83 वर्षीय गुर्दा दानी का परोपकारी ज़ज़्बा

समाचार सच में हैरान करने वाला लगा कि एक 83 वर्षीय व्यक्ति ने इंगलैंड में अपना एक गुर्दा परोपकार करते हुये दान किया है। परोपकार शब्द का यहां बहुत महत्व है क्योंकि उस खबर में बार बार एक शब्द लिखा गया था …altruistic ..अर्थात् परोपकारी…..मुझे इस का ठीक से अर्थ पता नहीं था। शब्दकोष में देखने पर पता चला।

अब देखा जाए तो जो भी डोनर अपना गुर्दा दान कर रहा है, वह कर तो परोपकार के लिये ही है ना। लेकिन नहीं, शायद कानून ऐसा नहीं मानता। आप भी हैरान हो जाएंगे अगर इस परोपकार की परिभाषा आप सुनेंगे तो। इस तरह के केसों में परोपकार का मतलब है कि इस बंदे को यह नहीं पता कि उस का गुर्दा किस बीमार के शरीर में लगाया जायेगा और यह बंदा जीवनपर्यंत उस व्यक्ति से मिल भी नहीं सकेगा………तो फिर इस  रिश्ते को क्या नाम दें…..कितना बड़ा इंसानियत का रिश्ता, मानवता का अटूट बंधन।

अब एक प्रश्न है कि 83 वर्ष के व्यक्ति ने अपना गुर्दा तो दान दे दिया …..आखिर उस में अब बचा क्या होगा? —यह एक गलत धारणा है, सभी तरह के टैस्ट करने के बाद ही, दानी के गुर्दे की सेहत का जायजा लेकर ही इस विशेषज्ञ इस तरह का निर्णय लेते हैं, इसलिए वह तो इश्यू है ही नहीं। हां, एक बात तो है कि इस बंदे की सेहत की दाद देनी पड़ेगी जिसे 83 वर्ष की उम्र में भी इस तरह का दान देने के फिट पाया गया।

इस महान पुरूष के बारे में और लिखा था कि जब ये 70 वर्ष के हो गये तो इन्हें रक्त-दान देने से रोक दिया गया, जब इन्होंने अपनी बोन-मैरो (Bone marrow) को दान करना चाहा तो पता चला कि यह दान तो 40 वर्ष के नीचे वाले ही कर सकते हैं …..फिर इन्होंने गुर्दे की बीमारी से परेशान लोगों की तकलीफ़ों का ध्यान करते हुए अपना एक गुर्दा दान देने का निर्णय कर लिया। और दान देने के एक हफ़्ते बाद ये अपने आप को एक दम बिल्कुल फिट मानते हैं। इन के इस मानवता-मयी ज़ज़्बा को बारम्बार सलाम!!!

यह 83 वर्ष के गुर्दा दानी वाली खबर तो मैंने कल शाम को पढ़ी ….यह मुझे बहुत ही आश्चर्यजनक लगा क्योंकि सुबह ही दा हिंदु में एक आर्टीकल देखा था …. High Court allows donation of kidney for transplantation.

दा हिंदु की इस खबर में देखा कि दिल्ली की एक महिला को उस के चाचा की पोती या दोती (अब इंगलिश का यही तो लफड़ा है, grand-daughter लिखा है ….अब कैसे पता चले कि पोती है या दोती) ….अपना एक गुर्दा दान देना चाह रही थी लेकिन मैडीकल विशेषज्ञों की जो कमेटी इस तरह के किडनी ट्रांसप्लांट की अनुमति देती है, उस ने इस केस में अनुमति देने से यह कहते हुये मना कर दिया कि रिश्तेदारी दूर की है, दोनों रिश्तेदारों की वित्तीय हालत में बड़ा अंतर है जिस से लगता है कि उन में इतना स्नेह नहीं हो सकता और इस केस में उन्हें पैसे के लेनदेन का अंदेशा है इसलिए वे इस की इजाजत नहीं दे सकते।

मामला अपील अधिकारी तक गया …वहां भी रिजैक्ट… लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने इस आप्रेशन की अनुमति दे दी है… कोर्ट के निर्णय पर तो मैं किसी तरह की कोई भी टिप्पणी करने में सक्षम हूं नहीं, लेकिन जब जज ने अपना निर्णय 48 पन्नों में लिखा है तो सब कुछ जांच-परख तो लिया ही होगा। कोर्ट का कहना है कि जिस कमेटी ने यह कहा है कि दूर के रिश्तों में प्रेम-स्नेह हो नहीं सकता और गुर्दा दानी एवं गुर्दा लेने वाले की वित्तीय स्थिति में बड़ी खाई है….ये तर्क कोर्ट को न्यायसंगत नहीं लगे और उन्होंने कमेटी को दो दिन के भीतर इस ट्रांसप्लांटेशन की अनुमति देने को कहा है और अगर दो दिन के भीतर वे इस की अनुमति नहीं देते हैं तो भी इसे उन की अनुमति ही माना जायेगा।

  दरअसल गुर्दों की खरीद-फरोख्त का धंधा पिछले कुछ वर्षों पहले इतना चल निकला था कि यह एक चुटकुला सा लगने लगा था कि किस तरह के हट्टे-कट्टे युवकों के पेट से एक किडनी उड़ा ली जाती थी…..हिंदोस्तान की सारे विश्व में बड़ी जगहंसाई हो गई थी … अब विशेषज्ञों के जो दल इस तरह के आप्रेशन की अनुमति देते हैं (आथोराईज़ेशन कमेटी) उन्हें बड़ी सावधानी पूर्वक ये निर्णय लेने होते हैं ……………लेकिन सोचने की बात है कि अब मैडीकल फैसलों में भी कोर्ट-कचहरी को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है ……इस में कोई बुराई भी तो नहीं, क्योंकि कानून तो साबूतों की नींव पर ही टिका होता है।

इस लेख को लिखते लिखते यही ध्यान आ रहा है कि क्या हर बात का सबूत मिलना या ढूंढ पाना कहीं संभव होता है?……..क्या कहूं, कईं बातें सच होते हुये भी कहने-सुनने में अच्छी नहीं लगतीं, और हम बेचारे ठहरे हर शब्द पॉलिटिक्ली करैक्ट ही निकालने वाले। समझने वाले तो समझ गये !!

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