प्लास्टिक की वाटर-बोतल फ्रिज में रखते समय सोचें ज़रूर ….

जब हम बिल्कुल छोटे थे और फ्रिज नहीं था घर में तो एक आईसबाक्स में बर्फ रख कर उस पर कांच की बोतलें रख दी जाती थीं.. साथ में फल-फ्रूट भी वहीं रख दिया जाता था।

फिर 10-12 साल के हुए तो फ्रिज आ गया लेकिन बोतलें वहीं कांच वाली पानी पीने के लिए इस्तेमाल की जाती थीं। और अधिकतर ये दारू की खाली बोतलें ही हुआ करती थीं….और उन दिनों अगर वैट-69 की खाली बोतल में पानी ठंडा रखा जाता था तो यह भी एक स्टेट्स-सिंबल से कम नहीं होता था।

और उसी जमाने में हम लोग देखा करते थे कि बच्चों को दूध पिलाने वाली बोतलें भी कांच की ही हुआ करती थीं …और हर रोज़ उन की एक लंबे से ब्रुश से सफ़ाई की जाती थी।

यह जो जब से प्लास्टिक आ गये हैं, बहुत गड़बड़ हो गई है। सब कुछ प्लास्टिक का आने से पर्यावरण का नाश तो हुआ ही है, साथ ही साथ हमारी सेहत पर भी बहुत प्रभाव पड़ा है।

कुछ चीज़ें हम लोग बस बिना सोच विचार के करते चले जाते हैं …जैसे कि पानी को स्टोर करने के लिए प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल किये जाना। अकसर हम लोग अब तक यही सोचते रहे हैं ना कि जो पतली प्लास्टिक की थैलियां (प्लास्टिक की पन्नी) होती हैं वही पर्यावरण खराब करती हैं, अगर उन में हम कुछ खाने-पीने का सामान बाज़ार से लाते हैं तो यह हमारी सेहत के लिए खराब है।

कभी प्लास्टिक की बोतलों की तरफ़ जिन में हम लोग पानी भर कर फ्रिज में रखते हैं उस के बारे में तो कहां सोचते हैं। दरअसल कुछ दिन मैं नेट पर कहीं देख रहा था कि आट्रेलिया में बहुत बवाल मचा हुआ था कि बच्चों की जो प्लास्टिक की दूध वाली बोतलें हैं वे शिशुओं की सेहत के लिए अच्छी नहीं है… इन में से निरंतर Bisphenol-A (BPA) नामक कैमीकल निकलता रहता है जो मानव के लिए बहुत ही हानिकारक है।

मैं इतने दिनों तक यही सोच कर परेशान हो रहा था कि आट्रेलिया में निःसंदेह जो प्लास्टिक इस्तेमाल किया जा रहा है वह हमारे यहां के प्लास्टिक से तो उत्तम ही होगा। इस में तो कोई शक नहीं होना चाहिए।

लेकिन जिस तरह से हम इतने वर्षों से प्लास्टिक की बोतलों में पानी फ्रिज में रखते हैं ….यह भी एक गड़बड़ मामला तो है ही। और एक बात, प्लास्टिक की बोतल में पानी पीना कोई ऐसी बात भी नहीं कि इसे एक बार पीने से आदमी बीमार हो जाता है, लेकिन चूंकि ये कईं कईं वर्षों, कईं दशकों तक चलता रहता है इसलिए यह हमारे शरीर में बीमारीयां तो लाता ही है।

इस में कोई शक नहीं है कि प्लास्टिक की बोतलों में निरंतर पानी पीते रहना सेहत के लिए ठीक नहीं है, इसलिए मैंने गूगल अंकल के साथ ज़्यादा माथा-पच्ची नहीं की। बस एक लिंक दिखा जिसे यहां लगा रहा हूं —इस एक लिंक पर भी इस विषय के बारे में काफ़ी जानकारी दी गई है —Are plastic bottles a health hazard? –इस में अच्छे से बताया गया है कि इन बोतलों की वजह से हम कौन कौन सी आफ़त मोल ले रहे हैं !!

अच्छा एक बात शेयर करूं — जब किसी बात के बारे में पता चलता है तो उस का फायदा तो होता ही है। जब मैंने इस बात की चर्चा घर में की तो सब से पहले तो यही प्रतिक्रिया की आज कल के फ्रिज कांच की बोतलों का वजन कहां सह पाते हैं…लेकिन अगले दो चार दिनों में पानी के लिए कांच की बोतलें भी फ्रिज में दिखने लगीं। बड़ा अच्छा लगा यह देख कर…मैं कांच की बोतल से ही पानी लेना पसंद करता हूं …एक बात नोटिस की है कि सेहत के लिए तो यह सेहतमंद है ही, इस का स्वाद भी प्लास्टिक की बोतल वाले पानी से कहीं बेहतर होता है।

हमारे फ्रिज में रखी पानी की बोतलें — इस बात का प्रूफ़ कि हम ने वापिस कांच की बोतलों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है …..अब आप कब यह नेक काम कर रहे हैं? मुझे लिखियेगा…..

