंदु में एक अच्छा सा ऐडिटोरियल सुबह देख रहा था –सर्व शिक्षा अभियान के बारे में लिखा गया था कि यह जो एक नियम बन गया है कि किसी को पांचवी कक्षा तक फेल ही नहीं करना …ऐसे में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का स्तर बहुत नीचे गिर गया है। अगर आप भी इस संपादकीय लेख को देखेंगे तो आपको भी लगेगा कि उस में बातें ठीक ही कही गई हैं।

चलिए बच्चों के स्कूल के ग्रेड की बात चली है तो मैं आपसे एक खबर ही शेयर कर लूं—बड़ा अजीब सा लगा यह न्यूज़ देख कर। न्यू-यार्क टाइम्स पर खबर छपी है…Risky Rise of Good-Grade Pill.

खबर अच्छी खासी लंबी है..मैं तो पहला पन्ना पढ़ कर ही ऊब सा गया ….इसलिये यह पोस्ट लिखने लग गया।

जब भी यह बच्चों के स्कूल के ग्रेड-व्रेड सुधारने की बात चलती है तो मुझे यहां की अखबारों में दिखने वाले वे विज्ञापन ध्यान में आ जाते हैं जिन में ये दावा किया गया होता है कि इन्हें पढ़ने से स्मरण-शक्ति बढ़ जाती है, एकाग्रता भी बहुत बढ़ जाती है …और भी कईं तरह के वायदे………..लेकिन सब के सब बोगस, पब्लिक को बेवकूफ़ बनाने की बातें।

हां तो जिस खबर की मैं बात कर रहा था वह यह है कि अमेरिका के स्कूली बच्चे अपने ग्रेड को बेहतर करने के लिये कुछ दवाईयों का इस्तेमाल करते हैं.. इन्हें खाने से ये बच्चे रात में जागे रहते हैं और पढ़ाई में उन की एकाग्रता बढ़ जाती है। लेकिन लफड़ा इन दवाईयों का यह है कि ये इस काम के लिये नहीं बनीं हैं —इन का इस्तेमाल डाक्टरों द्वारा –ADHD(Attention deficit hyperactivity disorder) जैसे मरीज़ों का इलाज करने के लिये किया जाता है।

इन दवाईयों का नाम है – amphetamines and methylphenidate. वहां पर ऐसा तो है नहीं कि कोई किसी भी कैमिस्ट से कोई भी दवाई खरीद कर लेनी शुरू कर दे। इस न्यूज़ में बताया गया है कि इन दवाईयों को हासिल करने के लिये अमेरिकी स्टूडेंट्स मानसिक तौर पर बीमार होने का नाटक करते हैं और ऐसा ड्रामा करते हैं जैसे कि उस बीमारी के लक्षण इन में मौजूद हैं ….और फिर डाक्टर इन्हें वे दवाईयां लेने की सलाह दे देता है।

और कुछ सीनीयर छात्र भी ये दवाईयां अपने जूनियर छात्रों को बेचते हैं।

लफड़ा इन दवाईयों का सब से बड़ा यह भी है कि इन्हें लेने वाले छात्र देर-सवेर अन्य प्रकार के नशों के चक्कर में पड़ जाते हैं और तरह तरह के मादक-पदार्थों का व्यसन इन्हें लग जाता है।

खबर का लिंक मैंने ऊपर दे दिया है, अगर चाहें तो पढ़ सकते हैं …वैसे पहला पन्ना ही पढ़ लेंगे तो भी चलेगा। लेकिन चिंता की बात यह है कि हम हर काम में अमेरिका जैसे देशों को नकल करने का बहाना ढूंढते हैं ….अगर हमारे युवा छात्रों ने भी रात रात भर जागने के लिए इन दवाईयों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया तो बड़ा अनर्थ हो जायेगा। यहां तो वैसे ही युवावर्ग तरह तरह के नशे की चपेट में आता जा रहा है।

इसलिए हमें चाहिए कि इस तरह की खबरों के बारे में बच्चों को सचेत करें और ऐसी दवाईयों के दुष्परिणामों के बारे में भी अकसर चर्चा करते रहा करें। आप का क्या ख्याल है? — मुझे पता इसलिये नहीं लगेगा कि आपने फीडबैक न देने की कसम खाई है ….बिल्कुल वैसे …. जैसे कि मैंने गूगल सर्च-ईंजन के लिये लिखने की  की ठान रखी है।

