मरीज़ को पूरा हट्टा-कट्टा कर के घर भेजने की पीजीआई करेगा एक प्रशंसनीय पहल

10 जुलाई 2012 की अमर उजाला में प्रकाशित खबर

कुछ खबरें देख कर आस बंध सी जाती है ..अभी अभी जब आज की अमर उजाला अखबार उठाई तो यही हुआ। समाचार का शीर्षक ही कम रोचक न था …पी जी आई करेगा पूरा तंदरूस्त। इस के ई-पेपर से ली गई क्लिपिंग यहां लगा रहा हूं।

जैसा कि खबर में कहा गया है कि पी जी आई में भर्ती हुए मरीज अब सिर्फ एक तकलीफ़ का इलाज करवाने की बजाए पूरी तरह स्वस्थ होकर ही बाहर आएंगे। पी जी आई अपनी स्थापना के पचास साल पूरे होने पर मरीज़ों को यह बेहतर सुविधा देने जा रहा है।

हम अकसर सुनते हैं ना कि पुराने वैध बड़े ग्रेट हुआ करते थे – होते भी क्यों ना, वे एक मरीज़ को विभिन्न अंगों से तैयार हुआ एक पुतला समझने की बजाए एक पूर्ण शख्सियत समझते थे। वे उन को एक समग्र इकाई के रूप में देखते थे —केवल उन के शरीर का ही नहीं, उन की मनोस्थिति, उन की पारिवारिक परिस्थिति, समाज में उन का स्थान, उन की आध्यात्मिक प्रवृत्ति …..शायद अपने मरीज़ों के बारे में इन सब के बारे में पुराने वैध-हकीम ज़रूरत जितनी जानकारी तो रखते ही थे…तभी तो नबज़ पर हाथ रखने के कमाल के किस्से हम सुनते आये हैं।

ऊपर वाली खबर स्निप्पिंग टूल से काटी गई है —इस खबर को कैमरे से खींच कर डाला है, इस पर क्लिक करके आप इसे पढ़ पाएंगें—-ऊपर वाली खबर में यह काम नहीं हो पाया…..

और देखा जाए तो विश्व स्वास्थ्य संगठन की सेहत की परिभाषा भी तो कुछ ऐसी है — एग्जैक्टली तो मैं लिख नहीं पाऊंगा …लेकिन उस के प्राण यही हैं — सेहत का मतलब है किसी बंदे की शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, सामाजिक सेहत और केवल बीमारी से रहित होना ही सेहत की निशानी नहीं है।

मैं भी कहां इन बातों के बारे में कभी सोचता अगर मैंने बंबई की टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साईंसिस (TISS) में अस्पताल प्रशासन की पढ़ाई पढ़ने के दौरान मैडीकल एंड साईकैटरिक सोशल-वर्क को न पढ़ा होता। उसे पढ़ने के बाद मेरी आंखे खुल गईं।

हमारी चिकित्सा व्यवस्था की एक अहम् बुराई ही यह है कि हम ने बहुत ज़्यादा फ्रेगमैंटेशन तो कर दिया है—अर्थात् हम ने आदमी के शरीर को या यूं कह लें उस की सेहत को बहुत ही ज़्यादा हिस्सों में बांट दिया है और अब हम से वह एक साथ जुड़ नहीं पा रहे हैं। नतीजा हमारे सामने हैं —-हर अंग के लिए अलग डाक्टर, मज़ाक होता है कि दाईं आंख के लिए अलग और बाईं के लिए अलग…..लेकिन इतने विशेषज्ञ होने के जितने फायदे होने चाहिए क्या आप को अपने आसपास लोगों के चेहरों की तरफ़ देख कर ये महसूस हुए हैं। नहीं ना, यह हो भी कैसे सकता है।

मानता हूं सेहतमंद रखना केवल सेहत विभाग का ही जिम्मा ही नहीं हैं, बहुत से अन्य फैक्टर्स हैं जो किसी समाज की सेहत में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं।

किसी बड़े अस्पताल में किसी मरीज़ को विशेषकर कम पढ़े लिखे को देख लें, किसी गांव से आये को देख लें….. हम कितना भी सुविधाओं का ढिंढोरा पीट लें, उस की हालत दयनीय होती है। कभी इधर भाग, कभी उधर ….एक जगह से दूसरी जगह भाग भाग कर ही बेचारा परेशान हो जाता है।

एक बीमारी के लिए अगर आप्रेशन होना है तो सर्जन के इलावा दूसरे डाक्टरों का केवल यही प्रयत्न रहता है कि इसे आप्रेशन के दौरान कोई कंप्लीकेशन न हो, सब कुछ ठीक ठाक हो जाए….. यही जांच करते हैं ना आप्रेशन से पहले …दवाईयां देकर हाई-ब्लड-प्रेशर नीचे लाया जाता है, शूगर का स्तर नीचे किया जाता है …. और क्या करें, ठीक ही तो कर रहे हैं …. लेकिन आप्रेशन होने पर जब मरीज़ घर आ जाता है ….तब कुछ दिनों बाद उसे कोई दूसरी पुरानी तकलीफ़ सताना शुरू कर देती है …बस फिर से अस्पताल के चक्कर पर चक्कर।

वैसे डाक्टर भी क्या करें, सरकारी अस्पतालों में इतनी भीड़ होती है कि वे चाहते हुए भी मरीज़ की वर्तमान बीमारी के अलावा और कोई बात उस से कर ही नहीं पाते….।