लिखते लिखते ध्यान आया कि यार, इतनी क्रांतिकारी सी बात लिख रहा हूं तो इस से पहले एक बार अपने घर के फ्रिज में झांक कर तो देख लूं ….और जो देखा उस की तस्वीर यहां लगा रहा हूं। कांच की बोतलें आप देख सकते हैं।

एक बात और ..प्लास्टिक की बोतलें महंगी से महंगी हमारी सेहत के लिए खराब तो हैं ही , लेकिन हम लोग एक और बहुत गलत काम करते रहते हैं …ये जो मिनरल वाटर की बोतलें, कोल्ड-ड्रिंक्स की खाली प्लास्टिक की बोतलें होती हैं ये एक बार ही इस्तेमाल करने के लिए बनती हैं, लेकिन इन्हें भी कितने समय तक बार बार पीने वाला पानी पीने के लिए हम इस्तेमाल करते रहते हैं।

बस जाते जाते यही बात कहना चाहता हूं अगर आपने कल से अपने फ्रिज में कम से कम एक कांच की बोतल ही रखनी शुरु कर दी तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा, हो सकेगा तो कमैंट में लिखियेगा।

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कोल्ड-ड्रिंक्स के नाम पर मचने वाली लूट

कल रात में मैं अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की साइट पर ये गैस वाली कोल्ड-ड्रिंक्स (carbonated cold drinks) के बारे में पढ़ रहा था… इस वेबपेज का लिंक मैं नीचे दे रहा हूं ..आप देख कर दंग रह जाएंगे कि किस तरह से अमेरिका में इन कोल्ड-ड्रिंक्स के एक एक इन्ग्रिडिऐंट्स को कैसे लैंस के नीचे से गुजरना पड़ता है। इतनी बारीकी से प्रिज़रवेटिव्स एवं स्टेबीलाइज़र्स के बारे में लोगों को आगाह करवाया गया है।

लेकिन ऐसी कोई व्यवस्था भारत में मुझे तो कभी दिखी ही नहीं ….याद है कुछ वर्ष पहले जब सेंटर फॉर साईंस एंड एनवायरनमैंट (Centre for science and environment) ने कोल्ड-ड्रिक्स में इस्तेमाल किए जाने वाले पानी की क्वालिटी पर ही सवाल खड़े कर दिये थे तो कितना बवाल मचा था ….हां, हां, हुआ था कुछ तो अखबारों में, मीडिया में खबरें छपीं थीं….लेकिन क्या हुआ? — वही कोल्ड-ड्रिंक्स धड़ल्ले से बिक रही हैं –बिक रही हैं क्योंकि लोगों को इन की लत पड़ चुकी है।

इन कोल्ड-ड्रिंक्स के बारे में चिकित्सक बिल्कुल ठीक कहते हैं कि ये केवल मीठा पानी के सिवाए कुछ भी नहीं है…. तो क्या हम लोग उस गैस की कीमत चुका रहे होते हैं!

कोल्ड-ड्रिंक्स पीना बिल्कुल नाली में पैसे फैंकने के बराबर है —कोई भी तो फायदा नहीं है इसका — बस फायदा कंपनी का तो है ही, साथ ही साथ उन सुप्रसिद्ध शख्सियतों का जो इन को बेचने के लिए पब्लिक को  मूर्ख बनाने से भी नहीं चूकते — लेकिन आप ही कहेंगे – वे कोई जबरदस्ती तो नहीं ना कर रहे, जब पब्लिक खुशी खुशी  बन रही है तो वे भला यह नेक काम कर के क्यों न करोड़ों कमा लें!

जो लिंक मैं नीचे दे रहा हूं उस पर जाकर आप यह देखिए कि अमेरिकी लोग इन कोल्डड्रिंक्स के दीवाने हैं – कुछ लिखा था कि इतने गैलन कोल्ड ड्रिंक एक औसत अमेरिकी एक साल में गटक जाता है।

कोल्ड-ड्रिंक्स पीने को मैं कभी भी प्रोत्साहित नहीं करता — लेकिन कभी कभार जब थोड़ी बहुत बदहज़मी सी हो जाए तो थोड़ी बहुत पी ही लेता हूं …इस से ज़्यादा कुछ दिन —बस, महीने में एक दो बार –बिल्कुल थोड़ी बहुत किसी के बहुत आग्रह करने पर।

जो हमारे पुराने पारंपिक पेय रहे हैं –वे अभी भी भाते हैं —-गन्ने का रस, शिकंजी, आम का पन्ना, सत्तू, छाछ  …यह सब पीना अच्छा लगता है …. याद है बचपन में हम लोग उस बंटे वाली बोतल के कितने दीवाने हुआ करते थे — दूध में डाल कर पीना कितना अच्छा लगता था।

आप सब के लिेए एक होम-वर्क है –अगली बार जब कोल्ड-ड्रिंक्स, एनर्जी ड्रिंक्स अथवा किसी ऐसे पेय को खरीदें तो इस पर दी गई न्यूट्रिशन से संबंधित जानकारी ध्यान से देखियेगा।

मेरे कुछ लेख किसी ज़माने में लिखे हुए जिन्हें पढ कर आप को ज़रूर कुछ अच्छा लगेगा….
गन्ने के रस के बारे में मेरा एक लेख
एनर्जी ड्रिंक्स की इधर पोल खोली है
फलों का रस पीते समय थोड़ा ध्यान दें
और हां, अपने लिंक लगाने के चक्कर में अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन का वह लिंक ही कहीं न भूल जाऊं ….
What you should know about Carbonated Soft drinks?