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भांग पीने से होता है कहीं ज़्यादा नुकसान

भांग के बारे में मेरा ज्ञान बहुत सीमित है —बस, भांग का नाम आते ही मुझे याद आ जाता है वह सुपर-डुपर गीत—जय जय शिव शंकर…कांटा लगे न कंकर और दम मारो दम…मिट जाये गम। इस के साथ ही ध्यान में आ जाता है भारत का एक धार्मिक त्योहार जिस में भांग को घोट कर पीने की एक परंपरा सी बना रखी है… कुछ लोग होली के दिन भांग के पकौड़े भी खाते-खिलाते हैं —ऐसे ही एक बार किसी ने हमारे होस्टल में भी शरारत की थी – और बहुत से छात्रों की हालत इतनी खराब हो गई थी कि उन्हें अस्पताल में दाखिल करना पड़ा था।

और एक ध्यान और भी आता है भांग का नाम लेने से —कुछ नशा करने वाले लोग कुछ सुनसान जगहों पर अपने आप उग आए भांग के पौधों से पत्ते उतार के उन्हें हाथों से मसल मसल कर फिर उन्हें कागज में लपेट कर एक सिगरेट-नुमा डंडी सी तैयार कर उसे पीते हैं। और तो और धार्मिक स्थानों पर कुछ तथाकथित साधू का वेश धारण किये हुये लोग भी भांग का खूब प्रयोग करते हैं।

हम तो हैं हिंदोस्तानी –हमारी बात कुछ और है …और अमीर देशों में रहने वाले गोरे लोगों की बात कुछ और ..वे साधन-सम्पन्न लोग हैं, कोई भी शौक पाल सकते हैं। लेकिन मुझे कल ही पता चला कि वहां पर भी भांग के सिगरेट पीने का जबरदस्त क्रेज़ है…. बहुत ही ज्यादा हैरानगी हुई यह जान कऱ।

ब्रिटेन के चिकित्सा वैज्ञानिकों ने यह रिसर्च की है कि यू के में भांग पीने वाले यही समझते हैं कि यह सिगरेट के मुकाबले में बिलकुल भी नुकसान दायक नहीं है।

लेकिन सच यह है कि भांग पीना भी सिगरेट पीने की तरह बहुत ही ज्यादा नुकसान दायक है। यह इसलिये है कि इसे पीने वाले इस का कश बहुत गहरा खींचते हैं जिस की वजह से सिगरेट के मुकाबले में कहीं ज्यादा टॉर और कार्बनमोनोआक्साईड गैस वे फेफड़े के अंदर खींच लेते हैं। इसलिये फेफड़े का कैंसर, ब्रोंकाइटिस और टी बी जैसे रोग पैदा होने का डर तो बना ही रहता है।

भांग का पौधा

रिसर्च से यह भी पता चला है कि एक वर्ष तक रोज़ाना भांग का एक सिगरेट पीने से फेफड़े का कैंसर होने का जो रिस्क होता है वह उतना ही है जितना एक वर्ष तक रोज़ाना बीस सिगरेट पीने से होता है।

आज जब मैं बी बी सी न्यूज़ पर यह खबर पढ़ रहा था तो यही सोच रहा था कि आखिर क्यों लोग विदेशों में जाकर पढ़ाई करने के लिये आतुर होते हैं….. ठीक है वहां कुछ आधुनिक ज्ञान सीख लेते होंगे, लेकिन बहुत ही और चीज़ें भी तो सीख ही लेते होंगे ….अब यह भांग पीने की ही बात देखिये, मैं रिपोर्ट में यह पढ़ कर दंग रह गया कि वहां पर लगभग 40 प्रतिशत लोग इस का इस्तेमाल अपने जीवनकाल के दौरान कर चुके हैं।

अगर पर इस प्रामाणिक शोध के बारे में विस्तार से पढ़ना चाहें तो इस लिंक पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं….Health Risks of Cannabis ‘underestimated’ , experts warn.. जो भी हो, मेरे लिये तो यह एक बहुत बड़ी खबर थी। मुझे लगता था कि यह केवल हिंदोस्तान की ही समस्या है …. लेकिन यहां तो हमाम में सारे …..!!