ऐसी बैकग्राउंड में पी जी आई की तरफ़ से इस खबर का दिखना एक ठंडे हवा के झोंके जैसा है …..देखते हैं इस का क्रियान्वयन कैसे किया जाता है … जो भी है, मंशा अच्छी है तो सब कुछ अच्छा ही होगा, लेकिन सब का माईंड-सैट चेंज होना ज़रूरी है —मरीज़ कहे कि मैं तो बस वही इलाज करवाऊंगा जिस की मुझे तकलीफ़ है, ऐसे तो नहीं चलेगा —कुछ भयंकर किस्म की बीमारियों के लक्षण शुरूआती दौर में होते ही नहीं है, ऐसे ही डाक्टरों एवं अन्य पैरा मैडीकल स्टॉफ को भी इस तरह की सुविधा के लिए– जिस के अंतर्गत मरीज़ को उस की सहमति से उस का एक बीमारी का सफल इलाज होने पर दूसरी अन्य तकलीफ़ों को भी दूर घर के हंसते-मुस्कुराते घर रवाना किया जायेगा.—पूरी तरह से डटे रहना होगा।

चलिए कहीं से शुरूआत तो हुई —अच्छा लगा यह खबर देख कर —इस का फॉलो-अप करते रहेंगे — वह कहावत भी कितनी सुदंर है कि तीन हज़ार मील का सफ़र भी शुरू तो पहले ही कदम से होता है!!

पोस्ट कुछ ज़्यादा ही बोझिल सी नहीं हो गई ? —इसे हल्का फुल्का करने का भी जुगाड़ अपने पास है , लीजिए क्लिक करिए ….

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रिश्तों की अग्निपरीक्षा : बच्चे का पिता होने को लेकर संदेह में करा रहे डीएनए जांच

मैंने इस मुद्दा पर पढ़ा तो बहुत पहले से ही था…. आज फिर अमर उजाला के फ्रंट पेज पर यह स्टोरी देख कर मन बहुत कुंठित हुआ ….. अनमोल विश्वास पर भारी दस हज़ार का जांच ….इस स्टोरी में वर्णऩ किया गया है कि भारत के मंझोले शहरों में भी बच्चे का पिता होने की पुष्टि के लिये डीएऩए परीक्षण का चलन बढ़ता जा रहा है। आगरा, लखनऊ, चंडीगढ़ जैसे शहरों में बच्चे के जैविक पिता (biological father) की जांच के लिये पैटर्निटी केंद्र खुल गए हैं।
यहां पुरूष बच्चे और अपना ब्लड-सैंपल डॉक्टरों के माध्यम से दिल्ली, हैदराबाद,पुणे और अहमदाबाद की परीक्षणशालाओं में भेज रहे हैं। यूपी के मंझोले शहरों के अस्पतालों में हर महीने 10से 15 मामले पैटरनिटी टैस्ट के आ रहे हैं। मात्र दस हज़ार रूपये की फीस समेत इस टैस्ट के लिए तीन एमएल खून देना होता है, जिसकी रिपोर्ट एक सप्ताह में आती है। नेशनल एक्रेडिशन बोर्ड ऑफ हॉस्पिटल (एनबीएच) से संबद्ध कोई भी सैंटर डीएनए परीक्षण के लिये खून के नमूने ले सकता है। यदि बच्चों और पिता के नमूने मेल नहीं खाते तो यह तालाक का आधार भी बनता है। डीएऩए परीक्षण से यदि एक तरफ सामाजिक वर्जनाएं टूट रही हैं, तो दूसरी तरफ़ इसका सकारात्मक पक्ष भी सामने आ रहा है।
पैटरनिटी टेस्ट कॉमर्शियल हो चुका है। खबर में लिखा है कि दंपति अपना संशय मिटाने के लिए पैथोलाजी लैब से टेस्ट करा सकते हैं। इसके लिए कोई कानूनी कार्रवाई करने की ज़रूरत नहीं है। बल्कि एनएबीएच से संबद्ध किसी भी लैबोरेटरी की रिपोर्ट को कोर्ट भी मान्यता देता है।
एक सप्ताह में मिल जाती है पैटर्निटी रिपोर्ट
निजी हस्पतालों में खुले कलेक्शन सेंटर
शादीशुदा जिंदगी को विश्वास खुशनुमा करता है। टीवी सीरियल्स के पितृत्व जांच के बारे में दिखाए जाने के बाद से लोगों की मानसिकता बदली है। ऐसे में हाई सोसाइटी तक सीमित पैटरनिटी टेस्ट मिडल क्लास तक पहुंचा है। समाजशास्त्रियों का कहना है कि पति-पत्नी के बीच विश्वास का बंधन टूट रहा है।
पहचान पत्रों पर लगेगा डीएनए चिप —
अब स्कूलों में डीएनए चिप युक्त पहचान पत्र बनाने पर विचार किया जा रहा है। इंडियन बायोसाइंस की उपाध्यक्ष डा दिव्या जायसवाल के अनुसार पैदा होते ही बच्चों का डीएनए टैस्ट आसान होता है। बच्चों के डीएनए चिप में माता पिता का नाम, स्थायी पता समेत जन्म लेने का स्थान व तारीख भी अंकित रहेगी…. जन्म के समय ही डीएनए प्रोफाइल तैयार होने से अस्पतालों पर बच्चे बदलने के लगने वाले आरोप को एक मिनट में हल कर लिया जाएगा।

अच्छा तो पाठकों ये तो थी वो सारी बातें जो अखबार में छपी हैं…..लेकिन इस टैस्ट के बारे में अपना नज़रिया मैं अभी एक-दो घंटे में लिख कर आप के सामने हाज़िर होता हूं……..कहीं जाईयेगा नहीं, just a short break!!