कच्चे दूध का मुद्दा तो पीछे छूट गया लगता है..

जब हम लोग 25 वर्ष पहले माइक्रोबॉयोलॉजी पढ़ते थे तो दूध की पैश्चूराईज़ेशन के बारे में पढ़ा—वह यह कि गाय, भैंस, बकरी ..इन से मिलने वाले दूध को पैश्चूराईज़ेशन करने के बाद ही सेवन किया जाना चाहिए।

बचपन में देखते थे कि हमारे पड़ोस में एक सरकारी प्राइमरी स्कूल था जिस में दोपहर को सैंकड़ों दूध के पाउच आ जाते थे जिन्हें वे बच्चे मिड-डे मील के तौर पर पीते थे। अब सोचता हूं तो लगता नहीं कि वह दूध पैश्चूराईज़्ड होगा। पैश्चूराईज़ेशन का मतलब है कि कच्चे दूध को एक विशेष समय तक विशेष डिग्री तापमान तक उबलने देना ताकि उस में हानिकारक जीवाणु जैसे कि ई-कोलाई, सालमोनैला, लिस्टिरिया आदि नष्ट हो जाएं और दूध पीने लायक बन जाए।

लेकिन मुझे याद है कि हमें यह भी पढ़ाया जाता था कि बिना पैश्चूराईज़ेशन के दूध लेने से एक तरह की टी बी –जिसे बोवाईन ट्यूबरक्लोसिस – Bovine Tuberculosis –भी कहते हैं… हो सकती है जिस में हमारी आंते टीबी से ग्रस्त हो सकती हैं।

आज जब सुबह यह न्यूज़-रिपोर्ट पढ़ रहा था तो यही सोचा कि शायद विकसित देशों में पशुओं की टी बी पर पूरा काबू पा लिया होगा जो इस बीमारी का ज़िक्र तक ही नहीं है।

जब बिल्कुल छोटे थे तो देखते थे कि अकसर लोग गाय-भैंस के नीचे बैठ कर “डोके” लिया करते थे —यह पंजाबी का शब्द है जिस का मतलब है गाय, भैंस के थनों के सामने बैठ कर दूध की धारें सीधा मुंह में लेना…. इस तरह से दूध के पीने को बहुत पौष्टिक माना जाता था ..बस, सिर्फ़ एक भ्रांति और क्या!!

आज जब मैं फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा प्रकाशित यह रिपोर्ट देख रहा था जिस का लिंक मैं यहां दे रहा हूं तो यही सोच रहा था कि अब भारत में तो कच्चे दूध की बात ही शायद कभी सुनी नहीं। यहां पर दूध इतना ज़्यादा मिलावटी बिकने लगा है कि अब यह फोकस कहां रहा है कि दूध उबला भी हुआ है या नहीं!! FDA link –> Raw Milk And Food Safety … इस लिंक पर क्लिक करते ही आप जिस वेबपेज पर पहुंचेंगे, वहां पर जो वीडियो लगा हुआ है वह भी ज़रूर देखिए।

नकली, घटिया किस्म के पावडर से तैयार किया गया दूध धड़ल्ले से बिक रहा है — मीडिया कुछ दिन चीखता-चिल्लाता है, लेकिन वह भी क्या करे, केवल दूध पर ही तो अटका नहीं रह सकता। लेकिन इतनी बात तो अब मैं भी समझ गया हूं कि यह बाज़ार में बिकने वाले पनीर, मिठाईयां, मावा सब के सब (सब के सब की बजाए अधिकतर लिखना मुझे अपनी सेफ्टी के लिए ठीक लगता है!!) ..पावडर दूध से तैयार किये जा रहे हैं….वरना इतना दूध कैसे गर्मी के दिनों में भी इतनी आसानी से मिल जाता है।

अब तो लगता है कि दूध की क्वालिटी के बारे में बात ही न की जाए— यहां यह ही नहीं पता कि किस मिलावटी दूध का सेवन किया जा रहा है, ऐसे में पैश्चूराईज़ेशन की बात को क्या छेड़ें !!