 

गाड़ी चलाते चलाते टैक्सट मैसेज भेजने पर ही मिलता है लाईसेंस

भारत की सड़कों पर स्कूटरों, मोटरसाईकिलों, कारों, ट्रकों वालो को वाहन चलाते हुये अपने मोबाइल पर बात करते देखने की अब हमें आदत सी हो चुकी है। गुस्सा तो कईं बार बहुत आता है जब ऐसे चालक की वजह से हम लोग इन से टकराते टकराते बचते हैं, आता है कि नहीं?

और तो और मुझे सरकारी रोड़वेज़ की चलती बसों में चालकों द्वारा मोबाईल पर बात करते देख गुस्सा कम और डर ज़्यादा लगता है कि 80-90 बंदों की जान इस चालक के भरोसे है। लेकिन चुपचाप उस की बात खत्म होने की प्रतीक्षा किये जाने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं होता।

मोबाइल हाथ में पकड़ कर कोई कैसे एक हाथ से अपना वाहन चला सकता है? और अब तो निरंतर कनैक्टिविटि के चक्कर में युवा ड्राइविंग करते करते टैक्स्ट मैसेज (texting) भी लिखते दिख जाते हैं। शायद यही कारण होगा बैल्जियम में उन्होंने ड्राइविंग लाइसैंस देने से पहले एक टैस्ट लेना शुरु कर दिया है….कार का ड्राइविंग देते समय अपनी कार में बैठे बैठे टैस्ट लेने वाले के सामने अपने मोबाईल पर एक टैक्ट्स मैसेज टाइप करो …. स्पैलिंग्ज़ ठीक होने चाहिए, पंक्चूएशन भी ठीक होनी चाहिए …अगर ऐसा कोई कर पायेगा तो लाइसैंस पाने का वह ड्राईवर पात्र होगा, वरना घर जाओ।

यह टैस्ट इस तरह से होता है …गाड़ी चलानी शुरू करने से पहले ही इंस्ट्रक्टर बता देता है कि ड्राईविंग लाईसैंस के कानून में कुछ बदलाव हुये हैं…वह इस टैक्सटिंग टैस्ट के बारे में भी बताता है … यह सुन कर टेस्ट देने आये युवा की हालत थोड़ी सी तो पतली हो जाती है कि यह कैसे संभव हो सकता है, इस से कारें ठुकने लगेंगी, लोग सड़कों पर मरने लगेंगे।

लेकिन इंस्ट्रक्टर भी क्या करे, वह अपनी मजबूरी जतला देता है कि यह नियम उस ने तो बनाया नहीं, इसलिये इस का पालन तो करना ही होगा।

बहरहाल टैस्ट शुरू होता है, ड्राइवर गाड़ी चलानी शुरु करता है …लेकिन साथ में मोबाइल पर एक टैक्ट्स मैसेज भी लिखना है, अब अगर वह कुछ लिखने लगता है तो गाड़ी इधर उधर घूम जाती है, अपनी लेन में नहीं रहती, बार बार ट्राई तो करता है लेकिन नहीं हो पाता…… आखिर में हार कर हाथ खड़े कर देता है कि यह कैसा टैस्ट है, यह हो ही नहीं सकता कि ड्राइविंग करते समय मैसेजिंग भी की जा सके……. just not possible!

बस युवा को इसी बात के लिये कन्विंस करना ही तो इस टैस्ट का ध्येय होता है। ऐसा कोई टैस्ट नहीं आया …लेकिन युवा को इस तरह के खतरनाक खेल का एक ट्रेलर दिखाने के लिये यह टैस्ट करवाने का नाटक किया जाता है कि उन का मन मान ले कि दोनों संभव नहीं हैं।

चलिये अब आप इस का राज़ तो जान ही चुके हैं तो इस वीडियो को भी देख ही लीजिए ….जिसे देख कर सारा माजरा आप की समझ में आ जायेगा।

अब समस्या यह है कि स्मार्ट-फोन और टेबलेट आने की वजह से युवा निरंतर 3-G तकनीक से जुड़े रहना चाहते हैं …यहां तक कि आई-पैड चूंकि पोर्टेबल है, इसलिये इसे भी कहीं भी गाड़ी चलाते समय अपनी लैप में रखना या व्हील पर ही रखना कितना खतरनाक है, इस के लिये भी कोई टैस्ट निकालो, यार।

Source : Texting & Driving : The Impossible test

सेहत खराब करने वाली दवाईयां आखिर बिकती ही क्यों हैं?

