हैल्थ कार्यक्रमों में हिंदी की सार्थकता

टीवी पर कोई भी ऐसा कार्यक्रम देखना अच्छा लगता है जिस में किसी भी क्षेत्र में अनुभवी विशेषज्ञ अपना ज्ञान बांट रहा होता है। और जैसे जब वी मैट का दारा सिहं का वह डॉयलाग है कि इस उम्र में यह पता चलते देर नहीं लगती कि लड़के लड़की में चल क्या रहा है, बस एक नज़र ही काफ़ी होती है। ठीक उसी प्रकार जब किसी भी कार्यक्रम को देख रहे होते हैं जिस में विशेषज्ञ बुलाए गये हों तो किसी विशेषज्ञ को केवल आधा मिनट सुनने के बाद ही पता चल जाता है कि इसे आगे सुनना है या फिर वही ऊ ला ऊ ला …ही चलते रहने दिया जाए।
मुझे भी विभिन्न विशेषज्ञों की बातें सुनना बहुत अच्छा लगता है..क्योंकि ये लोग इन कार्यक्रमों के माध्यम से अपने जीवन भर का अनुभव बिंदास बांट रहे होते हैं। और अगर बात सेहत से जुड़े कार्यक्रमों की हो तो बात ही क्या है।
शनिवार शाम को छ़ः बजे लोकसभा टीवी एक प्रोग्राम आता है – हैल्दी इंडिया। उस समय जब भी मैं घर पर होता हूं तो इसे ज़रूर देखता हूं….इस बार भी 7 जनवरी को उन्होंने एक बहुत बढ़िया टापिक चुना था … ऐंटीनेटल केयर अर्थात् गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की देखभाल। बढिया विषय चुनने के साथ साथ जो तीन महिला रोग विशेषज्ञ आमंत्रित कर रखी थी वे भी सभी अत्यंत अनुभवी …उन के मुख से निकला एक एक शब्द ऐसा तोल के निकला हुया, उनकी वर्षों की तपस्या पर आधारित कि चाहे तो उन शब्दों को पत्थरों पर उकेर दिया जाए। राम मनोहर लोहिया अस्पताल, सुचेता कृपलानी अस्पताल और आल इंडिया इंस्टीच्यूट ऑफ मैडीकल साईंसस से ये महिला रोग विशेषज्ञ आईं थीं।
बात यह नहीं है कि टॉपिक इतना आसान …गर्भावस्था में महिलाओं की देखभाल…..आप भी पढ़ते हुए यही सोच रहे होंगे कि इस में है क्या ….अब सब तो जानने लगे हैं कि इस अवस्था में महिलाओं को अच्छा पौष्टिक आहार लेना है, कुछ दवाईयां आदि लेनी होंगी, अल्ट्रासाउंड करवाना होगा…बस….लेकिन जब इतनी अनुभवी तीन तीन महिला रोग विशेषज्ञ एक साथ बैठी हुई हैं तो कुछ तो वह ऐसा कहेंगी जिसे बहुत से दर्शक पहले से नहीं जानते और जिसे जानना नितांत आवश्यक होगा। लेकिन उस के लिए ज़रूरी है धीरज से इन्हें सुनने की।
लेकिन वही बात है कि धीरज तो कोई तभी रखेगा जब किसी की बात को समझ पाएगा……जी हां, इन कार्यक्रमों की भाषा की तरफ़ ध्यान दिया जाना बहुत ज़रूरी है। मैंने पहले भी लोकसभा टीवी को लिखा था  और आज फिर लिख रहा हूं कि अगर हम चाहते हैं कि इस तरह के सुंदर कार्यक्रमों का फ़ायदा करोड़ों लोग उठा पाएं तो उस के लिए ज़रूरी है कि कार्यक्रम को पेश करने वाले और आमंत्रित विशेषज्ञ भी अपनी अहम् बातों को हिंदी में भी दोहराते चले जाएं ….कुछ मल्टीमीडिया स्लाईड्स भी हिंदी में हो जाएं……..जहां तक मुझे याद है इस कार्यक्रम में भी केवल अंग्रेज़ी ही चली। दूसरे व्यवसायिक चैनलों पर किस की बात पर कितना यकीन किया जाए, यह हम डाक्टर लोग ही तय नहीं कर पाते तो आम आदमी कैसे यह तय कर पायेगा।
मैं किसी पूर्वाग्रह से बाधित होकर नहीं लिख रहा हूं लेकिन मैं ऐसा मानता हूं कि इस तरह के कार्यक्रमों की सार्थकता बहुत ज़्यादा बढ़ सकती है अगर इन्हें हिंदी में प्रसारित किया जाए…. और अगर यह किसी कारण वश नहीं भी हो पाए तो कम से कम हिदी-अंग्रेज़ी मिक्स कर दी जाए ….आज कल वैसे भी हिंगलिश लोगों को अच्छी लगने लगी है।
सोचने वाली बात यह है कि कार्यक्रम पेश करने वाला व्यक्ति हिंदी में प्रवीण है, सभी की सभी विशेषज्ञ भी हिदींभाषी ही हैं, और देश के करोड़ों लोग जो इन्हें देख सुन रहे हैं वे भी सभी हिंदी समझ लेते हैं तो फिर अंग्रेज़ी को क्यों दी जाती है इतनी प्राथमिकता …… और जहां तक बात है कोई प्रयोजक (स्पांसर) आदि ढूंढने की ….तो वह भी इस तरह के सरकारी चैनलों के लिए कोई मुद्दा नहीं होता। अगर हम ने विशेषज्ञों की बात जन मानस तक पहुंचानी है तो हमें उन्हीं की भाषा में, उन्हीं की शैली में ही उन से बतियाना होगा।
चलिए मैंने अपनी बात तो इतने ज़्यादा शब्दों का सहारा लेकर कर ली लेकिन उन विशेषज्ञों द्वारा कही दो बातें भी तो आप तक पहुंचा दूं…..