दूध के ऊपर कुछ भी लिखना अब बड़ा फुद्दू सा काम लगता है …कारण यह कि हर तरफ़ धड़ल्ले से मिलावटी दूध, कैमीकल दूध बिक रहा है …पब्लिक इसे पी-पी कर अपनी सेहत तबाह किये जा रही है।

बस, यह लिख कर अपनी बात खत्म करता हूं कि सावधानी बरतने में ही समझदारी है। मैं अपनी बात ही कहता हूं —मैं बाज़ार की चाय बहुत ही ज़्यादा मज़बूरी में पीता हूं —साल छः महीने में एक बार …जैसे कि कोई दूध से बनी मिठाई को शिष्टचार के लिए कभी छःमहीने-साल में एक बार खा लेता हूं —इसी पूरी अवेयरनैस के साथ खाता हूं यह मिलावटी घटिया दूध से तैयार की गई है…..बर्फी-वर्फी का तो मतलब ही नहीं, शायद पांच छः वर्ष हो गये हैं।

किसी भी समारोह में जाता हूं तो दूध और दूध से बने पदार्थों को छूना भी पाप समझता हूं –जैसे कि मिल्क-शेक, दही भल्ले, रायता, पनीर वाली कोई भी सब्जी, लस्सी-छाछ, रबड़ी, आइसक्रीम……लिस्ट इतनी लंबी है कि आप यही सोच रहे होंगे कि यार तू फिर जाता ही क्यों है इन समारोहों में …..उस का जवाब है दाल-चावल खाने। अगर हो सके तो आप भी सार्वजनिक जगहों पर इन चीज़ों का त्याग कर के देखिए —अच्छा लगेगा। मुझे देख कर अब बच्चे भी शादी-ब्याहों में इन चीज़ों से दूध रहने लगे हैं।

आजकल यह बाज़ार में जगह जगह मिल्क-शेक बहुत बिकने लग गया है ….समझ नहीं आती कि लिखूं कि नहीं कि क्या आप यह सुनिश्चित करते हैं कि यह दूध पैश्चूराईज़ड है कि नहीं, लेकिन फिर लगता है कि क्या फर्क पड़ता है —जिस दूध का ही पता नहीं कि वह किस मिलावटी स्रोत से आया है ….किसी घटिसा किस्म के पावडर से बना है या और कोई कैमीकल लफड़ा है —कुछ भी तो पता नहीं… ऐसे में पैश्चूराईज़ड है या नहीं, अब किसे इन सब बातों में पड़ने की फ़ुर्सत है।

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि दूध के बारे में बहुत ही ज़्यादा सचेत रहने की ज़रूरत है, आखिर यह हमारी सेहत का मामला है।

दुनिया भर में नाश्ते में क्या लिया जा रहा है..

आज एक बड़ी रोचक बात चली …वह यह कि दुनिया के लोग सुबह के नाश्ते में क्या क्या लेते हैं….इस का लिंक यहां दे रहा हूं ….Breakfast from around world – चीन से यूगांडा तक लोग क्या क्या खा रहे हैं, यह देखना अच्छा लगा। इन खाद्य़ पदार्थों के नाम तो मेरे को भी नहीं आते। इस लिंक पर जा कर जब आप एक से दस वाली गिनती पर क्लिक करते जाएंगे तो विभिन्न देशों के नाश्तों की तस्वीरें देख पाएंगे।
मुझे ये तस्वीरें देख कर ऐसे लगा कि यह तो पंजाब के साथ भेदभाव हो गया … पंजाब का नाश्ता तो यहां दिखाया ही नहीं गया, इसलिये मैंने गूगल से निकाल लिया पंजाबी नाश्ता जिसे यहां सजा रहा हूं।

गर्मागर्म परांठा

 

अमृतसरी नॉन

चलिए मज़ाक तो हो गया, लेकिन यह पंजाबी नाश्ते की जो मुंह बोलती तस्वीरें हैं ये मज़ाक नहीं है, ये तो सच्चाई है….कड़े वाला मीठी लस्सी वाला गिलास भी मज़ाक नहीं है।

सुबह के नाश्ते का ध्यान आते ही मुझे अपने कईं प्रोफैसर याद आ जाते हैं ….जब ओपीडी में या क्लास में किसी छात्रा को चक्कर आ जाता था तो खूब डांटते थे कि तुम लोग पता नहीं नाश्ते से क्यों भागती हो? –और सच में अकसर उन दिनों कुछ छात्राएं ब्रेकफॉस्ट नहीं किया करती थीं।

पूरी-छोले

हलवा कैसे कोई भूल सकता है ..

लेकिन आज भी देखते हैं कि बच्चों की अकसर ब्रेकफॉस्ट में ज्यादा रूचि नहीं दिखती, बस भागते भागते एक गिलास दूध ले लिया तो लिया वरना कोई बात नहीं सब चलता है वाली मानसिकता।

एक पौष्टिक नाश्ता सब के लिये ज़रूरी होता है, किसी भी आयुवर्ग के लिये। बच्चों के ऊपर की गई मैं एक रिसर्च देख रहा था कि जो बच्चे घर से पौष्टिक नाश्ता नहीं कर के जाते, वे पढ़ाई में ठीक से मन नहीं लगा पाते, किसी विश्वसनीय संस्था ने यह स्टडी की थी….. कईं बार लगता है कि ऐसे विषयों पर रिसर्च करने से क्या हासिल …कोई अनपढ़ बंदा भी यह जानता है कि अगर सुबह का नाश्ता ही नहीं किया गया तो पढ़ाई में क्या ख़ाक मन लगेगा !!

