नकली, घटिया दवाईयों की सार्वजनिक सूचना

जिस जगह भी ट्रांसपेरेंसी दिखती है अच्छा लगता है …. विकसित देशों की बहुत ही बातों से हम काफ़ी कुछ सीख सकते हैं।

मैं अकसर अमेरिकी साइट फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की साइट की बहुत प्रशंसा करता हूं … इस में बहुत ही बढ़िया जानकारी हर वर्ग के लिये दी जाती है …मरीज़ों के लिए, चिकित्सकों के लिए, इंडस्ट्री के लिए – हरेक को अपने मतलब की जानकारी मिल ही जाती है।

इतनी पारदर्शिता है कि अगर कोई नकली बिक रही दवाई का पता चलता है तो जनता को सावधान करने हेतु वे उस के बारे में बिंदास ढंग से अपनी साइट पर डाल देते हैं। यहां तक कि अगर इस एजेंसी को यह भी पता चलता है कि कहीं पर इंटरनेट पर भी अगर नकली किस्म की दवाईयां बेच कर पब्लिक को चूतिया बनाया जा रहा है तो वे इस तरह की दवाईयों का पूरा विवरण भी अपनी साइट पर डाल देते हैं। हो सके तो कभी कभी इस साइट को देखा करें, कुछ न कुछ हमेशा सीखने को मिलेगा —एनर्जी ड्रिंक की पोल अकसर खुलती दिखती है, फूड-सप्लीमैंट्स का गड़बड़ घोटाला भी यहीं दिखेगा — कम से कम हम लोग इन चीज़ों के बारे में सचेत तो हो सकते हैं।

आज मैं जिस दवाई के नकली होने की बात कर रहा हूं …वह Amphetamines श्रेणी में आती है …. अभी कल रात ही जब मैं अमेरिकी बच्चों में अपना ग्रेड सुधारने के लिए जिस दवाई को लिये जाने के क्रेज़ की बात कर रहा था, वह यही है… और आज पता चला कि इंटरनेट पर बिकने वाली यह दवाई नकली है, इस के लेबल के ऊपर लिखा कुछ है और है इस में कुछ और।

काफ़ी बार ऐसे किस्सों के बारे में रिपोर्ट कर चुका हूं …इंटरनेट पर जो लोग दवाई खरीदते हैं वे अकसर अपनी शारीरिक अवस्था के बारे में गोपनीयता बनाये रखना चाहते हैं …आखिर इस में बुराई भी क्या है…. लेकिन ये इंटरनेट पर दवाईयां बेचने वाले शातिर लोग इस बात को भली-भांति जानते हैं कि वे अपने ग्राहकों को घटिया किस्म की दवाईयां भी पेल देंगें तो कुछ होने वाला नहीं …कारण, जो लोग अपनी प्राईव्हेसी की वजह से ये दवाईयां नेट से खरीद रहे हैं वे कभी दवाईयों से होने वाले दुष्परिणामों के बारे में अपनी आवाज़ नहीं उठायेंगे।

लेकिन जो भी हो, मैं तो फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के काम को पूरा अकं देता हूं …यह एजेंसी प्रशंसनीय काम कर रही है …. इस की तुलना में देखिये अपने यहां सब काम राम भरोसे ही चलता है …. जानें इतनी सस्ती हैं कि इन नकली, घटिया किस्म की दवाईयों से बहुत कुछ होता रहता है..लेकिन आवाज़ कौन उठाए, हर कोई यही सोचता है कि इस से मुझे क्या लेना देना, मेरे साथ थोड़े ही ऐसा हुआ है, यह तो दूसरों का मुद्दा है…और न्याय-प्रणाली में इतना ज्यादा समय लग जाता है ….

कुछ अस्पतालों में दवाईयों के सैंपल कभी कभी टैस्टिंग के लिए भेजे भी जाते हैं लेकिन जब तक उन कि रिपोर्ट आती है कि वे सैंपल असंतोषजनक पाये गये हैं तब तक उन दवाईयों का स्टॉक अकसर खत्म हो चुका होता है …..अब दोष का ठीकरा कौन किस के सिर पर फोड़े, लेकिन जब ये ठीकरे उत्तर प्रदेश के नेशनल रूरल हैल्थ मिशन के हज़ारों करोड़ के घोटाले की तरह फूटने शुरू होते हैं तो फिर देर-सवेर सभी दोषियों की शामत आ जाती है। पहले ही क्यों नहीं सुधर जाते भाई, सरकार अच्छी खासी तनख्वाह देती है गुज़ारे के लिये…..क्यों ऐसे चक्करों में पड़ते हो जिस में निर्दोष भोली भाली जनता जो आप को भगवान समझ कर पूजती है, उस की जान के  साथ साथ अपनी जान तक जाने का जोखिम बना रहे।
नकली दवाईयों की फेक्टरी

गुप्त रोगों के लिए नेट पर बिकने वाली दवाईयां

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मलेरिया की घटिया दवाईयों की खुली पोल

आज कल यह मुद्दा वैसे ही इतना ज़्यादा गर्माया हुआ है कि मलेरिया की रोकथाम के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले कीटनाशकों ने अपना असर खो दिया है। इस के साथ साथ अगर यह भी पता चले कि बाज़ार में मलेरिया के लिए बिकने वाली दवाईयों में ही गड़बड़ है तो फिर इस बीमारी के नियंत्रण पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा!