  • उन्होंने बताया कि गर्भ धारण करने से पहले की अवस्था भी इसी केयर के अंतर्गत आती है, कहने का भाव यह कि जब कोई विवाहित महिला गर्भ धारण के बारे में सोचती है तो उसे महिला रोग विशेषज्ञ से अवश्य मिलना चाहिए …. इस बात का उन्होंने विशेष महत्व बताया … फॉलिक एसिड नाम की एक टैबलेट है जिसे महिला रोग विशेषज्ञ गर्भधारण करने से भी पहले लेने की सलाह देती हैं , अगर गर्भावस्था के दौरान महिलाओं द्वारा इसे नियमित इस्तेमाल किया जाए तो नवजात शिशुओं में पाई जाने वाली बहुत सी विकृतियों (abnormalities like neural tube defects) से बचा जा सकता है।
  •  थैलेसिमिया जैसी बीमारी की स्क्रीनिंग की बात भी चल रही थी कि अगर पति अथवा पत्नी इस बीमारी के कैरियर हैं तो भी गर्भावस्था के शुरूआती दौर में ही इस की जांच कर के पता कर लिया जाए कि बच्चे तो इस बीमारी से ग्रस्त नहीं होगा, अगर होगा तो फिर शुरूआती दौर में ही गर्भपात करवाने के लिए दंपति को समझा दिया जाए।
  • एक बात उन विशेषज्ञों द्वारा और भी बहुत सुंदर कही गई कि सामान्य ढंग से चलने वाली गर्भावस्था कब असामान्य हो जायेगी, आम जनता को इस का पता ही नहीं चल पाता, इसीलिए नियमित तौर पर महिला रोग विशेषज्ञ से गर्भावस्था के दौरान मिलते रहना बेहद ज़रूरी है।