पेड़े वाली लस्सी

 

कड़े वाले बड़े गिलास में लस्सी पीने का मज़ा ही कुछ और है..

क्या आप को लगता है कि अब इतनी बढ़िया बढ़िया पंजाबी पकवानों की याद दिला कर मैं आप को सेहतमंद नाश्ते के विभिन्न विकल्पों के बारे में बोर करने की हिमाकत करना चाहूंगा। आज तो यही नाश्ता चलने दो यार ……..कल की कल सोचेंगे। कोई बात नहीं कभी कभी नियम तोड़ने भी तो अच्छे लगते हैं…..है कि नहीं? …. नाश्ते के बाद यह पेड़े वाली पंजाबी मीठी लस्सी कड़े वाले बडे़ गिलास में पीना मत भूलना ……मलाई मार के !!!

 

प्रेरणा … Breakfast from around world

आइसक्रीम के नाम पर आखिर बिक क्या रहा है?

आइसक्रीम शॉप में सचेत (??) करता यह पोस्टर

कुछ दिन पहले की बात है ..मैं एक आईस-क्रीम की दुकान से आईस-क्रीम खरीदने गया… जैसे कि दुकानदारों की आदत सी होती है, उस ने अपने आप ही मुझे अपनी आईस-क्रीम के फायदे गिनाने शुरू कर दिये। बताने लगा कि केवल उन के द्वारा बेचे जाने वाले ब्रांड की आइसक्रीम ही असली ताज़ा दूध से बनती है और जितनी भी आईसक्रीम के नाम से बेचे जाने वाले अन्य प्रोडक्ट्स हैं, वे फ्रोज़न डेज़टर्स हैं और वे ज़्यादातर वेजिटेबल ऑयल्स/फैट्स से बनाए जाते हैं। मेरी मन में थोड़ी बहुत बात तो पड़ गई।

उस ने अपनी दुकान में एक पोस्टर भी चिपका रखा था जिस की तस्वीर आप ऊपर देख रहे हैं।

अकसर जब भी आईसक्रीम की बात चलती है तो अपना बचपन याद आ ही जाता है …जब पांच पैसे में हमें वह साईकिल पर आने वाला बर्फ की कुल्फ़ी से ही बेहद खुशियां दे जाता करता था, है कि नहीं? …और जब कभी अपना बजट 10 पैसे का होता था तो वह तीले वाली कुल्फ़ी खरीद लिया करते थे …जिसे वह रेहड़ीवाला हमें थमाते समय रबड़ी में डुबोना कभी नहीं भूला करता था। आज जब पीछे देखता हूं तो लगता है कि उस ज़माने में तीले वाली कुल्फ़ी खाना भी शायद एक टुच्चा-सा स्टेट्स सिंबल ही हुआ करता था।

 

बर्फ के गोले वाले दिन याद आये कि नहीं?

उन दिनों की ही बात है … बर्फ के गोले खाने वाले दिन। कोई सोच विचार नहीं कि बर्फ किस पानी की बनी है, उस में डलने वाले रंग परमिटेड हैं कि नहीं, शक्कर की जगह सकरीन तो इस्तेमाल नहीं की गई ….कुछ भी सोच विचार नहीं, बस बर्फ़ के गोले वाले ने बनाया गोला और हम टूट पड़ते थे उस पर वहीं ही …और वह बार बार उस पर मीठा रंग डलवाने का सिलसिला।

अरे यार, यह तो मैं किधर का किधर का निकल गया … बात चल रही थी आइसक्रीम की और फ्रोज़न-डेज़टर्स की….अब बचपन की यादें शेयर करने लगूंगा तो हो गई मेरी बात पूरी !!

अच्छा तो उस दुकानदार ने मुझे वह अपनी दुकान में लगा पोस्टर भी दिखा दिया और अपनी आइसक्रीम के ही आइसक्रीम होने के दावे को मेरे सामने पेश कर दिया। बात आई गई हो गई और मैंने अपनी बीवी-बच्चों से भी यह बात कही …उन्होंने भी इस पर छोटी मोटी टिप्पणी कर के अपने अपने आइसक्रीम-कप की तरफ़ ध्यान देना ही ज़ारी रखा।

अचानक अखबार को कैसे ध्यान आ गया इस जमे हुये तेल के बारे में लिखने का !

कल ही हिंदी के एक प्रसिद्द समाचार-पत्र के दूसरे पन्ने पर ही यह खबर दिख गई … हैरानगी हुई कि ज़्यादातर बातें उस आइसक्रीम वाले पोस्टर से ही मेल खा रही थीं। इस के सत्यता या असत्यता पर टिप्पणी किये बिना मुझे यही लगा कि यह ख़बर प्रायोजित सी लग रही है जैसे किसी कंपनी ने ही इसे लगवाया हो।

इस खबर में लिखी बातें या उस आइसक्रीम के बूथ पर लगे पोस्टरों में सच्चाई हो सकती है लेकिन सोचने की बात यह है कि जो कंपनी ऐसा दावी कर रही है कि आइसक्रीम ताज़ा दूध से बनती है ….क्या गारंटी है कि उसके प्रोड्क्ट्स ताज़ा दूध से ही बनते होंगे।

बम्बई चौपाटी पर वह दुकान जहां हमने दस साल बहुत आइसक्रीम खाई ...