परसों मेरा एक मित्र मुझ से पूछने लगा कि वज़न बढ़ाने के लिये ये जो फूड-सप्लीमैंट्स आते हैं इन्हें खा लेने में आखिर दिक्तत है क्या। मैंने कहा कि लगभग इन सब में कुछ ऐसे प्रतिबंधित दवाईयां –स्टीरॉयड आदि – होते हैं जो कि सेहत के लिये बहुत नुकसानदायक हैं। अच्छा, आगे उस ने कहा कि यह जो जिम-विम वाले हैं वे तो कहते हैं कि जो डिब्बे वो बेच रहे हैं, वे बिल्कुल ठीक हैं। बात वही है कि अगर उन्होंने इन डिब्बों को आठ-नौ सौ रूपये में बेचना है तो इतना सा आश्वासन देने में उन का क्या जाता है, कौन सा ग्राहक इन की टैस्टिंग करवाने लगा है, और सच बात तो यह है कि किसी को पता भी तो नहीं कि यह टैस्टिंग हो कहां पर सकती है।

पिछले सप्ताह अस्पताल में एक युवक मेरे से कोई दवाई लेने आया …अच्छा, अब पता झट चल जाता है कि सेहत का राज़ क्या है, शारीरिक व्यायाम, पौष्टिक आहार या फिर वही डिब्बे वाला सप्लीमेंट से डोले-शोले बना रखे हैं ….मुझे लगा कि यह डिब्बों वाला केस है …मेरे पूछने पर उस ने बताया कि सर, दो महीने डिब्बे खाये हैं, पहले महीने तो मुझे अपने आप में लगा कि मुझ में नई स्फूर्ति का संचार हो रहा है तो दूसरे महीने मुझे देख कर लोगों ने कहना शुरू कर दिया। आगे पूछने लगा कि सर, क्या आप अपने बेटे को ये सप्लीमैंट्स खिलाने के लिये पूछ रहे हैं…..उस के बाद मुझे इन सप्लीमैंट्स की सारी पोल खोलनी पड़ी।

हां, तो मैं उस मित्र की बात कर रहा था जो कह रहा था कि जिम संचालक तो कहते हैं कुछ नहीं इन में सिवाए बॉडी को फिट रखने वाले तत्वों के ……लेकिन जो बात उस ने आगे की, मुझे वह सुन कर बहुत शर्म आई क्योंकि मेरे पास उस की बात का कोई जवाब नहीं था।

हां, जानिए उस मित्र ने क्या पूछा….उस ने कहा ..डाक्टर साहब, मैं आप के पास आया हूं, आप ने बता दिया और मैंने मान लिया …लेकिन उन हज़ारों युवकों का क्या होगा जो ये सप्लीमैंट्स खाए जा रहे हैं…. उस ने यह भी कहा कि इन डिब्बों पर तो स्टीरायड नामक प्रतिबंधित दवाईयों के उस पावडर में डाले जाने की बात कही नहीं होती।

अब इस का मैं क्या जवाब देता ? – बस, यूं ही यह कह कर कि कोई कुछ भी कहें, इन में कुछ प्रतिबंधित दवाईयां तो होती ही हैं जो शरीर के लिये नुकसानदायक होती हैं। लेकिन उस का प्रश्न अपनी जगह टिका था कि अगर ये नुकसानदायक हैं तो फिर ये सरे-आम बिकती क्यों हैं, अब इस का जवाब मैं जानते हुए भी उसे क्या देता!! बस, किसी तरह यह बात कह कर इस विषय को चटाई के नीच सरका दिया कि लोगों की अवेयरनेस से ही सारी उम्मीद है। लेकिन उस बंदे के सारे प्रश्न बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करने वाले हैं।

परसों उस मित्र से होने वाली इस बातचीत का यकायक ध्यान इसलिए आ गया क्योंकि कल मैंने अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की साइट पर एक पब्लिक के लिये नोटिस देखा जिस में उन्होंने जनता को आगाह किया था एक गर्भनिरोधक दवाई न लें क्योंकि वह नकली हो सकती है, इस से नुकसान हो सकता है…..यह उस तरह की दवाई थी जो एमरजैंसी गर्भनिरोधक के तौर पर महिलाओं द्वारा खाई जाती है…..असुरक्षित संभोग के बाद (unprotected sex) ….. वैसे तो अब इस तरह की दवाईयों के विज्ञापन भारतीय मीडिया में भी खूब दिखने लगे हैं….इन की गुणवत्ता पर मैं की प्रश्नचिंह नहीं लगा रहा हूं लेकिन फिर भी कुछ मुद्दे अब महिला रोग विशेषज्ञ संगठनों ने इन के इस्तेमाल से संबंधित उठाने शुरू कर दिये हैं।