बातें तो उन सभी ने बहुत ही काम की बताईं…….लेकिन एक बात जो मुझे बहुत ही अच्छी लगी कि कार्यक्रम के दौरान दिल्ली के जिस किसी भी सरकारी अस्पताल की भी महिला ओपीडी की वीडियो दिखाई गई ….वहां मैंने यह देखा कि बहुत से बैंचों पर सभी महिलाएं इत्मीनान से बैठ कर अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही हैं, कोई धक्का-मुक्की नहीं, कोई घंटों खड़े होकर और भी बीमार होने का अंदेशा नहीं, बड़े ही आत्मसम्मान के साथ इंतज़ार करती महिलाएं……….क्या ऐसा सभी अस्पतालों में नहीं हो सकता कि इंतज़ार करने वाले मरीज़ों के आराम की तरफ़ भी ध्यान दिया जाए……………….अभी भी कुछ अस्पतालों में ओपीडी के बाहर खड़े मरीज़ अजीब से लगते हैं, यही सोच कर कि बातें हम लोग बहुत सी हांकते हैं, अपने काम को ही पूजा समझने की जगह हम बहुत सा समय बिना वजह की चाटुकारिता में गंवा देते हैं लेकिन क्या सभी मरीज़ों को सम्मानपूर्वक उनकी बारी की प्रतीक्षा करवाना सच ही में हमारे बश की बात नहीं है?  घंटों खड़े खड़े इंतज़ार करने से, धक्का मुक्का सहन करते करते, लाईन को सीधा करने करने वाले चपरासी से बार बार की डांट (ताकि सिफारिशी मरीज़ों को पहले अंदर  घुसाया जा सके) कैसे किसी मरीज़ का हाई-ब्लड-प्रैशर ठीक रख सकती है जब कि हम सब जानते हैं कि प्यार से बढ़िया दवा कोई बनी ही नहीं।
कल ही फेसबुक के एक फोरम पर एक सुंदर बात दिखी …..एक अनुभवी फ़िज़िशियन जो कि 30 वर्षों से प्रैक्टिस कर रहा है उस ने ऐलान किया कि प्यार से बढ़ कर कोई औषधि है ही नहीं, यह मानव जाति को लगने वाले सभी रोगों को मिटा देता है। किसी ने पूछा कि अगर यह काम न करे तो …….यह सुन कर उस फ़िज़िशियन ने जवाब दिया ………….तो फिर आप इस की डोज़ बढ़ा दें अर्था्त् प्यार की डोज़ बढ़ा दें।

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लोकसभा चैनल पर आने वाला हैल्दी-शो

मुझे अकसर लगे रहो मुन्नाभाई का वह सुंदर सा  डॉयलाग याद आता रहता है…..एक तो आठ हैं चैनल, फिर भी दिल बहलते क्यों नहीं!! बात बिल्कुल ऐसी ही है, मेरे साथ तो ऐसा ही है, मुझे आप का पता नहीं। लेकिन एक बात और तय है कि मैं अकसर सरकारी चैनलों पर लंबे समय तक खुशी खुशी अटका रहता हूं।

कालेज के दिनों की अलग बात थी…जब केवल जालंधर दूरदर्शन और पाकिस्तानी टीवी के बीच च्वाईस करनी होती थी, लेकिन वह कोई मुश्किल काम न था, लगभग साढ़े आठ बजे रात तक जालंधर दूरदर्शन और फिर अगल दो-अढ़ाई घंटे हम तक पाकिस्तानी सीरियल देखा करते थे ….आज तक वैसे उम्दा सीरियल नहीं दिखे। जालंधर दूरदर्शन अथवा राष्ट्रीय कार्यक्रम देखने की समय सीमा केवल हिंदी फीचर फिल्म या फिर चित्रहार वाले दिनों में आगे बढ़ जाती थी। दूरदर्शन देखने की शुरूआत अकसर रात के खाने की इंतज़ार में शाम छः बजे से ही खेती-बाड़ी प्रोग्राम देखने से या फिर मंड़ियो के भाव सुनने से ही हो जाया करती थी।