यार मैं इस पत्तल वाली आइसक्रीम को कैसे भूल गया ..

बाज़ार में बिकने वाले दूध की —जिन में सुप्रसिद्ध कंपनियों के पाउच भी शामिल हैं — कितनी गुणवता है, यह सब कुछ अब देश से छिपा नहीं है, ऐसे में मुझे कभी भी यह डाइजैस्ट नहीं हुआ कि 60-70-80 रूपये में एक बड़ी सी ब्रिक में क्या बिक रहा होगा। इतने में तो ढंग का दो किलो शुध्द दूध तक नही आ पाता।

चलिए,इस की तो बात छोड़िए …उस पांच पांच दस दस रूपये में बिकनी वाली सॉफ्टी में क्या क्या डाला जाता होगा, देख कर डर लगता है। डर तो भी लगता है जब गाड़ी के दूसरे डिब्बे में कोई सफ़ेद रंग की कुल्फी दो-दो रूपये में बेचने वाला आ धमकता है ………….और लोग खूब खाते हें.

आप भी सोच रहे होंगे कि यार तू तो डरता ही रहेगा, लेकिन क्या करें, देख कर मक्खी तो नहीं निगली जाती। इतना तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ये जो पांच-पांच दस-दस रूपये में सॉफ्टी बेचने वाले स्टाल जगह जगह खुल गये हैं, इन में दूध तो हो नहीं सकता, उस की जगह पर क्या क्या डाला जाता है, इस के बारे में जानना होगा। लालच की बीमारी इतनी ज़्यादा बढ़ चुकी है कि अधिकतर खाध्य पदार्थ बेचने वाले को अपने चंद सिक्कों के मुनाफ़े के आगे ग्राहक की सेहत कुछ भी नहीं लगती।

मेरे विचार में तो जितने भी प्रोडक्ट्स बाज़ार में उपलब्ध हैं उन से यह अपेक्षा करना कि वे दूध से तैयार हुये हैं, यह सरासर हिमाकत होगी…इन में दूध न होने का मेरा पक्का विश्वास है। जो दूध से तैयार होने की ज़्यादा दुहाई देते हैं वे भी ताज़ा-शुध्द दूध तो इस्तेमाल करने से रहे, पावडर वाले दूध की हर जगह भरमार है...और तो और सिंथेटिक दूध के बारे में सचेत कर कर के अब चैनलों वाले इस विषय पर चुप ही हो गये हैं …..या आईपीएल में नित्य-प्रतिदिन होने वाले लफड़ों ने, निर्मल बाबा जी के दिव्य चमत्कारों की चकाचौंध ने उन्हें भी अपने घेरे में ले लिया है।

बहरहाल, कुछ भी हो बाज़ार में बिकने वाले आइसक्रीम का स्वाद तो अब फीका पड़ गया है।

यह पोस्ट यहीं बंद करता हूं ….यह तो केवल यादों की बारात सी ही पोस्ट लग रही है … इस विषय पर विशेष सामग्री लेकर जल्द ही हाज़िर होता हूं। तब तक यादों की बारात में ही शामिल हो जाते हैं ……..

चमकीले दोने बीमारी परोसते हैं…

हर खाने-पीने की वस्तु को प्लास्टिक की थैलियों में बिकता देख सिर दुःखता है। आज से पंद्रह-बीस वर्ष पहले दूध, दही प्लास्टिक की थैलियों में डाल कर दिया जाना बड़ा अजीब सा लगता था…लेकिन धीरे धीरे दिखने लगा कि गर्म दाल, सब्जी ….कोई भी खाध्य पदार्थ यहां तक कि तरह तरह के फलों के रस, गर्म रसगुल्ले….सब जहां प्लास्टिक की थैलियों का बोलबाला है।
मुझे नहीं पता कि किस प्रांत पर ये थैलियां प्रतिबंधित हैं और कहां पर अभी चालू हैं, न ही मैंने कभी जानने की कोशिश की क्योंकि अन्य कानूनों की तरह इस कानून को लागू करने के लिये भी जनता का पूरा सहयोग चाहिए। प्रतिबंध के बावजूद ऐसी कौन सी जगह है जहां हमें प्लास्टिक का इस्तेमाल होते नहीं दिखता!
बहरहाल, आज का मुद्दा कुछ अलग है, थोड़ा थोडा आस्था से और काफ़ी ज्यादा सेहत से संबंधित है। यहां किसी भी धार्मिक उत्सव में जाएं तो वहां प्रसाद मिलना तय होता है। लेकिन ज़्यादातर जगहों पर आपने देखा होगा कि जिन दोनों में हलवा, खीर, या कुछ भी गर्मागर्म परोसा जाता है, उन्हें देख कर ऐसा लगता है जैसे कि वो बीमारियां परोसने वाले दोने हैं।
मुझे दो दिन पहले इस बात को पाठकों तक पहुंचाने का ध्यान आया। मैं किसी सत्संग में गया हुआ और जब बाहर आते वक्त देखा कि इस तरह के चमकीले दोनों में प्रसाद दिया जा रहा है तो अजीब सा लगा। मैंने आज से लगभग चार-पांच वर्ष पहले भी इन दोनों के ऊपर एक लेख लिया था .. जिस का शीर्षक था …क्या ये बीमारियां परोसने वाले दोने हैं?