सौजन्य .. फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन
पहला तो यह कि कुछ महिलाओं ने इसे रूटीन के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है … दंपति यह समझने लगे हैं कि यह भी गर्भनिरोध का एक दूसरा उपाय है….लेकिन नहीं, यह एमरजैंसी शब्द जो इन के साथ लगा है यह बहुत ज़रूरी शब्द है. वरना रूटीन इस्तेमाल के लिये अगर इसे गर्भनिरोधक गोलियों (माला आदि) की जगह इसे इस्तेमाल किया जाने लगेगा तो अनर्थ हो जाएगा, महिलाओं की सेहत के ऊपर बुरा असर – after all, these are hormonal preparations– और दूसरी बात यह कि लोगों को यह गलतफहमी है कि इस तरह का एमरजैंसी गर्भनिरोधक लेने से यौन-संचारित रोगों की चिंता से भी मुक्ति मिलती है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है।

हम भी कहां के कहां निकल गये ….वापिस लौटते हैं उस अमेरिकी एफडीआई की चेतावनी की तरह जिस में उन्होंने एक ऐसे ही प्रोडक्ट की फोटो अपनी वेबसाइट पर डाल दी है ताकि समझने वाले समझ सकें, लेकिन मेरी भी तमन्ना है कि जो किसी भी नागरिक के लिये खराब है …पहली बात है वो कैमिस्टों की दुकानों पर बिके ही क्यों और दूसरी यह कि क्यों न अखबारों में, चैनलों पर इन के बारे में जनता को निरंतर सूचित किया जाए ……….आखिर चैनल हमें प्रवचनों की हैवी डोज़ या फिर सास-बहू के षड़यंत्र दिखाने-सिखाने के लिए ही तो नहीं बने….सामाजिक सरोकार तो भी कोई चीज़ है। कोई मेरी बात सुन रहा है या मैं यूं ही चीखे जा रहा हूं?

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सप्लीमैंट्स से सावधान

ड्रग्स खिलाने-पिलाने-सुंघाने के बाद होने वाले बलात्कार

अकसर हम लोग इलैक्ट्रोनिक मीडिया में देखते ही रहते हैं कि विभिन्न शहरों में सारी सारी रात चलने वाली रेव-पार्टीयों के दौरान पुलिस ने छापा मारा और वहां से ड्रग्स भी मिले। और अकसर ऐसा होता है कि जब ड्रग्स की बात चलती है तो हम यही सोच लेते हैं कि होंगी ये वही ड्रग्स जो इंजैक्शन की मदद से नशा करने वाले लेते हैं …हम ऐसा सोचते हैं कि नहीं?

एक दिन खबर दिखती है …और फिर हमेशा के लिये गायब….कारण बताने की क्या ज़रूरत है, सब जानते ही हैं।
लगभग दस दिन पहले मैं मैडलाइऩ-प्लस पर मैडीकल समाचार देख रहा था … वहां पर एक खबर दिखी की कैटामीन ड्रग के इस्तेमाल से इस का नशा करने वाले लोगों में पेशाब से संबंधित कईं पेचीदगीयां हो जाती हैं… यहां तक की urinary incontinence अर्थात् पेशाब अपने आप निकलने जैसे नौबत भी आ जाती है…पेशाब रोक पाने के ऊपर कंट्रोल सा खत्म हो जाता है।

हां तो मैंने इस खबर को इतना तूल दिया नहीं …कारण यही कि मुझे यह लगा कि यह तो अमीर देशों के बड़े लोगों की बड़ी बातें हैं, इस का भारत जैसे देश से कोई इतना लेना देना नहीं ….और मैं आगे कुछ और पढ़ने में व्यस्त हो गया। यहां यह बताना ठीक होगा कि कैटामीन नामक दवाई है जो आप्रेशन के पहले अनसथीसिया (anaesthesia – निश्चेतण) करने के काम आती है। मुझे याद है हम ने भी इस दवाई के प्रभाव में कईं आप्रेशन होते देखे हैं। वही तस्वीर मन में थी कि कौन इस तरह की दवाई (जो कि विशेषज्ञ ही इस्तेमाल करते हैं आप्रेशन के लिये) को दुर्प्रयोग करने का जोखिम लेता होगा।

