45 से 65 वर्ष के आयुवर्ग को हैपेटाइटिस-सी टैस्ट करवाने की सलाह

अमेरिकी सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल ने उन सभी लोगों को एक बार हैपेटाइटिस-सी के लिये रक्त जांच करवाने की सलाह दी है जिन का जन्म 1945-1965 के दौरान हुआ था।

अमेरिका में 1999-2007 के दौरान हैपेटाइटिस-सी से ग्रस्त लोगों के मरने की संख्या में दोगुनी वृद्दि हुई है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि इस रोग का पता ही चिकित्सा वैज्ञानिकों को 1989 में चला ….और इस से पहले सत्तर और अस्सी के दशक में यह इंफैक्शन खूब फैला, यह वह समय था जब 1945 से 1965 के बीच में पैदा होने वाले लोग युवावस्था में थे।

1945-1965 के दौरान पैदा हुए लोगों में यह इंफैक्शन व्यापक तौर पर मौज़ूद है लेकिन उन में से एक चौथाई लोगों पर ही यह टैस्ट किया गया है।

सैंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल का विश्वास है कि इस अभियान से लगभग सवा लाख के करीब जानें बच पाएंगी। अमेरिका में हर वर्ष हैपेटाइटिस सी के लगभग 17000 केस सामने आने लगे हैं।

इस बीमारी से लिवर को जो डैमेज होता है वह कईं कईं दशकों तक बिना किसी लक्षण के ही चलता रहता है और इसलिए बिना टैस्टिंग के इस का पता नहीं चल सकता।

अमेरिका में इस समय इस बीमारी से 32 लाख लोग ग्रस्त हैं जिन में से 20 लाख लोग 1945-65 के बीच की पैदावार हैं। अमेरिकी विशेषज्ञों का यह मानना है कि अगर यह टैस्टिंग वाला अभियान कामयाब हो गया तो लगभग आठ लाख लोग (1945-65 की उपज) इलाज के लिये आगे आएंगे।

हैपेटाइटिस सी के बहुत से केस तो इंजैक्शन के लिये इस्तेमाल की जाने वाली सूईंयों से होते हैं – और 1992 में इस टैस्ट के चलने से पहले, जो बिना हैपेटाइटिस सी के टैस्ट के लोगों को जो ब्लड चढ़ाया जाता था (Blood transfusion) , उस से भी इस इंफैक्शन को बढ़ावा मिला।
भारतीयों के लिए क्या हुक्म है? — ऐसा कोई सरकारी हुक्मनामा तो अभी दिखा नहीं लेकिन एक बात तो है कि 1945-65 के बीच पैदा होने वाली भारतीय जानें कोई अमेरिकी जानों से भिन्न थोड़ी ही हैं। उस दौरान ही नहीं आज भी गांवों-कसबों में किस तरह की दूषित सिरिंजो-सूईंयों आदि से इंजैक्शन दिये जाते हैं यह जगजाहिर है। और भारत में भी यह रक्त जो इतने वर्षों तक बिना टैस्टिगं के चढ़ाया जाता रहा उस ने भी अपना प्रभाव छोड़ा ही होगा।

इसलिए लगता तो यही है कि अमेरिकी सलाह हम भारत वालों को भी मान ही लेनी चाहिए …जिन का जन्म 1945-65 के बीच हुआ है, उन्हें यह ब्लड टैस्ट (हैपेटाइटिस सी के लिये —500या 600 रूपये तक हो जाता है) करवा ही लेना चाहिए। और विशेषकर इस उम्र के वे लोग जिन्हें कभी भी लाइफ़ में 1992 से पहले रक्त चढ़ाया गया हो, या कोई आप्रेशन हुआ हो या कभी इंजैक्शन आदि लगे हों तो यह टैस्ट करवाना उन के लिये भी ठीक रहेगा।

मैं सोच रहा हूं कि यह टैस्ट लोगों ने करवा भी लिया … और अगर पॉज़िटिव होने का पता चल भी गया तो क्या होगा? — क्या वे इस के लिये महंगा इलाज करवा पाएंगे? —अधिकांश लोग तो इस के इलाज के बारे में सोच ही नहीं सकते …कोई विरला ही होगा जो बड़े शहरों के बड़े चिकित्सा संस्थानों के बड़े चिकित्सकों तक पहुंच कर इस तरह का इलाज शुरू करवा पाएगा। इस के इलाज के लिये इस्तेमाल की जाने वाली दवाईयां बहुत महंगी होती हैं।

लेकिन ऐसी भी क्या बात है ….Hope lasts with life! — क्या पता कब ये दवाईयां आम आदमी की पहुंच में आ जाएं या अस्पतालों में जनता को मुफ्त मिलने लगे ………जो भी हो, टैस्टिंग का यह तो फायदा होगा कि लोग इस के बारे में सचेत हो जाएंगे, इस के बारे में जनता में चर्चा छिड़ेगी ….और कुछ न भी हो, अगर पॉज़िटिव बंदे को अपने स्टेट्स का पता चलेगा तो उसे जीवनशैली में बदलाव करने संबंधी, खाने-पीने में परहेज़ संबंधी सलाह तो विशेषज्ञों से मिल ही जाएगी ….. क्या पता इस से कितने लोगों के सालों में ज़िंदगी लौट आए —वह इंगलिश में कहते हैं न …..adding life to years!

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हैपेटाइटिस सी के बारे में जानना क्यों ज़रूरी है?