मैं क्यों यह स्टोरी लेकर बैठ गया ? —केवल यह बताने के लिये कि अपना सरकारी चैनलों से इश्क बहुत पुराना है। मैंने नोटिस किया है कि जब भी रिमोट हाथ में होता है तो मैं अकसर किसी न किसी सरकारी चैनल पर लंबे समय तक सहर्ष अटका रहता हूं। यह किसी मजबूरी-वश नहीं होता, लेकिन इन के बहुत से कार्यक्रमों की रैलेवेंस ही इतनी बढ़ती होती है कि देखते ही लगता है कि यह अपना ही कार्यक्रम है। इन में सब से बढ़िया बात यही होती है कि इन में व्यवसायीकरण नहीं झलकता —या फिर यह कह लूं कि व्यवसायीकरण की बास नहीं आती, वरना दूसरे कमर्शियल चैनलों पर तो छोटी-सी ब्रेकें देख देख कर सिर चकराने-सा लगता है।

जो गीत, जो फ़िल्में इन सरकारी चैनलों पर दिखती हैं, वे किसी वर्ग को ध्यान में रख कर प्रसारित नहीं की जातीं लेकिन वे सारे देश की पसंद होती हैं। कल रात को मैं लोकसभा टीवी पर देव आनंद की काला-पानी देख रहा था, अब ऐसी फिल्मों का अन्य कमर्शियल चैनलों पर दिखना मुश्किल सा हो गया है, है कि नहीं?
ऐसे ही दूरदर्शन पर एक प्रोग्राम देखा करता था ब्रेक-फास्ट शो के नाम से —उस की भी श्रेष्टता ब्यां कर पाना मुश्किल है। अपने अपने फील्ड से नामचीन हस्तियों से आप को रू-ब-रू करवाया जाता है, सब बातें लगता हैं अपनी ही हो रही है, अपने समाज की ही हो रही हैं, अपने आसपास के लोगों की ही बातें हैं। एक अन्य प्रोग्राम मुझे अकसर साहित्यिक विषयों पर बहुत भाता है जिस में ख्यातिप्राप्त लेखकों को अपने जीवन के अनुभव बांटते देख कर बहुत प्रेरणा मिलती है।

भूमिका कुछ ज़्यादा ही लंबी हो गई दिखती है …हां, तो बात तो मैं करना चाह रहा था लोक सभा चैनल पर दिखाए जाने वाले हैल्दी-शो की जो हर शनिवार शाम को 6 से 7 बजे तक दिखाया जाता है। इतना बढ़िया कार्यक्रम कि इसे एक बार लगा लें तो फिर आप अगले एक घंटे तक किसी दूसरे चैनल पर जा ही नहीं पाएंगे।

पिछले दो-तीन हफ्ते से मैं इसे नियमित देख रहा हूं ….. विभिन्न विषयों से जुडे अलग अलग विशेषज्ञों को ये स्टूडिय़ो में आमंत्रित करते हैं ..लाइव प्रोग्राम है…..दो-तीन हफ्ते पहले सड़क पर होने वाली सड़क दुर्घटनाओं के बारे में बातें हो रही थीं….. किस तरह से इस कार्यक्रम के अनुभवी विशेषज्ञ लोगों का बिहेवियर बदलने के लिये प्रेरित करते हैं, यह देखते ही बनता है, इस का सब से बड़ा कारण मुझे यही लगता है कि ये सब के सब अपने दिल से बोल रहे होते हैं और जब दिल कोई भी दिल से बोलता है तो फिर समझ लीजिए कि भगवान ही बोल रहा होता है। क्योंकि उस में इन की कोई कमर्शियल मजबूरी नहीं होती कि फलां फलां टैस्ट या दवाई को ही इन विशेषज्ञों ने प्रोमोट करना होता है, बिल्कुल ऐसी कोई बात मैंने कभी नोटिस नहीं की सरकारी चैनलों के सेहत प्रोग्रामों में।