लेकिन कल ही की बात है कि मैंने जब इन्हीं सब ड्रग्स के नाम टाइम्स ऑफ इंडिया के रविवारीय परिशिष्ट देखते हुये एक आर्टीकल में देखे – A Party Evil तो मुझे बेहद हैरानगी हुई कि अपने देश में भी ये सब दवाईयां कुछ नाइट-क्लबों, पबों आदि में किस बिंदास अंदाज़ में इस्तेमाल की जा रही हैं।

चलिये, इन दवाईयों के नामों के चक्कर में क्या पड़ना, बस इतना ही काफ़ी है कि इस तरह की ड्रग्स को डेट-रेप ड्रग्स कहा जाता है। लड़का-लड़की कहीं बाहर घूमने गये —नाइट-क्लब, डिस्को, पब आदि में या किसी रेव-पार्टी के दौरान किसी तरह से इस तरह की दवाईयां लड़की की ड्रिंक्स (hard drink or soft drink) में मिला दी जाती हैं ….उस ड्रग के प्रभाव से लड़की बिल्कुल बदहवास सी, बेसुध सी, न बेसुध ना होश में वाली स्थिति… बेहाल सी महसूस करने लगती है, यादाश्त कमज़ोर होने लगती है और फिर जब तक उस दवा का असर रहेगा उस के साथ क्या क्या हुआ उसे कुछ भी ध्यान न होगा ….और अगर कुछ पता भी हो तो वह शर्म की वजह से किसी से कुछ कहेगी भी नहीं। और इस दवाई के प्रभाव में लड़कियां अपने आप को इतना कमज़ोर-बेबस सा हो जाती हैं कि वे चाह कर भी किसी तरह का विरोध नहीं कर पातीं— और बस शैतान का काम आसान!!

युवा पाठकों को इन सब खतरों से सजग करने के लिये टाइम्स ऑफ इंडिया का यह आर्टीकल बिल्कुल ठीक है। लफड़ा इन दवाईयां का सब से बड़ा यह भी है कि न तो इन का कोई रंग होता है, न ही कुछ इन की गंध ही होती है और न ही इन का कोई स्वाद ही होता है, इसीलिये जब कोई शैतान इन को किसी ड्रिंक्स में मिला कर किसी लड़की को पिला देता है तो उसे इस का पता ही नहीं चल पाता।

एक दो बातें उस आर्टीकल में यह भी लिखी हुई थीं कि लड़कियों को चाहिये कि इस तरफ़ ध्यान दें कि अपनी ड्रिंक्स को ऐसी जगहों पर अकेले मत छोड़ें और अगर वाश-रूम में भी जाएं तो अपनी ड्रिंक को खत्म कर ही लें….और तो और किसे के साथ अपनी ड्रिंक्स शेयर न करें…. और भी एक बात कि अगर ऐसी जगहों पर कोई ऐसा मित्र साथ हो जो ड्रिंक्स न लेता हो तो ठीक है। बात कुछ जमी नहीं …मुझे भी ठीक लगी नहीं … इतना अविश्वास हो अगर किसी के ऊपर लेकिन फिर उस के साथ नाइट-लाइफ का अनुभव लेना है तो फिर तो कभी भी कुछ भी हो सकता है क्योंकि शातिर किस्म के लोगों की सोच ऐसे लेख लिखने वालों से फॉस्ट चलती है।

हां, तो कैटामीन से बात शुरू की थी .. अभी हाल ही में मुंबई से साढ़े तीन करोड़ की यह दवाई पकड़ी गई है … आप्रेशन करने से पहले तो इस का टीका लगाने की एक विशेष विधि/मॉनीटरिंग होती है .. लेकिन इस का खुराफाती इस्तेमाल करने के लिये कैसे भी इस को इंजैक्ट कर दिया जाता है …यहां तक कि इसे snort –सुंघवा दिया जाता है और असर होने लगता है।

यह लेख लिखते समय यही ध्यान आ रहा है कि हम लोग जा कहां रहे हैं……सब कुछ ज़्यादा ही फॉस्ट नहीं हो गया? …और इसीलिये हादसे ही हादसे दिखते रहते हैं। यह लेख भी देखने योग्य है कि किस तरह से मौज-मस्ती के लिये इस तरह से किया जाने वाला ड्रग्स का दुरूपयोग एड्स जैसे रोगों को भी आमंत्रण दे सकता है।