बीमारी परोसने वाले चमकीले दोने

अब इन दोनों में सफ़ेद चमकीले कागज़ की जगह गोल्डन चमकीला कागज़ लगाया जाने लगा है। इस तरह के दोनों में हम अकसर यहां वहां जलेबी, इमरती, गर्मागर्म रबड़ी, पानी-पूरी (गोल-गप्पे), चाट-पापड़ी, गर्मागर्म आलू की टिक्की, नूड्लस ….डाल कर खाते रहते हैं। लेकिन यह समझना बहुत ज़रूरी है कि इस तरह के दोनों में कुछ भी खाना बीमारी को निमंत्रण देने वाली बात है।
आप कभी इस चमकीले से कामज़ को दोने से अलग करने की कोशिश तो करें …. आप देखेंगे कि यह बहुत आसानी से अलग हो जाता है, यह बहुत बारीक होता है …और इसे देख कर आप स्वयं अनुमान लगा लेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है कि हम लोग इन तरह के दोनों में कुछ खाएं और कुछ न कुछ इस तरह का सस्ता प्लास्टिक भी हम न निगल जाएं। 
मैं तो अकसर यह देख कर दंग रह जाता हूं कि किस तरह से जनता को हर छोटी से छोटी चीज़ के लिये भी बनाया जाता है….इन दोनों को देखने में आप को लगेगा कि ये हैं तो पत्तल के ही, बस ऊपर यह चमकीला सा कवर लगा हुआ है। लेकिन नहीं, ये चमकीले कागज को उतारने के बाद जो आप को खाकी रंग को दोना नज़र आ रहा है, यह भी खाकी कागज़ का बना हुआ है।

थर्ड-क्लास प्लास्टिक जिसे कागज़ पर चिपका रखा है..

अब वो पत्तल वाले दोने तो दिखने तो लगभग बंद ही हो गये हैं ….सब से बढ़िया तो वही होते थे …लेकिन अब कौन करे उन्हें बनाने की माथापच्ची, पब्लिक को चकाचौंध करने के लिए और बहुत से सामान आ गये हैं। उन पत्तल के दोनों में या प्लेटों में कुछ भी खाना कितना सुखद अनुभव होता था, मानव जाति के साथ साथ मां प्रकृति के लिये भी ….जहां भी वे पत्तल गिरेंगे, मिट्टी में मिट्टी हो जाएंगे। और ये प्लास्टिक वाले दोने पहले तो  मानव को बीमार करेंगे और फिर धरती मां का गला दबाए रखेंगे क्योंकि ये बॉयो-डिग्रेडबल नहीं होते।
मैंने पिछले कुछ महीनों में काफ़ी पढ़ा कि विकसित देशों में बच्चों की प्लास्टिक से बनी दूध की बोतलें पर बहुत बवाल मचा हुआ है क्योंकि इन्हें बच्चों में होने वाली काफ़ी शारीरिक तकलीफ़ों से जोड़ कर देखा गया है, बच्चे तो बच्चे, बाप रे बाप, बडों का भी सारा दिन प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल किया जाना कहां तक सुरक्षित है, यह चर्चा फिर कभी करेंगे, विदेशों में इस दिशा में लोग काफ़ी जागरूक हो चुके हैं।
मैंने जब कहीं पर कम से कम फ्रिज में प्लास्टिक की बोतलों की बजाए कांच की बोतलें रखने की बात कही तो जवाब मिल गया …आजकल फ्रिज की बॉडी पहले जैसे इतनी रफ एंड टफ नहीं होती कि कांच की बोतलों का वज़न सह पाएं। मैं व्यक्तिगत तौर पर इस से सहमत नहीं हूं— फ्रिज की बॉडी को बचाने के चक्कर में कहीं हम अपनी बॉडी की तो ऐसी की तैसी नहीं कर रहे!
लगता है काफ़ी कुछ लिख दिया है, इसे यहां बंद करता हूं कि अगली बार जब भी आप को किसी जगह पर प्रसाद आदि इन बीमारी परोसने वाले दोनों में दे तो आप प्रेमपूर्वक दोने को दूर रखते हुए प्रसाद को हाथ पर ग्रहण कर लें, कोई बात नहीं …अगर उस समय हाथ थोड़े से मैले भी होंगे तो भी इन भयंकर दोनों से तो कईं गुणा बेहतर ही हैं। आशा है आप इस बात को अपने अन्य लोगों के साथ भी शेयर करेंगे।