डाक्टरों की हर बात को सुन कर इतनी टेंशन लेना भी ठीक नहीं, इसलिए अगर थोड़ा सा भी तनाव लग रहा है तो उसे इसी वेबपेज पर छोड़ कर आगे बढ़िये …सुनिए तो अमिताभ क्या कह रहे हैं …..

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हैपेटाइटिस-सी से हुई मौत ने मचाया हड़कंप ?

हिंदी समाचार-पत्रों की देश के दूर-दराज के इलाकों में पहुंच बहुत ज़्यादा है लेकिन यह देख कर दुःख होता है कि हिंदी प्रिंट मीडिया में मैडीकल पत्रकारिता को ढंग से कवर किया नहीं जाता। अकसर लोग अखबार में लिखी हरेक बात को किसी धार्मिक-ग्रंथ में लिखी बात की तरह ही लेते हैं, कतरने तक संजो कर रखते हैं इसलिए हिंदी अखबारों के हैल्थ कवरेज के कंटैंट को सुधारने में बहुत कुछ काम किया जाना अभी बाकी है।
हर खबर में मसाले-बाजी नहीं चलती — मैं भी रोज़ाना हिंदी का एक अखबार भी देखता हूं—नाम में क्या रखा है, ज्यादातर हिंदी की अखबारों का यही हाल है। सब से अहम् कारण यह है कि मैडीकल बीट के लिए प्रशिक्षित मैडीकल पत्रकार उपलब्ध ही नहीं है, और जो विज्ञान बैकग्राउंड से हैं, शायद उन्हें अंग्रेज़ी प्रिंट मीडिया ज़्यादा भा जाता है, बुराई भी क्या है, वे भी क्या करें, मुझे कईं बार बड़ा अजीब सा लगता है कि ये हिंदी के समाचार-पत्र विज्ञापनों आदि के बेहिसाब कमाई करते हैं लेकिन लेखकों को उन का मानदेय देने में इन को बड़ी दिक्कत होती है।
हां तो जो खबर मैंने सुबह देखी, उस का शीर्षक था …. हैपेटाइटिस-सी से मौत के बाद हड़कंप। खबर थी कि हैपेटाइटिस-सी के कारण होशियारपुर जिले में एक आदमी की मौत के बाद सेहत विभाग में हड़कंप की स्थिति है। इसके तहत इलाके के घर घर में जाकर हैपेटाइटिस सी संक्रमण की जांच की जा रही है।
एक बड़ी न्यूज़-स्टोरी तो थी लेकिन उसने केवल और केवल जनता को डराने का ही काम किया। आप शीर्षक ही देखिए — मौत के बाद हड़कंप —हड़कंप? …यह तो तब मचता है जब किसी सरकारी स्कूल में टीचर क्लास से गायब दिखते हैं या अस्पताल में डाक्टर किसी निरीक्षण के दौरान गैर-मौजूद पाये जाते हैं। इस में पाठकों को इस बीमारी के बारे में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं करवाई गई। खबर पढ़ कर और विशेषकर यह हड़कंप जैसी भाषा के इस्तेमाल से तो आम आदमी समझ ले कि हैपेटाइटिस का मतलब है बस मौत। ऐसा नहीं है, मैडीकल साईंस ने बहुत तरक्की कर ली है, आज हैपेटाइटिस-सी वॉयरस को ब्लड से मिटाने का दवाईयां आ गई हैं, महंगी हैं, बहुत कम लोग यह इलाज करवा पाते हैं, वो बात दूसरी है।
ऐसी बीमारियों के बारे में सब से ज़्यादा ज़रूरी है कि बचाव के तरीकों से लोगों को रू-ब-रू किया जाए। आप नीचे दिये गये लिंकों पर जाकर इस के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

हैपेटाइटिस-सी के बारे में आखिर सब को जानना क्यों ज़रूरी है ?

हैपेटाइटिस लाइलाज तो नहीं है लेकिन !!

जब चिकित्सा-कर्मी ही बीमारी परोसने लगें..
जाते जाते ध्यान आया —दो लड़कों को –छोटी उम्र के ही थे –दो दिन पहले मिले थे ….जब मैंने उन के हाथ और बाजुओं पर टैटू के बारे में पूछा तो बता रहे थे कि थोड़े दिन पहले ही गुदवाए हैं, बता रहे थे पांच पांच रूपये में यह बन जाते हैं …बात पांच –पचास की नहीं है, बच्चें हैं, समझते नहीं कि इन को यहां-वहां कहीं से भी गुदवाने से हैपेटाइटिस-सी, हैपेटाइटिस-बी, एच-आई-व्ही इंफैक्शन तक लग सकती है क्योंकि इन्हें गुदवाने वाले मशीन को हज़ारों लोगों पर इस्तेमाल किया जाता है, मैंने उन्हें अच्छे से समझा तो दिया है कि ऐसे टैटू गुदवाना क्यों खतरनाक है।
कुछ अरसा पहले की बात है कि पंजाब के मालवा बैल्ट में —भटिंडा, फरीदकोट, कोटकपूरा आदि इलाके में जब एक गांव में हैपेटाइटिस सी के बहुत से मरीज़ पाए गए तो पता चला कि गांव में मैडीकल का धंधा करने वाला एक नीम-हकीम एक ही सूँईं से सारे गांव वालों को टीके लगा दिया करता था………. हिंदी अखबारों को मेरी सलाह है कि अगर हड़कंप पैदा करना ही है तो ऐसे गलत कामों के प्रति करें ताकि लोग अपने आप को बचा सकें…..हैपेटाइटिस सी का इलाज तो है लेकिन बहुत कम लोग ही इसे करवा पाते हैं।