अमेरिकी नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ हैल्थ के वैज्ञानिकों ने 1999 से 2010 के बीच दक्षिण-पूर्वी एशिया एवं अफ्रीका से खरीदी गई मलेरिया के इलाज के लिये दी जाने वाली दवाईयों पर होने वाले क्वॉलिटी टैस्ट के 27 सैटों का विश्लेषण किया है जिसे कल ही दा लैंसेट में प्रकाशित करवाया गया है।

दक्षिण-पूर्वी एशिया एवं अफ्रीका दोनों ही जगहों से लिये गये दवाईयों के लगभग एक तिहाई नमूने फेल हो गये हैं। कुछ केसों में तो सैंपल इतने घटिया कि वे किसी संघीन ज़ुर्म की परिभाषा में आ रहे थे, कुछ ऐसे जिन में एक्सपॉयरी वाली दवा थी जिसे फिर से रि-पैक कर दिया गया था और कुछ सैंपल ऐसे जिन में दवाई की मात्रा बहुत ही कम डाली गई थी।

क्या ऐसी तस्वीरों से भी नकली दवाईयों का कारोबार करने वाला का दिल नहीं पसीजता होगा!!

इसे सुन कर ऐसा नहीं लगता कि कुष्ठ रोग का इलाज तो है, काश इस लालच रूपी कोढ़ का भी कोई इलाज दिख जाए।

मलेरिया पर काम करने वालों ने पिछले कितने वर्षों से शोर मचा रखा है कि बेअसर हो रही दवाईयों की वजह से अब मलेरिया के पैरासाइट इतने ढीठ किस्म के हो गये हैं कि उन पर आधुनिक आर्टीमैसीनिन पर आधारित दवाईयां भी असर नहीं कर रहीं। यहां तक कि पुरानी दवा जैसे कि कुनीन पर आधारित दवा भी मलेरिया के उपचार के लिये पहले दक्षिण-पूर्वी एशिया में बेअसर हुईं और बाद में यह सिलसिला अफ्रीका तक फैल गया।

लैंसेट में छपी इस खबर में सलाह दी गई है कि चीन और भारत में अधिक टैस्टिंग की जानी चाहिए क्योंकि गरीब देशों में इस्तेमाल की जाने वाली दवाईयां यहां ही बनती हैं। इस ने इस बात की भी सिफ़ारिश की है कि इन दवाईयों की प्रामाणिकता जांच करने के लिए स्क्रैच-टैग, फील्ड में टैस्टिंग के लिए स्पैक्ट्रोमीटर और शिपमैंट के दौरान ट्रैक करने के लिये रेडियोफ्रिक्वैंसी टैग्स का इस्तेमाल होना चाहिए।

An editorial accompanying the study suggested that much more testing be done in China and India, where most drugs intended for poor countries are made. It also endorsed greater use of scratch tags for authenticity checks, spectrometers for field testing and radiofrequency tags for shipment tracking.

टैस्टिंग की व्यवस्था निःसंदेह भारत में भी कुछ ज़्यादा दुरूस्त है नहीं। अब लोगों ने सूचना के अधिकार के अंतर्गत सरकारी चिकित्सास संस्थानों से यह पूछना शुरू कर दिया है कि ड्रग टैस्टिगं के लिये आप का कितना बजट है, आप ने इस में से कितना एक वर्ष में खर्च किया है और जिन जिन दवाईयों के टैस्ट आपने करवाए हैं उन के परिणाम क्या हैं? ….. शायद कुछ लोगों को ये प्रश्न अटपटे से लग रहे हों, लेकिन प्रश्न पूछने का अधिकार तो हर नागरिक है, मैंन-आपने उसे यह नहीं दिया, देश के कानून ने उसे यह हक दिया है।

प्रश्न पूछ रहे हैं लोग, चलिए कुछ तो असर दिखेगा। वरना मैंने ऐसा सुना है कि दवाईयों के जो नमूने टैस्ट के लिये भेजे जाते हैं उन की रिपोर्ट बस इतनी आती है …संतोषजनक सैंपल अथवा इस सैंपल को मापदंडों (standards) के अनुरूप नहीं पाया गया है— the sample does not conform to the standards.