हां, तो जब से मैं यह लोक सभा  टीवी पर हैल्दी-शो देख रहा हूं –मुझे एक बात बहुत बुरी तरह से कचोटती है कि यह सारे का सारा कार्यक्रम इंगलिश में होता है। मैं किसी भी बात के लिये इन की आलोचना नहीं कर रहा हूं लेकिन सकारात्मत आलोचना की जाए तो सब के लिये ही बेहतर होती है —ठीक है कि नहीं?  हां, तो मैंने इन्हें लिखा कि आप का इतना उम्दा प्रोग्राम है ..प्रिज़ेन्टेशन इतना बढ़िया, विशेषज्ञ इतने अनुभवी, ज़मीन से जुड़ी बातें करते हैं, कोई हाई-फाई बाते करके डराते नहीं…..सब कुछ अच्छा ही अचछा लेकिन फिर भी मैंने लिखा कि इस तरह के कार्यक्रम का फायदा देश के करोड़ों हिंदी-भाषा तक न पहुंचे तो कुछ अजीब सा लगता है।

जवाब तो मुझे कोई नहीं आया लेकिन अगली बार जब एच आई व्ही पर प्रोग्राम देखा तो उस में हिंदी भाषा में बातें देख-सुन पर आस बंधी, अच्छा लगा कि जनमानस तक इतनी बढ़िया बढ़िया बातें पहुंच पाएंगी। कल फिर एक कार्यक्रम था — हार्ट फेल्यर के ऊपर। लेकिन अधिकतर प्रोग्राम केवल इंगलिश में ही था, केवल एक दर्शक ने प्रश्न हिंदी में पूछा जिसे एक विशेषज्ञ ने बेहद सुदंर तरीके से हैंडल किया। प्रश्न बता देता हूं… लाइव प्रोग्राम था ..दर्शक ने पूछा कि भारत गांवों में बसता है, और एक औसत ग्रामीण आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं से दूर रहते हुए किस तरह से अपने दिल के बारे में सचेत रह सकता है। जवाब देने वाले विशेषज्ञ ने बहुत ही सटीक जवाब दिया कि सीने में भारीपन या दर्द को पेट की तकलीफ़ से न जोड़ कर देख जाए, ऐसे काम या एक्सरसाईज़ जो आप पहले सहज ही कर लिया करते थे, अगर इन्हें करने में सांस फूलने लगे या फिर पांवों में सूजन दिखने लगे तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श करें।

लेकिन मुझे चुभन इस बात की है कि ऐसे प्रोग्रामों में जो इतने इतने अनुभवी चिकित्सक चैनल वाले ढूंढ कर ले आते हैं, उन का फायदा देश के हर ऐसे नागरिक को मिलना चाहिए जो हिंदी समझ लेता है —चाहें वह अंगूठाछाप भी हो इस से क्या फ़र्क पड़ता है। ये विशेषज्ञ हमारी भ्रांतियों को दूर कर रहे होते हैं, हमारे डर को छू-मंतर कर रहे होते हैं, हमें उपचार के विभिन्न विकल्पों के बारे में समझा रहे होते हैं…..लेकिन इंगलिश में ….ठीक है, कुछ चिकित्सक हिंदी में अपनी बात रखने में इतने सहज नहीं होते तो भी क्या बात है, आज का दर्शक हर तरह की हिंदी को समझ लेता है जिस के लिये हमें हिदीं-मसाला फिल्मों का शुक्रिया अदा करना चाहिए जिन की कृपा से हम बम्बईया चालू हिंदी के आदि हो चुके हैं। वैसे तो अब गृह-मंत्रालय के राजभाषा विभाग ने भी आदेश जारी कर दिये हैं कि सरकारी काम काज में साहित्यिक हिंदी की जगह बोलचाल की भाषा को बढ़ावा दें।