प्रोटीन की कमी कर देती है जवानी में बूढ़ा

दो दिन पहले अपने एक मित्र के यहां जाना हुआ… वहां पर उन का 20-22 वर्ष का बेटा बैठा हुआ था…ऐसे ही कुछ रूटीन टैस्ट उस ने अपने करवाए थे … बात चली की इस के टैस्टों में प्रोटीन की मात्रा कम आई है… कम का मतलब कि बिल्कुल लोअर रेंज की तरफ और ग्लोबुलिन नामक प्रोटीन की मात्रा भी कम थी। बाकी सब ठीक ठाक था।
मेरा मित्र और उस की पत्नी दोनों आई ए एस कैडर में हैं ….प्रोटीन की कमी की बात छिड़ी तो उस नवयुवक ने कहना शुरू किया कि लगता है कि अब मुझे प्रोटीन की भरपाई करने के लिये कुछ करना ही होगा, वह जो बातें कर रहा था, दरअसल वे सब की सब ऐसी भ्रांतियां हैं जिन का हर स्तर पर खंडन होना चाहिए।
वह बच्चा कहने लगा कि प्रोटीन की कमी के रहते ही मुझे जिम जाने से कुछ भी हासिल नहीं हो रहा था। उस ने आगे कहा कि वह जब भी जिम से होकर आता था तो अपने आप को पहले से भी ज़्यादा थका-हारा पाता था। लेकिन वह कहने लगा कि लगता है अब मुझे कुछ तो प्रोटीन सप्लीमैंट आदि लेने शुरू करने ही होंगे। और वहां बैठे बैठे बात यह भी चली कि उसे जंक-फूड ही पसंद है— पिज़्जा, बर्गर, नूडल्स, कोल्ड-ड्रिक्स, रेस्टरां का खाना, चिप्स, आइसक्रीम —-बस वही सब कुछ जो आज कल की जैनरेशन एक्स को चाहिए होता है — इसलिये अब मेरी और मेरी पत्नी की बोलने की बारी थी।
मेरी पत्नी ने उसे समझाया कि यह जो तुम सप्लीमैंट्स की बात करते हो उसे तो बिल्कुल मन से निकाल दो …इन में सब तरह की स्टीरायड्स की मिलावट की रिपोर्टें आती रहती हैं …..वैसे भी प्रोटीन की कमी को दूर करने के लिये युवास्था में यह फूड-सप्लीमैंट्स को लेना तो कोई विकल्प है ही नहीं, विशेषकर ऐसे युवाओं में जो घर के खाने से –दाल रोटी साग सब्जी से दूर भागते हैं…..
इसलिये उस युवक को सलाह दी गई कि तुम किसी तरह के और चक्करों में न पड़ कर अपना खाना पीना ठीक करो….दाल, रोटी आदि पर ध्यान देना शुरू करो…..दाल की अच्छी मात्रा खाया करो, अंकुरित दालें एवं अनाज खाया करो, दूध-दही का सेवन किया करो………चिंता न करों, बाकी सब कुछ प्रकृत्ति दुरूस्त कर देगी। यह हमें बार बार चेता कर लाइन पर लाने का काम करती रहती है।
वैसे तो हमारे मित्र का पूरा परिवार शुद्ध शाकाहारी है ….लेकिन उन के बेटे ने उस दिन अपना एक और डॉउट दूर करना ज़रूरी समझा … पूछने लगा कि क्या उसे इस प्रोटीन की कमी के लिए मांस,मीट,मच्छी खाना होगा। उस का समाधान किया गया कि अगर केवल इस कमी को पूरा करने के लिये ही वह मांसाहार का इस्तेमाल करने की सोच रहा तो इस की कोई ज़रूरत नहीं क्योंकि शाकाहारी खान-पान के द्वारा भी संतुलित आहार से इस कमी को बड़े अच्छे ढंग से दूर रखा जा सकता है।
पता नहीं अब ये बातें कितना उस पर असर करेंगी — वैसे उसे यह भी समझा दिया था कि प्रोटीन की कमी इस उम्र में होना कोई अच्छी बात नहीं है …. प्रोटीन हमारे शरीर में बॉडी बिल्डिंग व रिपेयर का काम करता है, इसलिए इस की कमी को सीरियसली लेते हुये वह सब कुछ करें जिस से यह मात्रा पूरी हो जाए।
वैसे आप को यह बात सुन कर क्या यह नहीं लगता कि यह कहानी तो हर घर के बच्चों की है …विशेषकर खाते-पीते संभ्रांत परिवारों की …….लेकिन इस का समाधान तो करना ही होगा…. 20-22 वर्ष के युवाओं में प्रोटीन की कमी दिखने लगेगी तो यह भविष्य के लिये खतरे की घंटी ही तो है।

वैसे एक बात तो है कि आज का युवा हमारी बात न भी मानें ….कम से कम मेरे द्वारा नीचे दिये जा रहे लिकं पर जा कर इस इकबाल की दिनचर्या से ही कुछ सीख लें ………….