ऐसे कैसे चलेगा, इतना ही लिखना काफी नहीं है, आज हर नागरिक को यह जानने का अधिकार है कि जो दवा का सैंपल फेल हुआ है उस का कारण साफ़ शब्दों में क्या है, क्या यह नकली थी, घटिया था, दवाई कम थी या फिर कोई और लफड़ा था।

कईं बार तो यह भी सुनने में आता है कि दवा की टैस्टिंग रिपोर्ट आए कितने दिन हो जाते हैं लेकिन लंबे अरसे तक यह रिपोर्ट उन इकाईयों तक पहुंच ही नहीं पाती (या जानबूझ कर पहुंचाई ही नहीं जाती ?) जिन्होंने इसे आगे मरीज़ों में बांटना होता है। इस का परिणाम यह होता है कि दवा पूरी खत्म होने पर उस संस्थान तक रिपोर्ट पहुंचती है कि उस की गुणवत्ता तो ठीक नहीं थी, शायद तब तक उस कंपनी का बिल भी पास हो जाता होगा।

सीधी सी बात है, इस में किसी तरह की भी ढील की रती भर भी गुंजाईश है ही नहीं…..सरकार ने किस लिये अपने सेवकों को मोबाईल फोन, टैलीफोन, इंटरनेट कनैक्शन लगा कर दिये हुये हैं ……उन का यह उद्देश्य यह भी होना चाहिए कि किसी भी चालू, घटिया किस्म की दवा की ख़बर को जंगल की आग की तरह फ़ैला दिया जाए। क्या यह आज की चिकित्सा व्यवस्था की नैतिक जिम्मेदारी नहीं है ….या मैंने बहुत बड़ी मांग कर दी है?

वो एयरटैल का विज्ञापन आता है ना …..Every friend counts! — मैं तो बस इतना कहूंगा कि Every patient counts…….he/she is just indispensible for his folks!  What do you say?

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नकली, घटिया दवाईयों से पैसा कमाने वाले क्या आतंकवादी नहीं हैं?

नकली, घटिया, चालू किस्म की दवाईयां मार्कीट में धड़ल्ले से बिक रही हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। कुछ वर्ष पहले की बात है टी.बी की दवाईयों के बारे में भी बहुत आ रहा था कि भारत में बिकने वाली टी.बी की कुछ दवाईयां घटिया किस्म की हैं।

अकसर इस तरह की ख़बरें देख-सुन कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं …जिन प्रोग्रामों के ऊपर सरकार करोड़ों रूपये खर्च कर रही है, इन के लिये इस्तेमाल की जाने वाली दवाईयों में इतने घपलेबाजी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आम इंसान तक पहुंचने वाली दवाईयों की गुणवत्ता के साथ जो लोग खिलवाड़ करते हैं, वे मुझे तो कभी भी किसी आतंकवादी से कम नहीं लगे। लगें भी क्यों, ये कितनी ज़िंदगीयां लील लेते हैं, कोई गिनती ही नहीं है। आम आदमी की तो चीख में भी दम नहीं होता, न ही इन दरिंदों को कानून के शिकंजे तक पहुंचाने की बेचारे में ताकत होती है।

अपनी बात कहने की स्वतंत्रता है, ब्लॉग मेरा अपना है, इसलिए मन की एक बात तो लिखना ही चाहता हूं….मेरी हमेशा तमन्ना रही है कि जो भी लोग नकली, घटिया या चालू किस्म की दवाईयों से किसी भी प्रकार से संबंधित रहे हैं, उन को पब्लिक को ही सौंप दिया जाना चाहिए ….वह इन का जो भी फैसला करे। ये दरिंदे सच में बड़े शातिर, हैवान किस्म के होते हैं और इन की पहुंच बड़ी ऊपर तक होती है।

उत्तर प्रदेश में नेशनल रूरल हैल्थ मिशन (राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थय मिशन) के साथ क्या हुआ? — करोड़ों अरबों की घपलेबाजी ……इतनी जानें चली गईं ….लेकिन हर बंदे का यही कहना कि हमनें कुछ नहीं किया ….अगर किसी ने भी कुछ नहीं किया तो शायद ये सब घिनौने काम भूत-प्रेत ही कर गये होंगे।

मैं भी कहां का कहां पहुंच गया ….जिस जगह भी बेचारे आम आदमी को चु..या बनते देखता हूं मैं उस की जगह पर अपने आप को खड़ा पाता हूं ….मेरे से यह सब देखा नहीं जाता और सिर दुःखने लग जाता है जो कि तब तक ठीक नहीं होता जब तक इस तरह का कुछ लिख कर अपनी जिम्मेदारी से फ़ारिग होने का ढोंग न कर लूं!!

अभी कुछ दिन पहले की ही बात है कि बीबीसी की साइट पर एक बड़ी खबर छपी कि भारत तो नकली एवं प्रतिबंधित दवाईयों को ठेलने का एक अड्डा बन चुका है। बीबीसी की न्यूज़ बिना किसी ठोस प्रमाण के नहीं होती, अभी मैं पिछले एक सप्ताह से इस मुद्दा का अध्ययन कर ही रहा था कि आज सुबह पता चला कि मलेरिया की दवाईयों में भी लफड़ा है। आखिर यह लफड़ा है क्या, इस की चर्चा अगली पोस्ट में करता हूं।

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