हां, तो मैं सरकारी चैनलों की लोकप्रियता की बात कर रहा था… कल बाद दोपहल भी जब मैंने रिमोट पकड़ा तो दूरदर्शन के नेशनल चैनल पर एक बहुत बढ़िया कार्यक्रम चल रहा था। जिस में चित्रा मुदगिल जी, अशोक चक्रधर जी, एक डाक्टर और गोहर जी बैठे हुए थे ……प्रोग्राम का नाम था, मेरी बात .…कुछ यौन-संबंधों में उन्मुकता के बारे में बातें चल रही थीं……कालजीएट लड़के-लड़कियां थे, कुछ मां-बाप थे, अध्यापक थे और विशेषज्ञ तो थे ही….शीर्षक तो मुझे कार्यक्रम का पता नहीं चला क्योंकि मैंने बीच मे ही देखना शुरू किया था। लेकिन कार्यक्रम अति सुंदर था…. जब लिव-इन रिलेशनशिप की बात हो रही थी ……अशोक चक्रधर की बात का ध्यान आ रहा है….. वेस्ट का बेस्ट लो वेस्ट मत उठाओ—-(Take best from the west, not their waste!) …. चित्रा जी ने सुंदर शब्दों में कहा कि आज की युवा पीढ़ी शायद आसमान तो पा लेती है लेकिन उस के पांवों के तले से ज़मीन छूट जाती है…..(ऐसे ही कुछ भाव आप को नीचे एम्बैड किये गये यू-ट्यूब वीडियो में भी मिलेंगे)…..फिर एक बात, सब के सब विशेषज्ञ अपनी बात इतनी सहजता, ईमानदारी, प्रेम-वातसल्य, सौह्र्दर्यता से रखने वाले कि कैसे कोई चैनल बदले!! मैं चित्रा जी की इस बात से बहुत प्रभावित हुआ कि जब किसी चीज़ को पश्चिम द्वारा नकार दिया जाता है तो वह हमारे पल्ले पड़ जाती है — जब कोई ड्रग वहां पर बैन हो जाती है तो यहां बिकने लगती है।

इसी तरह के ही कार्यक्रम में एक बार डा त्रेहन (हृदय रोग विशेषज्ञ) को भी सुना था, उन्होंने भी कहा था कि अपने मन को खोल लिया करो…..उन्होंने यह भी कहा ….दिल खोल लै यारां नाल, नहीं तां डाक्टर खोलनगे औज़ारां नाल। मैंने भी तो वही किया, आप के साथ दिल खोल लिया……हल्का लग रहा है। लेकिन एक निर्णय कर रहा हूं कि लोकसभा चैनल पर जो भी बातें हैल्दी-शो में बड़े बड़े विशेषज्ञों द्वारा इंगलिश में कही जाएंगी उन बातों को आप तक अपने हिंदी में लिखे लेखों द्वारा  पहुंचाता रहा करूंगा।

वैसे मैंने यह डोमेन एवं इस की होस्टिंग अपने इंगलिश ब्लॉग के लिये खरीदी थी लेकिन पता नहीं क्यों इंगलिश में लिखने की इच्छा ही नहीं होती, यही लगता है कि मैं किस से बात कर रहा हूं………..वैसे भी इंगलिश में तो पहले ही से सब तक के कंटैंट की भरमार है, तो फिर हम सब का सामूहिक कर्तव्य बनता है कि हम हिंदी को सहेजें, उसे आगे लाएं, उस से प्यार करें, उसे बढ़ावा दें………..और यह इश्क इस स्तर तक परवान चढ़ जाए कि देश में केवल हिंदी समझने वाले को कभी भी यह न लगे कि केवल हिंदी जानने की वजह से वह पीछे छूट गया, या फिर उस का कोई नुकसान हो गया। वो अलग बात है कि इंगलिश पर भी अच्छी पकड़ होनी बहुत लाज़मी है, बढ़िया नौकरियां मिल पाती है, लेकिन यहां पर हम कहां नौकरियां पाने की बात कर रहे हैं, हम तो एक सीधे सादे देहाती हिंदोस्तानी तक अपनी दिल की गहराईयों से निकली अपनी बातें पहुंचाने की बात ही तो कर रहे हैं, आप का क्या ख्याल है?